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न करें ये लापरवाही:प्रसव के बाद मां-बच्चे की सही देखभाल है जरूरी
नई दिल्ली । प्रसव के बाद का समय मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद नाज़ुक और महत्वपूर्ण होता है। डिलीवरी के बाद अक्सर ध्यान सिर्फ बच्चे पर चला जाता है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि अगर मां स्वस्थ रहेगी तभी शिशु की सही देखभाल संभव है। इस समय थोड़ी-सी लापरवाही आगे चलकर मां और बच्चे दोनों की सेहत पर भारी पड़ सकती है, इसलिए प्रसवोत्तर देखभाल को हल्के में नहीं लेना चाहिए। डिलीवरी के बाद मां का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान शरीर की ताकत, खून और पोषक तत्व काफी हद तक कम हो जाते हैं। ऐसे में मां को पूरा आराम, सुकून भरा माहौल और परिवार का सहयोग मिलना बहुत जरूरी है। अत्यधिक काम करना, नींद पूरी न होने देना या मानसिक तनाव देना मां की रिकवरी को धीमा कर देता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय मां को चिंता, डर और तनाव से दूर रखना चाहिए क्योंकि इसका सीधा असर दूध बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है।खान-पान की बात करें तो प्रसव के बाद हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन बहुत जरूरी होता है। हरी सब्जियां, दालें, दूध और दूध से बनी चीजें, थोड़ी मात्रा में घी, दलिया, खिचड़ी जैसे भोजन शरीर को ताकत देते हैं और पाचन भी ठीक रखते हैं। आयुर्वेद में मेथी, जीरा, सौंफ, अदरक और शतावरी को बहुत लाभकारी माना गया है। ये न सिर्फ शरीर की कमजोरी दूर करते हैं बल्कि मां के दूध की मात्रा बढ़ाने में भी मदद करते हैं। बहुत ठंडा, बासी या तला-भुना खाना इस समय नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।शारीरिक देखभाल भी उतनी ही जरूरी है। डिलीवरी के बाद हल्की मालिश, गुनगुने पानी से स्नान और धीरे-धीरे किए गए हल्के व्यायाम शरीर को फिर से संतुलन में लाने में मदद करते हैं। पेट और कमर की मांसपेशियां धीरे-धीरे मजबूत होती हैं और दर्द में भी राहत मिलती है। लेकिन किसी भी तरह की जल्दबाजी या तेज एक्सरसाइज से बचना चाहिए।अक्सर लोग इस समय मां की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं, जो गलत है। हार्मोनल बदलाव के कारण मां को उदासी, चिड़चिड़ापन या थकान महसूस हो सकती है। ऐसे में परिवार का प्यार, समझदारी और सहयोग बहुत मायने रखता है। अगर समय रहते सही देखभाल की जाए तो यह दौर मां और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षित और सुखद बन सकता है।अब बात करें बच्चे की, तो जन्म के तुरंत बाद मां का पहला दूध (कोलोस्ट्रम) बच्चे के लिए अमृत के समान होता है। इसे किसी भी बच्चे को पिलाना चाहिए। पहले छह महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध देना सबसे अच्छा माना जाता है। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और वह स्वस्थ रहता है। बच्चे की साफ-सफाई, गर्माहट और समय-समय पर स्तनपान का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है।

वर्ल्ड कैंसर डे :बचाव संभव, इन आदतों से तौबा, तो इन्हें करें दिनचर्या में शामिल
नई दिल्ली । कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही आदतें अपनाकर और कुछ बुरी आदतों से पूरी तरह दूर रहकर इस बीमारी से बचा जा सकता है। हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर में कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने, इस बीमारी के कारणों को समझने और बचाव के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए समर्पित है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय कैंसर से बचाव के लिए कुछ आसान और प्रभावी सुझाव देता है, जिन्हें रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल कर लिया जाए तो जोखिम काफी कम हो सकता है। ये छोटी-छोटी आदतें अपनाकर न केवल कैंसर से बचा जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य भी बेहतर कर सकते हैं।मंत्रालय के अनुसार, कैंसर से बचाव के लिए सबसे जरूरी कदम है, सबसे पहले तंबाकू और इसके सभी उत्पादों (सिगरेट, गुटखा, बीड़ी, पान मसाला, हुक्का आदि) से पूरी तरह दूर रहें। तंबाकू कैंसर के सबसे बड़े कारणों में से एक है, खासकर मुंह, फेफड़े, गले और पेट के कैंसर का। दूसरा, शरीर का वजन संतुलित रखें। मोटापा कई तरह के कैंसर (स्तन, आंत, किडनी, गर्भाशय आदि) का जोखिम बढ़ाता है। इसलिए संतुलित वजन बनाए रखना बहुत जरूरी है। तीसरी जरूरी चीज है, नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधियां। रोजाना कम से कम 30-45 मिनट पैदल चलना, योग, साइकिलिंग या कोई भी शारीरिक व्यायाम कैंसर के खतरे को कम करता है। वहीं, फल, सब्जियां और पौष्टिक आहार का सेवन बढ़ाएं। रंग-बिरंगे फल-सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, नट्स और कम प्रोसेस्ड फूड खाने से शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स बढ़ते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में मदद करते हैं। कैंसर के बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहें। डॉक्टर की सलाह से समय पर स्क्रीनिंग जैसे मैमोग्राफी, पेप स्मीयर, कोलोनोस्कोपी करवाएं। शुरुआती स्टेज में कैंसर पकड़ में आ सकता है, जिससे इलाज आसान और सफल होता है।

मोरिंगा ऑयल:प्रदूषण और धूप से खराब स्किन पर असरदार, दाग-धब्बों को भी करे दूर
मुंबई । बदलती लाइफस्टाइल, प्रदूषण, धूप, तनाव और गलत खानपान का असर सबसे पहले चेहरे पर दिखाई देता है। झुर्रियां, एज स्पॉट्स, दाग-धब्बे और रूखी त्वचा जैसी परेशानियां अब कम उम्र की भी समस्या बनने लगी हैं। ऐसे में प्राकृतिक उपाय बेहद कारगर हैं, जिनमें मोरिंगा तेल बेहतर विकल्प है। मोरिंगा को आयुर्वेद में शोभांजन कहा जाता है। इसके पत्ते, फल, छाल और खासतौर पर इसके बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। मोरिंगा के सूखे बीजों से निकाला गया तेल बेहद पोषक माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, यह तेल त्वचा के दोषों को संतुलित करता है और शरीर के अंदर और बाहर दोनों स्तरों पर काम करता है।इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च एंड एप्लीकेशंस में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, मोरिंगा तेल में ओलिक एसिड, विटामिन ए, सी और ई, फ्लेवोनॉयड्स और पॉलीफेनॉल जैसे तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये सभी तत्व मिलकर त्वचा को पोषण देते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-एजिंग, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो त्वचा को भीतर से स्वस्थ बनाते हैं।एज स्पॉट्स, चेहरे पर पड़ने वाले काले धब्बे, अक्सर फ्री रेडिकल्स, धूप और कोलेजन की कमी के कारण होते हैं। मोरिंगा तेल इस समस्या पर सीधे काम करता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं। वहीं, विटामिन सी त्वचा में कोलेजन के निर्माण को बढ़ावा देता है, जिससे त्वचा की इलास्टिसिटी बनी रहती है और धब्बे कम होते हैं। तेल से हल्के हाथों से मसाज करने से त्वचा की गहराई तक पहुंचकर डार्क स्पॉट्स को हल्का करने में मदद मिलती है।आयुर्वेद में एज स्पॉट्स को पित्त दोष के असंतुलन से भी जोड़ा जाता है। मोरिंगा तेल में ठंडक देने वाले गुण होते हैं, जो त्वचा की गर्मी को शांत करते हैं और पित्त को संतुलन में लाने में सहायक होते हैं। इससे पिगमेंटेशन से बचाव होता है। नहाने के बाद या रात को सोने से पहले चेहरे पर इसकी कुछ बूंदों से मसाज करने पर त्वचा लंबे समय तक नरम और मुलायम बनी रहती है।एज स्पॉट्स के अलावा, मोरिंगा तेल त्वचा की कई दूसरी समस्याओं में भी राहत देता है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीसेप्टिक गुण मुंहासों, जलन और एलर्जी में मददगार माने जाते हैं। यह त्वचा की प्राकृतिक नमी को बनाए रखता है, जिससे रूखापन और खिंचाव कम होता है। फटे होंठों, बेजान त्वचा और सन डैमेज में भी इसका इस्तेमाल लाभकारी माना जाता है।

शरीर को वज्र की तरह मजबूत बना देगी हीरा भस्म:कैंसर, गठिया और दिल से जुड़े रोगों में भी लाभकारी
नई दिल्ली । आयुर्वेद में दुर्लभ जड़ी-बूटियों की सहायता से रोगों का इलाज कई सालों से होता आया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जड़ी-बूटियों के अलावा, प्राकृतिक धातुओं से भी इलाज संभव है? आयुर्वेद में विभिन्न धातुओं द्वारा तैयार की गई भस्मों से भी लंबे समय से इलाज होता आया है। हीरा भस्म, हीरक भस्म या व्रज भस्म को भी आयुर्वेद में दवा की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो शरीर के सभी दोषों (वात, पित्त और कफ) के असंतुलन को दूर करती है और शरीर के किसी भी अंग से संबंधित पुरानी बीमारियों को दूर किया जा सकता है।आयुर्वेद में हीरा भस्म एक महत्वपूर्ण औषधि है, जिसके सेवन से आयु और जीवन की गुणवत्ता में सुधार आता है और कुछ गंभीर बीमारियों में भी हीरा भस्म का इस्तेमाल सदियों से होता आया है, जैसे कैंसर, ट्यूमर, तपेदिक, मधुमेह, मोटापा और पुरानी एनीमिया की बीमारी से छुटकारा पाने में हीरा भस्म मदद करती है। आयुर्वेद में इसे 'वज्र भस्म' के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह शुद्ध हीरे से तैयार की जाती है। इस भस्म को शुद्ध हीरे और कुछ दुर्लभ जड़ी-बूटियों के कई बार शोधन के बाद तैयार किया जाता है।हीरे में कार्बन होता है, और इसमें रस सिंदूर और शुद्ध गंधक की बराबर मात्रा मिलाकर अच्छी तरह पीस लिया जाता है। फिर इसे एक डिब्बा बंद डिब्बे में हवा की अनुपस्थिति में गर्म किया जाता है, और इस प्रक्रिया को 14 बार दोहराया जाता है। इसकी एक ग्राम की कीमत हीरे की असल कीमत के कैलकुलेशन से तैयार की जाती है।हीरे के समान कीमती ये भस्म कई रोगों में काम आती है। यह हृदय रोगों के लिए लाभकारी है। अगर दिल ठीक से रक्त का प्रवाह नहीं करता है या रक्त धमनियां कमजोर हैं, तो हीरा भस्म दिल को मजबूती देता है। इस भस्म का उपयोग अस्थमा, मधुमेह, मोटापा, बांझपन और सूजन संबंधी बीमारियों के इलाज में किया जाता है।इसके अलावा, अगर रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तब भी हीरा भस्म टॉनिक की तरह काम करता है और शरीर में स्फूर्ति लाने में सहायक है। हीरा भस्म का इस्तेमाल कैंसर, गठिया और अस्थि मज्जा से जुड़े रोगों को दूर करने में भी होता आया है। ये प्राकृतिक रूप से स्मृति शक्ति बढ़ाकर मस्तिष्क को तेज बनाती है, जिससे एकाग्रता बढ़ती है। पुरुषों से जुड़ी शारीरिक कमजोरी में भी हीरा भस्म लाभकारी है।

