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चैत्र नवरात्रि का आठवां दिन:मां महागौरी की आराधना से सौभाग्य और सुख की होती है प्राप्ति, इस बार बन रहा विशेष संयोग भी
नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र की अष्टमी तिथि 26 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। साथ ही अशोक अष्टमी व्रत और मासिक दुर्गाष्टमी भी मनाई जाएगी। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का भी संयोग बन रहा है, जो शुभ कार्यों के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है। नवरात्र की अष्टमी तिथि पर मां महागौरी की आराधना से भक्तों को शक्ति, सौभाग्य और सुख की प्राप्ति होती है।दृक पंचांग के अनुसार, गुरुवार को सूर्योदय 6 बजकर 18 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 36 मिनट पर होगा। तिथि की बात करें तो अष्टमी सुबह 11 बजकर 48 मिनट तक है। उदयातिथि के अनुसार पूरे दिन अष्टमी का मान होगा। नक्षत्र आर्द्रा है जो शाम 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। धर्मशास्त्र के अनुसार, शुभ कार्य सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत काल या अभिजित मुहूर्त में करना शुभकर होता है। वहीं, राहुकाल और दुर्मुहूर्त या अशुभ समय के दौरान किसी भी शुभ काम से बचना चाहिए।जानें शुभ मुहूर्त के बारे मेंगुरुवार को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 45 मिनट से 5 बजकर 31 मिनट तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 2 मिनट से 12 बजकर 52 मिनट तक, विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। वहीं, गोधूलि मुहूर्त 6 बजकर 34 मिनट शाम से 6 बजकर 58 मिनट तक, अमृत काल सुबह 6 बजकर 50 मिनट से 8 बजकर 21 मिनट तक और सर्वार्थ सिद्धि योग शाम 4 बजकर 19 मिनट से अगले दिन सुबह 6 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। साथ ही रवि योग शाम 4 बजकर 19 मिनट से अगले दिन सुबह 6 बजकर 17 मिनट तक रहेगा।अशुभ समयअशुभ समय की बात करें तो 26 मार्च को राहुकाल दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 3 बजकर 31 मिनट तक, यमगंड सुबह 6 बजकर 18 मिनट से 7 बजकर 50 मिनट तक, गुलिक काल सुबह 9 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। वहीं, दुर्मुहूर्त सुबह 10 बजकर 24 मिनट से 11 बजकर 13 मिनट तक रहेगा।

श्री महाकाल लोक में दिखा अलौकिक दृश्य:भोले की एक झलक पाने देर रात लाईन में लगे भक्त, भव्य शृंगार को देख हुए भाव-विभोर
उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर की प्राचीन भव्यता पूरे विश्व में विख्यात है। बारह ज्योतिर्लिंगों में दक्षिणमुखी महाकालेश्वर का अपना एक विशिष्ट स्थान है और उसमें भी विशिष्ट है यहां होने वाली भस्म आरती। आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और पूरे मंदिर का माहौल देखने लायक होता है। ऐसा ही अलौकिक दृश्य बुधवार को देखने को मिला है। इस दिन भक्त बाबा के दर पर दर्शन के लिए देर रात से लंबी कतारों में लगे हुए थे।देश-विदेश से आए श्रद्धालु बाबा का भव्य शृंगार देखने के लिए उत्सुक नजर आए। पूरा मंदिर बाबा के भक्तों की लंबी कतारों से भरा हुआ था। सुबह भोर में बाबा के पट खुले और फिर महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा पहले बाबा का जलाभिषेक किया, जिसमें उन्हें पंचामृत से स्नान करवाया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं।जय महाकाल के जयकारों से गूंजा परिसरइसके बाद पूरा मंदिर परिसर जय महाकाल के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। भक्तों ने श्हर हर महादेवश् और ऊं नमः शिवाय के जयकारे लगाए। इसके बाद भगवान महाकाल का सुंदर श्रृंगार किया गया। फूलों की मालाएं, बेलपत्र, चंदन और अन्य पूजा सामग्री से बाबा को सजाया गया। फिर, बाद में महाकाल की कपूर आरती की गई और उसके बाद उन्हें भोग लगाया गया। हर दिन अलग तरीके से किया जाता है बाबा का शृंगारहर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है। वहीं, भस्म आरती देखने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु उज्जैन आते हैं। महाकाल की भस्म आरती न सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि यह आस्था का जीवंत प्रमाण है। आरती में शामिल होने के लिए पुरुषों के लिए धोती और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।

बाबा महाकाल का अद्भुत शृंगार देखकर गदगद हुए भक्त:कपाट खुलते ही जय श्री महाकाल के जयकारों से गूंजा परिसर
उज्जैन। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर सोमवार को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के बाबा महाकाल के दर पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर जय श्री महाकाल के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। मंदिर परिसर में श्रद्धालु बाबा की झलक पाने के लिए रविवार देर रात से लंबी कतारों में लगे हुए थे। परंपरा के अनुसार, बाबा महाकाल को जगाने के लिए सोमवार सुबह 4 बजे मंदिर के पट खोले गए। सुबह-सुबह ही कई सारे श्रद्धालु भस्म आरती में शामिल होते हुए दिखाई दिए। उन्होंने सुबह-सुबह भगवान के दर्शन किए और पवित्र पूजा विधियों को देखा।यह आरती महाकाल मंदिर की सबसे विशेष और पवित्र परंपरा का हिस्सा मानी जाती है। भक्तों ने बड़ी श्रद्धा से भगवान के दर्शन किए और आरती के दौरान पूजा विधि को बड़े मन से देखा। यह आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा करवाई जाती है।पंचामृत से हुआ बाबा महाकाल का अभिषेकइसमें बाबा निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। सुबह 3ः30 से 4ः00 बजे के बीच मंदिर के पट खुलते हैं और गर्भगृह में पूजा शुरू होती है। इसके बाद पंचामृत से अभिषेक किया गया, जिसमें शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई।अद्भुत शृंगार देखकर गदगद हुए श्रद्धालु इसके बाद बाबा का भव्य श्रृंगार किया गया। इसमें महाकाल को चंदन से शृंगार किया गया व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला अर्पित की गई। भक्त बाबा का अद्भुत शृंगार देखकर खुशी से गदगद दिखे। इसके बाद महाकाल की कपूर आरती होती है और उसके बाद उन्हें भोग लगाया जाता है। हर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है।भक्तों ने अलौकिक क्षण के दर्शनइस पावन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से इस अलौकिक क्षण के दर्शन किए। संपूर्ण मंदिर परिसर जयकारों से गुंजायमान रहा और वातावरण पूरी तरह शिवमय हो गया। लगभग दो घंटे चली इस आरती के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार और प्रभु का शृंगार साथ-साथ चलता रहा।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की अहम बैठक आज:कई अहम फैसलों पर मुहर लगने की उम्मीद, अंतिम चरण में निर्माण कार्य
अयोध्या। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की एक महत्वपूर्ण बैठक शनिवार को अयोध्या में होने वाली है, जहां मंदिर संचालन और आगंतुकों की व्यवस्था से संबंधित कई महत्वपूर्ण निर्णयों को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। बैठक से पहले, राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने भव्य परियोजना की प्रगति के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि निर्माण कार्य अब अंतिम चरण में है। मंदिर परिसर पर कुल व्यय लगभग 1,800 करोड़ रुपए होने का अनुमान है, जो इस विकास की विशालता और महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।मंदिरा में दर्शन व्यवस्था को लेकर भी होगा मंथनइसके साथ ही प्रमुख मुद्दों में से एक परिसर के भीतर स्थित सात सहायक मंदिरों में दर्शन की व्यवस्था से संबंधित है। इनमें परिक्रमा मार्ग पर स्थित सप्त ऋषि मंदिर भी शामिल हैं, जहां आगामी रामनवमी समारोह के बाद श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश खोले जाने की उम्मीद है।कार्यक्रमों के आयोजन के तरीके पर निर्णय की भी उम्मीदट्रस्ट की ओर से भविष्य में धार्मिक समारोहों और कार्यक्रमों के आयोजन के तरीके पर भी निर्णय लिए जाने की उम्मीद है। सूत्रों के अनुसार, मंदिर परिसर में बड़े पैमाने के कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जा सकते हैं और सरल एवं पारंपरिक अनुष्ठानों की ओर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। आध्यात्मिक पवित्रता को ध्यान में रखते हुए, सातों मंदिरों में ध्वजारोहण समारोहों का आयोजन संयमित तरीके से किए जाने की संभावना है।

चैत्र नवरात्रि: शक्ति की आराधना को समर्पित तीसरा दिन, शिव-शक्ति की भक्तों के लिए खास रहेगा कल का दिन, जानें
शक्ति की आराधना को समर्पित नवरात्रि का तीसरा दिन शनिवार को है। खास बात है कि इस दिन देवाधिदेव महादेव और माता गौरा के पूजन का दिन यानी गणगौर भी पड़ रहा है। धार्मिक मान्यता है कि शिव-पार्वती की पूजा से कन्याओं को मनचाहा वर, विवाहिताओं को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। दृक पंचांग के अनुसार शनिवार को चैत्र मास, शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है, जिसे गणगौर के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र में लोकप्रिय है। गणगौर में गण का अर्थ भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती से है। कई जगहों पर शिव को श्ईसर जीश् और पार्वती को गौरा माता या गवरजा जी के नाम से पूजा जाता है। इस व्रत और पूजन का विशेष महत्व है। अविवाहित कन्याएं पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखकर मनचाहा वर प्राप्ति की कामना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए पूजा करती हैं। गणगौर की पूजा में महिलाएं विधि-विधान से पूजन करती हैं।नवरात्र के तीसरे दिन सूर्योदय 6 बजकर 24 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 33 मिनट पर होगा। शुक्ल तृतीया रात 11 बजकर 56 मिनट तक है। नक्षत्र अश्विनी 21 को पूरे दिन और 22 मार्च की देर रात 12 बजकर 37 मिनट तक है। योग इन्द्र शाम 7 बजकर 1 मिनट तक, करण तैतिल दोपहर 1 बजकर 14 मिनट तक है।21 मार्च के शुभ मुहूर्त की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 49 मिनट से 5 बजकर 37 मिनट तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 4 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक, विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 32 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक है। वहीं, अमृत काल शाम 5 बजकर 58 मिनट से 7 बजकर 27 मिनट तक रहेगा।अशुभ समय का विचार भी महत्वपूर्ण है। इस दिन राहुकाल सुबह 9 बजकर 26 मिनट से 10 बजकर 57 मिनट तक, यमगंड दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 31 मिनट तक और गुलिक काल सुबह 6 बजकर 24 मिनट से 7 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। इस दौरान कोई नया या शुभ कार्य करना वर्जित रहता है।

