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वैदिक जयोतिषः कल से मीन राशि में अस्त होंगे न्याय के दवेता शनि,:इतने दिन चुनौतीपूर्ण रहेंगे इन राशि वालों को, नकारात्मक परिस्थितियां आ सकती है सामने
वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह को कर्म, न्याय और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। जब शनि अपनी चाल बदलते हैं या अस्त होते हैं, तो इसका प्रभाव कई राशियों के जीवन पर देखने को मिलता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार शुक्रवार यानि 13 मार्च 2026 से शनि मीन राशि में अस्त हो जाएंगे और लगभग 35 दिनों तक यानी 17 अप्रैल 2026 तक इसी अवस्था में रहेंगे। इस दौरान कुछ राशियों के लिए समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से तुला, मकर और कुंभ राशि के जातकों को इस अवधि में अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।तुला राशि: तुला राशि में शनि को उच्च का ग्रह माना जाता है, इसलिए इस राशि के लोगों पर शनि का प्रभाव विशेष रूप से देखा जाता है। जब शनि अस्त होते हैं तो कुछ नकारात्मक परिस्थितियां सामने आ सकती हैं। इस दौरान अचानक खर्च बढ़ने की संभावना है, जिससे आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है। पैसों के लेन-देन में सावधानी रखना बेहद जरूरी होगा। इसके अलावा बातचीत करते समय शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि छोटी सी बात भी गलतफहमी पैदा कर सकती है। परिवार और कार्यस्थल दोनों जगह धैर्य बनाए रखना बेहतर रहेगा। ज्योतिष के अनुसार शनिवार के दिन सरसों के तेल का दान करना इस समय लाभकारी माना जाता है।मकर राशि: मकर राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं, इसलिए शनि के अस्त होने का प्रभाव इस राशि के लोगों पर ज्यादा महसूस हो सकता है। इस समय आत्मविश्वास में थोड़ी कमी आ सकती है और कामकाज में मन भी कम लग सकता है। अगर कोई कानूनी मामला चल रहा है तो उसमें देरी या अड़चन आने की संभावना बन सकती है। आर्थिक मामलों में सतर्क रहना जरूरी होगा, इसलिए उधार लेने या देने से बचना बेहतर रहेगा। नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को सफलता पाने के लिए पहले से अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। इस दौरान नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना गया है।कुंभ राशि: कुंभ राशि के स्वामी भी शनि ही हैं, इसलिए शनि के अस्त होने का असर इस राशि के जातकों पर भी देखने को मिल सकता है। करियर और कारोबार से जुड़े फैसले सोच-समझकर लेना जरूरी होगा, क्योंकि जल्दबाजी में लिया गया निर्णय परेशानी का कारण बन सकता है। इस समय व्यवहार थोड़ा कठोर हो सकता है, जिससे रिश्तों पर असर पड़ सकता है। आर्थिक मामलों में लापरवाही नुकसान पहुंचा सकती है। प्रेम और वैवाहिक जीवन में भी छोटी-मोटी परेशानियां आ सकती हैं। ऐसे में काले कुत्ते को रोटी खिलाना शुभ माना जाता है।

देवी भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से:घटस्थापना के लिए हैं दो शुभ मुहूत, भक्तों के लिए खास रहेगी इस बार की नवरात्रि
सनातन धर्म में चैत्र नवरात्र का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है और नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। होली के बाद आने वाला यह पहला प्रमुख धार्मिक पर्व होता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्र की शुरुआत 19 मार्च, गुरुवार से हो रही है, जो भक्तों के लिए अत्यंत शुभ मानी जा रही है। इस दिन कलश स्थापना के साथ नवरात्र के व्रत की शुरुआत की जाएगी।पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट से प्रारंभ होकर 20 मार्च को सुबह 4 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों के निर्धारण में उदयातिथि का विशेष महत्व होता है। इसी कारण 19 मार्च को ही चैत्र नवरात्र का आरंभ माना जाएगा और इसी दिन श्रद्धालु घटस्थापना कर व्रत रखेंगे। नवरात्र के पहले दिन माता दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है।इस वर्ष चैत्र नवरात्र की शुरुआत तीन विशेष शुभ योगों में हो रही है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन शुक्ल योग, ब्रह्म योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को अत्यंत शुभ माना जाता है और इनकी उपस्थिति में किए गए पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं।कलश स्थापना या घटस्थापना के लिए 19 मार्च को दो विशेष शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। पहला और सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 52 मिनट से 7 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। यदि किसी कारणवश इस समय पूजा न कर पाएं तो दोपहर के अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापना की जा सकती है, जो 12 बजकर 05 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा।इसके अलावा नवरात्र के पहले दिन कई अन्य शुभ मुहूर्त भी रहेंगे। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से 5 बजकर 39 मिनट तक रहेगा, जबकि प्रातः संध्या का समय सुबह 5 बजकर 15 मिनट से 6 बजकर 26 मिनट तक होगा। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 29 मिनट से 6 बजकर 53 मिनट तक और सायं संध्या 6 बजकर 32 मिनट से 7 बजकर 43 मिनट तक रहेगी। इसके अतिरिक्त अमृत काल रात 11 बजकर 32 मिनट से 1 बजकर 03 मिनट तक तथा निशिता मुहूर्त रात 12 बजकर 05 मिनट से 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा।इन शुभ योगों और मुहूर्तों के संयोग में शुरू हो रहा चैत्र नवरात्र भक्तों के लिए विशेष फलदायी माना जा रहा है। श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा कर सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करेंगे।

हस्यमयी डोडीताल:हिमालय की गोद में वह पवित्र झील जहां जुड़ी है भगवान गणेश के पुनर्जन्म की कथा
उत्तरकाशी । हिमालय की गोद में बसी डोडीताल झील सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं बल्कि धार्मिक आस्था और पौराणिक महत्व के लिए भी खास मानी जाती है। इसे भगवान गणेश का जन्मस्थान माना जाता है। इसके आसपास की वादियां, बर्फ से ढके जंगल और पहाड़ इस स्थल को और भी खास बना देते हैं। डोडीताल झील के पास एक प्राचीन गणेश मंदिर स्थित है, जहां भगवान गणेश माता पार्वती (अन्नपूर्णा के रूप में) के साथ विराजमान हैं। इसके आसपास की वादियां, बर्फ से ढके जंगल और पहाड़ इस स्थल को और भी अलौकिक बना देते हैं। सर्दियों में जब झील और आसपास का क्षेत्र बर्फ की सफेदी में ढक जाता है, तो पूरा दृश्य ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने यहां अपना सबसे शांतिपूर्ण और दिव्य रूप सजाया हो।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तराखंड का डोडीताल वही पावन स्थल है जहां माता पार्वती ने अपने उबटन से भगवान गणेश की रचना की थी। कथा के अनुसार, माता पार्वती जब स्नान कर रही थीं, तब उन्होंने बालक गणेश को द्वारपाल के रूप में नियुक्त कर किसी को भी भीतर न आने देने का आदेश दिया। इसी बीच जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो अपने पिता के परिचय से अनजान बालक गणेश ने उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक दिया।इस हठ से क्रोधित होकर महादेव ने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती के विलाप और दुःख को देखकर भगवान शिव ने उन्हें पुनर्जीवित करने का वचन दिया और गणेश जी के धड़ पर गज (हाथी) का मुख लगाकर उन्हें पुनः जीवित किया।डोडीताल झील समुद्र तल से लगभग 3,024 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। झील का पानी क्रिस्टल की तरह साफ और नीला है, जिसमें हिमालयन गोल्डन ट्राउट मछलियां पाई जाती हैं। चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियां, घने जंगल और अल्पाइन घास के मैदान इस जगह को जैसे किसी स्वर्ग में बदल देते हैं। यहां आने वाले लोग न सिर्फ हिमालय की सुंदरता को निहारते हैं, बल्कि भगवान गणेश की कथा और उनके पुनर्जन्म की पौराणिक गाथा को भी महसूस कर पाते हैं।

माथे पर त्रिपुंड, सिर पर नया मुकुट:निराकार से साकार रूप के दर्शन कर निहाल हुए भोले के भक्त, जय महाकाल के जयकारों से गूंजा परिसर
उज्जैन। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि बुधवार को विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार किया गया। इसे देखने के लिए भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लगी थीं। देश-विदेश से आए श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन और उनके विशेष शृंगार को देखने के लिए उत्सुक दिखे। सुबह 4 बजे की प्रसिद्ध भस्म आरती के समय मंदिर परिसर पूरी तरह से भक्तों से भर गया था। पूरा परिसर जय महाकाल के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और आस्था साफ दिखाई दे रही थी।महानिर्वाणी अखाड़े ने अर्पित की भस्ममध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में सुबह की भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। इस आरती में महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई, और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं ने श्रुंगार को बनाया आकर्षकअभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई। इसके बाद बाबा का विशेष शृंगार किया गया, जिसमें महाकाल का मुखारविंद (कमल के समान सुंदर मुख) बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया। बाबा के माथे पर स्पष्ट त्रिपुंड व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला पहनाई गई। साथ ही ताजा बिल्वपत्र (बेलपत्र) चढ़ाए गए और रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं से पूरे शृंगार को और भी आकर्षक बनाया गया। यह नजारा देखकर हर किसी का मन प्रसन्न हो गया।12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है महाकालेश्वर मंदिरमहाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे बहुत खास माना जाता है। यह दुनिया का एकमात्र दक्षिणमुखी स्वयंभू शिवलिंग है। भगवान शिव यहां कालों के काल महाकाल के रूप में विराजमान हैं। महाकाल के दर्शन के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। मंदिर की वास्तुकला में कई शैलियों का भव्य संगम देखने को मिलता है। यहां ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली अलौकिक भस्म आरती के दर्शन हेतु देश-विदेश से भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।

11 मार्च 2026 का राशिफल:कर्क सहित कई राशियों के लिए दिन अनुकूल, कहीं धन लाभ तो कहीं संयम की जरूरत
बुधवार 11 मार्च 2026 को चंद्रमा वृश्चिक राशि में गोचर कर रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह स्थिति कई राशियों के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आ सकती है। कुछ लोगों को अचानक धन लाभ या आय में वृद्धि के योग बन सकते हैं, जबकि लंबे समय से अटके हुए कार्य भी पूरे होने की संभावना है। बेरोजगार लोगों को भी आज किसी शुभ समाचार की प्राप्ति हो सकती है। हालांकि कुछ राशियों को अपनी वाणी और व्यवहार पर संयम रखने की सलाह दी गई है। आइए जानते हैं आज सभी 12 राशियों का राशिफल।मेष राशिमेष राशि के जातकों के लिए आज का दिन सामान्य लेकिन प्रभावी रहने वाला है। बदलती परिस्थितियों में सूझबूझ और धैर्य से काम लेना जरूरी होगा। परिवार का सहयोग मिलने से आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। हालांकि सफेदपोश ठगों और धूर्त लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। कार्यक्षेत्र में विस्तार की योजनाएं गति पकड़ सकती हैं और आपके प्रयासों को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।वृष राशिवृष राशि वालों को आज सामंजस्य बनाए रखने पर ध्यान देना होगा। महत्वपूर्ण चर्चाओं में आपकी पहल फायदेमंद साबित हो सकती है। लाभ की स्थिति अच्छी रहेगी, लेकिन नए लोगों पर तुरंत भरोसा करने से बचें। स्वास्थ्य को लेकर थोड़ी सावधानी रखें और किसी भी विवाद से दूर रहना बेहतर रहेगा।मिथुन राशिमिथुन राशि के लोगों को आज मेहनत के मुकाबले थोड़ा कम लाभ मिल सकता है, इसलिए धैर्य बनाए रखें। कार्यक्षेत्र में लापरवाही से बचना जरूरी है। अनुशासन और समय सीमा का पालन करने से सफलता के रास्ते खुलेंगे। पेशेवर लोगों से संपर्क मजबूत होगा और आपके कौशल की सराहना हो सकती है।कर्क राशिकर्क राशि के जातकों के लिए आज का दिन काफी सकारात्मक रह सकता है। कार्यों में तेजी आएगी और उलझे हुए मामले सुलझ सकते हैं। विरोधियों की सक्रियता कम रहेगी, जिससे राहत मिलेगी। मित्रों और सहयोगियों के साथ मिलकर किए गए प्रयासों में सफलता मिल सकती है। कई परिणाम आपके पक्ष में बनते नजर आएंगे।सिंह राशिसिंह राशि वालों का ध्यान आज घर की सुविधाओं और पारिवारिक जरूरतों पर रहेगा। भौतिक वस्तुओं की खरीदारी के योग बन सकते हैं। पेशेवर क्षेत्र में प्रदर्शन अच्छा रहेगा और सफलता का प्रतिशत बढ़ेगा। छात्रों को भी परीक्षा में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।कन्या राशिकन्या राशि के लोगों के लिए आज सामाजिक तालमेल मजबूत रहेगा। संपर्क और संवाद के जरिए नए अवसर मिल सकते हैं। परिवार के साथ संबंध बेहतर होंगे। हालांकि निजी रिश्तों में किसी भी तरह के विवाद से दूर रहने की सलाह दी गई है।तुला राशितुला राशि के जातकों का मधुर व्यवहार आज उन्हें खास बना सकता है। परिवार और रिश्तेदारों के साथ संबंधों में मिठास बढ़ेगी। घर में खुशी का माहौल रहेगा और किसी शुभ आयोजन की संभावना भी बन सकती है। हालांकि अनावश्यक बहस से बचना बेहतर रहेगा।वृश्चिक राशिवृश्चिक राशि वालों के लिए आज सकारात्मकता से भरा दिन हो सकता है। नए विचारों को अपनाने का अवसर मिलेगा। बैठकों और बातचीत में आपका प्रभाव बढ़ेगा। परिवार और मित्रों का सहयोग मिलने से कई पुराने मुद्दे सुलझ सकते हैं।धनु राशिधनु राशि के जातकों को आज खर्चों पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। निवेश से जुड़े प्रस्तावों को ध्यान से समझें और जल्दबाजी से बचें। विदेश से जुड़े कार्यों या संपर्कों में रुचि बढ़ सकती है। खानपान और दिनचर्या पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।मकर राशिमकर राशि वालों के लिए आज वित्तीय अवसर बन सकते हैं। करियर और कारोबार में लाभ के संकेत हैं। पेशेवर संपर्क बढ़ेंगे और आपकी प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हो सकती है। लेनदेन में स्पष्टता बनाए रखना आपके लिए फायदेमंद रहेगा।कुंभ राशिकुंभ राशि के लोगों को आज कार्यक्षेत्र में अच्छा सहयोग मिलेगा। अधिकारियों के साथ मुलाकात और संवाद बढ़ सकता है। आय में वृद्धि के योग बन रहे हैं और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोगों को सफलता मिल सकती है।मीन राशिमीन राशि के जातकों के लिए आज भाग्य का साथ मिलने के संकेत हैं। धार्मिक और सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। वरिष्ठों की सलाह से महत्वपूर्ण निर्णय लेना लाभकारी रहेगा। सरकारी या प्रशासनिक कार्यों में भी सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।ज्योतिषियों के अनुसार आज अधिकांश राशियों के लिए भगवान गणेश की पूजा करना शुभ माना गया है। पान और मोदक का भोग लगाकर “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करने से दिन शुभ और मंगलमय रह सकता है।