सेहत: देसी घी में छिपा है सौंदर्य का खजाना, झुर्रियों और रूखी त्वचा से मिलेगी राहत
नई दिल्ली। आयुर्वेद में शुद्ध घी को अमृत कहा जाता है क्योंकि ये सिर्फ मन के लिए ही लाभकारी नहीं होता है, बल्कि तन को भी अनगिनत फायदे देता है। आंतों की कब्ज दूर करने से लेकर घी हड्डियों को मजबूती देता है, लेकिन क्या आज जानते हैं कि देसी घी त्वचा के लिए कितना फायदेमंद है? घी त्वचा को अंदर से पोषण देता है, ड्राइनेस कम करता है और नेचुरल ग्लो लाने में मदद करता है। सही मात्रा में उपयोग करने से स्किन हेल्दी और एजिंग सपोर्टेड रहती है।आयुर्वेद में घी को शीतल, स्निग्ध और रसायन माना गया है। घी वात और कफ को संतुलित रखने में भी मदद करता है, जो त्वचा से जुड़े रोगों के पीछे की सबसे बड़ी वजह होती है। घी त्वचा को गहराई से पोषण देता है और गंदगी को खत्म कर चेहरे की मृत कोशिकाओं को हटाकर ग्लो लाने में भी मदद करता है। खास बात ये है कि घी में एजिंग को रोकने की क्षमता होती है। चेहरे पर आने वाली झुर्रियों को कम करने के लिए घी का सेवन करना लाभकारी रहेगा।देसी घी त्वचा को नरम बनाता है और सर्दियों में होने वाले रूखेपन से भी बचाता है, लेकिन घी के सेवन का तरीका और कुछ सावधानियां जाननी भी जरूरी हैं। पहले ये जानते हैं कि घी का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। घी को सीमित मात्रा में भोजन में शामिल कर सकते हैं। सुबह और दोपहर के भोजन में घी का उपयोग आहार में किया जा सकता है। इसके अलावा, रात के समय घी को चेहरे के रूखे हिस्से पर भी लगाया जा सकता है।अब जानते हैं कि घी का प्रयोग करते हुए किन सावधानियों को बरतने की जरूरत है। अगर पाचन कमजोर है, तो एक सीमित मात्रा में ही घी का इस्तेमाल करें। अगर ऑयली स्किन है, तब भी घी का इस्तेमाल कम से कम करें क्योंकि ये मुहांसों और एक्ने का कारण बन सकता है। दिल से जुड़े रोगी और मधुमेह से पीड़ित लोगों को भी घी के सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। दिल से जुड़े रोगियों को कम चिकनाई खाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि घी कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है, जो दिल के रोगी के लिए खतरा है।

सेहत: सुबह के नाश्ते से रात के खाने तक, आपकी सेहत का भरोसेमंद साथी है दलिया
नई दिल्ली। सुबह की शुरुआत अगर हल्के, स्वादिष्ट और सेहतमंद नाश्ते से हो जाए तो पूरा दिन अच्छा निकलता है। ऐसे में दलिया एक ऐसा भोजन है, जो सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक आपकी सेहत का भरोसेमंद साथी बन सकता है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर जंक फूड या बाहर का तला-भुना खाना खा लेते हैं जो पेट और सेहत दोनों के लिए नुकसानदायक होता है, लेकिन अगर आप रोज के खाने में दलिया शामिल कर लें, तो यह शरीर को जरूरी पोषण देने के साथ-साथ आपको कई बीमारियों से भी बचाने में मदद करता है। दलिया पचने में हल्का होता है और पेट पर बोझ नहीं डालता, इसलिए इसे किसी भी समय खाया जा सकता है।दलिया में भरपूर मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं जो पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं। नियमित रूप से दलिया खाने से कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में काफी राहत मिलती है। यही वजह है कि डॉक्टर और आयुर्वेद विशेषज्ञ भी इसे रोजाना खाने की सलाह देते हैं।अगर वजन कम करना चाहते हैं तो दलिया आपके लिए बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि यह कम कैलोरी वाला भोजन है और लंबे समय तक पेट भरा रखता है। इससे बार-बार भूख नहीं लगती और आप ओवरईटिंग से बचते हैं।दलिया दिल की सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम होता है। डायबिटीज के मरीजों के लिए भी दलिया अच्छा विकल्प है, क्योंकि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने नहीं देता। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों के लिए दूध वाला दलिया ऊर्जा देने वाला आहार है, जबकि सब्जियों या दाल के साथ बना नमकीन दलिया लंच या डिनर के लिए परफेक्ट रहता है। रात के खाने में हल्का दलिया खाने से नींद भी अच्छी आती है और पेट साफ रहता है। बस ध्यान रखें कि इसमें ज्यादा तेल-मसाले न डालें।

सेहत :ब्रेन फॉग कहीं दिल की बीमारी का संकेत तो नहीं? जानें वैज्ञानिक कारण
नई दिल्ली । आज की तेजतर्रार जिंदगी में अक्सर लोग थकान, तनाव और भूलने की आदत को आम परेशानी मान लेते हैं। लेकिन, कभी‑कभी यह केवल मानसिक थकान नहीं होती, बल्कि यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। कई डॉक्टर मानते हैं कि बार‑बार ध्यान भटकना, नाम भूलना या दिमाग का भारी लगना सिर्फ दिमाग की कमजोरी नहीं, बल्कि दिल की बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। हार्ट डिजीज हमेशा सीने में दर्द या सांस फूलने के जरिए ही सामने नहीं आती। कई बार यह धीरे‑धीरे दिमाग के लक्षणों के जरिए सामने आती है। ब्रेन फॉग दिमाग की उस हालत को कहते हैं जब आपको चीजें याद नहीं रहतीं, सोचने में दिक्कत होती है, और आप खुद को थोड़ा सुस्त महसूस करते हैं। अक्सर लोग इसे उम्र बढ़ने या तनाव का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।दिमाग और दिल के बीच गहरा संबंध है। जब दिल सही से काम करता है, तो दिमाग भी सही ढंग से काम करता है और जब दिल कमजोर होता है, तो दिमाग भी थक जाता है। यही वजह है कि ब्रेन फॉग सिर्फ दिमाग की समस्या नहीं, बल्कि दिल की बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। इसे पहचानना, जांच कराना और समय पर इलाज शुरू करना बेहद जरूरी है।डॉक्टर बताते हैं कि यह केवल सतही कमजोरी नहीं होती, बल्कि कई मामलों में दिमाग तक पहुंचने वाले ब्लड सर्कुलेशन में कमी का कारण होती है। जब दिल ठीक से ब्लड पंप नहीं करता, तो दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे मेमोरी, फोकस, और सोचने‑समझने की क्षमता प्रभावित होती है।जनरल ऑफ सेरेब्रल ब्लड फ्लो एंड मेटाबॉलिज्म में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दिल की हल्की कमजोरी भी दिमाग तक ब्लड फ्लो घटा सकती है। इसका असर सीधे याददाश्त, ध्यान और सोचने-समझने की क्षमता पर पड़ता है। अगर आप अक्सर भूलते हैं, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते या सोचने में सुस्ती महसूस करते हैं, तो यह सिर्फ दिमाग की समस्या नहीं, बल्कि दिल की चेतावनी भी हो सकती है।ऐसे में अपने दिल की जांच कराएं। छोटे‑छोटे बदलाव जैसे ब्लड प्रेशर, हार्ट रेट या ब्लड फ्लो का निरीक्षण करना आपके लिए बड़े फायदे ला सकता है।

हिन्दू धर्म के लिए बेहद खास है माघ शुक्ल पक्ष की सप्तमी:सूर्य और देवी उपासकों को सभी कष्टों से मिलती है मुक्ति
नई दिल्ली। माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि धार्मिक दृष्टि से बेहद खास है। गुप्त नवरात्रि के सातवें दिन के साथ ही इस दिन सूर्य देव की आराधना को समर्पित भानु सप्तमी की विशेष तिथि भी पड़ रही है, जो सूर्य और देवी उपासकों के लिए बेहद खास है। 25 जनवरी को भानु सप्तमी का पर्व है। यह दिन सूर्य देव की विशेष आराधना का है, जब रविवार और शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का संयोग बनता है तो उसे भानु सप्तमी या रवि सप्तमी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव की पूजा-पाठ विशेष तौर पर फलित होती है और सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और करियर में उन्नति मिलती है। साथ ही शारीरिक-मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।रविवार को गुप्त नवरात्रि का सातवां दिन भी है। गुप्त नवरात्रि माघ मास में शुक्ल पक्ष में शुरू होती है, जिसमें देवी की गुप्त साधना की जाती है। यह नवरात्रि तंत्र-मंत्र साधकों के लिए विशेष महत्व रखती है। रविवार को भानु सप्तमी पड़ने से यह दिन और भी पुण्यकारी हो गया है।भानु सप्तमी पर सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है। स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देने, लाल चंदन, रोली, लाल फूल, गुड़, चावल और जल से पूजा करने का विधान है। इसके साथ ही साधक को ओम ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः, घृणि सूर्याय नमरू, सूर्य देवताभ्याम नमरू मंत्र का का कम से कम 108 बार जप करना चाहिए। पूजा के बाद अपनी क्षमता अनुसार दान जैसे गुड़, गेहूं, लाल वस्त्र या तांबे का दान करना शुभ माना जाता है।धार्मिक मान्यता है कि भानु सप्तमी पर सूर्य देव की भक्ति से जातक को नया ऊर्जा मिलती है। करियर में प्रगति होती है, रोगों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। गुप्त नवरात्रि के दिन देवी साधना के साथ सूर्य पूजा करने से दोहरी शक्ति मिलती है।दृक पंचांग के अनुसार, रविवार को शुक्ल सप्तमी तिथि रात 11 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। रेवती नक्षत्र दोपहर 1 बजकर 35 मिनट तक है, उसके बाद अश्विनी शुरू होगा। चंद्रमा मीन राशि में संचार करेंगे। वहीं, सूर्योदय 7 बजकर 13 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर 54 मिनट पर होगा।किसी भी शुभ या नए कार्य से पहले मुहूर्त का विचार महत्वपूर्ण है। रविवार को राहुकाल दोपहर 4 बजकर 34 मिनट से 5 बजकर 54 मिनट तक रहेगा, इस दौरान कोई शुभ कार्य न करें। अन्य अशुभ समय जैसे यमगंड दोपहर 12 बजकर 34 मिनट से 1 बजकर 54 मिनट तक और गुलिक काल दोपहर 3 बजकर 14 मिनट से 4 बजकर 34 मिनट तक है।पंचांग के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 26 मिनट से 6 बजकर 19 मिनट तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 12 मिनट से 12 बजकर 55 मिनट तक है।