महाकालेश्वर मंदिरः ब्रह्म मुहूर्त में खुले बाबा महाकाल के कपाट:चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन देखने को मिला अद्भुत शृंगार, एक झलक पाने लगी भक्तों की कतार
उज्जैन। नवरात्र के दूसरे दिन, उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में सुबह की भस्म आरती देखने के लिए भक्तों का सैलाब देखने को मिला। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को बाबा का अद्भुत शृंगार देखने को मिला, जिसे देखने के लिए भक्त रात से ही कतारबद्ध थे। सुबह 4 बजे की भस्म आरती के दौरान बाबा का विधि-विधान से पूजन किया गया।सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद, और फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा को स्नान कर अभिषेक पूजन कराया और भस्म आरती की शुरुआत हुई, जिसे मंत्रोच्चार और ढोल-नगाड़ों के साथ संपन्न किया जाता है।शिवलिंग पर बिखेरी जाती है भस्मयह आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। वे मंत्रोच्चार के साथ बाबा महाकाल को भस्म अर्पित करते हैं। इस समय शिवलिंग पर भस्म बिखेरी जाती है, जो निराकार रूप का प्रतीक है। इस दौरान बाबा अपने भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं।बाबा का किया गया विशेष शृंगारइसके बाद बाबा का विशेष शृंगार किया गया। इसमें महाकाल को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया। बाबा के माथे पर स्पष्ट त्रिपुंड व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला पहनाई गई। साथ ही ताजा बिल्वपत्र (बेलपत्र) चढ़ाए गए और रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं से पूरे शृंगार को और भी आकर्षक बनाया गया।बम-बम भोले के जयघोष से गूंजा परिसरइस दौरान मंदिर परिसर बम-बम भोले और हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठा। भस्म आरती लगभग दो घंटे तक चलती है। पवित्र भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है।उज्जैन के महाकाल मंदिर में भस्म आरती के अलावा दिन भर में छह अन्य आरतियां होती हैं, जिनमें बालभोग, भोग, पूजन, संध्या और शयन आरती शामिल हैं। भस्म आरती का विशेष महत्व है, जो भक्तों के लिए आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र है। गर्भगृह में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं हैय वे नंदी हॉल या बैरिकेड्स से दर्शन करती हैं।

चैत्र नवरात्रि दूसरा दिन:देवी धाम में उमड़ा भक्तों का सैलाब, मां के दिव्य शृंगार और अलौकिक दर्शन ने श्रद्धालुओं को किया भाव-विभोर
मैहर। चैत्र नवरात्र के पावन अवसर पर आज दूसरे दिन जगत जननी मां शारदा के दरबार में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। मां के दिव्य शृंगार और अलौकिक दर्शन ने भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। नवरात्रि के दूसरे दिन मां शारदा का विशेष शृंगार किया गया, जिसके दर्शन कर भक्तों ने जय माता दी के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर गूंजा दिया।चैत्र नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही मंदिर में भक्तों का सैलाब मैहर माता के दर्शन के लिए पहुंच रहा है। चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन मां शारदा का नीले रंग के वस्त्र और सोने के आभूषणों से माता का दिव्य शृंगार हुआ। मां को बड़ी नथ पहनाकर सुसज्जित किया गया। प्रधान पुजारी पवन दाऊ महाराज द्वारा विधि-विधान से मां की आरती की गई और भोग अर्पित किया गया। मंदिर परिसर में भक्ति गीतों और जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें दर्शन के लिए लगी रहीं। भक्त 1000 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़कर मां के दरबार तक पहुंच रहे हैं और शुभ अवसर पर आशीर्वाद ले रहे हैं।नौ दिनों तक बंद रहेंगे वीआईपी दर्शनचैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन से ही भक्त बड़ी संख्या में मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच रही है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए मंदिर समिति और प्रशासन ने नौ दिनों तक वीआईपी दर्शन को बंद रखने का फैसला लिया है। यह फैसला भक्तों की भीड़ और भव्य मेले को ध्यान में रखकर लिया है। 19 मार्च से लेकर 27 मार्च तक मंदिर में सामान्य तरीके से भक्त दर्शन कर पाएंगे।नवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं माता का दर्शन करनेप्रशासन के अनुसार, नवरात्रि के दौरान देश-विदेश से प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु माता रानी के दर्शन के लिए मैहर पहुंचते हैं। ऐसे में आम श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो और दर्शन व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके, इसके लिए यह फैसला लिया गया है।यह बात सभी जानते हैं कि चैत्र नवरात्रि में प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां शारदा मंदिर की बहुत मान्यता है। माना जाता है कि इसी स्थान पर मां सती का हार गिरा था और यहां पुजारी से पहले मां के परम भक्त उनकी पूजा करते हैं। माना जाता है कि मंदिर में जब पुजारी मंदिर के कपाट खोलते हैं तो प्रतिमा के पास ताजा फूल मिलते हैं।

हिंदू नववर्ष, चैत्र नवरात्रि:अभूतपूर्व उल्लास में डूबी धमनगरी, महाकाल मंदिर में लहराया धर्म ध्वज, सूर्योपासना से भक्तिमय हुआ रामघाट
उज्जैन। धर्मनगरी उज्जैन में हिंदू नववर्ष, चैत्र नवरात्रि और गुड़ी पड़वा का उत्सव इस बार अभूतपूर्व आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के पावन अवसर पर पूरी नगरी भक्ति में डूबी नजर आई। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जगत की रचना की थी, इसलिए इसे ‘सृष्टि आरंभ दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है।सुबह की पहली किरण के साथ शिप्रा नदी के रामघाट और दत्त अखाड़ा घाट पर हजारों श्रद्धालु एकत्रित हुए। भक्तों ने सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की। पूरे घाट क्षेत्र में वैदिक मंत्रोच्चार और सूर्योपासना से वातावरण भक्तिमय हो उठा। वहीं महाकालेश्वर मंदिर में परंपरा अनुसार ध्वज परिवर्तन का आयोजन हुआ, जो नववर्ष के स्वागत का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। हरसिद्धि मंदिर सहित शहर के सभी देवी मंदिरों में विशेष सजावट और अनुष्ठान किए गए, जहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।रामघाट पर हुआ कोटि सूर्योपासना का भव्य आयोजनसुबह 5ः30 बजे रामघाट पर ‘कोटि सूर्योपासना’ का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें हजारों लोगों ने एक साथ सूर्य वंदना की। यह आयोजन नवसंवत्सर अभिनंदन समारोह समिति और विभिन्न ज्योतिष संस्थाओं के सहयोग से किया गया।शाम को विक्रमोत्सव 2026 के तहत ‘सृष्टि आरंभ दिवसदृउज्जयिनी गौरव दिवस’ का भव्य कार्यक्रम आयोजित होगा। इसमें भगवान शिव और शिप्रा की महिमा पर आधारित नृत्य-नाट्य प्रस्तुति, ड्रोन शो और आतिशबाजी आकर्षण का केंद्र रहेंगे। प्रसिद्ध गायक विशाल मिश्रा की संगीत प्रस्तुति कार्यक्रम को और खास बनाएगी।इस अवसर पर ‘सम्राट विक्रमादित्य अलंकरण 2026’ के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तित्व को 1.01 करोड़ रुपये का सम्मान दिया जाएगा, जिससे उज्जैन की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिलेगी।

मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन: आदिशक्ति की आराधना से तप, संयम, ज्ञान की होती है प्राप्ति, जानें शुभ मुहूर्त के बारे में
नई दिल्ली। आदिशक्ति की आराधना के पर्व चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन शुक्रवार को मां दुर्गा के दूसरे रूप ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी। ब्रह्मचारिणी मां की आराधना से तप, संयम, ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है। माता को सफेद वस्त्र, चंदन, फूल और सफेद मिठाई चढ़ाने का विधान है। इस दिन का विशेष महत्व है, क्योंकि पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बना हुआ है।सर्वार्थ सिद्धि के साथ अमृत सिद्धि योग भी बन रहा है, जो शुक्रवार सुबह 6 बजकर 25 मिनट से लेकर देर रात 2 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। साथ ही शनिवार दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक विजय मुहूर्त का संयोग है, जो नए कार्य, पूजा और मंत्र जाप के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।19 मार्च को सूर्योदय 6 बजकर 25 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 32 मिनट पर होगा। वहीं, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पूरे दिन के साथ ही अगले दिन यानी 21 मार्च की देर रात 2 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। नक्षत्र रेवती भी अगले दिन देर रात 2 बजकर 27 मिनट तक रहेगा, फिर अश्विनी शुरू होगा। योग ब्रह्म रात 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। करण बालव दोपहर 3 बजकर 43 मिनट तक रहेगा।धार्मिक मान्यता है कि सर्वार्थ सिद्धि योग में शुरू किए गए कार्य सफल होते हैं और राहुकाल में कोई नया काम या पूजा करने से वह निष्फल होता है। दृक पंचांग के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन शुभ मुहूर्त में ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 50 मिनट से 5 बजकर 38 मिनट तक और अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा।विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। अमृत काल की बात करें तो रात 12 बजकर 13 मिनट से देर रात 1 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। वहीं, निशिता मुहूर्त रात 12 बजकर 4 मिनट से 12 बजकर 52 मिनट तक है।अशुभ समय का विचार भी महत्वपूर्ण है। शुक्रवार को राहुकाल सुबह 10 बजकर 58 मिनट से दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक और यमगंड दोपहर 3 बजकर 30 मिनट से 5 बजकर 1 मिनट तक, गुलिक काल सुबह 7 बजकर 56 मिनट से 9 बजकर 27 मिनट तक और वर्ज्य दोपहर 3 बजकर 16 मिनट से 4 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। इस दौरान कोई भी नया, शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