वैदिक ज्योतिष:राहु-मंगल-बुध की दुर्लभ युति! इन 3 राशियों को मिल सकते हैं बड़े चैलेंज
नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब राहु किसी अन्य ग्रह के साथ युति बनाते हैं तो उसका प्रभाव अक्सर चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस समय कुंभ राशि में राहु के साथ मंगल और बुध भी मौजूद हैं, जिससे त्रिग्रही योग बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक यह स्थिति 11 अप्रैल 2026 तक बनी रहेगी और इस दौरान कुछ राशियों के लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।ज्योतिष शास्त्र में राहु को भ्रम, अस्थिरता और अचानक बनने वाली परिस्थितियों से जोड़ा जाता है, जबकि मंगल ऊर्जा, साहस और आवेग का प्रतीक है। वहीं बुध बुद्धि, तर्क और निर्णय क्षमता के कारक माने जाते हैं। इन तीनों ग्रहों की एक साथ मौजूदगी कई बार व्यक्ति को जल्दबाजी में निर्णय लेने की ओर प्रेरित कर सकती है। इसलिए इस समय सोच-समझकर कदम उठाना जरूरी बताया जा रहा है।मेष राशि के लोगों के लिए यह समय कुछ चुनौतियां लेकर आ सकता है। कामकाज में रुकावटें आने की संभावना है और कई बार बनते हुए काम भी अचानक अटक सकते हैं। नौकरी या व्यापार से जुड़े मामलों में जल्दबाजी में लिया गया फैसला नुकसान पहुंचा सकता है। आर्थिक मामलों में भी सतर्क रहना जरूरी रहेगा, क्योंकि खर्च बढ़ सकते हैं। परिवार में छोटी-मोटी बातों को लेकर तनाव की स्थिति बन सकती है।कर्क राशि के जातकों को इस अवधि में धैर्य बनाए रखने की जरूरत होगी। मेहनत के बावजूद परिणाम मिलने में देरी हो सकती है। खर्चों में बढ़ोतरी से आर्थिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। निवेश या साझेदारी से जुड़े मामलों में जल्दबाजी से बचना बेहतर रहेगा। कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ गलतफहमी भी हो सकती है, इसलिए बातचीत में संयम रखना जरूरी होगा।वृश्चिक राशि के लोगों के लिए भी यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है। योजनाएं बनाने के बावजूद काम समय पर पूरे न होने की संभावना है। कार्यस्थल पर आलोचना या विरोध का सामना करना पड़ सकता है। आर्थिक मामलों में सावधानी जरूरी है, क्योंकि जल्दबाजी में लिया गया फैसला नुकसान दे सकता है। ऐसे समय में धैर्य और सकारात्मक सोच बनाए रखना लाभदायक माना गया है।

बाबा महाकाल:भोलेनाथ की भक्ति में लीन हुईं टेलीविजन इंडस्ट्री की मशहूर अभिनेत्री, दर्शन के अनुभव को बताया 'दिव्य'
उज्जैन । टेलीविजन इंडस्ट्री की मशहूर अभिनेत्री कनिका मान मध्य प्रदेश के उज्जैन में बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंची। इस दौरान उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर में बाबा भोलेनाथ का आशीर्वाद लिया और काफी देर तक हाथ जोड़कर बाबा के भक्ति रस में डूबी नजर आईं। माथे पर लाल चंदन लगाए नंदी महाराज के पास मौजूद अभिनेत्री बाबा महाकाल को निहारती नजर आईं। दर्शन के बाद उन्होंने बताया कि यह उनके लिए महाकाल के दर्शन का पहला अवसर था।कनिका ने कहा, "यहां मैं पहली बार बाबा के दर्शन के लिए आई हूं और मुझे नहीं पता था कि मेरा अनुभव इतना खास व यादगार होगा। मैं बाबा की सच्ची भक्त हूं, इसलिए मंदिर जाना मेरे लिए उत्साह था, लेकिन यहां का अनुभव वाकई और भी अद्भुत था।"उन्होंने भस्म आरती के बारे में खास तौर पर बात की। कनिका ने कहा, "भस्म आरती का अनुभव मेरे लिए बहुत खास रहा। वहां बहुत भीड़ थी, लेकिन मुझे ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं हुआ कि कोई परेशानी हो रही है। जब मैं पीछे मुड़ी तो देखा कि इतनी बड़ी भीड़ है, फिर भी हर कोई शांति से और आराम से दर्शन कर रहा था। मुझे लगा कि सब वही दिव्य अनुभव ले रहे हैं जो मैं ले रही थी। मैं आगे की पंक्ति में बैठी थी और सब बहुत खुश नजर आ रहे थे।"अभिनेत्री ने मंदिर प्रबंधन की तारीफ की। उन्होंने कहा, "मंदिर कमिटी ने सारे इंतजाम इतने अच्छे तरीके से किए हैं कि किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई। सब कुछ बहुत सुव्यवस्थित था। इसलिए मैं सबको कहना चाहूंगी कि डरने की कोई जरूरत नहीं है। लोग सोचते हैं कि भीड़ ज्यादा है, दर्शन नहीं हो पाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। आप जरूर आ सकते हैं। कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं खुद लास्ट मिनट में आई थी और फिर भी अच्छे से आगे बैठकर दर्शन किए।"

हिन्दू धर्म में शीतला अष्टमी का विशेष महत्व:सच्चे मन और श्रद्धा भक्ति करने पर बनी रहती है मां की कृपा, बचें इस तरह की गलतियों से
चैत्र माह में मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन माता शीतला की पूजा-अर्चना की जाती है और उनसे परिवार के सदस्यों को रोगों और बीमारियों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि मौसम परिवर्तन के समय कई तरह की संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए शीतला माता की पूजा कर स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इस वर्ष शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा।शीतला अष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमें दाल-भात, पूरी, दही, लस्सी और हरी सब्जियां शामिल होती हैं। परंपरा के अनुसार इन सभी व्यंजनों को अगले दिन ठंडा और बासी रूप में खाया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन इन्हीं पकवानों का भोग माता शीतला को अर्पित किया जाता है, जिसके बाद परिवार के सदस्य प्रसाद के रूप में उसे ग्रहण करते हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाना चाहिए। इसलिए जो भी भोजन बनाना होता है, वह एक दिन पहले ही तैयार कर लिया जाता है। इस दिन ठंडा और बासी भोजन करने की परंपरा है, जिसे शरीर के लिए ठंडक देने वाला माना जाता है।इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद शीतला माता के मंदिर जाकर दर्शन करना चाहिए और विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान माता को हल्दी, दही और बाजरा का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर नीम के पत्तों का भी विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि नीम स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है और रोगों से बचाव में सहायक होता है।शीतला अष्टमी का पर्व केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि यह स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने का संदेश भी देता है। इस दिन आखिरी बार बासी भोजन करने की परंपरा मानी जाती है। इसके बाद लंबे समय तक बासी भोजन करने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन घर में पूजा करने के साथ-साथ शीतला माता के मंदिर जाना भी शुभ माना जाता है। इसके अलावा भगवान शिव की पूजा करने का भी विधान बताया गया है। कहा जाता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से की गई पूजा से माता शीतला की कृपा बनी रहती है और परिवार को रोगों से सुरक्षा मिलती है।

महाकालेश्वर मंदिर भस्मारती:बाबा महाकाल का भव्य श्रृंगार निहारने उत्सुक हुए भक्त, चेहरों पर दिखाई दी भक्ति और आस्था की झलक
उज्जैन। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में हर रोज सुबह की भस्म आरती लोकप्रिय रहती है। इस आरती के लिए भक्त देर रात से ही मंदिर परिसर पहुंचना शुरू कर देते हैं। मंगलवार को चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर भगवान महाकाल का खास शृंगार किया गया। इस मौके पर सुबह की भस्म आरती के दौरान मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतार देखने को मिली। देश-विदेश से आए श्रद्धालु बाबा का भव्य श्रृंगार देखने के लिए उत्सुक नजर आए। पूरा मंदिर बाबा के भक्तों की लंबी कतारों से भरा हुआ है। पूरा मंदिर परिसर जय महाकाल के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और आस्था साफ दिखाई दे रही थी।अपनी खासियत के लिए मानी जाती है भस्मारतीमहाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती अपनी खासियत के लिए जानी जाती है। इसमें भस्म से बाबा का अभिषेक किया जाता है, जो बहुत दिव्य और खास अनुभव देता है। बाबा की भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।पंचामृत से पूजा और पवित्र भस्म से बाबा को कराया स्नानमध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती की गई। इस दौरान भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई।इसके बाद बाबा को चंदन से शृंगार किया गया व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला पहनाई गई। भक्त बाबा का अद्भुत शृंगार देखकर खुशी से गदगद दिखे। हर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है। इस आरती में शामिल होने के लिए भक्त देश-विदेश से आते हैं।