कोई साधारण फल नहीं है सिंघाड़ा:बीपी और थायरॉइड की समस्या से निजात दिलाने में कारगर
नई दिल्ली । सर्दियों में सिंघाड़ा के सेवन का खासा महत्व है। लोग इसे कच्चा खाते हैं, उबालकर नमक-मिर्च के साथ चटखारे लेते हैं, भूनकर या फिर सिंघाड़े के आटे से हलवा, पूरी और पकौड़े बनाते हैं। स्वाद के साथ-साथ यह फल औषधीय गुणों से भी भरपूर है। सिंघाड़े में आयोडीन, पोटेशियम, मैंगनीज, फाइबर और विटामिन जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो थायरॉइड को सपोर्ट करते हैं, पानी की अधिकता कम करते हैं, ब्लड प्रेशर संतुलित रखते हैं और पेट को आराम देते हैं।सेलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट पूजा मखीजा ने सिंघाड़े (वाटर चेस्टनट) के एक खास और दिलचस्प स्वास्थ्य लाभ पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि सिंघाड़ा देखने में छोटी थायरॉइड ग्लैंड जैसा दिखता है और मजेदार बात यह है कि इसके पोषक तत्व भी थायरॉइड के कार्य को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं।सिंघाड़े में आयोडीन, पोटेशियम और मैंगनीज जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। आयोडीन थायरॉइड हार्मोन बनाने के लिए जरूरी होता है, जबकि मैंगनीज और पोटेशियम टी4 हार्मोन को सक्रिय टी3 हार्मोन में बदलने की प्रक्रिया में मदद करते हैं। यह परिवर्तन थायरॉइड फंक्शन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बेहद आवश्यक है। कई लोगों को थायरॉइड संबंधी समस्याएं होने पर यह जानकारी उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि सिंघाड़ा एक प्राकृतिक और आसानी से उपलब्ध फल है।इसके अलावा, सिंघाड़ा शरीर में अतिरिक्त पानी जमा होने को कम करने में भी कारगर होता है। यह खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो थायरॉइड की वजह से सूजन या भारीपन महसूस करते हैं। पोटेशियम की अच्छी मात्रा ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में सहायता करती है, जिससे हृदय स्वास्थ्य को भी फायदा पहुंचता है।सिंघाड़ा पेट के लिए भी आरामदायक होता है। यह हल्का होने के कारण पाचन तंत्र को सुधारता है और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है। सिंघाड़ा सर्दियों में आसानी से मिलने वाला एक साधारण फल है, लेकिन इसके स्वास्थ्य लाभ काफी हैं। इसे कच्चा खाया जा सकता है, उबालकर, भूनकर या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजनों में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी स्वास्थ्य समस्या के मामले में डॉक्टर से सलाह लेना उचित रहता है।

बसंत पंचमी:बुद्धि-विद्या की देवी माता सरस्वती की आराधना का दिन, मां को सबसे प्रिय हैं पीली वस्तुएं
नई दिल्ली। बसंत पंचमी हिंदू कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन ज्ञान, संगीत, कला और विद्या की देवी माता सरस्वती को समर्पित है। बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक होने के साथ ही यह श्री पंचमी या सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अज्ञानता, आलस्य और सुस्ती से मुक्ति पाने के लिए मां सरस्वती की उपासना करते हैं। कई जगह छोटे बच्चों का बसंत पंचमी के दिन ही पहला अक्षर लिखवाने या विद्या आरंभ की परंपरा है। वहीं, स्कूलों में सुबह सरस्वती पूजा का आयोजन होता है। दृक पंचांग के अनुसार, 22 जनवरी की देर रात 1 बजकर 46 मिनट पर पंचमी तिथि शुरू होगी और अगले दिन तक रहेगी। नक्षत्र पूर्व भाद्रपद दोपहर 2 बजकर 33 बजे तक है, उसके बाद उत्तर भाद्रपद शुरू होगा। चंद्रमा कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्योदय 7 बजकर 13 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर मिनट पर होगा। पूरे दिन पंचक रहेगा।वहीं, राहुकाल सुबह 11 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक है। इस दौरान कोई भी शुभ या नया कार्य न करें। अन्य अशुभ समय में यमगंड 3 बजकर 13 मिनट से 4 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक माना गया है। यह समय स्वयं सिद्ध मुहूर्त है, जिसमें पूजा करना अत्यंत फलदायी होता है।शुक्रवार को ब्रह्म मुहूर्त 5 बजकर 26 मिनट से 6 बजकर 20 मिनट तक, अभिजीत मुहूर्त 12 बजकर 12 मिनट से 12 बजकर 54 मिनट तक और विजय मुहूर्त 2 बजकर 20 मिनट से 3 बजकर 2 मिनट तक है।बसंत पंचमी पर माता सरस्वती की उपासना का विशेष विधान है। सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले रंग के) पहनें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। लकड़ी की चैकी पर पीला वस्त्र बिछाकर मां सरस्वती का ध्यान करें। सबसे पहले गणपति की पूजा पहले करें। मां को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर चंदन, रोली, कुमकुम, अक्षत और सिंदूर का तिलक लगाएं। पीले फूलों की माला, आम के पत्ते और शृंगार सामग्री अर्पित करें। पुस्तकें, कलम और वाद्य यंत्र उनके समक्ष रखें। पूजन के बाद ओम ऐं सरस्वत्यै नमः का कम से कम 108 बार जप करें। माता की आरती उतारें और भोग लगाएं।मां सरस्वती को पीले रंग की चीजें प्रिय हैं। भोग में केसर युक्त हलवा, मालपुआ, बूंदी के लड्डू, केसरिया चावल, दूध से बनी मिठाई, तिल के लड्डू, पके केले, नारियल और पीली मिठाई, मालपुआ चढ़ाएं। फल, पीले फूल और गुलाल उनके चरणों में जरूर लगाएं।

स्वास्थ्य: हर बीमारी का इलाज आयुर्वेदिक औषधीय गोंद, जानें कब किसका करें सेवन
नई दिल्ली । औषधीय गोंद एक प्रकार का प्राकृतिक रेजिन है जो विभिन्न पेड़-पौधों से निकलता है, जिसे सदियों से आयुर्वेद और हर्बल दवाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह शरीर की कई समस्याओं में लाभकारी है और इसका सही इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होता है। अलग-अलग गोंद अलग-अलग बीमारियों में काम आते हैं और शरीर की कमजोरी, पाचन, हड्डियों की ताकत, त्वचा और इम्यूनिटी सुधारने में मदद करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं कतीरा गोंद की। यह गर्मी से होने वाली कमजोरी, पेशाब की जलन और कब्ज में बहुत फायदेमंद है और शरीर की गर्मी को ठंडा करता है। बबूल गोंद हड्डियों को मजबूत बनाता है, महिलाओं में प्रसव के बाद कमजोरी दूर करता है और कमर या जोड़ों के दर्द में राहत देता है। गोंदनी या करया गोंद कब्ज में लाभकारी है, मोटापा कम करने में मदद करता है और पाचन को बेहतर बनाता है।धावडा गोंद शरीर को मजबूती देने, घाव भरने व ऊर्जा प्रदान करने का काम करता है। मोरिंगा या सहजन गोंद हड्डियों की कमजोरी दूर करता है, इम्यूनिटी बढ़ाता है और शरीर की थकान दूर करता है। आम का गोंद पेट के रोग, दस्त और कमजोरी में सहायक है। नीम का गोंद त्वचा के रोग, खून साफ करने और फोड़े-फुंसी में लाभ देता है। पीपल का गोंद खांसी, दमा और गले की समस्याओं में मददगार है।बरगद का गोंद महिलाओं की सफेद पानी की समस्या, कमजोरी और रक्तस्राव रोकने में फायदेमंद है। बेल का गोंद दस्त, पेचिश और पेट की गर्मी को कम करता है और आंतों को मजबूत बनाता है। गुग्गुल गोंद जोड़ों के दर्द, गठिया और मोटापे में लाभकारी है और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता है। लोबान गोंद मानसिक शांति देता है, सिरदर्द और सूजन व दर्द में राहत देता है।राल गोंद घाव भरने, त्वचा रोग और सूजन में मदद करता है। शल्लकी गोंद आर्थराइटिस, जोड़ों की सूजन और मांसपेशियों के दर्द में काम आता है। हींग का गोंद गैस, अपच और पेट दर्द में लाभकारी है। अर्जुन का गोंद हृदय रोग, हाई बीपी और दिल की कमजोरी में सहायक है। अशोक का गोंद स्त्री रोग, अनियमित मासिक धर्म और अधिक रक्तस्राव में लाभ देता है।इसके अलावा, साल गोंद घाव, सूजन और त्वचा की समस्या में काम आता है। खैर का गोंद मुंह के छाले, दस्त और खून बहना रोकने में फायदेमंद है। इमली का गोंद पेट की गर्मी कम करता है, कब्ज में मदद करता है और पाचन सुधारता है। हर गोंद का अपना अलग फायदा है और इसे सही मात्रा में इस्तेमाल करने पर यह शरीर की कई छोटी-बड़ी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है। हालांकि इन औषधीय गोंदों को अपने आहार या इलाज में शामिल करने से पहले योग्य आयुर्वेदाचार्य की सलाह लेना जरूरी है।

सुबह के नाश्ते से बनती है पूरे दिन की एनर्जी:इन चीजों से दें शरीर को भरपूर ताकत
नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर सुबह के नाश्ते को छोड़ देते हैं, लेकिन आयुर्वेद और विज्ञान दोनों ही मानते हैं कि सुबह का नाश्ता हमारे पूरे दिन की सेहत तय करता है। रात की 8 से 10 घंटे की नींद के बाद हमारा शरीर लंबे फास्ट से बाहर आता है। इस दौरान शरीर की ऊर्जा लगभग खत्म हो चुकी होती है और दिमाग को भी सही तरीके से काम करने के लिए पोषण की जरूरत होती है। अगर इस समय सही और पौष्टिक नाश्ता न मिले, तो दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और बार-बार भूख लगने जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।आयुर्वेद के अनुसार, सुबह का समय शरीर में अग्नि यानी पाचन शक्ति को धीरे-धीरे जगाने का होता है। ऐसे में भारी या बहुत तला-भुना खाना नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि पोषक तत्वों से भरपूर और आसानी से पचने वाला नाश्ता शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है। विज्ञान कहता है कि सुबह उठने के एक से डेढ़ घंटे के भीतर संतुलित नाश्ता करने से ब्लड शुगर लेवल स्थिर रहता है और मेटाबॉलिज्म एक्टिव होता है। ऐसे में कुछ खास फूड्स हैं, जो कम मात्रा में भी शरीर को भरपूर ताकत दे सकते हैं।सुबह के नाश्ते में कद्दू के बीज और चिया सीड्स जैसे बीजों का सेवन शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। कद्दू के बीज में प्रोटीन, जिंक, मैग्नीशियम और आयरन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, ये बीज शरीर की कमजोरी दूर करने में मदद करते हैं और नसों को मजबूत बनाते हैं। विज्ञान के मुताबिक, कद्दू के बीज दिल की सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं और इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं। वहीं चिया सीड्स फाइबर और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं। ये पेट में जाकर पानी सोख लेते हैं, जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करता है और बार-बार भूख नहीं लगती। यही कारण है कि यह वजन कंट्रोल करने में भी मददगार माने जाते हैं। चिया सीड्स आंतों की सफाई करते हैं।अगर आप ठोस नाश्ता पसंद करते हैं, तो बेसन यानी चने के आटे से बना नाश्ता एक बेहतरीन विकल्प है। आयुर्वेद में चना बलवर्धक माना गया है, यानी यह शरीर को ताकत देने वाला होता है। बेसन में मौजूद प्रोटीन मांसपेशियों को ऊर्जा देता है, जबकि फाइबर पाचन को दुरुस्त रखता है। सुबह बेसन से बना चीला खाने से शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा मिलती है और भूख कंट्रोल में रहती है। विज्ञान के अनुसार, बेसन धीरे-धीरे पचता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल संतुलित रहता है और डायबिटीज का खतरा भी कम होता है। सब्जियों के साथ बनाया गया बेसन चीला शरीर को विटामिन और मिनरल्स भी देता है।वहीं ग्रीक योगर्ट सुबह के नाश्ते को और भी खास बना देता है। ग्रीक योगर्ट सामान्य दही की तुलना में ज्यादा गाढ़ा और प्रोटीन से भरपूर होता है। आयुर्वेद में दही को पाचन के लिए उपयोगी माना गया है, बशर्ते इसे सही समय और सही तरीके से खाया जाए। ग्रीक योगर्ट में मौजूद प्रोबायोटिक्स पेट के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है।