चैत्र नवरात्रि:देवी आराधना में लीन हुए भक्त, वैष्णो देवी मंदिर में उमड़ा भक्तों का रेला, ड्योढ़ी तक पहुंच रहे दर्शनी
कटरा। आज गुरुवार से चैत्र नवरात्र यानि देवी आराधना का पर्व शुरु हो गया है। नवरात्रि के पहले दिन देशभर के देवी मंदिरों में भक्तों का रेला देखने को मिल रहा है। जम्मू और कश्मीर के कटरा में स्थित श्री माता वैष्णो देवी मंदिर में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन जबरदस्त भीड़ देखने को मिल रही है। सुबह से ही श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शनी ड्योढ़ी तक पहुंच रहे हैं और माता रानी के दर्शन के लिए आगे बढ़ रहे हैं। पूरा इलाका भक्ति के माहौल में डूबा है। हर तरफ श्जय माता दीश् के जयकारे गूंज रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां पहुंचे हैं। कोई परिवार के साथ आया है तो कोई दोस्तों के साथ, लेकिन सभी के चेहरे पर एक अलग ही खुशी और उत्साह नजर आ रहा है।एक श्रद्धालु ने बताया कि वह खुद को बहुत भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें नवरात्रि के पहले दिन माता रानी के दर्शन करने का मौका मिल रहा है। उन्होंने कहा कि वह लगभग हर साल यहां आते हैं, लेकिन इस बार पहली बार नवरात्रि में आए हैं। उनके लिए यह अनुभव और भी खास है, क्योंकि इस समय मंदिर की सजावट बहुत सुंदर होती है। उन्होंने कहा कि अब तक उन्होंने नवरात्रि की सजावट नहीं देखी थी। इसलिए इस बार वह इसे देखने के लिए भी काफी उत्साहित हैं। साथ ही उन्होंने माता रानी से प्रार्थना की कि पूरा देश समृद्ध और शक्तिशाली बने।माता के दर्शन कर निहाल हुए भक्तएक अन्य श्रद्धालु ने भी अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि वे पहले कश्मीर घूमने गए थे और वहां से सीधे माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए कटरा पहुंच गए। उन्होंने कहा कि नवरात्र के पहले ही दिन माता रानी के दर्शन मिलना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन का बहुत खास और यादगार पल है। उन्होंने यह भी कहा कि नवरात्रि में मंदिर की भव्य सजावट देखने लायक होती है और वह इस अनुभव को पूरी तरह महसूस करना चाहते हैं।श्रद्धालु ने देश और दुनिया के लिए शांति की कामना भी की। उनका कहना है कि आज के समय में जिस तरह से दुनिया में तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां बनी हुई हैं, ऐसे में माता रानी से यही प्रार्थना है कि सब कुछ शांत हो जाए और हर जगह सुख-शांति बनी रहे।

बगलामुखी मंदिर:तंत्र की देवी के दरबार में लगी भक्तों की कतार, चैत्र नवरात्रि के पहले दिन जगत जननी का दर्शन कर निहाल हुए भक्त
आगर-मालवा। चैत्र नवरात्रि की शुरुआत के साथ देशभर के देवी मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ पहुंच रही है। माता रानी के दिव्य दर्शन करने के लिए भक्त ब्रह्म मुहूर्त से ही दर्शन के लिए लाइनों में लगे हैं। मध्य प्रदेश में नलखेड़ा स्थित तंत्र की देवी कही जाने वाली मां बगलामुखी के दरबार में भक्तों को दर्शन के लिए घंटों इंतजार करते हुए देखा गया। भक्त ही जगत जननी के दर्शन पाकर बहुत खुश हैं।आगर मालवा के मां बगलामुखी मंदिर में दर्शन के लिए पहुंची महिला श्रद्धालु ने बताया कि वो हर साल नवरात्रि में मां बगलामुखी के दर्शन करने के लिए पहुंचती हैं और इस बार पहले नवरात्र के पहले दिन दर्शन करने का सौभाग्य मिला है। उन्होंने बताया कि यहां का हवन करने से जीवन की नकारात्मकता दूर होती है और ज्यादातर भक्त नवरात्रि में विशेष हवन कराने के लिए आते हैं। वे बीते 15 साल से मंदिर में दर्शन के लिए आ रही हैं।जीवन की परेशानियों का नाश करती हैं मांएक अन्य श्रद्धालु ने बताया कि वे 20 साल से हर साल नवरात्रि पर मां बगलामुखी के दर्शन के लिए आते हैं और हवन जरूर कराते हैं। यहां का हवन न सिर्फ मन तो सुकून देता है, बल्कि जीवन की परेशानियों का भी नाश करता है।शक्तिपीठ नैना देवी मंदिर में उमड़े भक्तवहीं हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन शक्तिपीठ श्री नैना देवी मंदिर में भी भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। भक्त मुराद पूरी करने के लिए मां के दरबार में लाल चुनरी और नारियल लेकर पहुंच रहे हैं। इस मौके पर मां की ज्योति को आरती के बाद मंदिर में घुमाया गया। मंदिर प्रशासन और जिला मजिस्ट्रेट ने मिलकर श्रद्धालुओं के सुलभ दर्शन के लिए व्यवस्थाएं भी की हैं।मीडिया से बात करते हुए जिला मजिस्ट्रेट राहुल कुमार ने बताया, आज हमने अपने सभी अधिकारियों और गैर-सरकारी सदस्यों के साथ बैठक की। कानून व्यवस्था और यातायात से संबंधित प्रमुख मुद्दों का समाधान कर लिया गया है। अतिरिक्त मजिस्ट्रेट तैनात कर दिए गए हैं, कमान एवं नियंत्रण केंद्र पूरी तरह से कार्यरत है और विभिन्न स्थानों पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दे दिया गया है। श्रद्धालुओं के लिए मेडिकल की सुविधा भी रखी गई है। हर तरह की परेशानी से निपटने के सारे इंतजाम कर दिए हैं।

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन बाबा महाकाल का हुआ मनमोहन शृंगार:साकार स्वरूप का दर्शन पाने उमड़ी भक्तों की भीड़
उज्जैन। बारह ज्योतिर्लिंग में से सबसे प्रभावशाली और काल के देवता माने जाने वाले श्री महाकालेश्वर मंदिर में चैत्र नवरात्रि की धूम देखने को मिली। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को बाबा का अद्भुत शृंगार किया गया और माथे पर बड़े अर्धचांद और त्रिपुण को स्थापित कर महाकाल की पूजा-अर्चना की गई। बाबा के चैत्र नवरात्रि के पहले दिन के खास दर्शन देखने के लिए भक्तों की भारी भीड़ पहुंची।बाबा महाकाल मंदिर में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर नव संवत्सर का भव्य स्वागत किया गया। ब्रह्म मुहूर्त में आयोजित भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का विशेष विधि-विधान के साथ पूजन किया गया। पहले ब्रह्म मुहूर्त में वीरभद्र से आज्ञा लेकर मंदिर के कपाट खोले गए और फिर दूध, दही, घी, शहद, और फलों के रस से बने पंचामृत से बाबा को स्नान कर अभिषेक पूजन कराया और भस्म आरती की शुरुआत हुई।माथे पर त्रिपुंड के साथ त्रिशूल किया गया था स्थापितचैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि, गुरुवार को बाबा के माथे पर त्रिपुंड बनाया गया और उसपर त्रिशूल को स्थापित किया गया। वहीं नीचे की तरफ भी एक त्रिपुंड बनाया गया और उसपर बाबा की तीसरी आंख को सुसज्जित किया गया। बाबा के माथे पर बड़ा अर्ध चांद भी बनाया गया जो तो सुख और शांति का प्रतीक है, और आखिर में सूखे मेवों की माला से बाबा को सजाया गया और लाल रंग की चुनरी बाबा को अर्पित की गई। बाबा के अद्भुत शृंगार को देख भक्त भी मंत्रमुग्ध नजर आए और पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव और जय माता दी के जयकारों से गूंज उठा।शृंगार के बाद बाबा साकार रूप में देते हैं दर्शनबता दें कि भस्म आरती के दौरान बाबा भक्तों को निराकार रूप में दर्शन देते हैं, जो जीवन और मृत्यु से परे होता है। माना जाता है कि जो भी बाबा के निराकार रूप में दर्शन करता है, उसे और जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिलती है। वहीं शृंगार के बाद बाबा साकार रूप में दर्शन देते हैं। साकार रूप बाबा का अलौकिक और संसार से जुड़ा होता है, जिसके दर्शन से भक्तों के सारे कष्ट कम हो जाते हैं।

धार्मिक नगरी में गौरवशाली परंपरा की वापसी:गुड़ी पड़वा पर महाकाल मंदिर में फहरेगा ब्रह्म ध्वज, महान सम्राट के समय हुई थी शुरुआत
उज्जैन। उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में इस वर्ष गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर एक ऐतिहासिक परंपरा का भव्य पुनरुद्धार देखने को मिलेगा। 19 मार्च को मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज फहराया जाएगा, जो केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि लगभग 2000 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत का पुनर्जीवन भी है। माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत प्राचीन भारत के महान सम्राट सम्राट विक्रमादित्य के समय में हुई थी।इस आयोजन को लगातार दूसरे वर्ष भी भव्य रूप में किया जा रहा है, जिसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है। उनके प्रयासों से विक्रम संवत और ब्रह्म ध्वज जैसी परंपराओं को फिर से जन-जन तक पहुंचाने की पहल की जा रही है।केसरिया रंग का होता है विशेष ध्वजविक्रमादित्य शोध संस्थान के निदेशक राम तिवारी के अनुसार ब्रह्म ध्वज शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक है। यह केसरिया रंग का विशेष ध्वज होता है, जिसमें दो पताकाएं दोनों ओर लगी रहती हैं। इसके मध्य में सूर्य का चिन्ह अंकित होता है, जो ऊर्जा, तेज और विश्व विजय का प्रतीक माना जाता है। महिदपुर स्थित अश्विनी शोध संस्थान में आज भी वे प्राचीन मुद्राएं सुरक्षित हैं, जो इस परंपरा की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती हैं।पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था उज्जैनइतिहास के अनुसार, विक्रमादित्य काल में उज्जैन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र था और इसे पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था। उस समय के सिक्कों पर बने चिन्ह उज्जैन के वैश्विक संपर्क और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाते हैं।ध्वज की खास बातविशेष बात यह भी है कि यह ध्वज लगभग 65 वर्षों तक पंडित सूर्यनारायण व्यास के परिवार द्वारा सुरक्षित रखा गया था। उसी से प्रेरणा लेकर आज के ब्रह्म ध्वज का निर्माण किया गया है, जो अब फिर से समाज में सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनकर स्थापित हो रहा है।