भक्तों के लिए खुशखबरी: चारधाम यात्रा के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू, 17 अप्रैल से होगी ऑनलाइन बुकिंग
देहरादून। भक्तों के लिए खुशखबरी है। चारधाम यात्रा-2026 के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन आज सुबह 7 बजे से शुरू हो गया है। जबकि 17 अप्रैल से ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू होगा। उत्तराखंड सरकार ने यात्रा से पहले रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया है। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन उत्तराखंड सरकार की वेबसाइट रजिस्ट्रेशनडीटूरिस्टकेयर.यूके.जीओवी.इन और मोबाइल ऐप टूरिस्ट केयर उत्तराखंड से कर सकते हैं। उत्तराखंड सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, 19 अप्रैल को यमुनोत्री और गंगोत्री के कपाट खुलेंगे। 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलेंगे। श्रीहेमकुण्ड साहिब की आधिकारिक घोषणा बाद में की जाएगी। उत्तराखंड सरकार की ओर से बताया गया है कि चारधाम यात्रा 2026 में आने के लिए भारतीय श्रद्धालु अपना पंजीकरण आधार कार्ड के माध्यम से कर सकेंगे, जबकि विदेशी श्रद्धालुओं के लिए ई-मेल आईडी की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।यहां खुलेंगे पंजीकरण केन्द्रजिन श्रद्धालुओं के पास आधार कार्ड उपलब्ध नहीं है, उनके लिए पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी पंजीकरण काउंटरों की व्यवस्था की गई है। इन काउंटरों पर रजिस्ट्रेशन कपाट खुलने से दो दिन पूर्व, 17 अप्रैल 2026 से प्रारम्भ की जाएगी। पंजीकरण केन्द्र एवं ट्रांजिट कैंप ऋषिकेश, पंजीकरण केन्द्र ऋषिकुल ग्राउंड हरिद्वार और पंजीकरण केंद्र विकास नगर देहरादून में खुलेंगे।उत्तराखंड सरकार ने श्रद्धालुओं से की अपीलश्रद्धालु किसी भी प्रकार की जानकारी या असुविधा होने पर टोल फ्री नंबर 0135-1364 पर कॉल कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उत्तराखंड सरकार ने चारधाम यात्रा में आने वाले सभी श्रद्धालुओं से अनुरोध किया है कि यात्रा को सुगम एवं व्यवस्थित बनाने के लिए यात्रा से पूर्व अपना पंजीकरण अनिवार्य रूप से करवा लें।मान्यताः यमुनोत्री से यात्रा शुरू करने पर नहीं आती कोई रुकावटधार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यमुनोत्री से यात्रा शुरू करने पर चारधाम यात्रा में किसी भी प्रकार की रुकावट भक्तों को नहीं आती है। यमुनोत्री, यमुना नदी का उद्गम स्थल है। यमुना जी यमराज की बहन हैं और उन्हें वरदान प्राप्त है कि वह अपने जल के माध्यम से सभी का दुख दूर करेंगी। मान्यता है कि जो श्रद्धालु यमुनोत्री में स्नान करता है, उसे मृत्यु के भय से मुक्ति मिल जाती है।

महाकालेश्वर मंदिरः:पवित्र भस्म आरती से बाबा महाकाल ने किया स्नान, दिव्य स्वरूप की एक झलक पाने उत्सुक दिखे भक्त
उज्जैन। उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि गुरुवार के दिन भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। वहीं, सुबह की भस्म आरती के दौरान मंदिर परिसर में भक्तों का तांता देखने को मिला।दूर-दूर से आए श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन के लिए बुधवार देर रात से ही मंदिर परिसर में पहुंचने लगे थे। हर कोई बाबा महाकाल के दर्शन पाने के लिए उत्सुक नजर आया। पूरा मंदिर परिसर जय महाकाल के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और आस्था साफ दिखाई दे रही थी। बाबा की भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।पंचामृत से हुई भगवान की पूजामध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती की गई। इस दौरान भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई।इसके बाद बाबा को चंदन से शृंगार किया गया व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला अर्पित की गई। भक्त बाबा का अद्भुत शृंगार देखकर खुशी से गदगद दिखे। हर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है।देश-विदेश में मशहूर है बाबा महाकाल की भस्मारतीबाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में मशहूर है। उज्जैन में दूर-दूर से लोग दर्शन के लिए आते हैं। भस्म आरती का हिस्सा बनने के लिए भक्तों को पहले ही ऑनलाइन पंजीकरण कराना होता है और इस दिन भस्म आरती के लिए नंबर या टोकन लेना पड़ता है और भक्त उसी दिन दर्शन के लिए आते हैं। पंजीकरण के लिए मंदिर द्वारा निर्धारित शुल्क भी देना होता है।

धर्म : धन की देवी लक्ष्मी जंयती:चंद्र ग्रहण के चलते जानें माता कैसे होंगी प्रसन्न, मिलेगा धन-वैभव
नीलम अहिरवारहिंदू धर्म में धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी के जन्मोत्सव को लक्ष्मी जयंती के रूप में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि पर लक्ष्मी जयंती मनाने का महत्व है. मान्यता है कि इसी दिन क्षीर सागर के विशाल मंथन के समय मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं. खासकर दक्ष्ण भारत के राज्यों में लक्ष्मी जयंती का त्योहार मनाया जाता है. साल 2026 में लक्ष्मी जयंती 3 मार्च यानी चंद्र ग्रहण के दिन मनाया जा रहा है. भारतीय समय के अनुसार, चंद्र ग्रहण की शुरुआत आज यानी 03 मार्च को दोपहर 03 बजकर 20 मिनट से शुरू हो जाएगी और शाम 06 बजकर 46 मिनट पर खत्म हो जाएगा. वहीं भारत में दिखाई देने के कारण चंद्र ग्रहण का सूतक भी माना जाएगा. भारत में सूतक की शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में यदि आप लक्ष्मी जयंती पर पूजा कर रहे हैं तो सूतक काल खत्म होने के बाद यानी शाम 07 बजे के करीब कर सकते हैं. ग्रहण के दौरान व्रत रहकर मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है..पूजा में देवी लक्ष्मी को कुमकुम, कमल के फूल, सिंदूर, लड्डू आदि चीजें अर्पित करें. आखिर में मां लक्ष्मी की आरती करें. कैसे करें मां लक्ष्मी को प्रसन्नमान्यता है कि जिस पर माता लक्ष्मी मेहरबान हो जाती हैं वो अन्न, धन, समृद्धि, स्वास्थ्य आदि का लाभ उठाता है. आइए जानते हैं माता लक्ष्मी को खुश करने के आसान उपाय के बारे मेंकहते हैं शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी की पूजा के लिए उत्तम माना जाता है इसलिए शुक्रवार के दिन सुबह उठते ही मां लक्ष्मी को नमन कर, स्नान कर स्वच्छ सफेद या गुलाबी वस्त्र धारण करें. इसके बाद श्रीयंत्र व मां लक्ष्मी के चित्र के सामने खड़े होकर श्री सूक्त का पाठ करें. कमल का पुष्प मां लक्ष्मी को अर्पित करना लाभकारी साबित होगाजब भी घर से किसी भी खास काम से निकलें, तो निकलने से पहले थोड़ा मीठा दही खाकर निकलें. इससे माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती हैजिस घर में साफ-सफाई अथवा स्वच्छता रहती है वहां मां लक्ष्मी विराजती हैं.शाम को सूर्यास्त के समय को गोधूलि बेला कहा जाता है. गोधूलि का अर्थ होता है गाय के पैरों से उठने वाली धूल. शाम के समय ही गाय चारा चरकर घर की ओर प्रस्थान करती है, इसलिए इसे गोधूलि बेला कहते हैं. इस समय मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ होता हैमां लक्ष्मी के समक्ष घी के दीये जलाना भी अच्छा होता हैनारियल को श्रीफल (Shrifal) यानी श्री का फल कहा जाता है. श्री का अर्थ लक्ष्मी होता है. इस चलते मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए नारियल को पूजा में रखना अच्छा होता है.कमल का फूल यदि प्रत्येक दिन माता लक्ष्मी जी को कमल का फूल चढ़ाया जाए, तो लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं, घर धन से भरा रहता हैधनिया जो धनिया सब्जी मसाला के रूप में प्रयोग करते हैं. खड़ी धनिया ले लें और लक्ष्मीजी के आसन के पास उसे फैला देते हैं, तो लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न होती हैं.मान्यता है कि मुनक्का और मखाना दोनों को मिक्स करके लक्ष्मी जी के पास रखें तो लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और उनके ऊपर लक्ष्मी माता की कृपा हमेशा बरसती रहती है प्रतिदिन सुबह-शाम दीपक जलाएं, विशेषकर शुक्रवार को माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा के दौरान लक्ष्मी मंत्रों का जाप किया जाता है. लक्ष्मी बीज मंत्रॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥, लक्ष्मी गायत्री मंत्र ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥ महालक्ष्मी मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥धार्मिक मान्यतानुसार जिस पर मां लक्ष्मी का हाथ हो उसे आर्थिक दिक्कतें नहीं घेर पातीं. माता लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है. जिस जातक पर मां लक्ष्मी की कृपा हो या जिस घर में वे विराजित हों उस घर के लिए सुख-समृद्धि के द्वार खुल जाते हैंDisclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि tv27news किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें

बाथू मंदिर: हर साल 8 महीने की जल समाधि लेता है चमत्कारी शिव मंदिर
नई दिल्ली । देशभर में भगवान शिव के कई चमत्कारी मंदिर हैं, जो अपने इतिहास और पौराणिक कथाओं की वजह से विश्व प्रसिद्ध हैं। चमत्कारों की बात सभी करते हैं लेकिन उसे आंखों से देख पाना असंभव है। हिमाचल प्रदेश में ऐसा मंदिर है, जहां चमत्कार को अपनी आंखों से देखा जा सकता है। यहां मौजूद मंदिर 8 महीने तक पानी में डूबे रहते हैं लेकिन पत्थर और मंदिर की मजबूती में कोई कमी नहीं है। विज्ञान भी यह समझ नहीं पाया है कि पानी का असर मंदिर पर देखने को क्यों नहीं मिलता।हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा में बाथू मंदिर, जिन्हें 'बाथू की लड़ी' के नाम से भी जाना जाता है। यहां बाथू का मतलब लकड़ी होता है, हालांकि मंदिर विशाल काले पत्थरों से बना है। मंदिर पोंग बांध के जल में प्रतिवर्ष विसर्जन के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां के कई मंदिर 6 महीने तक आंशिक रूप से जलमग्न रहते हैं और मानसून के दौरान पूरी तरह से अदृश्य हो जाते हैं। हालांकि गर्मियों के दौरान मंदिर धीरे-धीरे दिखने लगते हैं। मानसून के समय मंदिर तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है और बाकी समय सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं।मंदिर की उत्पत्ति को लेकर कई तरह के मत हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि महाभारत काल के पांडवों ने इन्हें 5000 वर्ष पूर्व बनवाया था। वनवास के दौरान पांडवों ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या कर मंदिर का निर्माण किया था। दूसरी ओर, शोधकर्ता और इतिहासकार इस भव्य रचना का श्रेय हरिपुर-गुलेर के राजा हरिचंद गुलेरिया को देते हैं।बाथू मंदिर का आर्किटेक्चर किसी को भी हैरान कर सकता है। मंदिर को काले बलुआ पत्थर से बनाया गया है, जो बहुत भारी और नक्काशी करने में कठिनाई पैदा करते हैं। बलुआ पत्थर की मजबूती की वजह से ही मंदिर प्रकृति की मार झेलने के बाद भी सदियों से खड़ा है। बाथू मंदिर छह अलग-अलग मंदिरों की शृंखला है, जिसमें पांच मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित हैं। हालांकि, गर्भगृह में भगवान शिव विराजमान हैं। शेषनाग, हनुमान, गणेश और देवी काली की आकर्षक मूर्तियां भी इन मंदिरों में शोभा बढ़ाती हैं। बाहरी द्वार पर काली और गणेश की कलात्मक पत्थर की नक्काशी लगभग अद्वितीय है।8 महीने पानी में डूबे रहने की वजह से मंदिर में पूजा-पाठ काफी समय से बंद है। यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से मशहूर है, न कि आध्यात्मिकता की नजरिए से। मंदिर की कुछ प्रतिमाएं प्राचीन होने की वजह से खंडित हो चुकी हैं।