कैल्शियम से भरपूर है शंख भस्म:हड्डियों और जोड़ों को देती है नया जीवन
नई दिल्ली । आयुर्वेद में उपचार के लिए सदियों से दुर्लभ जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता आया है। जड़ी-बूटियों के गुण बड़े से बड़े रोग से मुक्ति दिलाने की शक्ति रखते हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि आयुर्वेद में भस्म के जरिए भी रोगों को दूर करने का काम पहले से होता आया है। हम बात कर रहे हैं शंख भस्म की, जिसे आयुर्वेद में चमत्कारी भस्म के नाम से जाना जाता है।शंख भस्म एक आयुर्वेदिक औषधि है जिसका उपयोग एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्याओं के उपचार में किया जाता है। इसमें अम्लरोधी गुण होते हैं जो सीने में जलन और दर्द जैसे लक्षणों से राहत प्रदान करते हैं। रसशास्त्र में शंख को शुद्ध वर्ग के अंतर्गत एक खनिज के रूप में वर्णित किया गया है। शंख भस्म आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा दैनिक अभ्यास में उपयोग की जाने वाली महत्वपूर्ण भस्मों में से एक है।शंख भस्म का उपयोग पेट से जुड़े विकारों से लेकर हड्डियों और जोड़ों के विकारों को ठीक करने में किया जाता है, लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये है कि बिना चिकित्सक के शंख भस्म का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इसे सीधा खाया नहीं जाता है, बल्कि किसी न किसी चीज में मिक्स कर इसका सेवन किया जाता है। ये स्वाद में तीखी होती है और रोग के अनुसार इसके सेवन की मात्रा तय की जाती है।अगर पेट की पाचन अग्नि कमजोर हो गई है, पेट में दर्द रहता है, गैस बनने की वजह से उल्टी की परेशानी या सिर में दर्द होता है, तो शंख भस्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। शंख भस्म पाचन अग्नि को रीसेट करती है, जिससे खाना अच्छे से पचता है और पाचन की प्रक्रिया में सुधार आता है।शंख भस्म मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट होता है। यह हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने, ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने और दांतों की मजबूती को बनाए रखने में मदद करता है। अगर शरीर में कैल्शियम की कमी है, तब भी शंख भस्म का सेवन किया जा सकता है, लेकिन गर्भवती महिलाएं सेवन से पहले चिकित्सक की सलाह जरूर लें।शंख भस्म शरीर में वात और कफ दोषों को संतुलित करने का काम भी करती है। अगर ये दोनों ही दोष शरीर में असंतुलित हैं तो कई बीमारियों का जन्म होता है। इससे पेट से लेकर स्किन से जुड़ी परेशानियां होने लगती हैं। इसके अलावा, चेहरे के मुहांसों और दाग धब्बों से छुटकारा पाने के लिए भी शंख भस्म का लेपन और सेवन कर सकते हैं।

कम उम्र में सफेद बाल बन रहे हैं परेशानी? :सौंफ देगा बालों को नेचुरल हेयर कलर
नई दिल्ली । आज के समय में सफेद बाल केवल उम्र बढ़ने की निशानी नहीं रह गए हैं। बदलती जीवनशैली, अनियमित खानपान, बढ़ता तनाव, नींद की कमी और मोबाइल-लैपटॉप की लगातार स्क्रीन लाइट जैसे कई कारणों से कम उम्र में ही बाल सफेद होने लगे हैं। पहले जहां यह समस्या चालीस-पचास की उम्र के बाद दिखाई देती थी, वहीं अब स्कूल-कॉलेज जाने वाले युवाओं तक में बाल सफेद होना देखा जा रहा है। ऐसे में लोग तुरंत समाधान चाहते हैं। बार-बार हेयर कलर करना न तो सेहत के लिए अच्छा है और न ही हर किसी के पास इतना समय होता है।आयुर्वेद में बालों को शरीर की अंदरूनी सेहत का आईना माना गया है। आयुर्वेद मानता है कि जब शरीर में वात और पित्त का संतुलन बिगड़ता है, तो इसका असर सीधे बालों की जड़ों पर पड़ता है। वहीं विज्ञान भी यह मानता है कि मेलानिन नामक पिगमेंट की कमी से बाल सफेद होते हैं। मेलानिन ही वह तत्व है जो बालों को काला रंग देता है। जब तनाव, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, या पोषण की कमी होती है, तो मेलानिन बनना कम हो जाता है। ऐसे में कुछ प्राकृतिक चीजें मदद कर सकती हैं।सौंफ उन्हीं प्राकृतिक चीजों में से एक है। आमतौर पर सौंफ को हम पाचन के लिए जानते हैं, लेकिन आयुर्वेद में इसे त्रिदोष नाशक माना गया है। सौंफ में एंटीऑक्सीडेंट्स, फ्लेवोनॉयड्स, और कुछ ऐसे नेचुरल तत्व पाए जाते हैं जो फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं। विज्ञान के अनुसार, एंटीऑक्सीडेंट्स बालों की जड़ों को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाते हैं। यही डैमेज बालों के समय से पहले सफेद होने की एक बड़ी वजह बनता है।सौंफ में मौजूद नेचुरल पिगमेंट बालों पर हल्की डार्क कोटिंग बनाते हैं। यह तरीका बालों को अंदर से काला नहीं करता, लेकिन सफेद बालों को अस्थायी रूप से छुपाने में मदद करता है।इस देसी नुस्खे की प्रक्रिया भी बहुत सरल है। सबसे पहले सौंफ को साफ पानी में कुछ देर भिगोया जाता है ताकि उसकी अशुद्धियां निकल जाएं। इसके बाद उसे हल्की आंच पर भूनकर पूरी तरह जलाया जाता है। जब सौंफ जलकर काली राख बन जाती है, तो उसे ठंडा करके बहुत बारीक पीस लिया जाता है। यह पाउडर सफेद बालों पर लगाया जाता है। इसका असर एक दिन तक रहता है और अगली बार बाल धोने पर यह हट सकता है।अगर सफेद बालों की समस्या लगातार बढ़ रही है, तो आयुर्वेद और विज्ञान दोनों यही सलाह देते हैं कि खानपान सुधारें, तनाव न लें, और शरीर को अंदर से मजबूत बनाएं।

सर्दी, खांसी और जुकाम से चाहिए राहत?:घर में मौजूद यह विंटर कॉम्बो देगा आराम
नई दिल्ली । सर्दियों में जैसे-जैसे पारा गिरता है, लोग गले में खराश, छींक और सर्दी-जुकाम की शिकायत करने लगते हैं। ऐसे में लोग अक्सर सिरप और दवा की तरफ भागते हैं, लेकिन सच कहें तो रसोई में ही मौजूद एक आसान और असरदार नुस्खा इस परेशानी का हल है। यह है गुड़ और सोंठ। आयुर्वेद में इसे प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, गुड़ और सोंठ दोनों की तासीर गर्म होती है। इसका फायदा यह है कि यह शरीर में जमा कफ और ठंड को पिघलाने में मदद करता है। गुड़ श्वसन नली को साफ करता है और आयरन की प्रचुर मात्रा के कारण हीमोग्लोबिन बढ़ाता है, जिससे शरीर को ठंड से लड़ने की ताकत मिलती है।सोंठ में मौजूद जिंजरॉल एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरा है, जो फेफड़ों की सूजन कम करने और इंफेक्शन दूर करने में कारगर है। पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसे खांसी, जुकाम और शरीर में बढ़े कफ को दूर करने वाला बताया गया है।इसे इस्तेमाल करने के कई तरीके हैं। सूखी खांसी के लिए गुड़ और सोंठ की गोलियां बनाई जा सकती हैं। आधा कप कद्दूकस किया हुआ गुड़ लें, उसमें 2 चम्मच सोंठ पाउडर और एक चुटकी काली मिर्च मिलाकर थोड़ा घी डालें और गोलियां बना लें। दिन में 2-3 बार एक गोली चूसने से गले की खराश और खांसी में राहत मिलती है।जमे हुए कफ के लिए गुनगुना काढ़ा भी फायदेमंद है। एक गिलास पानी में गुड़ और सोंठ डालकर आधा उबालें और रात को सोने से पहले पिएं। यह छाती में जमा बलगम साफ करने में मदद करता है। वहीं, शरीर को गर्म रखने और ठंड से बचने के लिए सोंठ और गुड़ के लड्डू बनाने की पुरानी परंपरा है। इसे सुबह दूध के साथ खाने से जुकाम और जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।हालांकि, ध्यान रहे कि गुड़ और सोंठ की तासीर गर्म होती है। इसलिए सीमित मात्रा में ही सेवन करें। नाक से खून आने, बवासीर या पेट की अल्सर जैसी समस्या वाले लोग इसे कम लें। हमेशा गहरे रंग या जैविक गुड़ का ही चुनाव करें। साथ ही इसे गुनगुने पानी या घी के साथ लेना सबसे अच्छा रहता है।