हिन्दू नववर्ष:प्रतिपदा पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में होगा भव्य कार्यक्रम, साक्षी बनेंगी महामहिम, देखने को मिलेगी संघ परंपरा की झलक
अयोध्या। हिन्दू पंचाक के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए साल की शुरुआत होती है। इस साल 19 मार्च यानि गुरुवार से नया संवत्सर शुरू हो रहा है, जिसे रौद्र संवत्सर भी कहा जा रहा है। नव वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी शामिल होंगी। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था से लेकर तमाम तरह की तैयारियों को लेकर प्रशासन चैकस है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बुधवार को कारसेवक पुरम स्थित भरतकुटी में पत्रकारों से बातचीत में बताया कि कार्यक्रम के दिन सुबह आमंत्रित अतिथियों के आवास स्थलों के आसपास स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपरा के अनुसार शाखा लगेगी, ध्वज प्रणाम किया जाएगा और इसके साथ ही ‘आद्य सरसंघचालक प्रणाम’ से दिन की शुरुआत होगी।अतिथियों के लिए भोजन की रहेगी व्यवस्थाउन्होंने बताया कि आमंत्रित अतिथियों के लिए आठ अलग-अलग स्थानों पर भोजनालय की व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए मुख्य रूप से दो द्वार निर्धारित किए गए हैंकृबिड़ला धर्मशाला के सामने स्थित प्रवेश द्वार और रंग महल बैरियर। सभी आमंत्रितजनों को सुबह 10 बजे तक प्रवेश अनिवार्य रूप से करना होगा।आमंत्रित अतिथि 2 बजे के बाद करेंगे प्रभु के दर्शनचंपत राय ने बताया कि कार्यक्रम के समापन के बाद, लगभग पौने दो बजे के बाद सभी आमंत्रित अतिथियों को दर्शन कराए जाएंगे। इस विशेष दिन के लिए अलग से कोई विशेष दर्शन पास जारी नहीं किया गया है, हालांकि सामान्य श्रद्धालुओं के लिए दर्शन की व्यवस्था पूर्ववत जारी रहेगी। साथ ही, नवरात्रि से दर्शन का समय भी बढ़ाया जाएगा।चंपत राय ने दी आवासीय व्यवस्थाओं की जानकारीआवासीय व्यवस्थाओं पर जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिथियों को मंदिर के पूर्व दिशा में ठहराया गया है, जबकि उत्तराखंड, मेरठ और ब्रज प्रांत से आने वाले अतिथियों के लिए रामघाट और दोराही कुआं क्षेत्र में व्यवस्था की गई है। बसों से आने वाले निर्माण सहयोगियों के लिए चूड़ामणि चैराहे और तीर्थ क्षेत्र पुरम में ठहरने की सुविधा दी गई है।उन्होंने यह भी जानकारी दी कि आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी अपने 1,100 से अधिक भक्तों के साथ अयोध्या पहुंच चुकी हैं। मंदिर आंदोलन और निधि समर्पण अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी बड़ी संख्या में आमंत्रित किया गया है, हालांकि स्थान की सीमाओं के कारण सभी को आमंत्रित नहीं किया जा सका।चंपत राय ने बताया कि आमंत्रित अतिथियों से अनुरोध किया गया है कि वे प्रवेश से पहले अपने आवास पर ही भोजन या जलपान कर लें। कार्यक्रम स्थल पर अल्पाहार की भी व्यवस्था रहेगी और व्रत रखने वालों के लिए विशेष ध्यान रखा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अतिथि चाहें तो कार्यक्रम के बाद उसी दिन वापस जा सकते हैं या अगले दिन प्रस्थान कर सकते हैं।

चैत्र नवरात्रि:आदिशक्ति की आराधना का पर्व कल से, नौ दिनों तक मां के नौ रूपों की होगी पूजा, जानें घटस्थापना के शुभ मुहूर्त
भोपाल। हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्र बहुत ही पवित्र त्योहार माना जाता है। यह नौ दिनों तक चलने वाला पर्व मां दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित होता है। इसी दिन से हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी होती है। आदिशक्ति की आराधना का पर्व नवरात्र गुरुवार से प्रारंभ हो रहा है। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना का यह विशेष अवसर है। इस बार चैत्र नवरात्र गुरुवार, 19 मार्च से प्रारंभ हो रहे हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व होता है, जिसमें कलश स्थापित कर भगवती की पूजा की जाती है। चैत्र नवरात्र में भक्त नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। इन 9 दिनों में भक्त मां दुर्गा के लिए व्रत रखते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और मां दुर्गा को भोग लगाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। घटस्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा भी है, जिसे ज्वारा कहा जाता है। यह पर्व राम नवमी के साथ समाप्त होगा, जब मां दुर्गा की विजय का उत्सव मनाया जाता है।अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना को माना गया है अत्यंत शुभदृक पंचांग के अनुसार, घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त गुरुवार की सुबह 6 बजकर 52 मिनट से सुबह 7 बजकर 43 मिनट तक यानी कुल 50 मिनट तक है। वहीं, अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक है। यह समय अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि मुख्य मुहूर्त में संभव न हो तो अभिजित मुहूर्त का लाभ उठाया जा सकता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, घटस्थापना का कार्य सूर्योदय के बाद और उचित मुहूर्त में करना चाहिए।19 मार्च को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 26 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 32 मिनट पर होगा। अमावस्या तिथि सुबह 6 बजकर 52 मिनट तक रहेगी, इसके बाद प्रतिपदा शुरू होगी जो अगले दिन सुबह 4 बजकर 52 मिनट तक चलेगी। नक्षत्र उत्तर भाद्रपद है, जो अगले दिन सुबह 4 बजकर 5 मिनट तक रहेगा, फिर रेवती शुरू होगा।गुरुवार के शुभ मुहूर्त की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से 5 बजकर 39 मिनट तक विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक, गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 29 मिनट से 6 बजकर 53 मिनट तक है। अमृतकाल रात 11 बजकर 32 मिनट से देर रात 1 बजकर 3 मिनट रहेगा।नवरात्र के पहले दिन अशुभ समय की बात करें तो राहुकाल दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 30 मिनट तक, यमगंड सुबह 6 बजकर 26 मिनट से 7 बजकर 57 मिनट तक है। गुलिक काल सुबह 9 बजकर 28 मिनट से 10 बजकर 58 मिनट तक और दुर्मुहूर्त सुबह 10 बजकर 28 मिनट से 11 बजकर 17 मिनट है।नवरात्र पर कैसे होगी कलश स्थापना?नवरात्र की पूजा शुरू करने से पहले स्नान करें. फिर, मां दुर्गा के स्वागत के लिए घर व पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें इसके बाद एक लकड़ी की चैकी पर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें और पास में पानी से भरा कलश रखकर उसके ऊपर नारियल रखें। शुभ मुहूर्त में घट स्थापना या कलश स्थापना करें। फिर मां दुर्गा के आगे देसी घी का दीपक जलाएं, मां को फूलों की माला चढ़ाएं और फल, सूखे मेवे, मीठा पान, सुपारी, लौंग व इलायची का भोग लगाएं। इसके बाद, मां दुर्गा को कम से कम सात श्रृंगार की चीजें अर्पित करें और उनके मंत्रों का जाप करके आह्वान करें। फिर, दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ करें। शाम के समय भी रोजाना मां की पूजा करें और भोग लगाएं। भोग अर्पित करने के बाद भक्त सात्विक भोजन करके अपना व्रत खोल सकते हैं।

माथे पर त्रिपुंड-चन्द्रमा, सिर पर मुकुट:भोले का दिव्य शृंगार देख अभिभूत हुए भक्त, भस्म लेपन के साथ दिया आशीर्वाद
उज्जैन। उज्जैन में विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकालेश्वर मंदिर में चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (बुधवार) पर सुबह बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार देखने को मिला। बाबा के इस रूप को देखने के लिए भक्तगण रात से कतारबद्ध थे। तड़के 4 बजे आयोजित विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती के दौरान मंदिर प्रांगण श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। इस अवसर पर पूरा परिसर जय महाकाल के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा और भक्तों के चेहरों पर बाबा के दर्शन की अलौकिक प्रसन्नता स्पष्ट दिखाई दे रही थी।सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में बाबा का जल से स्नान किया जाता है। इसके बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई। यह आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। वे मंत्रोच्चार के साथ बाबा महाकाल को भस्म अर्पित करते हैं। इस समय शिवलिंग पर भस्म बिखेरी जाती है, जो निराकार रूप का प्रतीक है।भस्मारती में निराकार से साकार रूप के होते हैं दर्शनआरती में बाबा अपने भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई, और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।इसके बाद बाबा का विशेष शृंगार किया गया। इसमें महाकाल को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया। बाबा के माथे पर स्पष्ट त्रिपुंड व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला पहनाई गई। साथ ही ताजा बिल्वपत्र (बेलपत्र) चढ़ाए गए और रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं से पूरे शृंगार को और भी आकर्षक बनाया गया। भस्मारती का अनुभव होता है अत्यंत अलौकिकवहीं, श्रृंगार के बाद कपूर से महा-आरती की जाती है, जिसका अनुभव अत्यंत अलौकिक होता है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे बहुत खास माना जाता है। यह दुनिया का एकमात्र दक्षिणमुखी स्वयंभू शिवलिंग है। मंदिर में प्रवेश करने के लिए हर किसी के लिए नियम सख्त हैं। पुरुषों के लिए धोती (धोती-सोला) और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। आरती के दौरान कैमरा और मोबाइल ले जाना वर्जित है।

चैत्र नवरात्रि 2026ः :19 मार्च से शुरू होगी शक्ति की आराधना, मां का ऐसे आना है शुभ संकेत
हिंदू धर्म में नवरात्र का पर्व विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। वर्ष में चार बार आने वाले नवरात्रों में चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं, जबकि आषाढ़ और माघ मास में गुप्त नवरात्र होते हैं। चैत्र नवरात्र की शुरुआत हिंदू नववर्ष के साथ होती है, इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्र 19 मार्च, गुरुवार से प्रारंभ होंगे और 27 मार्च, शुक्रवार को समाप्त होंगे।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र की शुरुआत और समापन जिस वार पर होता है, उसी आधार पर मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी तय होती है। इस बार नवरात्र गुरुवार से शुरू हो रहे हैं, इसलिए माता दुर्गा के आगमन की सवारी डोली (पालकी) मानी जा रही है। शास्त्रों के अनुसार डोली पर माता का आगमन शुभ संकेत नहीं माना जाता। इसे प्राकृतिक आपदाओं, स्वास्थ्य समस्याओं या आर्थिक अस्थिरता के संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि, श्रद्धा, भक्ति, पूजा-पाठ और दान से इसके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है।वहीं नवरात्र का समापन शुक्रवार को होने के कारण माता दुर्गा का प्रस्थान हाथी पर माना गया है, जिसे अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है। हाथी समृद्धि, शांति और खुशहाली का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि आने वाले समय में अच्छी वर्षा, बेहतर फसल और आर्थिक मजबूती की संभावना रहेगी।नवरात्र के नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपोंकृशैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रीकृकी विधि-विधान से पूजा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।नवरात्र 2026 तिथियां पहला दिन - 19 मार्च 2026, मां शैलपुत्री देवी दूसरा दिन - 20 मार्च 2026, ब्राह्माचारिणी देवी तीसरा दिन - 21 मार्च 2026, चंद्रघंटा देवीचौथा दिन - 22 मार्च 2026, कूष्मांडा देवी पांचवां दिन - 23 मार्च 2026, स्कंदमाता देवीछठा दिन - 24 मार्च 2026, कात्यायनी देवी सातवां दिन - 25 मार्च 2026, मां कालरात्री आठवां दिन - 26 मार्च 2026, महागौरी नौवां दिन - 27 मार्च 2026, सिद्धदात्री देवी