कर्नाटक के इस मंदिर में रंग नहीं: राख से खेली जाती है होली, कामदेव और भगवान शिव से जुड़ा है इतिहास
नई दिल्ली । देशभर में 4 मार्च को होली का त्योहार मनाया जाएगा। जहां उत्तर भारत में होली को प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा के साथ जोड़कर मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में होली भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी है। दक्षिण भारत में होली अहंकार नष्ट होने का प्रतीक है और इस दिन भगवान शिव व कामदेव के एक साथ दर्शन करना शुभ माना जाता है। होली के दिन कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ पहुंचती है।कर्नाटक का रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर बाकी मंदिरों से काफी अलग है। यह दक्षिण भारत का पहला मंदिर है, जहां गर्भगृह में भगवान शिव और कामदेव एक साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि होली के दिन अगर भगवान शिव और कामदेव के एक साथ दर्शन कर लिए जाएं तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और अहंकार का भी नाश होता है। मंदिर के गर्भगृह में कामदेव की प्रतिमा शिवलिंग के साथ स्थापित है और प्रतिमा ध्यान की अवस्था में है।पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान शिव को लंबी और कठोर तपस्या से उठाने के लिए देवताओं ने कामदेव का सहारा लिया था। देवी सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव सृष्टि का पालन छोड़ कठोर तपस्या में लीन हो गए थे। सृष्टि की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए कामदेव ने कामबाण महादेव पर चलाया था। तपस्या भंग होने के बाद महादेव के तीसरे नेत्र के तेज से कामदेव राख में बदल गए थे। माना जाता है कि कामदेव को अपनी शक्तियों पर बहुत घमंड था, यही वजह रही कि भगवान शिव ने कामदेव का अहंकार तोड़ने के लिए तीसरा नेत्र खोला था।इसी पौराणिक कथा की वजह से आज भी कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर और बाकी मंदिरों में होली के दिन राख को माथे पर लगाया जाता है। माना जाता है कि यह राख कामदेव के अहंकार का प्रतीक है, जो याद दिलाती है कि अहंकार का अंत कैसे होता है।रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में होली का आयोजन पांच दिन तक चलता है, और अलग-अलग दिन विभिन्न अनुष्ठान होते हैं। इन पांच दिनों में कामदेव और भगवान शिव पर चांदी की वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, खासकर चांदी का पालना। माना जाता है कि अगर किसी दंपत्ति को संतान प्राप्ति नहीं हो रही है, तो वह होली के समय चांदी का झूला अर्पित करता है, तो मनोकामना जरूर पूरी होती है।

गुलाबी नगरी:हिंदू त्योहार-मुस्लिम कारीगरी के अद्भुत संगम की मिसाल है होली, सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत
जयपुर। होली का नाम सुनते ही रंग, उमंग और भाईचारे की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है, लेकिन गुलाबी नगरी जयपुर की होली कुछ खास पहचान रखती है। यहां सिर्फ गुलाल नहीं उड़ता, बल्कि सदियों पुरानी एक ऐसी परंपरा जीवंत होती है, जो हिंदू त्योहार और मुस्लिम कारीगरी के अद्भुत संगम की मिसाल है। यह परंपरा है ‘गुलाल गोटे’ की, जो इतिहास, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द के रंगों से सराबोर है।गुलाल गोटा दिखने में छोटी सी गेंद जैसा होता है, जिसका वजन लगभग 4 से 6 ग्राम के बीच रहता है। इसे लाख से तैयार किया जाता है और यह इतनी नाजुक होती है कि किसी के शरीर से हल्के से टकराते ही फूट जाती है। जैसे ही यह टूटती है, इसके भीतर भरा खुशबूदार गुलाल सामने वाले को रंगों में रंग देता है। खास बात यह है कि इससे किसी को चोट नहीं लगती, इसलिए यह पारंपरिक और सुरक्षित दोनों माना जाता है।इस अनोखी कला की जड़ें वर्ष 1727 में जुड़ी मानी जाती हैं, सवाई जय सिंह द्वितीय ने जयपुर शहर की स्थापना की थी। उसी समय से मनिहार समुदाय के कारीगर इस शिल्प में दक्ष रहे हैं। जयपुर के प्रसिद्ध ‘मनिहारों का रास्ता’ क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिम मनिहार परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को संजोए हुए हैं। आज उनकी सातवीं और आठवीं पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है। यह परंपरा केवल एक शिल्प नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल है।गुलाल गोटा बनाने की प्रक्रिया बेहद सावधानी और कुशलता मांगती है। सबसे पहले लाख को गर्म कर पिघलाया जाता है। इसके बाद कांच की पतली नली या फूंकनी की सहायता से उसमें हवा भरकर गोल आकार दिया जाता है। यह काम बेहद नाजुक होता है, क्योंकि जरा सी गलती पूरी संरचना को खराब कर सकती है। जब गोला तैयार हो जाता है, तो उसके भीतर सुगंधित और प्राकृतिक गुलाल भरा जाता है। अंत में इसे कागज या अरारोट के लेप से सावधानीपूर्वक बंद किया जाता है।इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि शुरुआती दौर में गुलाल गोटे विशेष रूप से राजघराने के लिए बनाए जाते थे। होली के अवसर पर राजा हाथी पर सवार होकर प्रजा के बीच आते और गुलाल गोटे फेंककर उत्सव का आनंद लेते थे। समय के साथ राजशाही का स्वरूप बदला, लेकिन यह परंपरा आज भी कायम है। वर्तमान में भी जयपुर के सिटी प्लेस जयपुर में होली के मौके पर गुलाल गोटों की विशेष मांग रहती है।पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी गुलाल गोटे महत्वपूर्ण हैं। ये पूरी तरह ईको-फ्रेंडली होते हैं, क्योंकि इन्हें शुद्ध लाख और प्राकृतिक रंगों से तैयार किया जाता है। प्लास्टिक या रासायनिक रंगों के विपरीत ये प्रकृति और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित माने जाते हैं।गुलाल गोटे सिर्फ एक पारंपरिक खिलौना नहीं, बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक पहचान, साझा विरासत और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक हैं। होली के रंगों में घुली यह परंपरा आज भी बताती है कि असली उत्सव वही है, जिसमें इतिहास, कला और भाईचारा साथ-साथ खिलते हैं।

महाकालेश्वर मंदिर:ईष्ट देव के अद्भुत शृंगार का दर्शन कर निहाल हुए भक्त, पंचामृत और फलों से हुआ बाबा महाकाल का अभिषेक
उज्जैन। फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आज सोमवार सुबह भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल के दरबार में हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। इस दौरान भक्तों ने देर रात से ही लाइन में लगकर अपने ईष्ट देव बाबा महाकाल के दर्शन किए। बाबा के अद्भुत दर्शन के बाद पूरा मंदिर हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज उठा।वार सोमवार और तिथि चतुर्दशी के दिन भक्तों को बाबा के अद्भुत शृंगार दर्शन का सौभाग्य मिला। आज बाबा महाकाल भी भक्तों को दर्शन देने के लिए सुबह 4 बजे जागे। वीरभद्र से आज्ञा लेकर सबसे पहले मंदिर के कपाट खोले गए और फिर पंचामृत और फलों के रस से बाबा का अभिषेक किया गया, जिसके बाद भस्म रमाकर आकर्षक शृंगार किया गया। बाबा का आज का शृंगार मन को शांति प्रदान करने वाला है क्योंकि बाबा के माथे पर अर्ध चांद और मोती की बिंदी को स्थापित किया गया, जोकि शांति का प्रतीक है।माथे पर त्रिपुंड लगाए बाबा को भांग और सूखे मेवों से भी सुसज्जित किया गया। भक्तों ने इन दिव्य दर्शनों का लाभ लिया जिससे पूरा मंदिर परिसर जय श्री महाकाल की गूंज से गुंजायमान हो गया।बता दें कि रोजाना नियमित समय पर बाबा की भस्म आरती होती है, जिसमें पहले बाबा निराकार और फिर साकार रूप में भक्तों को दर्शन करते हैं। माना जाता है कि निराकार रूप के दर्शन करना सौभाग्य की बात होती है, क्योंकि ये जन्म और मृत्यु के फेर से मुक्ति दिलाता है और जीवन के असली मायनों को समझाता है। वहीं साकार रूप में बाबा सजधज कर भक्तों को दर्शन देते हैं।हर तिथि के अनुसार बाबा का अद्भुत शृंगार किया जाता है और हर शृंगार अलग और मंत्रमुग्ध करने वाला होता है। कुछ खास त्योहारों जैसे होली, दिवाली, महाशिवरात्रि और अन्य सनातनी त्योहारों पर बाबा का भव्य शृंगार होता है और सुबह से लेकर शाम तक बाबा की 6 आरतियां होती हैं, जिसमें भोग आरती भी शामिल होती है। बाबा को रोजाना अलग-अलग मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं और वही मिष्ठान बाद में भक्तों में वितरण कर दिया जाता है।

होली: मुल्तानी मिट्टी-दही का लेप चेहरे की जलन को करेगा, रंगत को भी निखारने में है मददगार
नई दिल्ली। होली रंगों और खुशियों का त्योहार है, लेकिन सावधानी न बरतने पर यह आपकी त्वचा के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है। अक्सर रंगों में मौजूद केमिकल त्वचा की प्राकृतिक नमी छीन लेते हैं, जिससे स्किन रूखी हो जाती है या छिलने लगती है। जिनकी त्वचा संवेदनशील (सेंसिटिव) है, उन्हें लाल चकत्तों और एलर्जी का खतरा अधिक रहता है। इसलिए यह जरूरी है कि आप होली खेलते समय और उसके बाद भी अपनी त्वचा की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखें। आयुर्वेद में त्वचा को त्वक कहा जाता है, जो शरीर के लिए सिर्फ बाहरी आवरण नहीं, बल्कि पूरे शरीर का आईना है, जो शरीर को सुरक्षा प्रदान करने का भी काम करती है। होली के रंगों के लेपन के बाद स्किन को स्नेहन और शोधन की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए आयुर्वेद में कई तरीके बताए गए हैं, जिन्हें आसानी से घर पर ही किया जा सकता है।होली का रंग निकालने के लिए चेहरे पर किसी तरह का साबुन या फेसवॉश न लगाएं। साबुन और फेसवॉश में पहले से केमिकल होते हैं और रंगों के साथ मिलकर वे दोगुनी प्रतिक्रिया करते हैं। ऐसे में साधे पानी से चेहरे को धोएं और शोधन और शुद्धिकरण के लिए मक्के का आटा या फिर दरदरे चावल के आटे से चेहरे को हल्के हाथ से रगड़ें। यह न सिर्फ चेहरे को साफ करने का काम करेगा, बल्कि गंदगी को चेहरे से निकालने में मदद करेगा।इसके बाद चेहरे पर मुल्तानी मिट्टी और दही को मिलाकर लेप लगाएं। अक्सर रंगों को हटाने के लिए खुजली या लाल चकत्ते निकल आते हैं। ऐसे में मुल्तानी मिट्टी और दही का लेप चेहरे की जलन को साफ करेगा और चेहरे की रंगत को भी निखारने में मदद करेगा। मुल्तानी मिट्टी और दही के बाद त्वचा पर ताजा एलोवेरा जल का लेपन करें। यह त्वचा को मुलायम रखने के साथ-साथ आराम देने का भी काम करेगा।त्वचा की देखभाल के लिए सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक देखभाल भी जरूरी है। ऐसे में पूरे शरीर को आराम देने के लिए रात के समय हल्का गुनगुना दूध पीए। होली के दिन ज्यादा तला-भुना खाने से भी परहेज करें।

श्री लाडली जी महाराज मंदिर:श्रीकृष्ण के परपोते ने की थी स्थापना, लड्डूमार और लठमार होली के लिए विश्व प्रसिद्ध
बरसाना। देश के सबसे बड़े त्योहारों में से एक, होली का उत्सव अब बहुत नजदीक है। पूरे देश में 4 मार्च को रंग और गुलाल का पर्व बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाएगा, लेकिन होली एक ऐसा त्योहार है जिसका उत्सव कई जगहों पर पहले से ही शुरू हो जाता है, जिनमें प्रमुख ब्रज की होली है, जो अपनी अनोखी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। ब्रज के उन्हीं जगहों में से एक बरसाना के श्री लाडली जी महाराज मंदिर में लड्डूमार और लठमार होली का अनोखा उत्सव मनाया जाता है। यह प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के बरसाना में स्थित है, जो देवी राधा को समर्पित है। मंदिर में मुख्य रूप से श्री राधारानी (लाडली जी) और भगवान श्रीकृष्ण (लाल जी) की एक साथ पूजा की जाती है, इसलिए इसे श्री लाडली जी महाराज मंदिर के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है शहर की प्रिय पुत्री और पुत्र।मंदिर बरसाना की प्रमुख भानुगढ़ (ब्रह्मांचल) पहाड़ी की चोटी पर बना है, जिसे श्श्री जी मंदिरश् या श्राधा रानी मंदिरश् के नाम से भी जाना जाता है। इसी के साथ इसे श्बरसाने का माथाश् भी कहा जाता है, और मंदिर की ऊंचाई लगभग 250 मीटर है। मंदिर मुख्य रूप से अपने लोकप्रिय त्योहारों के लिए जाना जाता है, जिनमें राधाष्टमी, जन्माष्टमी, लड्डूमार और लठमार होली शामिल हैं।विशेष अवसरों पर मंदिर को खासतौर पर फूलों से सजाया जाता है और राधा-कृष्ण को श्छप्पन भोगश् अर्पित कर उनकी भव्य आरती की जाती है। इस मौके पर यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में भक्तों और पर्यटकों का तांता लगता है, जो इस जगह की शोभा को कई गुणा बढ़ा देता है।मान्यता है कि राधा रानी मंदिर की स्थापना लगभग 5000 साल पहले राजा वज्रनाभ के द्वारा की गई थी, जो कि भगवान श्रीकृष्ण के परपोते थे। मंदिर का माहौल हमेशा श्राधा-राधाश् के जाप से गूंजता रहता है और भक्तों को मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 108 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। बरसाना की लड्डूमार होली में मंदिर के पुजारी और भक्त हवा में लड्डू फेंकते हैं, और लोग उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।वहीं, लट्ठमार होली में बरसाना की महिलाएं नंदगांव से आए पुरुषों पर लाठियों से प्रहार करती हैं और पुरुष खुद को ढाल से बचाने की कोशिश करते हैं। यह परंपरा श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम-लीलाओं से प्रेरित है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना राधा और उनकी सखियों को रंगने आते थे, तब राधा और उनकी सखियां उन्हें लाठियों से खदेड़ा करती थी। उसी परंपरा को जीवित रखने के लिए आज तक इस उत्सव को बरसाना में बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है, जो विश्वभर में प्रसिद्ध है।