बॉडी डिटॉक्स से मजबूत इम्युनिटी तक:सुबह खाली पेट गुनगुने नींबू पानी के जबरदस्त फायदे
नई दिल्ली। शरीर की साफ-सफाई सिर्फ बाहर से नहीं, बल्कि अंदरूनी तौर पर भी बहुत जरूरी है। इसके लिए महंगे उपायों की जरूरत नहीं। बस हर सुबह उठते ही खाली पेट एक गिलास गुनगुना पानी में ताजा नींबू निचोड़कर पी लें। यह आसान आदत अपनाने से पाचन बेहतर होता है, शरीर डिटॉक्स होता है और सेहत में कई गुना सुधार आता है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने भी इस सरल घरेलू नुस्खे को काफी फायदेमंद बताया है। यह आदत न केवल सेहत को बेहतर बनाती है, बल्कि रोजमर्रा की कई छोटी-मोटी परेशानियों से भी छुटकारा दिला सकती है।एक्सपर्ट के अनुसार, सुबह खाली पेट गर्म नींबू पानी पीने के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। नींबू में भरपूर मात्रा में विटामिन-सी होता है, जो शरीर की रक्षा प्रणाली को सक्रिय रखता है और सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियों से बचाव में मदद करता है। यह वजन घटाने में भी कारगर है। गुनगुना नींबू पानी पाचन तंत्र को तेज करता है, मेटाबॉलिज्म बढ़ाता है और शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को कम करने में सहायक होता है। जो लोग वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक आसान उपाय है।इसके नियमित सेवन से पेट फूलना, गैस और अपच जैसी समस्याएं भी दूर रहती हैं। यह लिवर के लिए बहुत अच्छा है। नींबू पानी लिवर को डिटॉक्स करने में मदद करता है। सुबह खाली पेट पीने से लिवर टॉक्सिन्स को आसानी से बाहर निकाल पाता है, जिससे यह स्वस्थ और मजबूत रहता है। यह त्वचा के लिए भी फायदेमंद है। नींबू में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन-सी त्वचा को साफ और चमकदार बनाते हैं। यह मुंहासों को कम करता है, दाग-धब्बों को हल्का करता है और त्वचा को जवां रखने में मदद करता है। नियमित पीने से चेहरा निखरता है और त्वचा स्वाभाविक रूप से स्वस्थ दिखती है।यह नुस्खा बनाना भी बहुत आसान है। एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़कर मिलाएं। स्वाद के लिए थोड़ा शहद भी डाल सकते हैं, लेकिन चीनी से बचें। ध्यान रखें कि बहुत गर्म पानी न लें, सिर्फ गुनगुना ही काफी है।

मकर संक्रांति पर षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग:हिन्दू धर्म के लिए माना गया है बेहद शुभ, तिल दान से मिलेगा विशेष पुण्य
नई दिल्ली। 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व बहुत खास रहने वाला है, क्योंकि इस दिन षटतिला एकादशी भी पड़ रही है। इन दोनों का संयोग हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। मकर संक्रांति पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। संक्रांति पर अन्न दान के साथ अन्य पुण्य कर्म किए जाते हैं और गुड़-तिल से बने खाद्य पदार्थों के सेवन और दान का भी विशेष महत्व है। साथ ही सूर्य देव को जल देने का भी विशेष पर्व है।इस बार मकर संक्रांति के साथ ही माघ मास की कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी भी पड़ रही है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होती है। षटतिला का अर्थ है छह प्रकार से तिल का उपयोग। तिल को पवित्र और शुभ फल देने वाला माना जाता है। इस एकादशी पर तिल से जुड़े कार्य करने से पापों का नाश होता है, गरीबी दूर होती है, मनोकामनाएं पूरी होती हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।उत्तरायण काल में किए गए दान, व्रत और भक्ति का कई गुना फल मिलता है। इसलिए इस संयोग में तिल दान का महत्व और भी बढ़ जाता है। षटतिला एकादशी पर तिल का छह तरह से उपयोग करने की परंपरा है। पहला तिल मिले हुए पानी से स्नान करना। शरीर पर तिल का लेप लगाना। हवन में तिल की आहुति देना। ब्राह्मण या जरूरतमंद लोगों को तिल दान करना। व्रत के नियमों के अनुसार तिल से बने व्यंजन खाना और तिल मिश्रित जल पीना या पितरों को तर्पण करना शामिल है। ये सभी कार्य करने से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।वहीं, दृक पंचांग के अनुसार, 14 जनवरी को एकादशी तिथि शाम 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी। बुधवार को राहुकाल दोपहर 12 बजकर 30 मिनट से 1 बजकर 49 मिनट तक रहेगा, इस दौरान कोई नया शुभ कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। अनुराधा नक्षत्र 15 जनवरी सुबह 3 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। चंद्रमा वृश्चिक राशि में संचार करेंगे। सूर्योदय 7 बजकर 15 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर 45 मिनट पर होगा।

जटामांसी:बालों का झड़ना रोकने और ग्रोथ बढ़ाने की आयुर्वेदिक औषधि, जानिए फायदे
नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तनाव, गलत खान-पान और केमिकल युक्त प्रोडक्ट्स के कारण बालों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं, ऐसे में जटामांसी एक प्राकृतिक समाधान के रूप में सामने आती है। यह बालों की जड़ों को पोषण देकर उन्हें मज़बूत बनाती है और हेयर फॉल को धीरे-धीरे कम करने में मदद करती है। जटामांसी आयुर्वेद की एक बेहद प्रभावशाली जड़ी-बूटी है। यह हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है और इसकी जड़ औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है। पुराने समय से ही जटामांसी का इस्तेमाल बालों के झड़ने, रूसी और कमजोर बालों की समस्याओं में किया जाता रहा है।जटामांसी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह स्कैल्प में रक्त संचार को बेहतर बनाती है। जब सिर की त्वचा में ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है तो बालों के रोमछिद्रों तक जरूरी पोषक तत्व आसानी से पहुंचते हैं, जिससे नए बाल उगने की प्रक्रिया तेज होती है। यही कारण है कि जटामांसी को हेयर ग्रोथ बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक औषधि माना जाता है। इसके अलावा, यह वात दोष को संतुलित करती है जो आयुर्वेद के अनुसार बालों के झड़ने का एक मुख्य कारण होता है। नियमित उपयोग से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और टूटना कम होता है।रूसी, खुजली और स्कैल्प की जलन से परेशान लोगों के लिए भी जटामांसी बहुत फायदेमंद है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-फंगल गुण स्कैल्प को शांत करते हैं और रूसी की समस्या को धीरे-धीरे खत्म करने में मदद करते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स बालों को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं, जिससे समय से पहले बालों का सफेद होना कम हो सकता है। यह बालों के तंतुओं को मजबूती देता है, दोमुंहे बालों की समस्या घटाता है और बालों में प्राकृतिक चमक लाता है।जटामांसी का उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है। इसके तेल को नारियल या तिल के तेल में मिलाकर हफ्ते में दो-तीन बार स्कैल्प पर मालिश करना बेहद लाभकारी होता है। वहीं जटामांसी पाउडर को दही या पानी में मिलाकर हेयर मास्क की तरह लगाया जा सकता है। हालांकि इसका अत्यधिक या गलत इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए बेहतर है कि इसका उपयोग सीमित मात्रा में और किसी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह से किया जाए।

स्लीप ऑनसेट इनसोमनिया:बिस्तर पर लेटने के बाद भी नहीं आती नींद, जानें इसका कारण
नई दिल्ली। आजकल रात को अच्छी नींद लेना भी कई लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। कई बार ऐसा होता है कि बिस्तर पर लेटने के बावजूद भी नींद नहीं आती। इसे मेडिकल भाषा में स्लीप ऑनसेट इनसोमनिया यानी नींद न आने की समस्या कहते हैं। यह केवल एक आम परेशानी नहीं है, बल्कि यह आपके पूरे दिन की ऊर्जा, मूड और स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। नींद की कमी मस्तिष्क और शरीर दोनों को थका देती है, जिससे दिनभर तनाव, चिड़चिड़ापन और ध्यान में कमी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। आज के दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। सोने से ठीक पहले इन उपकरणों का इस्तेमाल करना शरीर में नींद के हार्मोन मेलाटोनिन के उत्पादन को रोक देता है। आयुर्वेद में इसे मानसिक अशांति और प्रकाश से उत्पन्न विकार कहा जा सकता है। जब स्क्रीन की नीली रोशनी आंखों में पड़ती है, तो मस्तिष्क सोचने लगता है कि दिन अभी खत्म नहीं हुआ। परिणामस्वरूप शरीर बिस्तर पर होने के बावजूद रिलैक्स नहीं होता और नींद नहीं आती।इसके अलावा, बिस्तर पर जाते ही कई लोग दिनभर की घटनाओं या आने वाले कल की चिंताओं में डूब जाते हैं। आयुर्वेद इसे चित्त विकार कहता है। जब मस्तिष्क लगातार अलर्ट मोड में रहता है, तो शरीर को नींद की जरूरत होने के बावजूद भी आराम नहीं मिल पाता। यह सोचने का सिलसिला कई बार अनजाने में आदत बन जाता है, जिससे नींद न आने की समस्या होती है।एक और बड़ा कारण है कैफीन का सेवन, खासकर दोपहर के बाद चाय या कॉफी पीना। विज्ञान के अनुसार कैफीन का असर शरीर में 6 से 8 घंटे तक रहता है। इसका मतलब यह है कि अगर आप शाम को चाय पीते हैं, तो रात को बिस्तर पर जाने पर आपका मस्तिष्क सक्रिय रहता है और नींद नहीं आती। आयुर्वेद में इसे पित्त और वात के असंतुलन से जोड़ा जाता है, जो शरीर को गर्म और उत्तेजित रखता है।स्लीप ऑनसेट इंसोमनिया का एक और कारण अनियमित सोने और जागने का समय है। जब रोज अलग-अलग समय पर सोते और जागते हैं, तो हमारा शरीर यह संकेत नहीं देता कि कब सोना है और कब जागना है। आयुर्वेद में इसे शरीर की प्राकृतिक लय के विघटन के रूप में देखा जाता है। इस वजह से नींद आने में देर होती है और नींद की गुणवत्ता भी कम हो जाती है।नींद की समस्या को दूर करने के लिए कुछ आसान उपाय हैं। सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी का इस्तेमाल कम करें और कमरे को अंधेरा रखें। हल्का संगीत सुनना, गहरी सांस लेना या आयुर्वेदिक हर्ब्स जैसे अश्वगंधा और ब्राह्मी का सेवन मानसिक शांति में मदद कर सकता है। दोपहर के बाद कैफीन से बचें और रोजाना एक ही समय पर सोने और जागने की आदत डालें। आयुर्वेद के अनुसार यह वात और पित्त को संतुलित करके नींद को प्राकृतिक रूप से सुधारता है।