महाकालेश्वर मंदिर:अपने आराध्य की एक झलक पाने उमड़ा भक्ता को सैलाब, पट खुलते ही जयश्री महाकाल से गूंजा परिसर
उज्जैन। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि मंगलवार के अवसर पर उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में सुबह भस्म आरती के दौरान श्रद्धालुओं की लंबी कतार देखने को मिली। पूरा मंदिर परिसर जय श्री महाकाल के जयकारों से गूंज उठा। महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालु देर रात से ही कतारबद्ध होने लगे थे। अपने आराध्य बाबा महाकाल की एक झलक पाने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। परंपरा के अनुसार, बाबा महाकाल को जगाने के लिए सुबह 4 बजे मंदिर के पट खोले गए।भगवान का किया गया था अलौकिक शृंगारइसके पश्चात, भगवान का अत्यंत अलौकिक शृंगार किया गया। तत्पश्चात विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती संपन्न हुई, जिसमें भस्म अर्पित कर महादेव का विशेष पूजन-अर्चन किया गया। इस पावन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से इस अलौकिक क्षण के दर्शन किए। संपूर्ण मंदिर परिसर जयकारों से गुंजायमान था और वातावरण पूरी तरह शिवमय हो गया। लगभग दो घंटे चली इस आरती के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार और प्रभु का शृंगार साथ-साथ चलता रहा।पवित्र भस्म से बाबा को कराया गया विशेष स्नानमहाकाल की यह आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा करवाई जाती है। इस आरती में महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। भस्म आरती के बाद महाकाल का जलाभिषेक किया जाता है। पंचामृत से उनका पूजन और पवित्र भस्म से विशेष स्नान करवाया गया।इसके पश्चात बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार किया गया, जिसकी छटा देखते ही बनती थी। भगवान के मुखारविंद को अत्यंत मनमोहक रूप में सजाया गयाय उनके मस्तक पर स्पष्ट त्रिपुंड और ॐ अंकित कर नवीन मुकुट धारण कराया गया। शृंगार में ताजे बिल्वपत्र और रंग-बिरंगे पुष्पों की मालाओं का प्रयोग कर इस अलौकिक दृश्य को और भी भव्य बनाया गया, जिसे देख श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।भस्मारती के कपिला गाय के गोबर का होता है इस्तेमालउल्लेखनीय है कि भस्म आरती के लिए प्रयुक्त पवित्र भस्म कपिला गाय के गोबर से निर्मित कंडों के साथ-साथ शमी, पीपल, पलाश, वट, अमलतास और बेर की लकड़ियों को प्रज्वलित कर विशेष विधि से तैयार की जाती है।

Karni Mata Temple:राजस्थान का एक ऐसा अनोखा मंदिर, जहां चूहों का जूठा प्रसाद ही माना जाता है सबसे पवित्र
बीकानेर। राजस्थान अपनी शाही संस्कृति, किलों और मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन यहां एक ऐसा मंदिर भी है जो अपनी अनोखी परंपरा के कारण लोगों को हैरान कर देता है। यह मंदिर है बीकानेर से करीब 30 किलोमीटर दूर देशनोक नाम की जगह पर स्थित करणी माता मंदिर, जिसे स्थानीय लोग 'चूहों वाला मंदिर' भी कहते हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां हजारों चूहे खुलेआम घूमते हैं और इन्हीं चूहों का जूठा प्रसाद सबसे पवित्र माना जाता है। मंदिर के अंदर कदम रखते ही आपको एक अलग ही दुनिया देखने को मिलती है। यहां करीब 25 हजार से ज्यादा चूहे रहते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग प्यार से 'काबा' कहते हैं। ये चूहे मंदिर के फर्श, दीवारों और हर कोने में आराम से घूमते नजर आते हैं। कई बार तो ये भक्तों के पैरों के ऊपर से भी गुजर जाते हैं। मान्यता है कि अगर कोई चूहा आपके पैर के ऊपर से गुजर जाए, तो इसे बहुत शुभ संकेत माना जाता है।इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु दूध, मिठाई और अनाज चूहों को खिलाते हैं। खास बात यह है कि जब चूहे इन चीजों को खा लेते हैं, तो वही बचा हुआ भोजन भक्त प्रसाद के रूप में भी ले जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि इस प्रसाद को खाने से देवी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।इस मंदिर की कहानी भी बेहद रोचक है। मान्यता के अनुसार, करणी माता को देवी दुर्गा का अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि एक बार उनके सौतेले बेटे लक्ष्मण की पानी में डूबने से मृत्यु हो गई। तब करणी माता ने मृत्यु के देवता यमराज से प्रार्थना की कि उनके बेटे को वापस जीवित कर दिया जाए। पहले तो यमराज ने मना कर दिया, लेकिन करणी माता की भक्ति और इच्छाशक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने लक्ष्मण समेत सभी नर बच्चों को चूहे के रूप में पुनर्जन्म दे दिया, तभी से यह माना जाता है कि इस मंदिर में रहने वाले चूहे करणी माता के वंशजों के ही रूप हैं।मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता है कि यहां अगर आपको सफेद चूहा दिख जाए तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि सफेद चूहे खुद करणी माता और उनके बेटों का प्रतीक हैं। इसलिए भक्त उन्हें देखने की बड़ी कोशिश करते हैं। इस भव्य मंदिर का निर्माण बीकानेर के राजा महाराजा गंगा सिंह ने 20वीं सदी की शुरुआत में करवाया था। मंदिर संगमरमर से बना हुआ है और इसके दरवाजे चांदी के बने हैं, जिन पर देवी से जुड़ी कहानियों की सुंदर नक्काशी की गई है।

कर्नाटक का श्री रेणुका येल्लम्मा मंदिर,:भक्तों किए दान को गिनने में लगे चार दिन, जानें कितना सोना-चांदी और रुपया मिला चढ़ावे में
बेलगावी। कर्नाटक के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध श्री रेणुका येल्लम्मा मंदिर में इस बार 3.07 करोड़ रुपये का भारी दान संग्रह हुआ है। मंदिर की दान पेटियों से प्राप्त इस राशि की गणना पिछले सप्ताह प्रारंभ होकर इस सप्ताह संपन्न हुई। इस दान संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि नकद राशि की तुलना में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए सोने और चांदी के आभूषणों की मात्रा कहीं अधिक है। चार दिनों तक चली दान की गिनतीश्री रेणुका येल्लम्मा मंदिर में दान की गिनती 9 मार्च को शुरू हुई और 12 मार्च तक चली। इस दौरान मंदिर का कुल दान 3.07 करोड़ रुपये पाया गया, जिसमें 2.78 करोड़ रुपये नकद, 16.16 लाख रुपये मूल्य के 100 ग्राम सोने के आभूषण और 12.35 लाख रुपये मूल्य के 4 किलो 547 ग्राम चांदी के आभूषण शामिल हैं। दान की गिनती को मंदिर के कर्मचारियों और छात्रों ने मिलकर मंदिर प्रशासन की निगरानी और गुप्त तरीके से पूरा किया।मां रेणुका येल्लम्मा है कर्नाटक का प्रसिद्ध मंदिर बता दें कि भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की माता के रूप में पूजी जाने वाली मां रेणुका येल्लम्मा कर्नाटक का प्रसिद्ध मंदिर है और सिर्फ देश से ही नहीं, बल्कि विदेश से भी भक्त मां का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं। यहां जगतजननी को येल्लम्मा कहकर पुकारा जाता है, जो पूरे जगत का पालन पोषण करती है।मंदिर की दीवारों पर की गई जटिल नक्काशीमंदिर का निर्माण रायबाग के राजा बोमाप्पा ने 1514 में करवाया था। मंदिर का बनाव दक्षिण भारतीय शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें चालुक्य, राष्ट्रकूट और द्रविड़ शैलियों तीनों शैलियों का अंश देखने को मिलता है। मंदिर की दीवारों पर जटिल नक्काशी की गई है और मंदिर में एक पवित्र जल स्रोत है। माना जाता है कि पवित्र जल स्रोत भक्तों के शारीरिक और मानसिक विकारों को दूर करता है। भक्त इस पवित्र जल को अपने साथ घर भी लेकर जाते हैं।गर्भगृह में मौजूद है मां की प्रतिमा अद्भुत गर्भगृह में मौजूद मां की प्रतिमा भी अद्भुत है, जिसे स्वयंभू माना जाता है। प्रतिमा के हाथ बिना अस्त्र के ऊपर की तरफ उठे हैं। ऐसा लगता है कि मां खुद भक्तों को साक्षात आशीर्वाद दे रही हैं। मंदिर में दिसंबर के महीने में मां को प्रसन्न करने के लिए धार्मिक मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भक्त विदेशों से भी आते हैं।

वैदिक जयोतिषः कल से मीन राशि में अस्त होंगे न्याय के दवेता शनि,:इतने दिन चुनौतीपूर्ण रहेंगे इन राशि वालों को, नकारात्मक परिस्थितियां आ सकती है सामने
वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह को कर्म, न्याय और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। जब शनि अपनी चाल बदलते हैं या अस्त होते हैं, तो इसका प्रभाव कई राशियों के जीवन पर देखने को मिलता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार शुक्रवार यानि 13 मार्च 2026 से शनि मीन राशि में अस्त हो जाएंगे और लगभग 35 दिनों तक यानी 17 अप्रैल 2026 तक इसी अवस्था में रहेंगे। इस दौरान कुछ राशियों के लिए समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से तुला, मकर और कुंभ राशि के जातकों को इस अवधि में अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।तुला राशि: तुला राशि में शनि को उच्च का ग्रह माना जाता है, इसलिए इस राशि के लोगों पर शनि का प्रभाव विशेष रूप से देखा जाता है। जब शनि अस्त होते हैं तो कुछ नकारात्मक परिस्थितियां सामने आ सकती हैं। इस दौरान अचानक खर्च बढ़ने की संभावना है, जिससे आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है। पैसों के लेन-देन में सावधानी रखना बेहद जरूरी होगा। इसके अलावा बातचीत करते समय शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि छोटी सी बात भी गलतफहमी पैदा कर सकती है। परिवार और कार्यस्थल दोनों जगह धैर्य बनाए रखना बेहतर रहेगा। ज्योतिष के अनुसार शनिवार के दिन सरसों के तेल का दान करना इस समय लाभकारी माना जाता है।मकर राशि: मकर राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं, इसलिए शनि के अस्त होने का प्रभाव इस राशि के लोगों पर ज्यादा महसूस हो सकता है। इस समय आत्मविश्वास में थोड़ी कमी आ सकती है और कामकाज में मन भी कम लग सकता है। अगर कोई कानूनी मामला चल रहा है तो उसमें देरी या अड़चन आने की संभावना बन सकती है। आर्थिक मामलों में सतर्क रहना जरूरी होगा, इसलिए उधार लेने या देने से बचना बेहतर रहेगा। नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को सफलता पाने के लिए पहले से अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। इस दौरान नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना गया है।कुंभ राशि: कुंभ राशि के स्वामी भी शनि ही हैं, इसलिए शनि के अस्त होने का असर इस राशि के जातकों पर भी देखने को मिल सकता है। करियर और कारोबार से जुड़े फैसले सोच-समझकर लेना जरूरी होगा, क्योंकि जल्दबाजी में लिया गया निर्णय परेशानी का कारण बन सकता है। इस समय व्यवहार थोड़ा कठोर हो सकता है, जिससे रिश्तों पर असर पड़ सकता है। आर्थिक मामलों में लापरवाही नुकसान पहुंचा सकती है। प्रेम और वैवाहिक जीवन में भी छोटी-मोटी परेशानियां आ सकती हैं। ऐसे में काले कुत्ते को रोटी खिलाना शुभ माना जाता है।