सरकारी लिस्ट से नदारद मप्र के प्रमुख मंदिरों के बहुरेंगे दिन:मंत्री लोधी ने अधिकारियों को दिए निर्देश, कहा- आध्यात्मिक धरोहर का संरक्षण सरकार की प्राथमिकता
भोपाल। मध्यप्रदेश के ऐसे मंदिर जो शासकीय सूची में शामिल नहीं हैं, किंतु जिनका धार्मिक और पुरातात्विक महत्व है, उन्हें चिन्हित कर उनके विकास और जीर्णोद्धार की ठोस कार्ययोजना बनाएं। मप्र के संस्कृति, पर्यटन और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्य मंत्री धर्मेंद्र लोधी ने इस तरह के निर्देश विभागीय अधिकारियों को दिए हैं। सोमवार को मंत्रालय में हुई विभागीय समीक्षा बैठक में मंत्री लोधी ने कहा कि आध्यात्मिक धरोहर का संरक्षण और श्रद्धालुओं की सुविधाओं में विस्तार सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।तीन महीने में देवस्थानों का ऑनलाइन दस्तावेजीकरणराज्य मंत्री लोधी ने प्रदेश के 55 जिलों के 22,098 शासन संधारित देवस्थानों की जानकारी की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि आगामी तीन माह के भीतर इन सभी देवस्थानों के दस्तावेजों का ऑनलाइन डिजिटलीकरण सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, मंदिरों के जीर्णोद्धार हेतु प्राप्त प्रस्तावों पर त्वरित कार्यवाही के लिए जिलों में समन्वय हेतु तत्काल नोडल अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश भी दिए।30 मार्च तक तीर्थदर्शन की 12 नई ट्रेनेंमुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना की प्रगति की जानकारी देते हुए अधिकारियों ने बताया कि 10 फरवरी 2026 तक 19 ट्रेनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को तीर्थ यात्रा कराई जा चुकी है। राज्य मंत्री श्री लोधी ने शेष 12 ट्रेनों का संचालन 30 मार्च 2026 तक पूरी गुणवत्ता और योजनाबद्ध तरीके से करने के निर्देश दिए।राज्य के बाहर की संपत्तियों का होगा सदुपयोगराज्य मंत्री लोधी ने निर्देशित किया कि प्रदेश के बाहर स्थित विभागीय परिसंपत्तियों की विस्तृत जानकारी जुटाई जाए। इन संपत्तियों के बेहतर उपयोग और उनके विकास के लिए एक प्रभावी रोडमैप तैयार किया जाए, ताकि राज्य की संपत्तियों का संरक्षण हो सके। उन्होंने मप्र तीर्थ स्थान एवं मेला प्राधिकरण की गतिविधियों की भी समीक्षा की गई। अधिकारियों ने बताया कि प्राधिकरण के अंतर्गत अब तक 111 तीर्थ और 1629 मेले पंजीकृत किए जा चुके हैं। मंत्री लोधी ने मुख्यमंत्री की घोषणाओं के क्रियान्वयन की स्थिति जानी और विभाग में रिक्त पदों को शासन के नियमानुसार शीघ्र भरने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए।

महाशिवरात्रि पर भक्तों का जोश हाई::धार्मिक नगरी से लेकर सोमनाथ तक हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजे शिवालय, हरिद्वार में भी दिखा आस्था का अद्भुत नजारा
उज्जैन/सोमनाथ। महाशिवरात्रि के पर्व पर रविवार को शिवालय हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज उठे। शहर से लेकर गांव तक शिवालयों में भक्तों की भीड़ रही। इस दौरान महादेव की आराधना की गई। मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन से लेकर बारह ज्योतिलिंर्गों में पहले स्थान पर विराजमान सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में महाशिवरात्रि के दिन आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। पर ऐसा ही दृश्य धर्मनगरी हरिद्वार में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। शहर के प्रमुख शिवालयों में दर्शन और जलाभिषेक के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा है। विशेष ज्योतिषीय महत्व के कारण इस बार श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में अधिक बताई जा रही है।भक्त सोमनाथ महादेव के दर्शन के लिए घंटों लाइन में खड़े होकर इंतजार कर रहे हैं और साथ ही बाबा के भजन भी गा रहे हैं। महिलाओं के बीच महाशिवरात्रि का अलग ही रंग देखने को मिल रहा है, जो परिसर में महादेव की शादी के बारात गीत गा रही हैं।महाशिवरात्रि के अवसर पर एक श्रद्धालु ने कहा, "आज मैं महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रार्थना करने सोमनाथ आई हूं और यहां की व्यवस्था शानदार है क्योंकि भीड़ होने के बाद भी आराम से दर्शन करने का मौका मिल रहा है। सुबह की मंगला आरती बहुत सुंदर थी और सब कुछ बहुत सुव्यवस्थित है। मेरा मानना है कि सबको एक बार दर्शन के लिए जरूर आना चाहिए।" पीएम मोदी की सराहना करते हुए महिला श्रद्धालु ने कहा, "मंदिर की साफ-सफाई और व्यवस्था को लेकर सरकार की तरफ से बहुत काम किया जा रहा है और प्रदेश में भी तेजी से विकास हो रहा है।"महाकाल मंदिर में 10 लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्मीदवहीं महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर उज्जैन में बाबा महाकाल का विशेष भस्मारती समारोह संपन्न हुआ। इस अवसर पर मंदिर के पट रात 2.30 बजे से खोले गए, जो 44 घंटे तक लगातार खुले रहेंगे। महाशिवरात्रि पर मंदिर में लगभग 10 लाख श्रद्धालुओं के दर्शन की उम्मीद है। देशभर में शिवरात्रि की धूम है, लेकिन उज्जैन में इसका विशेष महत्व है। यहां भस्मारती, विशेष श्रृंगार और शिव नवरात्रि जैसे आयोजन होते हैं। इस अवसर पर सेहरे का प्रसाद भी बांटा जाता है, जिसे लोग बहुत शुभ मानते हैं।पंचामृत अभिषेक और भस्मारतीमहाशिवरात्रि के मौके पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह 2.30 बजे बाबा महाकाल का विशेष पंचामृत अभिषेक किया गया और भस्मारती की गई। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचे। मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर बाबा महाकाल के दर्शन का विशेष महत्व है। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए हैं।भस्मारती से पहले बाबा महाकाल का पंचामृत अभिषेक हुआ। पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद और खांडसारी शक्कर शामिल थे। इसके बाद बाबा को चंदन का लेप लगाया गया और सुगंधित द्रव्य अर्पित किए गए। बाबा को उनकी प्रिय विजया (भांग) से श्रृंगारित किया गया और श्वेत वस्त्र पहनाए गए। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के बीच भस्मारती संपन्न हुई, जिसे देखकर भक्त भाव-विभोर हो गए।सेहरा सजावट और भस्मारतीशिवरात्रि के अगले दिन बाबा का सेहरा सजाया जाता है और दोपहर में भस्म आरती की जाती है। यह साल में केवल एक बार होता है। बाबा के सेहरे को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। लोग इसे बहुत शुभ मानते हैं और सेहरे के फूल-पत्तियों को संभालकर रखते हैं। मान्यता है कि इससे घर में सुख-शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है।मंदिर में दिनभर की पूजा-अर्चनाभस्मारती उपरांत दद्योदक आरती और भोग आरती के बाद दोपहर 12 बजे उज्जैन तहसील की ओर से पूजन-अभिषेक संपन्न हुआ। शाम 4 बजे होल्कर और सिंधिया स्टेट की ओर से पूजन और सायं पंचामृत पूजन के बाद भगवान महाकालेश्वर की नित्य संध्या आरती हुई। रात्रि में 8 बजे से 10 बजे तक कोटितीर्थ कुण्ड के तट पर विराजित श्री कोटेश्वर महादेव का पूजन, सप्तधान्य अर्पण और पुष्प मुकुट श्रृंगार (सेहरा) के बाद आरती की गई। रात्रि 10.30 बजे से सम्पूर्ण रात्रि भगवान महाकालेश्वर का महाअभिषेक संपन्न हुआ। इसमें 11 ब्राह्मणों द्वारा रूद्रपाठ और विभिन्न मंत्रों के माध्यम से अभिषेक किया गया।भस्म लेपन, पंचामृत पूजन और पांच प्रकार के फलों से अभिषेक के बाद, भगवान को नवीन वस्त्र पहनाए गए और सप्तधान्य अर्पित किया गया। भगवान महाकालेश्वर को चंद्र मुकुट, छत्र, त्रिपुंड और अन्य आभूषणों से श्रृंगारित किया गया। सेहरा आरती के दौरान भगवान को विभिन्न मिष्ठान्न, फल और पंच मेवा का भोग अर्पित किया गया। 16 फरवरी 2026 को सुबह सेहरा दर्शन के उपरांत दिन में 12 बजे भस्मारती संपन्न होगी। इसके बाद भोग आरती होगी और शिवनवरात्रि का पारणा किया जाएगा।हरिद्वार के दक्षेश्वर महादेव मंदिर के बाहर लगी लंबी कतारेंवहीं हरिद्वार के दक्षेश्वर महादेव मंदिर के बाहर सुबह से ही लंबी कतारें लगी हुई हैं। प्रशासन द्वारा व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पुलिस बल तैनात है तथा भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। प्रात:कालीन मुहूर्त से ही श्रद्धालु गंगाजल और पूजन सामग्री के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं और पूरा मंदिर परिसर ह्लबोल बमह्व और हर-हर महादेव के जयघोष से निरंतर गूंज रहा है।दक्षेश्वर महादेव मंदिर पुजारी महंत रविंद्र पुरी ने कहा, "महाशिवरात्रि के अवसर पर उत्तराखंड और पूरे देश के सभी श्रद्धालुओं और नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएं। फाल्गुन महीने में मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि, दिवाली, होली और कालाष्टमी के साथ वर्ष की चार प्रमुख रातों में से एक है। आस्था की दृष्टि से दक्षेश्वर महादेव मंदिर की बहुत मान्यता है क्योंकि ये भगवान शिव की ससुराल है और मां सति का जन्मस्थान भी। 300 वर्षों बाद ऐसा शुभ-संयोग महाशिवरात्रि पर बना है, जिसमें कुंभ राशि में 5 ग्रह एक साथ आ रहे हैं और ऐसे में जो भी लोग भगवान शिव की मानसिक और शारीरिक रूप से पूजा करेंगे, उनकी हर मनोकामना पूरी होगी।"