प्रेग्नेंसी में ये छोटी लापरवाही पड़ सकती है भारी: जेस्टेशनल डायबिटीज से बढ़ा जोखिम
नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान शुगर यानी जेस्टेशनल डायबिटीज आजकल महिलाओं के लिए एक बड़ी और गंभीर समस्या बनती जा रही है। जिला अस्पतालों से लेकर सीएचसी और पीएचसी तक इलाज कराने पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या में डेढ़ से दो गुना तक बढ़ोतरी देखी जा रही है। भंगेल सीएचसी की सीनियर मेडिकल ऑफिसर और गायनेकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. मीरा पाठक ने इस पर अपनी राय दी। डॉ. मीरा पाठक ने बताया कि जेस्टेशनल डायबिटीज वह स्थिति होती है जिसमें किसी महिला को प्रेग्नेंसी के दौरान पहली बार ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या होती है। आमतौर पर यह समस्या प्रेग्नेंसी के 24 से 26 हफ्ते यानी छठे या सातवें महीने में सामने आती है। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में डिलीवरी के बाद और पोस्टपार्टम पीरियड पूरा होने पर ब्लड शुगर लेवल अपने आप नॉर्मल हो जाता है।डॉ. मीरा के अनुसार, जेस्टेशनल डायबिटीज होने का मुख्य कारण प्लेसेंटा से निकलने वाले कुछ हार्मोन होते हैं। ये हार्मोन शरीर की कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति रेजिस्टेंट बना देते हैं। इसके चलते शरीर में शुगर लेवल बढ़ जाता है। यही हार्मोन जब ज्यादा मात्रा में बनते हैं तो वे मां के साथ-साथ बच्चे पर भी असर डालते हैं।इससे बचने के लिए सबसे जरूरी है समय पर स्क्रीनिंग। जब भी कोई महिला पहली बार एंटीनेटल चेकअप के लिए जाती है, उसे रैंडम ब्लड शुगर की जांच जरूर करानी चाहिए। इसके अलावा, कुछ महिलाएं हाई रिस्क कैटेगरी में आती हैं, जैसे ज्यादा वजन होना, 35 साल के बाद पहली प्रेग्नेंसी, परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री, प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर, पहले बार-बार मिसकैरेज होना, पेट में बच्चे की मौत होना, पिछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज रहना या पहले चार किलो से ज्यादा वजन का बच्चा पैदा होना। ऐसी महिलाओं के लिए 24 से 26 हफ्ते के बीच ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कराना बेहद जरूरी होता है।अगर इस दौरान लापरवाही बरती जाए तो इसका असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है। मां को बार-बार इंफेक्शन हो सकता है, पानी ज्यादा बनने की समस्या हो सकती है, मिसकैरेज या प्री-टर्म डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है। वहीं बच्चे पर इसका असर यह हो सकता है कि बच्चा या तो बहुत कमजोर पैदा हो या फिर जरूरत से ज्यादा वजन का यानी चार किलो से ऊपर का हो। डिलीवरी के तुरंत बाद भी खतरा खत्म नहीं होता। ऐसे बच्चों में जन्म के बाद ब्लड शुगर कम होने की संभावना रहती है और पीलिया का खतरा भी ज्यादा होता है। इसलिए डॉक्टर लगातार मॉनिटरिंग की सलाह देते हैं।डॉ. मीरा पाठक कहती हैं कि जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने का सबसे आसान और असरदार तरीका है स्मार्ट लाइफस्टाइल अपनाना। इसका मतलब है संतुलित आहार लेना। दिन में तीन बड़े खाने की बजाय छोटे-छोटे और बार-बार खाने की आदत डालें। हर दो से तीन घंटे में थोड़ा-थोड़ा खाना बेहतर रहता है। प्लेट का आधा हिस्सा हरी सब्जियों और सलाद से भरें। दाल, दही, लस्सी, पनीर और अंडा जैसी चीजों को डाइट में शामिल करें।दूसरी सबसे जरूरी बात है हिडन शुगर से बचना। हिडन शुगर वे चीजें होती हैं जो स्वाद में ज्यादा मीठी नहीं लगतीं, लेकिन उनमें शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। जैसे पैकेट वाला नारियल पानी, पैकेज्ड फ्रूट जूस, फ्लेवर्ड दूध, फ्लेवर्ड दही, ब्राउन ब्रेड, व्हाइट ब्रेड, पाव, बन, सीरियल्स, सैंडविच स्प्रेड, मेयोनीज, बिस्किट, रस्क, केक और मफिन। इन चीजों से दूरी बनाना बेहद जरूरी है।एक आम गलतफहमी यह भी है कि प्रेग्नेंसी में श्दो लोगों के लिए खानाश् चाहिए। डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए। पहले तीन महीने उतना ही खाएं जितना पहले खाती थीं। दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में अतिरिक्त मील जोड़ना काफी होता है।इसके अलावा, डॉक्टर की सलाह से रोजाना आधा घंटा हल्की एक्सरसाइज जरूर करें। हल्की वॉक, प्रेग्नेंसी योगा या हर मील के बाद 10-15 मिनट टहलना भी काफी फायदेमंद होता है। जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ने से बचें। पूरी प्रेग्नेंसी में करीब 10 से 11 किलो वजन बढ़ना सामान्य माना जाता है। खाना न छोड़ें, पूरी नींद लें, कम से कम 7-8 घंटे सोने की कोशिश करें और तनाव से दूर रहें। ये सभी बातें मिलकर जेस्टेशनल डायबिटीज को रोकने में मदद करती हैं।कुछ ऐसे लक्षण भी होते हैं जिन पर गर्भवती महिलाओं को खास ध्यान देना चाहिए, जैसे बार-बार ज्यादा भूख लगना, ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बार-बार इंफेक्शन होना, बार-बार फंगल इंफेक्शन और बीपी का बढ़ना। अल्ट्रासाउंड में अगर एम्नियोटिक फ्लूड ज्यादा दिखे, बच्चे का वजन बहुत तेजी से बढ़े या बच्चा कमजोर लगे, तो तुरंत ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए।

लैक्टिक एसिड से भरपूर कच्चा दूध:त्वचा को अंदर से साफ करने में करे मदद
नई दिल्ली। धूल-मिट्टी, प्रदूषण, गलत खान-पान और तनाव का असर सबसे पहले चेहरे पर दिखाई देता है। ऐसे में लोग महंगे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, जिनके साइड इफेक्ट्स का खतरा बना रहता है। अगर घर में मौजूद प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाए, तो यह त्वचा पर ज्यादा असरदार साबित होती हैं। इन्हीं प्राकृतिक उपायों में कच्चा दूध सदियों से इस्तेमाल होता आ रहा है। दादी-नानी के नुस्खों से लेकर आयुर्वेद तक, कच्चे दूध को त्वचा के लिए लाभकारी माना गया है। आज विज्ञान भी इसके गुणों को मानता है। आयुर्वेद के अनुसार, कच्चा दूध ठंडक देने वाला होता है। यह त्वचा की जलन, रूखापन और असंतुलन को शांत करने में मदद करता है। जब शरीर में पित्त बढ़ता है, तो इसका असर त्वचा पर दाग-धब्बे, मुंहासे और रंगत बिगड़ने के रूप में दिखाई देता है। कच्चा दूध इस पित्त को संतुलित करने में सहायक होता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक चिकनाई त्वचा को नमी देती है और उसे मुलायम बनाए रखने में मदद करती है।विज्ञान के मुताबिक, कच्चे दूध में लैक्टिक एसिड पाया जाता है, जो त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद है। लैक्टिक एसिड एक प्राकृतिक क्लींजर की तरह काम करता है। यह त्वचा की ऊपरी परत पर जमी गंदगी और मृत कोशिकाओं को धीरे-धीरे हटाने में मदद करता है। जब मृत कोशिकाएं हटती हैं, तो साफ त्वचा बाहर आती है, जिससे चेहरे पर प्राकृतिक चमक दिखाई देने लगती है। यही कारण है कि कच्चा दूध त्वचा को चमकदार बनाने में मददगार माना जाता है।कच्चा दूध त्वचा की रंगत को सुधारने में भी सहायक हो सकता है। नियमित रूप से इसका इस्तेमाल करने पर त्वचा का रंग समान दिखने लगता है। विज्ञान बताता है कि दूध में मौजूद प्रोटीन और विटामिन त्वचा की मरम्मत की प्रक्रिया को सहारा देते हैं। इससे धूप से हुई टैनिंग, हल्के दाग-धब्बे और थकान के निशान धीरे-धीरे कम हो सकते हैं। यह प्रक्रिया धीरे होती है, लेकिन लंबे समय तक असर दिखा सकती है।संवेदनशील त्वचा वालों के लिए भी कच्चा दूध राहत देने वाला माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, इसकी ठंडी तासीर त्वचा की सूजन और लालिमा को कम करने में मदद करती है। कच्चा दूध त्वचा की प्राकृतिक नमी को बनाए रखता है, जिससे त्वचा ज्यादा रूखी या खींची हुई महसूस नहीं होती। यही वजह है कि कई लोग इसे फेस क्लीनर या टोनर की तरह इस्तेमाल करते हैं।

सेहत के लिए वरदान हैं सीजनल फ्रूट:कड़कड़ाती ठंड में ये फल इम्यूनिटी बूस्ट कर बीमारियों से रखते हैं कोसों दूर
नई दिल्ली। सर्दियों की कड़ाकड़ाती ठंड, घना कोहरा, शीतलहर और ठिठुरन भरी हवाओं ने लोगों का हाल बेहाल कर रखा है। इस मौसम में इम्यूनिटी कमजोर पड़ने से अक्सर लोग सर्दी-खांसी, जुकाम और बुखार से पीड़ित हो जाते हैं। अच्छी बात यह है कि इस मौसम में मिलने वाले फल शरीर को अंदर से गर्माहट, भरपूर पोषण और मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता देते हैं। आयुर्वेद में मौसमी फलों सेहत के लिए वरदान माने जाते हैं।आयुष मंत्रालय अनुसार, “ताजा खाएं, मौसमी खाएं”। आयुर्वेद में इस बात पर विशेष जोर दिया जाता है कि सही मौसम के फल आसानी से पचते हैं और जीवन ऊर्जा से भरपूर होते हैं। प्रोसेस्ड नाश्ते या जंक फूड की जगह लोकल और मौसमी फलों का चुनाव करें, जो नेचुरल विटामिन, फाइबर और हाइड्रेशन देते हैं।आयुर्वेद के अनुसार, मौसमी फल सेहत के लिए वरदान हैं क्योंकि ये प्रकृति के साथ तालमेल में उगते हैं। मौसम के अनुसार फल खाने से शरीर के दोष (वात, पित्त, कफ) संतुलित रहते हैं। ये फल पके हुए और ताजे होने से पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, आसानी से पचते हैं और शरीर को मौसम की जरूरतों के अनुसार पोषण देते हैं। जैसे सर्दियों में ठंड और सूखे मौसम से बचाव के लिए विटामिन सी युक्त फल इम्यूनिटी बढ़ाते हैं, संक्रमण से लड़ते हैं और शरीर को गर्म रखते हैं। दूसरे सीजन के फलों में कीटनाशक ज्यादा होते हैं और पोषण कम, जबकि मौसमी फल प्राकृतिक रूप से मीठे, रसीले और औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं।मौसमी फलों के नियमित सेवन से पाचन अच्छा रहता है, त्वचा चमकदार बनती है, वजन नियंत्रित रहता और ऊर्जा बनी रहती है। सर्दियों के प्रमुख मौसमी फलों में संतरा किन्नू हैं, जो विटामिन सी का खजाना है। यह सर्दी-जुकाम से बचाव और इम्यूनिटी बूस्ट करते हैं। अमरूद फाइबर और विटामिन सी से भरपूर होता है, जो पाचन सुधारता है और ब्लड शुगर कंट्रोल करता है। आंवले को आयुर्वेद में सुपरफूड भी कहा जाता है, जो एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर, बाल-सौंदर्य और डिटॉक्स के लिए बेहतरीन हैं।वहीं, अनार ब्लड सर्कुलेशन सुधारता है और हृदय स्वास्थ्य अच्छा रखता है। कम कैलोरी, विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर स्ट्रॉबेरी त्वचा और इम्यूनिटी के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा अंगूर, सेब, नाशपाती और कीवी, गाजर और टमाटर भी शरीर के लिए फायदेमंद होता है। ये हाइड्रेशन, फाइबर और मिनरल्स प्रदान करते हैं, ठंड में ऊर्जा बनाए रखते हैं।आयुर्वेद सलाह देता है कि इन फलों को ताजा खाएं। जूस बनाकर या सलाद में मिलाकर सुबह या दोपहर में खाएं। रात में फलों का सेवन नहीं करना चाहिए। प्रोसेस्ड जूस से बचें।