देवी भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से:घटस्थापना के लिए हैं दो शुभ मुहूत, भक्तों के लिए खास रहेगी इस बार की नवरात्रि
सनातन धर्म में चैत्र नवरात्र का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है और नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। होली के बाद आने वाला यह पहला प्रमुख धार्मिक पर्व होता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्र की शुरुआत 19 मार्च, गुरुवार से हो रही है, जो भक्तों के लिए अत्यंत शुभ मानी जा रही है। इस दिन कलश स्थापना के साथ नवरात्र के व्रत की शुरुआत की जाएगी।पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट से प्रारंभ होकर 20 मार्च को सुबह 4 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों के निर्धारण में उदयातिथि का विशेष महत्व होता है। इसी कारण 19 मार्च को ही चैत्र नवरात्र का आरंभ माना जाएगा और इसी दिन श्रद्धालु घटस्थापना कर व्रत रखेंगे। नवरात्र के पहले दिन माता दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है।इस वर्ष चैत्र नवरात्र की शुरुआत तीन विशेष शुभ योगों में हो रही है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन शुक्ल योग, ब्रह्म योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को अत्यंत शुभ माना जाता है और इनकी उपस्थिति में किए गए पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं।कलश स्थापना या घटस्थापना के लिए 19 मार्च को दो विशेष शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। पहला और सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 52 मिनट से 7 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। यदि किसी कारणवश इस समय पूजा न कर पाएं तो दोपहर के अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापना की जा सकती है, जो 12 बजकर 05 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा।इसके अलावा नवरात्र के पहले दिन कई अन्य शुभ मुहूर्त भी रहेंगे। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से 5 बजकर 39 मिनट तक रहेगा, जबकि प्रातः संध्या का समय सुबह 5 बजकर 15 मिनट से 6 बजकर 26 मिनट तक होगा। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 29 मिनट से 6 बजकर 53 मिनट तक और सायं संध्या 6 बजकर 32 मिनट से 7 बजकर 43 मिनट तक रहेगी। इसके अतिरिक्त अमृत काल रात 11 बजकर 32 मिनट से 1 बजकर 03 मिनट तक तथा निशिता मुहूर्त रात 12 बजकर 05 मिनट से 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा।इन शुभ योगों और मुहूर्तों के संयोग में शुरू हो रहा चैत्र नवरात्र भक्तों के लिए विशेष फलदायी माना जा रहा है। श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा कर सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करेंगे।

हस्यमयी डोडीताल:हिमालय की गोद में वह पवित्र झील जहां जुड़ी है भगवान गणेश के पुनर्जन्म की कथा
उत्तरकाशी । हिमालय की गोद में बसी डोडीताल झील सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं बल्कि धार्मिक आस्था और पौराणिक महत्व के लिए भी खास मानी जाती है। इसे भगवान गणेश का जन्मस्थान माना जाता है। इसके आसपास की वादियां, बर्फ से ढके जंगल और पहाड़ इस स्थल को और भी खास बना देते हैं। डोडीताल झील के पास एक प्राचीन गणेश मंदिर स्थित है, जहां भगवान गणेश माता पार्वती (अन्नपूर्णा के रूप में) के साथ विराजमान हैं। इसके आसपास की वादियां, बर्फ से ढके जंगल और पहाड़ इस स्थल को और भी अलौकिक बना देते हैं। सर्दियों में जब झील और आसपास का क्षेत्र बर्फ की सफेदी में ढक जाता है, तो पूरा दृश्य ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने यहां अपना सबसे शांतिपूर्ण और दिव्य रूप सजाया हो।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तराखंड का डोडीताल वही पावन स्थल है जहां माता पार्वती ने अपने उबटन से भगवान गणेश की रचना की थी। कथा के अनुसार, माता पार्वती जब स्नान कर रही थीं, तब उन्होंने बालक गणेश को द्वारपाल के रूप में नियुक्त कर किसी को भी भीतर न आने देने का आदेश दिया। इसी बीच जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो अपने पिता के परिचय से अनजान बालक गणेश ने उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक दिया।इस हठ से क्रोधित होकर महादेव ने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती के विलाप और दुःख को देखकर भगवान शिव ने उन्हें पुनर्जीवित करने का वचन दिया और गणेश जी के धड़ पर गज (हाथी) का मुख लगाकर उन्हें पुनः जीवित किया।डोडीताल झील समुद्र तल से लगभग 3,024 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। झील का पानी क्रिस्टल की तरह साफ और नीला है, जिसमें हिमालयन गोल्डन ट्राउट मछलियां पाई जाती हैं। चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियां, घने जंगल और अल्पाइन घास के मैदान इस जगह को जैसे किसी स्वर्ग में बदल देते हैं। यहां आने वाले लोग न सिर्फ हिमालय की सुंदरता को निहारते हैं, बल्कि भगवान गणेश की कथा और उनके पुनर्जन्म की पौराणिक गाथा को भी महसूस कर पाते हैं।

माथे पर त्रिपुंड, सिर पर नया मुकुट:निराकार से साकार रूप के दर्शन कर निहाल हुए भोले के भक्त, जय महाकाल के जयकारों से गूंजा परिसर
उज्जैन। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि बुधवार को विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार किया गया। इसे देखने के लिए भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लगी थीं। देश-विदेश से आए श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन और उनके विशेष शृंगार को देखने के लिए उत्सुक दिखे। सुबह 4 बजे की प्रसिद्ध भस्म आरती के समय मंदिर परिसर पूरी तरह से भक्तों से भर गया था। पूरा परिसर जय महाकाल के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और आस्था साफ दिखाई दे रही थी।महानिर्वाणी अखाड़े ने अर्पित की भस्ममध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में सुबह की भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। इस आरती में महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई, और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं ने श्रुंगार को बनाया आकर्षकअभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई। इसके बाद बाबा का विशेष शृंगार किया गया, जिसमें महाकाल का मुखारविंद (कमल के समान सुंदर मुख) बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया। बाबा के माथे पर स्पष्ट त्रिपुंड व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला पहनाई गई। साथ ही ताजा बिल्वपत्र (बेलपत्र) चढ़ाए गए और रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं से पूरे शृंगार को और भी आकर्षक बनाया गया। यह नजारा देखकर हर किसी का मन प्रसन्न हो गया।12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है महाकालेश्वर मंदिरमहाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे बहुत खास माना जाता है। यह दुनिया का एकमात्र दक्षिणमुखी स्वयंभू शिवलिंग है। भगवान शिव यहां कालों के काल महाकाल के रूप में विराजमान हैं। महाकाल के दर्शन के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। मंदिर की वास्तुकला में कई शैलियों का भव्य संगम देखने को मिलता है। यहां ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली अलौकिक भस्म आरती के दर्शन हेतु देश-विदेश से भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।