कालिंजर महोत्सव-2026ः:‘इतिहास की गूंज, संस्कृति की आत्मा’ के संगम में सजेगा बुंदेलखंड, तीन दिन बांदा बनेगा सांस्कृतिक राजधानी
बांदा। उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र स्थित ऐतिहासिक नगरी बांदा महाशिवरात्रि के दिन से यानि 15 से 17 फरवरी तक सांस्कृतिक उल्लास से सराबोर होने जा रही है। इतिहास की गूंज, संस्कृति की आत्मा थीम पर आयोजित होने जा रहा कालिंजर महोत्सव 2026 सांस्कृतिक महासंगम के रूप में विरासत, पर्यटन और जनभागीदारी का विराट उत्सव बनेगा। जिला पर्यटन एवं संस्कृति परिषद और जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में कटरा कालिंजर मेला ग्राउंड में आयोजित इस महोत्सव में लोक परंपराओं, कला, संगीत और खेल का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि कालिंजर महोत्सव बुंदेलखंड की ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक वैभव को नई पहचान देने का सशक्त मंच है। उन्होंने बताया कि बुंदेली लोक नृत्य, आल्हा गायन, भजन और लोकगीतों सहित विविध प्रस्तुतियां क्षेत्रीय परंपराओं को राष्ट्रीय मंच प्रदान करेंगी। ऐतिहासिक कालिंजर किला की पृष्ठभूमि में आयोजित यह महोत्सव देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए भी स्मरणीय अनुभव सिद्ध होगा। तीन दिवसीय आयोजन में जहां एक ओर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे, वहीं खेल महोत्सव के जरिए युवाओं की ऊर्जा और प्रतिस्पर्धात्मक भावना को मंच मिलेगा। ‘बांदा गॉट टैलेंट’ के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को अपनी कला दिखाने का अवसर मिलेगा, जबकि ‘आज की शाम कालिंजर के नाम’ के अंतर्गत कलाकार, गायक और खिलाड़ी अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करेंगे। मंडलीय सरस मेले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा निर्मित उत्पादों की प्रदर्शनी, विभागीय स्टॉल, सम्मेलन और गोष्ठियां भी आयोजित की जाएंगी, जिससे स्थानीय उत्पादों और स्वरोजगार को बढ़ावा मिलेगा। खेल महोत्सव प्रतिदिन सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक आयोजित होगा। 15 फरवरी को खो-खो, 16 फरवरी को कबड्डी और 17 फरवरी को दंगल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा। वहीं ‘बांदा गॉट टैलेंट’ प्रतिदिन दोपहर 1 से 3 बजे तक होगाकृ15 फरवरी को विद्यालय स्तर, 16 फरवरी को महाविद्यालय स्तर और 17 फरवरी को जनपद स्तरीय विजेताओं की विशेष प्रस्तुतियां होंगी। प्रतिदिन शाम 4 से 6 बजे तक ‘स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर’ के अंतर्गत बुंदेली लोक नृत्य, लोक गायन और वीर रस से ओत-प्रोत आल्हा गायन की प्रस्तुतियां होंगी। इसके बाद शाम 6 से रात 10 बजे तक सांस्कृतिक संध्या का भव्य आयोजन होगा। 15 फरवरी को तृप्ती शाक्या एंड ग्रुप, 16 फरवरी को साधो द बैण्ड एंड ग्रुप और राधा श्रीवास्तव एंड ग्रुप प्रस्तुति देंगे। 17 फरवरी को चर्चित गायिका ममता शर्मा और राजा रेन्चो अपनी प्रस्तुतियों से समापन संध्या को यादगार बनाएंगे। अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने कहा कि कालिंजर महोत्सव-2026 बुंदेलखंड की विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार गणतंत्र दिवस की झांकी में कालिंजर किले को प्रमुखता देकर उसकी ऐतिहासिक गरिमा को नई ऊंचाई दे चुकी है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह आयोजन पर्यटन संवर्धन, स्थानीय अर्थव्यवस्था के सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण में मील का पत्थर साबित होगा।

ब्रह्मांड की पहली प्रेम कहानी!:सारेगामा ला रहा एनिमेटेड फिल्म ‘शिव सती’ दिव्य प्रेम कथा पर है आधारित
मुंबई। संगीत और मनोरंजन की प्रमुख कंपनी सारेगामा ने एक बड़ी और रोमांचक घोषणा की है। कंपनी एनिमेटेड फीचर फिल्म ‘शिव सती’ लेकर आ रही है, जो इसी साल देश भर के थिएटर्स में रिलीज होगी। यह फिल्म भगवान शिव और माता सती की दिव्य प्रेम कथा पर आधारित है, जिसे ब्रह्मांड की पहली प्रेम कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है। शिव-सती की कथा प्रेम, त्याग, समर्पण और दिव्य मिलन की प्रतीक है। एनिमेटेड फॉर्मेट में यह बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को आकर्षित कर सकती है।सारेगामा इंडिया लिमिटेड ने अमेजिंग इंडियन स्टोरीज के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को तैयार किया है। फिल्म को बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा है, जिसमें आधुनिक एनिमेशन तकनीक का इस्तेमाल होगा। इसे बड़े पर्दे के लिए स्पेशल लार्ज फॉर्मेट में तैयार किया जा रहा है, ताकि दर्शकों को भव्यता, भावनाएं और दृश्यों का कमाल महसूस हो।फिल्म के निर्देशक मशहूर राइटर-फिल्ममेकर विवेक आंचलिया हैं, जिन्होंने पहले ‘नैशा’, ‘तिकदम’ और ‘राजमा चावल’ जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बनाई है। विवेक आंचलिया इस प्रोजेक्ट को कटिंग-एज एनिमेशन के साथ टाइमलेस कहानी को जोड़कर एक शानदार अनुभव के लिए तैयार कर रहे हैं। फिल्म अभी प्रोडक्शन के दौर में है।सारेगामा ने इंस्टाग्राम पर इसकी घोषणा करते हुए कहा कि यह एनिमेटेड फिल्म भारतीय पौराणिक कथाओं को नए अंदाज में पेश करेगी, जिसमें स्केल, इमोशन और स्पेक्टेकल भरपूर होगा। यह घोषणा वैलेंटाइन डे पर आई है, जो प्रेम की थीम वाली कहानी के लिए फिट बैठती है। सारेगामा पहले भी कई सफल प्रोजेक्ट्स में शामिल रही है और अब एनिमेशन के क्षेत्र में कदम रखकर भारतीय माइथोलॉजी को ग्लोबल स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रही है।भगवान शिव पर आधारित कई एनिमेटेड फिल्में बन चुकी हैं, दो यूट्यूब के साथ ही ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी उपलब्ध हैं। ये पौराणिक कथाओं को मजेदार तरीके से पेश करती हैं। इन एनिमेटेड फिल्मों में द डांसिंग गॉड शिवा, जिसमें भगवान शिव के तांडव नृत्य और उनकी शक्ति दिखाई गई है। वहीं, शिव पार्वती में शिव और पार्वती की प्रेम कथा और विवाह की खूबसूरत कहानी है। एक अन्य मूवी शिवा रू द सेक्रेट वर्ल्ड ऑफ वेदास सिटी शामिल है, जिसमें शिव की महिमा के साथ उनके रहस्यों को नए अंदाज में दिखाया गया है।

महाशिवरात्रिः हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजी म्यूजिक इंडस्ट्री,:हंसराज ने रिलीज किया भोलेनाथ की शादी जुड़ी रस्मों का नया गीत, मस्तमौला अंदाज नाचते दिखे सुर-असुर
मुंबई। महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पहले म्यूजिक इंडस्ट्री भी हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज उठी है। भोजपुरी सिनेमा से लेकर हिंदी सिनेमा तक रोज नए शिव भक्ति गीत रिलीज हो रहे हैं, लेकिन अब शिव भक्ति से सराबोर गीत गाने वाले सिंगर हंसराज रघुवंशी ने महादेव की शादी से जुड़ी रस्मों का नया गीत रिलीज किया है जिसमें देवताओं से लेकर असुर बाबा की बारात में मस्तमौला अंदाज में नाच रहे हैं।हंसराज रघुवंशी का नया भक्ति गीत महादेव की शादी रिलीज हो चुका है, और गीत को सिंगर ने अपने आधिकारिक चैनल पर रिलीज किया है। गीत में शिव बारात का वर्णन किया गया है कि कैसे भस्म और नागों से बाबा शृंगार कर मां पार्वती को ब्याहने ले जा रहे हैं। गीत के बोल और बीट दोनों ही शानदार हैं, जो पूरी तरह डांसिंग वाइब दे रही है। गीत के सिंगर और कंपोजर खुद हंसराज हैं, जबकि गीत के बोल दीप फतेह ने लिखे हैं।महादेव की शादी के बोल मिस्ता बाज ने लिखे हैं और प्रोड्यूस कोमल सकलानी ने किया है, जो सिंगर की पत्नी हैं। रिलीज के साथ गीत को दर्शकों से अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। रिलीज के कुछ घंटों में ही गीत 50 हजार के पार हो चुका है और दर्शकों के दिल को भी छू रहा है।हंसराज रघुवंशी को भक्ति गीतों के लिए ही जाना जाता है। उन्होंने शिव कैलाशों के वासी, शिव समा रहे मुझसे, भोलेनाथ जी, लागी लगन शंकरा, पार्वती बोली शंकर से, और मेरा भोला है भंडारी जैसे भक्ति गीत गाए हैं। मेरा भोला है भंडारी गीत सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। गीत को अब तक 300 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं।शिव भक्ति से जुड़े गीत के अलावा हंसराज राम भक्ति से जुड़े गीत भी गाते हैं। राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समय सिंगर ने जय श्री राम, राम सिया राम, आओ राम जी, और राम समेत कई गीत गाए हैं।

शिव भक्ति का पवित्र पर्व कल:धार्मिक नगरी में अलर्ट मोड में प्रशासन, बाबा महाकाल का दर्शन करने पहुंच सकते हैं 10 से अधिक भक्त
उज्जैन। हिन्दू धर्मों के प्रमुख त्योहारों में से एक महाशिवरात्रि का पर्व का भगवान शिव को समर्पित है। यह पर्व फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस साल यह पवित्र त्योहार रविवार यानि 15 फरवरी को मनाया जाएगा। जिसकी तैयारियां शिव मंदिरों में जोरों से चल रही हैं। ऐसा ही मप्र की धार्मिक नगरी उज्जैन में भी देखने को मिल रहा है। बाबा महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए सारी तैयारियां पूरी कर ली गई है। बता दें कि मान्यता है कि शिवरात्रि की रात भगवान शिव का प्राकट्य हुआ था और शिव-पार्वती का दिव्य मिलन भी इसी तिथि से जुड़ा माना जाता है। महाकाल मंदिर में बढ़ने वाली भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन मंदिर का मुआयना करने पहुंचे, जहां मौके पर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट मौजूद रहे। मंदिर के हॉल में आयोजित एक बैठक में कार्यकारी मजिस्ट्रेटों और अधिकारियों को क्षेत्रवार जिम्मेदारियां सौंपी गईं और ड्यूटी चार्ट जारी किए गए।तैयारियों से अवगत कराया गया एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को महाकाल मंदिर के प्रशासक प्रथम कौशिक ने महाशिवरात्रि को लेकर हुई तैयारियों पर कहा, 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का पवित्र त्योहार है, जिसके दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। इसे ध्यान में रखते हुए, मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन ने तैयारियां पूरी कर ली हैं। उन्हीं तैयारियों के संबंध में आज जो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को काम सौंपा गया है, उन्होंने सभी तैयारियों के संबंध में ब्रीफिंग दी है। सभी को अपने सेक्टर की सभी व्यवस्थाओं को संभालना होगा, ताकि दर्शन करने आए किसी भी श्रद्धालु को किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो।महाकाल मंदिर में 10 लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्मीदउन्होंने आगे बताया कि 15 फरवरी और 16 फरवरी को मंदिर में भक्तों की संख्या बढ़ने वाली है और हर मजिस्ट्रेट अपने सेक्टर का दौरा पहले ही कर रहा है ताकि चीजों में समय रहते बदलाव किया जा सके। मंदिर प्रशासन की मानें तो दो दिन में 10 लाख से ज्यादा श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आ सकते हैं। इसलिए व्यवस्थाओं को अंतरिम रूप देने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही बाबा के कपाट 44 घंटे खुले रहने वाले हैं, जिससे भक्तों को बाबा के हर प्रहर के शृंगार के दर्शन हो सकें।महाशिवरात्रि पर चार पहर की होगी विशेष पूजामहाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में विशेष चार पहर की पूजा होगी जो अगले दिन यानी 16 फरवरी तक चलेगी। बता दें कि 15 फरवरी की रात महाकाल मंदिर की बेहद खास रात्रि होने वाली है क्योंकि महाशिवरात्रि के दिन बाबा को दूल्हे की तरह सजाया जाता है। फूलों के सेहरे और भारी आभूषणों से बाबा का शृंगार किया जाता है। बाबा के अद्भुत रूप के दर्शन के लिए ही भक्त देश के हर कोने से महाकाल मंदिर पहुंचते हैं।