काली हल्दी:एक ऐसा पौधा, जिसकी जड़ों में छीपा है औषधीय गुणों का खजाना
नई दिल्ली। काली हल्दी एक बहुत ही खास और दुर्लभ पौधा है, जिसे आम हल्दी की तरह रोजमर्रा के मसाले के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि इसे आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में एक शक्तिशाली औषधि माना गया है। इसका वैज्ञानिक नाम कुरकुमा कैसिया है। बाहर से यह साधारण हल्दी जैसी ही दिखाई देती है, लेकिन जब इसके कंद को काटते हैं तो अंदर का रंग नीले से गहरे काले रंग का होता है, जो इसे बाकी सभी हल्दी से अलग बनाता है। इसी अनोखे रंग और तेज सुगंध के कारण इसे काली हल्दी कहा जाता है। पुराने समय में लोग इसे बहुत संभालकर रखते थे और जरूरत पड़ने पर ही इसका उपयोग करते थे।आयुर्वेद में काली हल्दी का उपयोग दर्द, सूजन, सांस से जुड़ी समस्याओं, अस्थमा और जोड़ों के दर्द में किया जाता रहा है। माना जाता है कि इसमें प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो शरीर की सूजन को कम करने में मदद करते हैं। गांवों में लोग इसे घरेलू दवा की तरह इस्तेमाल करते थे। फोड़े-फुंसी, कीड़े के काटने, चोट या घाव होने पर काली हल्दी को पीसकर लेप बनाया जाता था, जिससे जल्दी आराम मिलता था। सरसों के तेल के साथ इसे हल्का गर्म करके लगाने की परंपरा भी रही है।काली हल्दी सिर्फ दवा के रूप में ही नहीं, बल्कि पूजा-पाठ और आध्यात्मिक कार्यों में भी खास मानी जाती है। तांत्रिक विद्या और लक्ष्मी पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है। पुराने लोग मानते थे कि यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और घर में सकारात्मकता लाती है। इसी कारण इसे ताबीज या पूजा की वस्तु के रूप में भी रखा जाता था। हालांकि आज के समय में इसके आध्यात्मिक उपयोग से ज्यादा इसके औषधीय गुणों पर ध्यान दिया जा रहा है।आजकल काली हल्दी कम दिखाई देती है, क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध नहीं है और इसे उगाने में समय लगता है। आधुनिक दवाओं के आने के बाद लोग पारंपरिक जड़ी-बूटियों से भी दूर हो गए हैं। फिर भी, अब धीरे-धीरे लोग इसके महत्व को दोबारा समझने लगे हैं।

सर्दियों में हेल्दी स्नैक:भुना मखाना शरीर को देता है गर्माहट और एनर्जी
नई दिल्ली । सर्दियों में ठंड की वजह से पाचन तंत्र सुस्त पड़ जाता है, जिससे अपच, कब्ज, गैस समेत पेट की कई परेशानियां होने लगती हैं। साथ ही शरीर में एनर्जी की कमी महसूस होती है। ऐसे मौसम में भुना मखाना एक हल्का, स्वादिष्ट और पौष्टिक नाश्ता साबित होता है। भुना मखाना कम कैलोरी वाला होता है, लेकिन प्रोटीन, फाइबर और जरूरी मिनरल्स से भरपूर होता है। रोजाना एक मुट्ठी भुना मखाना खाने से पाचन दुरुस्त रहता है, एनर्जी बनी रहती है और अनहेल्दी क्रेविंग भी कम होती है।भारत सरकार का आयुष मंत्रालय सर्दियों में सेहत बनाए रखने के लिए भुने हुए मखाने को नाश्ते की प्लेट में शामिल करने की सलाह देता है। सर्दियों में सेहत को सही रखने के लिए एक मुट्ठी भुने हुए मखाने का सेवन करें, यह शरीर की एनर्जी बनाए रखते हैं और क्रेविंग को कम करते हैं। हेल्दी भुना मखाना न सिर्फ स्वादिष्ट होता है, बल्कि पेट को ठीक रखता है और शरीर को कई फायदे पहुंचाता है।मखाना, जिसे फॉक्स नट्स या कमल के बीज भी कहते हैं, पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यह कम कैलोरी वाला स्नैक है, जो प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटैशियम, आयरन और जिंक का अच्छा स्रोत है। सर्दियों में जब शरीर को गर्माहट और एनर्जी की ज्यादा जरूरत होती है, तब भुना मखाना बेहतरीन विकल्प है। यह शरीर को अंदर से गर्म रखता है और अनहेल्दी स्नैक्स की क्रेविंग को कंट्रोल करता है।भुने मखाने में भरपूर फाइबर होता है, जो कब्ज दूर करता है और पेट को ठीक रखता है, पाचन तंत्र के लिए बेहद फायदेमंद है। भुने मखाने में कम कैलोरी और हाई फाइबर होती है, जिस वजह से भूख कम लगती है और वजन घटाने में मदद मिलती है। यह सर्दियों में थकान दूर करता है और दिन भर एनर्जी बनाए रखता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और पोटैशियम से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है और हार्ट हेल्थ अच्छी रहती है। यही नहीं, यह कैल्शियम और मैग्नीशियम से भरपूर होता है, जो हड्डियों और दांत को मजबूत बनाता है।भुना मखाना एंटी-एजिंग भी है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो त्वचा को चमकदार बनाते हैं और उम्र के प्रभाव को कम करते हैं। लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स की वजह से मखाना डायबिटीज के मरीजों के लिए भी सही है। जिंक और अन्य मिनरल्स रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करते हैं।भुना मखाना बनाना बहुत आसान है। एक मुट्ठी मखाने को घी या बिना तेल के भून लें। इसमें स्वाद के अनुसार नमक, काली मिर्च पाउडर, या चाट मसाला डालकर खाएं। इसे मीठा बनाने के लिए गुड़ या शहद मिला सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों में रोजाना एक मुट्ठी भुना मखाना खाने से शरीर गर्म और सेहत अच्छी बनी रहती है। यह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए सुरक्षित और फायदेमंद है। हालांकि, ज्यादा मात्रा में न खाएं और अगर कोई एलर्जी हो तो डॉक्टर से सलाह लें।

सुपरफ्रूट अंजीर:रोजाना करें सेवन, कब्ज-कमजोरी से लेकर खांसी तक में मिलेगा फायदा
नई दिल्ली । अंजीर न केवल एक स्वादिष्ट फल है, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर है, जो सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। आयुर्वेद में इसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसके रोजाना सेवन से न केवल कब्ज-कमजोरी दूर होती है बल्कि पुरानी खांसी तक में फायदा मिलता है। संस्कृत में उदुम्बर कहलाने वाला यह फल ताजा और सूखे दोनों रूपों में फायदेमंद होता है। यह शरीर को पोषण प्रदान करता है और कई रोगों में राहत देकर तकलीफें कम करने में कारगर है।आयुर्वेद के अनुसार, अंजीर का रस मधुर, औषधीय गुणों से भरपूर और शीतल होता है। यह मुख्य रूप से पित्त और वात दोष को शांत करता है, जबकि कफ में सीमित मात्रा में उपयोगी है। पाचन तंत्र पर अंजीर का प्रभाव विशेष रूप से लाभकारी है। यह पुरानी कब्ज में भी राहत देता है। साथ ही आंतों के रूखेपन को कम करता है, गैस और पेट के भारीपन से मुक्ति दिलाता है।बवासीर के मरीजों के लिए यह लाभदायी है। अंजीर मल त्याग को आसान बनाने के साथ ही खूनी बवासीर में जलन-दर्द कम करता है। सुपरफ्रूट कमजोरी और रक्त संबंधी समस्याओं में भी लाभदायी है। यह लंबी बीमारी के बाद रिकवरी में मदद करता है और महिलाओं की सामान्य कमजोरी दूर करता है।श्वसन तंत्र के लिए सूखा अंजीर सूखी खांसी, गले की खराश और फेफड़ों को पोषण देता है। हृदय स्वास्थ्य के लिए अंजीर एक टॉनिक है। यह रक्त वाहिनियों को मजबूत बनाता है, कोलेस्ट्रॉल संतुलित रखता है और रक्त संचार सुधारता है। आयुर्वेदाचार्य बताते हैं कि त्वचा पर इसका लेप फोड़े-फुंसी और घाव भरने में सहायक है, जबकि रूखी त्वचा को नमी प्रदान करता है।अंजीर का सेवन कैसे करें, इसके बारे में आयुर्वेदाचार्य जानकारी देते हैं। इसके लिए रात में 1-2 सूखे अंजीर पानी में भिगोकर रखें और सुबह खाली पेट खाएं। दूध के साथ लेने से शरीर को ताकत मिलती है।विशेषज्ञों का कहना है कि अंजीर प्रभावी फल है, जो शरीर की कई समस्याओं को दूर कर पोषण और ताकत देता है। नियमित और संतुलित सेवन से ही लाभ मिलता है। हालांकि, सावधानी जरूरी है। मधुमेह के मरीज सीमित मात्रा लें, अधिक कफ वाले ज्यादा न खाएं और अत्यधिक सेवन से पेट ढीला हो सकता है। आयुर्वेदिक उपचार से पहले वैद्य की सलाह अवश्य लें।

अजवाइन का पानी:सर्दी-जुकाम में राहत का देसी नुस्खा, घर पर ऐसे करें तैयार
नई दिल्ली । सर्दियों के मौसम और बढ़ते प्रदूषण की वजह से सर्दी, जुकाम और छाती में कंजेशन की समस्या आम हो जाती है। ऐसे में दवाओं के अलावा घरेलू उपाय बेहद कारगर साबित होते हैं। इनमें से एक लोकप्रिय और प्रभावी देसी नुस्खा है अजवाइन का पानी। आयुष मंत्रालय अजवाइन के पानी के गुणों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए घर पर खुद से तैयार करने की पूरी विधि भी बताता है। यह सरल, प्राकृतिक और आसानी से उपलब्ध सामग्री से बनने वाला उपाय जुकाम और कंजेशन में तुरंत राहत प्रदान करता है।अजवाइन में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एक्सपेक्टोरेंट गुण होते हैं, जो बलगम को ढीला करते हैं और सांस की नलियों को साफ करने में मदद करते हैं। नियमित और सीमित सेवन से सांस लेने में आराम मिलता है और शरीर को राहत मिलती है। यह उपाय सदियों से भारतीय घरों में इस्तेमाल किया जा रहा है, खासकर मौसमी बीमारियों के दौरान।अजवाइन का पानी बनाने की विधि बहुत आसान है। सबसे पहले 1 कप पानी को उबालें। उबलते पानी में 1 चम्मच अजवाइन डाल दें। इसे धीमी आंच पर 5-10 मिनट तक उबालें, ताकि अजवाइन के गुण पानी में अच्छी तरह घुल जाएं। फिर इसे छान लें और गुनगुना होने पर पी लें। दिन में 1-2 बार इसका सेवन किया जा सकता है। गुनगुने पानी में अजवाइन की खुशबू और स्वाद न केवल राहत देता है, बल्कि पाचन को भी बेहतर बनाता है।आयुर्वेद के अनुसार, अजवाइन का पानी न केवल जुकाम और कंजेशन में राहत देता है, बल्कि यह इम्युनिटी को भी मजबूत बनाने में सहायक है। यह उपाय बेहद फायदेमंद है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी है। अधिक मात्रा में सेवन न करें, क्योंकि इससे पेट में जलन या एसिडिटी हो सकती है। खाली पेट लेने से पहले अपनी सहनशीलता जांच लें। गर्भवती महिलाएं इसका सेवन डॉक्टर की सलाह लेकर ही करें। अगर सेवन के बाद पेट में कोई परेशानी या जलन महसूस हो, तो तुरंत बंद कर दें। बच्चों को देने से पहले भी विशेषज्ञ की राय लें।