11 मार्च 2026 का राशिफल:कर्क सहित कई राशियों के लिए दिन अनुकूल, कहीं धन लाभ तो कहीं संयम की जरूरत
बुधवार 11 मार्च 2026 को चंद्रमा वृश्चिक राशि में गोचर कर रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह स्थिति कई राशियों के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आ सकती है। कुछ लोगों को अचानक धन लाभ या आय में वृद्धि के योग बन सकते हैं, जबकि लंबे समय से अटके हुए कार्य भी पूरे होने की संभावना है। बेरोजगार लोगों को भी आज किसी शुभ समाचार की प्राप्ति हो सकती है। हालांकि कुछ राशियों को अपनी वाणी और व्यवहार पर संयम रखने की सलाह दी गई है। आइए जानते हैं आज सभी 12 राशियों का राशिफल।मेष राशिमेष राशि के जातकों के लिए आज का दिन सामान्य लेकिन प्रभावी रहने वाला है। बदलती परिस्थितियों में सूझबूझ और धैर्य से काम लेना जरूरी होगा। परिवार का सहयोग मिलने से आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। हालांकि सफेदपोश ठगों और धूर्त लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। कार्यक्षेत्र में विस्तार की योजनाएं गति पकड़ सकती हैं और आपके प्रयासों को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।वृष राशिवृष राशि वालों को आज सामंजस्य बनाए रखने पर ध्यान देना होगा। महत्वपूर्ण चर्चाओं में आपकी पहल फायदेमंद साबित हो सकती है। लाभ की स्थिति अच्छी रहेगी, लेकिन नए लोगों पर तुरंत भरोसा करने से बचें। स्वास्थ्य को लेकर थोड़ी सावधानी रखें और किसी भी विवाद से दूर रहना बेहतर रहेगा।मिथुन राशिमिथुन राशि के लोगों को आज मेहनत के मुकाबले थोड़ा कम लाभ मिल सकता है, इसलिए धैर्य बनाए रखें। कार्यक्षेत्र में लापरवाही से बचना जरूरी है। अनुशासन और समय सीमा का पालन करने से सफलता के रास्ते खुलेंगे। पेशेवर लोगों से संपर्क मजबूत होगा और आपके कौशल की सराहना हो सकती है।कर्क राशिकर्क राशि के जातकों के लिए आज का दिन काफी सकारात्मक रह सकता है। कार्यों में तेजी आएगी और उलझे हुए मामले सुलझ सकते हैं। विरोधियों की सक्रियता कम रहेगी, जिससे राहत मिलेगी। मित्रों और सहयोगियों के साथ मिलकर किए गए प्रयासों में सफलता मिल सकती है। कई परिणाम आपके पक्ष में बनते नजर आएंगे।सिंह राशिसिंह राशि वालों का ध्यान आज घर की सुविधाओं और पारिवारिक जरूरतों पर रहेगा। भौतिक वस्तुओं की खरीदारी के योग बन सकते हैं। पेशेवर क्षेत्र में प्रदर्शन अच्छा रहेगा और सफलता का प्रतिशत बढ़ेगा। छात्रों को भी परीक्षा में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।कन्या राशिकन्या राशि के लोगों के लिए आज सामाजिक तालमेल मजबूत रहेगा। संपर्क और संवाद के जरिए नए अवसर मिल सकते हैं। परिवार के साथ संबंध बेहतर होंगे। हालांकि निजी रिश्तों में किसी भी तरह के विवाद से दूर रहने की सलाह दी गई है।तुला राशितुला राशि के जातकों का मधुर व्यवहार आज उन्हें खास बना सकता है। परिवार और रिश्तेदारों के साथ संबंधों में मिठास बढ़ेगी। घर में खुशी का माहौल रहेगा और किसी शुभ आयोजन की संभावना भी बन सकती है। हालांकि अनावश्यक बहस से बचना बेहतर रहेगा।वृश्चिक राशिवृश्चिक राशि वालों के लिए आज सकारात्मकता से भरा दिन हो सकता है। नए विचारों को अपनाने का अवसर मिलेगा। बैठकों और बातचीत में आपका प्रभाव बढ़ेगा। परिवार और मित्रों का सहयोग मिलने से कई पुराने मुद्दे सुलझ सकते हैं।धनु राशिधनु राशि के जातकों को आज खर्चों पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। निवेश से जुड़े प्रस्तावों को ध्यान से समझें और जल्दबाजी से बचें। विदेश से जुड़े कार्यों या संपर्कों में रुचि बढ़ सकती है। खानपान और दिनचर्या पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।मकर राशिमकर राशि वालों के लिए आज वित्तीय अवसर बन सकते हैं। करियर और कारोबार में लाभ के संकेत हैं। पेशेवर संपर्क बढ़ेंगे और आपकी प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हो सकती है। लेनदेन में स्पष्टता बनाए रखना आपके लिए फायदेमंद रहेगा।कुंभ राशिकुंभ राशि के लोगों को आज कार्यक्षेत्र में अच्छा सहयोग मिलेगा। अधिकारियों के साथ मुलाकात और संवाद बढ़ सकता है। आय में वृद्धि के योग बन रहे हैं और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोगों को सफलता मिल सकती है।मीन राशिमीन राशि के जातकों के लिए आज भाग्य का साथ मिलने के संकेत हैं। धार्मिक और सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। वरिष्ठों की सलाह से महत्वपूर्ण निर्णय लेना लाभकारी रहेगा। सरकारी या प्रशासनिक कार्यों में भी सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।ज्योतिषियों के अनुसार आज अधिकांश राशियों के लिए भगवान गणेश की पूजा करना शुभ माना गया है। पान और मोदक का भोग लगाकर “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करने से दिन शुभ और मंगलमय रह सकता है।

वैदिक ज्योतिष:राहु-मंगल-बुध की दुर्लभ युति! इन 3 राशियों को मिल सकते हैं बड़े चैलेंज
नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब राहु किसी अन्य ग्रह के साथ युति बनाते हैं तो उसका प्रभाव अक्सर चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस समय कुंभ राशि में राहु के साथ मंगल और बुध भी मौजूद हैं, जिससे त्रिग्रही योग बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक यह स्थिति 11 अप्रैल 2026 तक बनी रहेगी और इस दौरान कुछ राशियों के लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।ज्योतिष शास्त्र में राहु को भ्रम, अस्थिरता और अचानक बनने वाली परिस्थितियों से जोड़ा जाता है, जबकि मंगल ऊर्जा, साहस और आवेग का प्रतीक है। वहीं बुध बुद्धि, तर्क और निर्णय क्षमता के कारक माने जाते हैं। इन तीनों ग्रहों की एक साथ मौजूदगी कई बार व्यक्ति को जल्दबाजी में निर्णय लेने की ओर प्रेरित कर सकती है। इसलिए इस समय सोच-समझकर कदम उठाना जरूरी बताया जा रहा है।मेष राशि के लोगों के लिए यह समय कुछ चुनौतियां लेकर आ सकता है। कामकाज में रुकावटें आने की संभावना है और कई बार बनते हुए काम भी अचानक अटक सकते हैं। नौकरी या व्यापार से जुड़े मामलों में जल्दबाजी में लिया गया फैसला नुकसान पहुंचा सकता है। आर्थिक मामलों में भी सतर्क रहना जरूरी रहेगा, क्योंकि खर्च बढ़ सकते हैं। परिवार में छोटी-मोटी बातों को लेकर तनाव की स्थिति बन सकती है।कर्क राशि के जातकों को इस अवधि में धैर्य बनाए रखने की जरूरत होगी। मेहनत के बावजूद परिणाम मिलने में देरी हो सकती है। खर्चों में बढ़ोतरी से आर्थिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। निवेश या साझेदारी से जुड़े मामलों में जल्दबाजी से बचना बेहतर रहेगा। कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ गलतफहमी भी हो सकती है, इसलिए बातचीत में संयम रखना जरूरी होगा।वृश्चिक राशि के लोगों के लिए भी यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है। योजनाएं बनाने के बावजूद काम समय पर पूरे न होने की संभावना है। कार्यस्थल पर आलोचना या विरोध का सामना करना पड़ सकता है। आर्थिक मामलों में सावधानी जरूरी है, क्योंकि जल्दबाजी में लिया गया फैसला नुकसान दे सकता है। ऐसे समय में धैर्य और सकारात्मक सोच बनाए रखना लाभदायक माना गया है।

बाबा महाकाल:भोलेनाथ की भक्ति में लीन हुईं टेलीविजन इंडस्ट्री की मशहूर अभिनेत्री, दर्शन के अनुभव को बताया 'दिव्य'
उज्जैन । टेलीविजन इंडस्ट्री की मशहूर अभिनेत्री कनिका मान मध्य प्रदेश के उज्जैन में बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंची। इस दौरान उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर में बाबा भोलेनाथ का आशीर्वाद लिया और काफी देर तक हाथ जोड़कर बाबा के भक्ति रस में डूबी नजर आईं। माथे पर लाल चंदन लगाए नंदी महाराज के पास मौजूद अभिनेत्री बाबा महाकाल को निहारती नजर आईं। दर्शन के बाद उन्होंने बताया कि यह उनके लिए महाकाल के दर्शन का पहला अवसर था।कनिका ने कहा, "यहां मैं पहली बार बाबा के दर्शन के लिए आई हूं और मुझे नहीं पता था कि मेरा अनुभव इतना खास व यादगार होगा। मैं बाबा की सच्ची भक्त हूं, इसलिए मंदिर जाना मेरे लिए उत्साह था, लेकिन यहां का अनुभव वाकई और भी अद्भुत था।"उन्होंने भस्म आरती के बारे में खास तौर पर बात की। कनिका ने कहा, "भस्म आरती का अनुभव मेरे लिए बहुत खास रहा। वहां बहुत भीड़ थी, लेकिन मुझे ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं हुआ कि कोई परेशानी हो रही है। जब मैं पीछे मुड़ी तो देखा कि इतनी बड़ी भीड़ है, फिर भी हर कोई शांति से और आराम से दर्शन कर रहा था। मुझे लगा कि सब वही दिव्य अनुभव ले रहे हैं जो मैं ले रही थी। मैं आगे की पंक्ति में बैठी थी और सब बहुत खुश नजर आ रहे थे।"अभिनेत्री ने मंदिर प्रबंधन की तारीफ की। उन्होंने कहा, "मंदिर कमिटी ने सारे इंतजाम इतने अच्छे तरीके से किए हैं कि किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई। सब कुछ बहुत सुव्यवस्थित था। इसलिए मैं सबको कहना चाहूंगी कि डरने की कोई जरूरत नहीं है। लोग सोचते हैं कि भीड़ ज्यादा है, दर्शन नहीं हो पाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। आप जरूर आ सकते हैं। कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं खुद लास्ट मिनट में आई थी और फिर भी अच्छे से आगे बैठकर दर्शन किए।"

हिन्दू धर्म में शीतला अष्टमी का विशेष महत्व:सच्चे मन और श्रद्धा भक्ति करने पर बनी रहती है मां की कृपा, बचें इस तरह की गलतियों से
चैत्र माह में मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन माता शीतला की पूजा-अर्चना की जाती है और उनसे परिवार के सदस्यों को रोगों और बीमारियों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि मौसम परिवर्तन के समय कई तरह की संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए शीतला माता की पूजा कर स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इस वर्ष शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा।शीतला अष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमें दाल-भात, पूरी, दही, लस्सी और हरी सब्जियां शामिल होती हैं। परंपरा के अनुसार इन सभी व्यंजनों को अगले दिन ठंडा और बासी रूप में खाया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन इन्हीं पकवानों का भोग माता शीतला को अर्पित किया जाता है, जिसके बाद परिवार के सदस्य प्रसाद के रूप में उसे ग्रहण करते हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाना चाहिए। इसलिए जो भी भोजन बनाना होता है, वह एक दिन पहले ही तैयार कर लिया जाता है। इस दिन ठंडा और बासी भोजन करने की परंपरा है, जिसे शरीर के लिए ठंडक देने वाला माना जाता है।इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद शीतला माता के मंदिर जाकर दर्शन करना चाहिए और विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान माता को हल्दी, दही और बाजरा का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर नीम के पत्तों का भी विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि नीम स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है और रोगों से बचाव में सहायक होता है।शीतला अष्टमी का पर्व केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि यह स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने का संदेश भी देता है। इस दिन आखिरी बार बासी भोजन करने की परंपरा मानी जाती है। इसके बाद लंबे समय तक बासी भोजन करने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन घर में पूजा करने के साथ-साथ शीतला माता के मंदिर जाना भी शुभ माना जाता है। इसके अलावा भगवान शिव की पूजा करने का भी विधान बताया गया है। कहा जाता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से की गई पूजा से माता शीतला की कृपा बनी रहती है और परिवार को रोगों से सुरक्षा मिलती है।

