Download App

Latest News

इजराइल दौरा : प्रवासी भारतीयों के स्वागत से भावविभोर हुए पीएम मोदी, दृष्टिहीन गायिका की मनमोहन प्रस्तुति ने जीता दिलयादों में राष्ट्र ऋषि : जेपी की ढाल और आपातकाल का 'अंडरग्राउंड कमांडर'कूनो नेशनल पार्क में दिखा फॉरेस्ट ऑउलेट : विलुप्त प्रजाति का दिखना जैव विविधता संरक्षण के लिए शुभ संकेत, 1872 में खोजा गया था पहली बार3 करोड़ के बैंक ऋण घोटाले में ईओडबल्यू की एफआईआर : संपत्तियां बैंक में गिरवी रखवाकर आरोपियों ने की जालसाजी प्रेग्नेंसी में इन फलों का करें सेवन : मां के साथ शिशु के लिए भी फायदेमंदलीला मजूमदार जयंती विशेष : बच्चों को 'पाताल दीदी' जैसी रचना देने वाली रचनाकार, जो कहलाईं बाल साहित्य की जादूगरनी

लीला मजूमदार जयंती विशेष : बच्चों को 'पाताल दीदी' जैसी रचना देने वाली रचनाकार, जो कहलाईं बाल साहित्य की जादूगरनी

बच्चों को 'पाताल दीदी' जैसी रचना देने वाली रचनाकार, जो कहलाईं बाल साहित्य की जादूगरनी
a

admin

Feb 26, 202601:15 PM

नई दिल्ली । बांग्ला साहित्य में ऐसे कई रचनाकार हुए, जिनके कलम का जादू आज भी कविता-कहानियों समेत अन्य विधा के रूप में अमर है। ऐसी एक बाल साहित्य की जादूगरनी कहलाईं लीला मजूमदार, उन चुनिंदा महिला साहित्यकारों में से एक, जिन्होंने बच्चों की कहानियों से लेकर वयस्क उपन्यासों तक हर उम्र के पाठकों को अपनी रचना से समृद्ध किया।

लीला मजूमदार की रचनाएं बालमन की पसंद तो हैं ही, साथ ही महिलाओं के जीवन, भावनाओं और संघर्षों की सच्ची हितैषी भी साबित हुईं। लीला मजूमदार का जन्म 26 फरवरी 1908 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता प्रमदा रंजन रे, प्रसिद्ध लेखक उपेंद्रकिशोर राय चौधरी के छोटे भाई थे। बचपन के शुरुआती साल उन्होंने शिलांग में बिताए। स्कूली शिक्षा लोरेटो कॉन्वेंट और सेंट जॉन्स डायोसेसन स्कूल से पूरी की, जहां मेधावी लीला अक्सर उच्च अंक लाती थीं।

कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स और मास्टर्स दोनों में गोल्ड मेडल जीतने के बाद उन्होंने शिक्षण कार्य दार्जिलिंग के महारानी गर्ल्स स्कूल में शुरू किया, फिर रवींद्रनाथ टैगोर के आग्रह पर शांतिनिकेतन में शामिल हुईं। बाद में आशुतोष कॉलेज और ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। रेडियो पर उन्होंने ‘महिला महल’ सीरीज में ‘मोनिमाला’ नामक किरदार रचा, जो एक साधारण मध्यमवर्गीय बंगाली लड़की की जिंदगी को खूबसूरती से दिखाता है। यह किरदार लाखों महिलाओं से जुड़ गया।

लीला मजूमदार के साहित्यिक सफर की शुरुआत किशोरावस्था में चाचा उपेंद्रकिशोर द्वारा शुरू की गई पत्रिका ‘संदेश’ में कहानी ‘लक्खी छेले’ से हुई। उनकी पहली बच्चों की किताब ‘बैद्यनाथर बोरी’ आई, लेकिन ‘दिन दुपुरे’ ने आलोचकों की तारीफ बटोरी और उन्हें ख्याति दिलाई। उन्होंने कुल 125 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें कहानी संग्रह, उपन्यास, कविताएं, संस्मरण, रसोई की किताबें, अनुवाद और संपादित ग्रंथ शामिल हैं।

लीला मजूमदार की कहानियां रोजमर्रा की जिंदगी की सच्चाई को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करती थीं, लेकिन उनमें गहरा जादू और संवेदनशीलता थी। उन्होंने मजबूत महिला पात्र रचे, जो घरेलू जीवन की जटिलताओं को बखूबी उजागर करते थे। बच्चों के लिए उन्होंने सपनों भरी दुनिया बनाई, जबकि वयस्क पाठकों को पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मुद्दों पर सोचने को मजबूर किया।

उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘बक बध पाला’ एक हास्य-नाटक है, जिसके लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला। उपन्यास ‘पाडी पिशिर बोरमी बक्शो’ पर सत्यजीत रे फिल्म बनाने की योजना बना चुके थे, बाद में अरुंधति देवी ने इसे फिल्माया। उन्होंने शेक्सपियर, जोनाथन स्विफ्ट और अर्नेस्ट हेमिंग्वे जैसे लेखकों के कार्यों का बांग्ला अनुवाद भी किया।

Powered by Tomorrow.io

Advertisement

Ad

Related Post

Placeholder
लीला मजूमदार जयंती विशेष : बच्चों को 'पाताल दीदी' जैसी रचना देने वाली रचनाकार, जो कहलाईं बाल साहित्य की जादूगरनी