विजया एकादशी:पुरी में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर में उमड़ा आस्थावनों का रेला, सिर्फ आज के दिन ही होते हैं बाबा अद्भुत दर्शन
पुरी। उड़ीसा के पुरी में भगवान शिव के प्राचीन श्री लोकनाथ मंदिर में विजया एकादशी के मौके पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। भक्त भगवान शिव के सबसे पवित्र रूपों में से एक के दर्शन के लिए ब्रह्म मुहूर्त से ही मंदिर के प्रांगण में लंबी लाइनों में लगे हैं। भक्त मंदिर परिसर में बने पवित्र कुंड में स्नान कर रहे हैं।श्री लोकनाथ मंदिर, जगन्नाथ मंदिर के पास बना, सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है, जहां हर साल की तरह इस साल भी महाशिवरात्रि से दो दिन पहले पंकोद्धारा अनुष्ठान की परंपरा निभाई जा रही है। भक्तों के बीच पंकोद्धारा नीति का बहुत महत्व है क्योंकि माना जाता है कि आज के दिन भक्तों को बाबा के सबसे पवित्र रूप के दर्शन करने का मौका मिलता है।मंदिर के पुजारी शशांक शेखर महापात्रा ने कहा, न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में, सभी शिव मंदिरों में से, यह एकमात्र मंदिर है जहां यह पर्व मनाया जाता है। पंकोद्धारा एकादशी का मतलब है, श्भगवान शिव के पहले दर्शन। बाकी दिनों बाबा की चरित्र प्रतिमा के दर्शन करने का मौका मिलेगा, लेकिन आज के दिन बाबा के पूर्ण रूप के दर्शन किए जाते हैं।माना जाता है कि आज एकादशी के दिन बाबा के दर्शन करने से 1 लाख शिवलिंग के दर्शन करने का पुण्य मिलता है और दर्शन सिर्फ शरीर नहीं, आत्मा तक को छू लेते हैं। इसे आत्मशुद्धि का दर्शन भी कहा जाता है। मंदिर की व्यवस्था पर बात करते हुए पुजारी ने बताया कि श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए दो लाइनों की व्यवस्था की गई है और पुलिस प्रशासन और मंदिर प्रशासन मिलकर भक्तों को सुलभ दर्शन कराने का प्रयास कर जा रहे हैं। पंकोद्धारा अनुष्ठान से दिन शिवलिंग पर जमे पानी को साफ करने का काम करते हैं और आस-पास जमा फूल और गंदगी को भी हटाते हैं।बता दें कि श्री लोकनाथ मंदिर उड़ीसा का सबसे प्राचीन मंदिर है, जहां शिवलिंग हमेशा पानी में डूबा रहता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, लोकनाथ शिवलिंग को भगवान राम का रूप माना जाता है और शिवलिंग की स्थापना भी भगवान राम ने की थी। मंदिर में मौजूद तालाब भी आस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि तालाब में स्नान करने से शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। महाशिवरात्रि के दिन भी पवित्र कुंड में स्नान करने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं।

52वां खजुराहो नृत्य समारोह:सीएम मोहन 20 को करेंगे आगाज, नटराज की छाया में होगा कला साधना का समागम
भोपाल। विश्व धरोहर स्थल खजुराहो की धरती एक बार फिर शास्त्रीय नृत्य की गरिमामय प्रस्तुतियों से गुंजायमान होगी। 20 से 26 फरवरी के बीच नटराज थीम पर आयोजित 52वें खजुराहो नृत्य समारोह में कला साधना का समागम होगा। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव इसका शुभारंभ करेंगे। वहीं राज्यपाल मंगुभाई पटेल की मौजूदगी में इसका समापन समारोह आयोजित किया जाएगा। यहां नृत्य प्रस्तुतियां रोजाना शाम 6:30 बजे से होंगी। वहीं खजुराहो कार्निवल का समय दोपहर 2:00 बजे से होगा। मप्र सरकार के संस्कृति विभाग, उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत एवं कला अकादमी और मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद के तत्वाधान में यह कार्यक्रम परंपरा, प्रयोग और नवाचार का संगम बनेगा। संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला ने बताया कि कंदरिया महादेव एवं जगदंबा मंदिर परिसर में आयोजित इस सात दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आयोजन में देश के सुप्रतिष्ठित तथा उदीयमान नर्तक नृत्यांगनाएं अपनी प्रस्तुतियों से जहां भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविध परंपराओं को मंच पर साकार करेंगी। वहीं दूसरी ओर शिल्पग्राम में हो रहे खजुराहो कार्निवाल सहित पर्यटन विकास निगम की विविध कला विधाओं से संबंधित गतिविधियां इसे रोमांचक बनाएंगी। समारोह के उद्घाटन अवसर पर सांसद खजुराहो वीडी शर्मा, संस्कृति व पर्यटन राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी प्रमुख रूप से मौजूद रहेंगे। इन कलाकारों की होंगी नृत्य प्रस्तुतियां 20 फरवरी 2026: ममता शंकर, कोलकाता-कथक, अनुराधा वेंकटरमन, चेन्नई - भरतनाट्यम और शुभदा वराडकर, मुंबई -ओडिसी21 फरवरी 2026: विश्वदीप, दिल्ली-कथक, प्रभात कुमार महतो, झारखंड - छाऊ, अकमरल कैनाजारोवा, कजाकिस्तान - भरतनाट्यम22 फरवरी 2026: थकचोम इबेमुबी देवी, मणिपुर- मणिपुरी, दुर्गा चरण रणबीर, ओडिशा- ओडिसी, सत्रिया केंद्र, असम - सत्रिया23 फरवरी 2026: नव्या नायर चेन्नई - भरतनाट्यम, कोट्टकल नंदकुमारन नायर, केरल - कथकली, जी.पद्मजा रेड्डी, चेन्नई - कुचिपुड़ी24 फरवरी 2026: शिंजिनी कुलकर्णी, दिल्ली - कथक, इलियाना सिटारिस्टी, भुवनेश्वर - ओडिसी, कलामंडलम क्षेमवती, केरल - मोहिनीअट्टम25 फरवरी 2026: सास्वती सेन, दिल्ली - कथक, सुश्री मोहंती, भुवनेश्वर - ओडिसी, नोयोंसखी देवी, मणिपुर - मणिपुरी26 फरवरी 2026: सुनयना हजारीलाल, मुंबई - कथक, प्रतिभा प्रहलाद, बेंगलुरु - भरतनाट्यम, भावना रेड्डी, दिल्ली - कुचिपुड़ी और प्रभुतोष पांडा -ओडिसीकार्निवल में यह होंगी गतिविधियांखजुराहो कार्निवल: देश के दूसरे राज्यों के क्राफ्ट और लोक नृत्यनटराज: भगवान शिव के नृत्य रूपों को दिखाने वाली मूर्तियों की प्रदर्शनीऔर शैव-शाक्त पेंटिंगनेशनल चिल्ड्रन डांस फेस्टिवल: उभरते कलाकारों द्वारा क्लासिकल डांस परफॉर्मेंसलय शाला-23 से 25 फरवरी: अलग-अलग भारतीय नृत्य शैलियों के जाने-माने डांस गुरुओं के साथ संवादकलावर्त- 21 से 24 फरवरी: अलग-अलग कला विषयों पर आधारित चर्चाआर्ट-मार्ट: पानी के रंगों से प्रकृति का चित्रण, प्रदर्शनी-कम-बिक्रीहुनर: पारंपरिक शिल्प की प्रदर्शनी और बिक्रीसृजन: खजुराहो की वास्तुकला पर आधारित मिट्टी की मूर्तियां बनानास्वाद: क्षेत्रीय व्यंजनमध्य प्रदेश पर्यटन गतिविधियाँ: खानाबदोश समुदायों के साथ गांव का टूर, एक दिन का वॉक-टूर, भ्रमण कार्यक्रम, नेचर वॉक, खजुराहो गांव का टूर, ई-बाइक टूर, वॉटर स्पोर्ट, हॉट एयर बैलून, फैम टूर

महाशिवारात्रि स्पेशल:पाताल लोक से जुड़े हैं बाबा दुग्धेश्वर महादेव, स्पर्श मात्र से मिलती है कष्टों से मुक्ति
देवरिया। 15 फरवरी को देशभर के शिव मंदिरों में महाशिवरात्रि का त्योहार पूरे उत्साह से मनाया जाने वाला है और उसके लिए तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसी कड़ी में हम आपके लिए ऐसे शिव मंदिर की जानकारी लेकर आए हैं जिसकी उत्पत्ति गाय के दूध से हुई है और इस अद्भुत शिवलिंग की जड़ें पाताल लोक से जुड़ी हैं। खास बात ये है कि मंदिर सिर्फ अध्यात्म का केंद्र नहीं बल्कि राजनीति से भी जुड़ा है।हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं, उसका नाम है दुग्धेश्वर महादेव मंदिर, जो कि उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर कस्बे में बना है। मंदिर हजारों साल पुराना बताया जाता है और मंदिर को लेकर भक्तों की मान्यता भी उतनी ही मजबूत है। माना जाता है कि दुग्धेश्वर महादेव के स्पर्श दर्शन और दूध अर्पित करने से जीवन के सारे कष्ट मिल जाते हैं और शारीरिक रोगों से भी मुक्ति मिलती है, लेकिन खास बात ये है कि मंदिर के गर्भगृह में मौजूद ये शिवलिंग अनोखा है क्योंकि उसका आकार बाकी शिवलिंग से बिल्कुल अलग है।मंदिर में स्थापित शिवलिंग दिखने में खंडित चट्टान की तरह दिखते हैं और इस रूप को चंडलिंग अवतार माना जाता है। इसका कनेक्शन उज्जैन के महाकाल से है। माना जाता है कि दुग्धेश्वर महादेव बाबा महाकाल के उप-रूप हैं, जिनके दर्शन करने से ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जितना ही पुण्य मिलता है। इसलिए जो भक्त बाबा के दर्शन के लिए उज्जैन नहीं जा पाते हैं, वे देवरिया के दुग्धेश्वर महादेव के दर्शन जरूर करते हैं।18 एकड़ में बने दुग्धेश्वर महादेव के दर्शन करना भी आसान नहीं है क्योंकि महादेव जमीन से नीचे की तरफ 15 फीट पर स्थिति हैं और उनके दर्शन के लिए सीढ़ियों से नीचे उतकर जाना होता है। जमीन से नीचे की तरफ स्थापित होने की वजह से दुग्धेश्वर महादेव को पाताल का राजा कहा जाता है। माना जाता है कि शिवलिंग की जड़ें पाताल लोक से जुड़ी हैं।मंदिर की पौराणिक कथा भी बहुत अद्भुत है। कहा जाता है कि सालों पहले एक गोपालक की गाय इसी स्थान पर आकर रोजाना दूध देती थी। जब गोपालक ने गाय का पीछा किया तो पता चला कि इस जगह पर वो दूध देती है, वहां दिव्य शक्ति स्थापित है। बाद में उसी स्थान पर स्वयंभू दुग्धेश्वर महादेव प्रकट हुए। उसी दिन से बाबा पर दूध चढ़ाने की परंपरा चली आई है। शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में मंदिर में मेले का आयोजन होता है और बड़ी संख्या में भक्त बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर बाबा का विशेष शृंगार होता है और भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए बाबा पर गाय का शुद्ध दूध अर्पित करते हैं।

रीवा का पचमठा मंदिर:जहां आदि गुरु ने की थी शिवलिंग की स्थापना, सनातन धर्म के लिए बेहद खास माना जाता है यह स्थान
नीरज द्विवेदी, रीवाभारत के महान दार्शनिक, धर्म-सुधारक और अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक आदि गुरु शंकराचार्य ने देश में सनातन धर्म को एक सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से चार प्रमुख मठों की स्थापना की थी। ये मठ भारत की चारों दिशाओं-उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में स्थापित किए गए।लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य भारत के मध्य भाग में भी एक मठ की स्थापना करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मध्यप्रदेश के रीवा क्षेत्र को चुना। इसी स्थान पर उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की और एक मठ की नींव रखी। जिसको मचमठा के नाम से जाना जाता है। यह शिवलिंग आज भी उसी स्थान पर विद्यमान है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह उस कालखंड की स्मृति भी है, जब आदि शंकराचार्य पूरे देश में भ्रमण कर सनातन धर्म को एकजुट करने का कार्य कर रहे थे। यहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए आते हैं। विशेष रूप से महाशिवरात्रि के पर्व पर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। दूर-दराज से आए श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं, जलाभिषेक करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं।मंदिर के पुजारी ने बताया कि मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहाँ भगवान शिव की आराधना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। इसी कारण यह मठ न केवल रीवा बल्कि पूरे विंध्य क्षेत्र में आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।बता दें कि आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी, उत्तर में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारिका, दक्षिण में मैसूर क्षेत्र, और पूर्व में पुरी। इन मठों का उद्देश्य था देशभर में सनातन धर्म और अद्वैत वेदांत का प्रचार-प्रसार करना। लेकिन इसके साथ ही आदि शंकराचार्य भारत के मध्य क्षेत्र को भी आध्यात्मिक रूप से सशक्त करना चाहते थे।