महाकालेश्वर मंदिर भस्मारती:बाबा महाकाल का भव्य श्रृंगार निहारने उत्सुक हुए भक्त, चेहरों पर दिखाई दी भक्ति और आस्था की झलक
उज्जैन। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में हर रोज सुबह की भस्म आरती लोकप्रिय रहती है। इस आरती के लिए भक्त देर रात से ही मंदिर परिसर पहुंचना शुरू कर देते हैं। मंगलवार को चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर भगवान महाकाल का खास शृंगार किया गया। इस मौके पर सुबह की भस्म आरती के दौरान मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतार देखने को मिली। देश-विदेश से आए श्रद्धालु बाबा का भव्य श्रृंगार देखने के लिए उत्सुक नजर आए। पूरा मंदिर बाबा के भक्तों की लंबी कतारों से भरा हुआ है। पूरा मंदिर परिसर जय महाकाल के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और आस्था साफ दिखाई दे रही थी।अपनी खासियत के लिए मानी जाती है भस्मारतीमहाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती अपनी खासियत के लिए जानी जाती है। इसमें भस्म से बाबा का अभिषेक किया जाता है, जो बहुत दिव्य और खास अनुभव देता है। बाबा की भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।पंचामृत से पूजा और पवित्र भस्म से बाबा को कराया स्नानमध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती की गई। इस दौरान भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई।इसके बाद बाबा को चंदन से शृंगार किया गया व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला पहनाई गई। भक्त बाबा का अद्भुत शृंगार देखकर खुशी से गदगद दिखे। हर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है। इस आरती में शामिल होने के लिए भक्त देश-विदेश से आते हैं।

भक्तों के लिए खुशखबरी: चारधाम यात्रा के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू, 17 अप्रैल से होगी ऑनलाइन बुकिंग
देहरादून। भक्तों के लिए खुशखबरी है। चारधाम यात्रा-2026 के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन आज सुबह 7 बजे से शुरू हो गया है। जबकि 17 अप्रैल से ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू होगा। उत्तराखंड सरकार ने यात्रा से पहले रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया है। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन उत्तराखंड सरकार की वेबसाइट रजिस्ट्रेशनडीटूरिस्टकेयर.यूके.जीओवी.इन और मोबाइल ऐप टूरिस्ट केयर उत्तराखंड से कर सकते हैं। उत्तराखंड सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, 19 अप्रैल को यमुनोत्री और गंगोत्री के कपाट खुलेंगे। 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलेंगे। श्रीहेमकुण्ड साहिब की आधिकारिक घोषणा बाद में की जाएगी। उत्तराखंड सरकार की ओर से बताया गया है कि चारधाम यात्रा 2026 में आने के लिए भारतीय श्रद्धालु अपना पंजीकरण आधार कार्ड के माध्यम से कर सकेंगे, जबकि विदेशी श्रद्धालुओं के लिए ई-मेल आईडी की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।यहां खुलेंगे पंजीकरण केन्द्रजिन श्रद्धालुओं के पास आधार कार्ड उपलब्ध नहीं है, उनके लिए पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी पंजीकरण काउंटरों की व्यवस्था की गई है। इन काउंटरों पर रजिस्ट्रेशन कपाट खुलने से दो दिन पूर्व, 17 अप्रैल 2026 से प्रारम्भ की जाएगी। पंजीकरण केन्द्र एवं ट्रांजिट कैंप ऋषिकेश, पंजीकरण केन्द्र ऋषिकुल ग्राउंड हरिद्वार और पंजीकरण केंद्र विकास नगर देहरादून में खुलेंगे।उत्तराखंड सरकार ने श्रद्धालुओं से की अपीलश्रद्धालु किसी भी प्रकार की जानकारी या असुविधा होने पर टोल फ्री नंबर 0135-1364 पर कॉल कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उत्तराखंड सरकार ने चारधाम यात्रा में आने वाले सभी श्रद्धालुओं से अनुरोध किया है कि यात्रा को सुगम एवं व्यवस्थित बनाने के लिए यात्रा से पूर्व अपना पंजीकरण अनिवार्य रूप से करवा लें।मान्यताः यमुनोत्री से यात्रा शुरू करने पर नहीं आती कोई रुकावटधार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यमुनोत्री से यात्रा शुरू करने पर चारधाम यात्रा में किसी भी प्रकार की रुकावट भक्तों को नहीं आती है। यमुनोत्री, यमुना नदी का उद्गम स्थल है। यमुना जी यमराज की बहन हैं और उन्हें वरदान प्राप्त है कि वह अपने जल के माध्यम से सभी का दुख दूर करेंगी। मान्यता है कि जो श्रद्धालु यमुनोत्री में स्नान करता है, उसे मृत्यु के भय से मुक्ति मिल जाती है।

महाकालेश्वर मंदिरः:पवित्र भस्म आरती से बाबा महाकाल ने किया स्नान, दिव्य स्वरूप की एक झलक पाने उत्सुक दिखे भक्त
उज्जैन। उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि गुरुवार के दिन भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। वहीं, सुबह की भस्म आरती के दौरान मंदिर परिसर में भक्तों का तांता देखने को मिला।दूर-दूर से आए श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन के लिए बुधवार देर रात से ही मंदिर परिसर में पहुंचने लगे थे। हर कोई बाबा महाकाल के दर्शन पाने के लिए उत्सुक नजर आया। पूरा मंदिर परिसर जय महाकाल के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और आस्था साफ दिखाई दे रही थी। बाबा की भस्म आरती महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा की जाती है। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं। वहीं, भस्म आरती होने के बाद बाबा का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया।पंचामृत से हुई भगवान की पूजामध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती की गई। इस दौरान भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया, पंचामृत से पूजा हुई और पवित्र भस्म से उनका विशेष स्नान भी कराया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई।इसके बाद बाबा को चंदन से शृंगार किया गया व माथे पर चंद्रमा सुसज्जित किया गया और नवीन मुकुट पहनाकर बाबा को फूलों की माला अर्पित की गई। भक्त बाबा का अद्भुत शृंगार देखकर खुशी से गदगद दिखे। हर दिन बाबा का शृंगार अलग-अलग तरीके से किया जाता है।देश-विदेश में मशहूर है बाबा महाकाल की भस्मारतीबाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में मशहूर है। उज्जैन में दूर-दूर से लोग दर्शन के लिए आते हैं। भस्म आरती का हिस्सा बनने के लिए भक्तों को पहले ही ऑनलाइन पंजीकरण कराना होता है और इस दिन भस्म आरती के लिए नंबर या टोकन लेना पड़ता है और भक्त उसी दिन दर्शन के लिए आते हैं। पंजीकरण के लिए मंदिर द्वारा निर्धारित शुल्क भी देना होता है।

धर्म : धन की देवी लक्ष्मी जंयती:चंद्र ग्रहण के चलते जानें माता कैसे होंगी प्रसन्न, मिलेगा धन-वैभव
नीलम अहिरवारहिंदू धर्म में धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी के जन्मोत्सव को लक्ष्मी जयंती के रूप में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि पर लक्ष्मी जयंती मनाने का महत्व है. मान्यता है कि इसी दिन क्षीर सागर के विशाल मंथन के समय मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं. खासकर दक्ष्ण भारत के राज्यों में लक्ष्मी जयंती का त्योहार मनाया जाता है. साल 2026 में लक्ष्मी जयंती 3 मार्च यानी चंद्र ग्रहण के दिन मनाया जा रहा है. भारतीय समय के अनुसार, चंद्र ग्रहण की शुरुआत आज यानी 03 मार्च को दोपहर 03 बजकर 20 मिनट से शुरू हो जाएगी और शाम 06 बजकर 46 मिनट पर खत्म हो जाएगा. वहीं भारत में दिखाई देने के कारण चंद्र ग्रहण का सूतक भी माना जाएगा. भारत में सूतक की शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में यदि आप लक्ष्मी जयंती पर पूजा कर रहे हैं तो सूतक काल खत्म होने के बाद यानी शाम 07 बजे के करीब कर सकते हैं. ग्रहण के दौरान व्रत रहकर मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है..पूजा में देवी लक्ष्मी को कुमकुम, कमल के फूल, सिंदूर, लड्डू आदि चीजें अर्पित करें. आखिर में मां लक्ष्मी की आरती करें. कैसे करें मां लक्ष्मी को प्रसन्नमान्यता है कि जिस पर माता लक्ष्मी मेहरबान हो जाती हैं वो अन्न, धन, समृद्धि, स्वास्थ्य आदि का लाभ उठाता है. आइए जानते हैं माता लक्ष्मी को खुश करने के आसान उपाय के बारे मेंकहते हैं शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी की पूजा के लिए उत्तम माना जाता है इसलिए शुक्रवार के दिन सुबह उठते ही मां लक्ष्मी को नमन कर, स्नान कर स्वच्छ सफेद या गुलाबी वस्त्र धारण करें. इसके बाद श्रीयंत्र व मां लक्ष्मी के चित्र के सामने खड़े होकर श्री सूक्त का पाठ करें. कमल का पुष्प मां लक्ष्मी को अर्पित करना लाभकारी साबित होगाजब भी घर से किसी भी खास काम से निकलें, तो निकलने से पहले थोड़ा मीठा दही खाकर निकलें. इससे माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती हैजिस घर में साफ-सफाई अथवा स्वच्छता रहती है वहां मां लक्ष्मी विराजती हैं.शाम को सूर्यास्त के समय को गोधूलि बेला कहा जाता है. गोधूलि का अर्थ होता है गाय के पैरों से उठने वाली धूल. शाम के समय ही गाय चारा चरकर घर की ओर प्रस्थान करती है, इसलिए इसे गोधूलि बेला कहते हैं. इस समय मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ होता हैमां लक्ष्मी के समक्ष घी के दीये जलाना भी अच्छा होता हैनारियल को श्रीफल (Shrifal) यानी श्री का फल कहा जाता है. श्री का अर्थ लक्ष्मी होता है. इस चलते मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए नारियल को पूजा में रखना अच्छा होता है.कमल का फूल यदि प्रत्येक दिन माता लक्ष्मी जी को कमल का फूल चढ़ाया जाए, तो लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं, घर धन से भरा रहता हैधनिया जो धनिया सब्जी मसाला के रूप में प्रयोग करते हैं. खड़ी धनिया ले लें और लक्ष्मीजी के आसन के पास उसे फैला देते हैं, तो लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न होती हैं.मान्यता है कि मुनक्का और मखाना दोनों को मिक्स करके लक्ष्मी जी के पास रखें तो लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और उनके ऊपर लक्ष्मी माता की कृपा हमेशा बरसती रहती है प्रतिदिन सुबह-शाम दीपक जलाएं, विशेषकर शुक्रवार को माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा के दौरान लक्ष्मी मंत्रों का जाप किया जाता है. लक्ष्मी बीज मंत्रॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥, लक्ष्मी गायत्री मंत्र ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥ महालक्ष्मी मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥धार्मिक मान्यतानुसार जिस पर मां लक्ष्मी का हाथ हो उसे आर्थिक दिक्कतें नहीं घेर पातीं. माता लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है. जिस जातक पर मां लक्ष्मी की कृपा हो या जिस घर में वे विराजित हों उस घर के लिए सुख-समृद्धि के द्वार खुल जाते हैंDisclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि tv27news किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें


