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बेबस मां की मजबूरी, रस्सी से बंधा बेटा : गरियाबंद के सुखरीडबरी गांव में 35 साल के मानसिक अस्वस्थ बेटे की देखभाल में जूझ रही मां, प्रशासन से लगाई गुहार

नीलम अहिरवार

नीलम अहिरवार

Jun 09, 2026
06:00 AM
गरियाबंद के सुखरीडबरी गांव में  35 साल के मानसिक अस्वस्थ बेटे की देखभाल में जूझ रही मां, प्रशासन से लगाई गुहार

गरियाबंद से धनंंजय बिहारी की रिपोर्ट

गरियाबंद:छत्तीसगढ़ सरकार विशेष पिछड़ी जनजातियों के विकास और कल्याण के बड़े-बड़े दावे करती हैं लेकिन गरियाबंद के एक गांव से आई ये तस्वीर उन दावों की हकीकत बयां करती है। यहां एक बुजुर्ग मां अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे की देखभाल के लिए ऐसी मजबूरी झेल रही है, जिसे देखकर किसी का भी दिल पसीज जाए। आधार कार्ड न होने से बेटा सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित है और मां आज भी प्रशासन की मदद का इंतजार कर रही है। गरियाबंद जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर छुरा ब्लॉक के ग्राम पंचायत कोपेकासा के आश्रित गांव सुखरीडबरी में रहने वाली अग्नि बाई भुंजिया की जिंदगी संघर्ष की मिसाल बन चुकी है। उनका 35 वर्षीय बेटा महेश भुंजिया मानसिक रूप से अस्वस्थ है और वर्षों से बीमारी से जूझ रहा है। मां की उम्र ढल चुकी है, लेकिन बेटे की देखभाल की जिम्मेदारी आज भी उनके कंधों पर है। परिजनों के मुताबिक महेश जब महज पांच साल का था, तब वह गंभीर मलेरिया की चपेट में आ गया था। समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाने के कारण उसकी मानसिक स्थिति प्रभावित हो गई। तब से लेकर आज तक वह सामान्य जीवन नहीं जी पा रहा है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर है, जिससे बेहतर उपचार कराना संभव नहीं हो पाया।

बेबस मां की मजबूरी, रस्सी से बंधा बेटा

सबसे दर्दनाक तस्वीर तब सामने आती है, जब अग्नि बाई रोजी-रोटी की व्यवस्था के लिए घर से बाहर निकलती हैं। बेटे की सुरक्षा को लेकर चिंतित मां मजबूरी में उसे घर के बरामदे में रस्सी से बांधकर छोड़ जाती हैं, ताकि वह कहीं भटक न जाए या किसी हादसे का शिकार न हो। यह दृश्य प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को साफ दिखाता है।

सरकारी दावों के बीच बेबस मां की पुकार
 

परिवार विशेष पिछड़ी जनजाति भुंजिया समुदाय से ताल्लुक रखता है। इसके बावजूद उन्हें शासन की कई महत्वपूर्ण योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। परिवार का कहना है कि महेश का आधार कार्ड आज तक नहीं बन पाया है। आधार कार्ड नहीं होने की वजह से उसे न तो सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिल रही है और न ही राशन जैसी बुनियादी सुविधाओं का पूरा लाभ मिल पा रहा है।  ग्रामीणों का कहना है कि कुछ समय पहले प्रशासनिक अधिकारियों ने परिवार की स्थिति का जायजा लिया था और मदद का भरोसा भी दिया था। लेकिन आश्वासन के बाद भी कोई ठोस पहल नहीं हुई। अब एक ओर सरकार विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने और योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर सुखरीडबरी की यह बेबस मां अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे के साथ आज भी सहायता की आस लगाए बैठी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन इस परिवार की सुध कब लेता है और उनकी समस्याओं का समाधान कब तक हो पाता है।

नीलम अहिरवार
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नीलम अहिरवार

17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।

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