संस्कृति और रिश्तों को मजबूत करने की नई पहल:महाशिवरात्रि के मौके पर मथुरा से आए बाबा विश्वनाथ के लिए उपहार
वाराणसी। 15 फरवरी को होने वाली महाशिवरात्रि को लेकर देशभर के मंदिरों में तैयारियां चल रही हैं। रंग-रोगन से लेकर खास तरह की पोशाक और मिष्ठान बनाना शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में मथुरा और अन्य मंदिरों से वस्त्र, मिठाई और फल सहित कई प्रकार की भेंट अर्पित की जा रही है। इस आदान-प्रदान का उद्देश्य अन्य मंदिरों के बीच संस्कृति और रिश्तों को मजबूत करना है।इस कार्यक्रम को मंदिरों में सफलतापूर्वक चलाने वाले कार्यकर्ता ने आईएएनएस से कहा, महाशिवरात्रि को लेकर देशभर के मंदिरों से नई पहल शुरू की गई है, जिसमें देश के बड़े मंदिर और हमारी मुहिम से जुड़ने वाले मंदिर सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे हमारे सनातन धर्म और मंदिर का जुड़ाव पहले से और ज्यादा मजबूत होगा। जैसे हम इस कार्यक्रम के तहत महाशिवरात्रि पर भेंट लेकर आए हैं, वैसे ही बाकी बड़े मंदिरों में होने वाले त्योहारों पर भी भेंट अर्पित की जाएगी।उन्होंने आगे कहा, देश में लगातार भाषा, खाने, बोली, क्षेत्र और पहनावे के आधार पर अंतर को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है और इसका असर भी कई क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। इस अंतर को हम सभी इस कार्यक्रम और आस्था के जरिए पाटने की कोशिश कर रहे हैं। इसका उद्देश्य देश के सभी मंदिरों को एक दूसरे से जोड़ने का है। भारत के किसी भी भाग में मौजूद मंदिर सनातन का प्रतीक है, जिसे क्षेत्र या बोली के आधार पर बांटना गलत होगा।बहुत पुराना है शिव-श्रीकृष्ण का संबंधमंदिर में अर्पित की जाने वाली भेंटों की जानकारी देते हुए बताया, महाशिवरात्रि के मौके पर जम्मू कश्मीर में स्थित माता वैष्णों देवी और दक्षिण में रामेश्वरम और गुजरात से लेकर असम तक के बड़े मंदिरों से भेंटें प्राप्त हो चुकी हैं। आज मुथरा से आई भेंट को अर्पित करने का काम किया जा रहा है क्योंकि भगवान शिव और श्री कृष्ण का संबंध बहुत पुराना है और दोनों ही एक दूसरे को अपना आराध्य मानते हैं। मंदिर से प्रसाद, वस्त्र और फूल बड़ी मात्रा में भेजे गए हैं।

महाशिवरात्रि स्पेशल :नंदी के मुख से निकलती जलधारा करती है जलाभिषेक, हैरान कर देंगे रहस्य
नई दिल्ली। 15 फरवरी को देशभर में महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाने वाला है। भक्त शिव मंदिर में दर्शन कर मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बेंगलुरू में एक ऐसा मंदिर है, जहां भगवान शिवलिंग पर निरंतर जल धारा बहती है। चौंकाने वाली बात ये है कि जल का स्त्रोत अज्ञात है। शोध करने आए वैज्ञानिक भी नहीं जानते हैं कि पानी कहां से आ रहा है।बेंगलुरु के मल्लेश्वरम इलाके में भगवान शिव का प्राचीन काडु मल्लेश्वर मंदिर स्थापित है, जिसकी तुलना 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग से की जाती है। माना जाता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग मल्लिकार्जुन का स्वरूप है। मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी के दौरान मराठा राजा शिवाजी के भाई वेंकोजी ने कराया था। मंदिर पर मराठा और द्रविड़ शैली की नक्काशी और बनावट हर हिस्से में देखने को मिलती है। मंदिर को 400 साल पुराना बताया जाता है और इसी मंदिर के पास स्थित है श्री दक्षिणामुख नंदी तीर्थ कल्याणी क्षेत्र।माना जाता है कि काडु मल्लेश्वर मंदिर का लाभ तभी मिलता है, जब दक्षिणामुख नंदी तीर्थ के दर्शन हो जाते हैं। दक्षिणामुख नंदी तीर्थ क्षेत्र में भक्तों को आंखों से चमत्कार और अपने भगवान के प्रति भक्त की आस्था देखने को मिलती है। मंदिर के प्रांगण में नंदी महाराज की प्राचीन पत्थर से बनी प्रतिमा मौजूद है, जिसके मुख से निरंतर साफ और ठंडे पानी की जलधारा निकलती रहती है, जो सीधे शिवलिंग पर गिरती है।पानी कहां से आता है? मुख्य उद्गम पता लगाने के लिए वैज्ञानिक भी मंदिर का रुख कर चुके हैं, लेकिन किसी को नहीं पता कि पानी आता कहां से है। जलधारा सिर्फ नंदी महाराज के मुख से निकलती है और शिवलिंग का जलाभिषेक करती है। भक्त इसे भक्ति और चमत्कार मानते हैं।स्थानीय मान्यता है कि मंदिर में विराजमान शिवलिंग भक्तों की हर इच्छा को पूरी करते हैं। अगर भक्त अपने ईष्ट से सच्चे मन से कुछ भी मांगता है, वह पूरा हो जाता है। महाशिवरात्रि और सावन के महीने में लाखों की भीड़ मंदिर पहुंचती है। महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में 15 दिन का मूंगफली मेला भी लगता है। इतना ही नहीं, महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर को फूलों से सजाकर भगवान शिव की रथ यात्रा भी निकाली जाती है और विशेष अभिषेक भी होता है।

घूसखोर पंडत:मनोज वाजपेयी की फिल्म टाइटल पर फूटा संतों का गुस्सा, महामंडलेश्वर बोले- कुछ लोग खुश हैं, लेकिन यह गंभीर विषय
हरिद्वार। अभिनेता मनोज बाजपेयी की आगामी फिल्म घूसखोर पंडत को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। फिल्म का टीजर जारी होते ही ब्राह्मण समाज और संत समाज के लोग सड़कों पर उतर आए और इस फिल्म के खिलाफ कड़ा विरोध जताया। महामंडलेश्वर स्वामी ज्योतिर्मयानंद ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, इस तरह की फिल्म तुरंत प्रतिबंधित की जानी चाहिए, क्योंकि यह सीधे-सीधे एक विशेष समाज की छवि को धूमिल करने का प्रयास कर रही है। आजकल ब्राह्मण समाज के खिलाफ खुलेआम गालियां दी जा रही हैं और कुछ लोग इसे सामान्य मानकर खुश भी हैं, जबकि यह एक गंभीर और चिंताजनक बात है। उन्होंने कहा, ब्राह्मण समाज ने ही मानव और पशु के बीच का अंतर समाज को समझाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे में फिल्म में समाज के खिलाफ गलत संदेश देना राष्ट्र और समाज के लिए हानिकारक है।घूसखोर पंडत नाम अपने आप में आपत्तिजनक इसी मुद्दे पर गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने भी फिल्म के नाम और कहानी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, घूसखोर पंडत नाम अपने आप में आपत्तिजनक है, क्योंकि घूसखोरी कोई मामूली शब्द नहीं है बल्कि यह एक गंभीर आपराधिक कृत्य है। किसी भी समाज के लोगों को अपराधी के रूप में पेश करना निंदनीय है। इस तरह के फिल्म निर्माता पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति किसी समाज की छवि को नुकसान पहुंचाने का दुस्साहस न कर सके।आचार्य प्रमोद कृष्णम ने दी तीखी प्रतिक्रियाइनके अलावा, आचार्य प्रमोद कृष्णम ने इस फिल्म के टाइटल को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था, मेरी नजर में घूसखोर पंडत जैसा नाम रखना पाप के समान है। किसी भी समुदाय को जानबूझकर निशाना बनाकर फिल्म बनाना समाज को तोड़ने का काम करता है। कुछ लोग जानबूझकर जातियों का सहारा लेकर समाज में विभाजन पैदा करना चाहते हैं और यह फिल्म उसी तरह की साजिशों का हिस्सा हो सकती है।शिया धर्मगुरु ने अपनाया कड़ा रुखशिया धर्मगुरु मौलाना सैफ अब्बास ने भी इस विवाद पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा, किसी एक धर्म या समुदाय को टारगेट करके बनाई जा रही फिल्मों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिए। सस्ती लोकप्रियता और प्रचार के लिए देश के अंदर जिस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, वह बेहद अफसोसजनक है। मेरी भारत सरकार से मांग है कि इस फिल्म पर तुरंत पाबंदी लगाई जाए।उन्होंने आगे कहा, पहले फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ समाज को सकारात्मक संदेश देना होता था, लेकिन अब कुछ लोग केवल चर्चा में बने रहने और प्रचार पाने के लिए इस तरह के विवादित तरीकों का सहारा ले रहे हैं। ऐसी फिल्में देश में भाईचारे को मजबूत करने के बजाय माहौल खराब करने का काम कर रही हैं।

महाकालेश्वर मंदिर:उज्जैन में मौजूद हैं बाबा महाकाल का वृद्ध स्वरूप, इनके दर्शन के बिना अधूरी है धार्मिक यात्रा
नई दिल्ली। उज्जैन का महाकाल मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध दक्षिणमुखी और स्वयंभू मंदिर है। महाकाल मंदिर शिप्रा नदी के तट पर स्थित है, जहां जाने से समय भी बदल जाता है। माना जाता है कि महाकाल के दर्शन मात्र से जीवन में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि महाकाल मंदिर में मुख्य गर्भगृह में मौजूद शिवलिंग से भी पुराना शिवलिंग मंदिर में मौजूद है, जिसके दर्शन के बिना महाकाल की दर्शन यात्रा अधूरी मानी जाती है।उज्जैन के महाकाल मंदिर में कई प्राचीन मंदिर स्थापित हैं, जिनकी अपनी-अपनी मान्यता है। कुछ मंदिर का निर्माण नए सिरे से किया गया है लेकिन कुछ मंदिर की जड़े प्राचीन काल से जुड़ी हैं। मंदिर परिसर में महाकाल के दर्शन से पहले वृद्धकालेश्वर महादेव का मंदिर बना है, जिसे मुख्य मंदिर से भी प्राचीन बताया जाता है। मंदिर के गर्भगृह में बाबा महाकाल के प्रतिरूप में शिवलिंग मौजूद हैं और उनका शृंगार प्रतिदिन बाबा महाकाल की तरह ही होता हैं।भगवानों में फर्क कर पाना बहुत मुश्किलवृद्धकालेश्वर महादेव और बाबा महाकाल में फर्क कर पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि शिवलिंग का आकार और रूप दोनों एक जैसे हैं। कहा जाता है कि वृद्धकालेश्वर महादेव, बाबा महाकाल के वृद्ध स्वरुप हैं और उनसे भी ज्यादा प्राचीन हैं। उज्जैन में बाबा महाकाल के दर्शन का पुण्य तभी पूरा मिलता है, जब महाकालेश्वर के श्वृद्धश् स्वरूप के दर्शन न हो जाए। इसलिए भक्त महाकाल के दर्शन के बाद बाबा वृद्धकालेश्वर के दर्शन जरूर करते हैं।महाकाल से भी पुराने हैं बाबा वृद्धकालेश्वरमाना ये भी जाता है कि बाबा वृद्धकालेश्वर, महाकाल से भी पुराने हैं और उनसे पहले धरती पर प्रकट हुए थे। हालांकि आक्रमणकारियों की वजह से शिवलिंग और मंदिर दोनों को खंडित करने की कोशिश की गई लेकिन आज भी बाबा वृद्धकालेश्वर अपनी जगह पर स्थापित हैं और भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण कर रहे हैं। मंदिर की हालत थोड़ी जर्जर है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि मंदिर आक्रमणकारियों का शिकार हुआ था लेकिन साथ ही समय-समय पर मंदिर का रखरखाव भी होता रहता है।हर किसी को नहीं हो पाते स्पर्श दर्शनजहां महाकाल के स्पर्श दर्शन हर किसी को नहीं हो पाते हैं, वहीं उसके उलट बाबा वृद्धकालेश्वर के स्पर्श दर्शन के लिए मंदिर हमेशा खुला रहता है। भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए सावन और महाशिवरात्रि के दिन विशेष पूजा कराते हैं। जूना महाकाल की भी बाबा महाकाल की तरह ही अलग-अलग आरतियां प्रतिदिन की जाती हैं।