सेहत:चुपचाप पैर पसारती है ये आंत से जुड़ी बीमारी, लक्षणों को न करें अनदेखा
नई दिल्ली। व्यवस्त जीवनशैली में कई बार पोषण से जुड़ी जरूरतें नजरअंदाज हो जाती हैं और भागदौड़ भरी जिंदगी की रफ्तार में स्वास्थ्य कहीं पीछे छूट जाता है। इससे शरीर में कई बीमारियां घर करने लगती हैं और उनका पता तब चलता है, जब बात हाथ से निकल जाती है। अक्सर हम पेट के हल्के दर्द को मामूली समझकर छोड़ देते हैं, लेकिन इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। यह असल में यह आंतों की खराब सेहत का इशारा हो सकता है, जो आगे चलकर किसी बड़ी बीमार का रूप ले सकता है।आंत हमारे शरीर का अहम हिस्सा होता है, जो शरीर की गंदगी को बाहर निकालने का काम करता है। आंतों का संक्रमण तब होता है जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी छोटी या बड़ी आंतों में बढ़ने लगते हैं और धीरे-धीरे पेट दर्द, पाचन, कब्ज, हॉर्मोन असंतुलन, उल्टी, बुखार जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। कुछ आंतों में ज्यादा परेशानी होने पर कीड़े भी हो जाते हैं और ये स्थिति शरीर को कमजोर और बेहद बीमार कर सकती है।आंतों का संक्रमण होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे गंदा पानी और दूषित भोजन का सेवन करना, बार-बार एंटीबायोटिक लेना, कमजोर पाचन प्रणाली का होना, बिना हाथ साफ किए भोजन खाना, जंक फूड ज्यादा खाना, और तनाव लेना शामिल है।आयुर्वेद में आंतों की देखभाल के लिए कई तरह के उपाय बताए गए हैं। इसके लिए रोजाना दोपहर के समय छाछ का सेवन कर सकते हैं। छाछ आंतों के लिए औषधि है। इसमें हींग और जीरा मिलाकर पीने से आंतों का बैक्टीरिया खत्म होता है। दूसरा, अनार का रस पीने से भी आंतों को ठीक से काम करने की क्षमता मिलती है। इससे आंतों में फैलने वाला संक्रमण नियंत्रित होगा। अगर संक्रमण की वजह से पेट खराब हो गया है और दस्त की शिकायत है, तो अनार का सेवन जरूर करें।तीसरा, आयुर्वेद में बेल को अतिसार नाशक माना गया है, जो ठंडक से भरपूर होता है। ऐसे में बेल का जूस आंतों के लिए लाभकारी होता है। गर्मियों में बेल का जूस आंतों को साफ करने में मदद करता है। चैथा, त्रिफला चूर्ण का सेवन भी आंतों के लिए दवा की तरह है। त्रिफला चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ लेने से आंतों की सफाई होती है और संक्रमण का खतरा कम होता है। पांचवा, दूध के साथ हल्दी का सेवन भी आंतों को साफ करने में मदद करता है और आंतों की सूजन को कम करता है। हल्दी में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो शरीर की अंदरूनी सूजन को कम करते हैं।

सेहत:रात भर भीगे हुए सूखे मेवों के हैं दोगुने फायदे, हमेशा चुस्त-दुरूस्त रहेगा शरीर
नई दिल्ली। शरीर को हमेशा चुस्त-दुरूस्त बनाए रखने के लिए आहार के अलावा, सूखे मेवे भी खाने चाहिए। सूखे मेवे शरीर की कोशिकाओं को पोषण देने के साथ-साथ मन और मस्तिष्क का पूरा ध्यान रखते हैं। हमेशा कहा जाता है कि सूखे मेवे को रात के समय भिगोकर रखना चाहिए और फिर खाना चाहिए। लेकिन ऐसा क्यों? आज हम आपको बताएंगे कि सूखे मेवे को भिगोकर रखने से शरीर को कौन-कौन से लाभ मिलते हैं और किन मेवों का सेवन बिना भिगोए किया जा सकता है।बादाम का सेवन हर किसी को करना चाहिए, लेकिन भिगोने के बाद। रात के समय भिगोकर रखने से बादाम में मौजूद फाइटिक एसिड कम हो जाते हैं, जो शरीर में पोषण के अवशोषण को रोकते हैं। भिगोकर रखने से पाचन भी आसान होता है और बादाम का पूरा पोषण शरीर को मिलता है।किशमिश का सेवन भी रात को भिगोने के बाद सुबह करना चाहिए। भीगी हुई किशमिश में सूखी किशमिश की तुलना में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, और वे पाचन और शरीर को गर्मी को दूर करने में मदद करती हैं। सूखी किशमिश में तासीर थोड़ी गर्म होती है, लेकिन भिगोने के बाद वे शरीर को ठंडक देने का काम करती हैं।अंजीर का सेवन भी भिगोकर ही करना चाहिए। सूखने की वजह से अंजीर के रेशे सख्त हो जाते हैं और पाचन में बाधा डालते हैं। ऐसे में अंजीर को भिगो देने से वो नर्म पड़ जाती है और कैल्शियम, पोटैशियम और मिनरल्स का अवशोषण अच्छे से होता है। अगर इसे दूध के साथ लिया जाए तो ये शरीर की ऊर्जा को दोगुना कर देती है।कुछ बीज भी शरीर को पोषण देने में मदद करते हैं, जिन्हें रात में भिगोकर लेना चाहिए। इसमें असली के बीज और मेथी और धनिए के बीज शामिल हैं। मेथी के बीजों को भिगोने से उसका कड़वापन कम हो जाता है और पाचन आसानी से होता है। मेथी का पानी या दानों का सेवन ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखता है और आंतों में मौजूद टॉक्सिन को बाहर निकालने में मदद करता है।असली के बीजों को भी भिगोकर खाना चाहिए। भिगोने से असली में मौजूद फाइटिक एसिड कम हो जाते हैं और पाचन में मुश्किल नहीं होती। असली में प्रोटीन, कैल्शियम, और आयरन होते हैं, जो शरीर को कई बीमारियों से बचाते हैं। इसके अलावा, अखरोट, खसखस, काजू, पिस्ता और मगज के बीजों का सेवन बिना भिगोए भी कर सकते हैं।

गर्म पानी पीने से लेकर गुनगुने पानी से स्नान तक:जानिए कैसे छोटी-छोटी आदतें पीरियड्स के दर्द को कर सकती हैं कम
नई दिल्ली। महिलाओं के जीवन में पीरियड्स प्राकृतिक और जरूरी शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन इसके साथ आने वाला दर्द कई बार रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना देता है। पेट में ऐंठन, कमर दर्द, थकान, चिड़चिड़ापन और भारीपन जैसी समस्याएं आम हैं। आयुर्वेद इसे शरीर में वात दोष के असंतुलन से जोड़ता है, जबकि विज्ञान के अनुसार यह दर्द गर्भाशय में बनने वाले प्रोस्टाग्लैंडीन नामक रसायन की वजह से होता है, जो मांसपेशियों को सिकोड़ देता है। ऐसे में कुछ आसान आदतें अपनाकर इस दर्द को काफी हद तक कम किया जा सकता है।पीरियड्स के दौरान दिन की शुरुआत अगर गर्म पानी से की जाए, तो शरीर को तुरंत राहत मिलती है। आयुर्वेद में गर्म पानी को अग्नि यानी पाचन शक्ति को मजबूत करने वाला माना गया है। सुबह उठते ही एक गिलास गर्म पानी पीने से शरीर के अंदर जमी ठंडक दूर होती है और गर्भाशय की मांसपेशियां धीरे-धीरे खुलने लगती हैं। विज्ञान भी मानता है कि गर्म पानी ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करता है, जिससे पेट में जकड़न कम होती है। इससे सूजन घटती है और दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसमें हर्बल चाय भी फायदा पहुंचाती है।नहाने का तरीका भी पीरियड्स के दर्द पर असर डालता है। ठंडे पानी से नहाने पर मांसपेशियां और ज्यादा सिकुड़ सकती हैं, जिससे दर्द बढ़ता है। वहीं गुनगुने या गर्म पानी से नहाने पर शरीर को सुकून मिलता है। जब गर्म पानी पेट और कमर पर पड़ता है, तो वह प्राकृतिक सिकाई का काम करता है। आयुर्वेद में इसे स्वेदन कहा जाता है, यानी शरीर से जकड़न निकालना। विज्ञान के अनुसार, गर्म पानी नसों को शांत करता है और दर्द को कम करता है।पीरियड्स के दौरान सुबह का नाश्ता बहुत अहम हो जाता है। इस समय शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा और पोषण की जरूरत होती है। अगर नाश्ता हल्का लेकिन पौष्टिक हो, तो कमजोरी और चक्कर जैसी समस्याएं कम होती हैं। आयुर्वेद में ऐसे भोजन की सलाह दी जाती है जो शरीर को ताकत दे और आसानी से पच जाए। केले, सूखे मेवे, बीज और हरी सब्जियां शरीर में जरूरी तत्वों की कमी पूरी करती हैं। विज्ञान के अनुसार मैग्नीशियम और पोटेशियम मांसपेशियों को आराम देने में मदद करते हैं, जिससे ऐंठन कम होती है। फल और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ सूजन को भी घटाते हैं।पीरियड्स में हल्की एक्सरसाइज या योग शरीर के लिए फायदेमंद साबित होता है। आयुर्वेद में कहा गया है कि योग से वात दोष संतुलित रहता है। सुबह कुछ मिनट की स्ट्रेचिंग या आसान योगासन करने से पेट की मांसपेशियों में खून का बहाव बढ़ता है। विज्ञान भी मानता है कि हल्की एक्सरसाइज से एंडोर्फिन नामक हार्मोन निकलता है, जो शरीर का प्राकृतिक दर्द निवारक होता है। इससे मन हल्का और शरीर आराम में आ जाता है।पीरियड्स के दर्द में सिकाई एक पुराना लेकिन बहुत असरदार तरीका है। गर्म पानी की बोतल या हॉट वाटर बैग को पेट पर रखने से तुरंत राहत महसूस होती है। आयुर्वेद इसे बाहरी ऊष्मा चिकित्सा मानता है, जो अंदर की जकड़न को खोलता है। विज्ञान के अनुसार, गर्माहट से नसें फैलती हैं और खून का प्रवाह तेज होता है, जिससे दर्द पैदा करने वाले रसायन कम हो जाते हैं।

स्टडी में खुलासा:प्रीडायबिटीज को ठीक करने से हार्ट अटैक के खतरे में 60 प्रतिशत की आ सकती है कमी
नई दिल्ली। एक स्टडी के अनुसार, प्रीडायबिटिक मरीज जो अपने ब्लड शुगर लेवल को कम करते हैं और बीमारी को कंट्रोल कर लेते हैं, वे गंभीर दिल की बीमारियों की संभावना को लगभग 60 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। द लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी जर्नल में पब्लिश रिसर्च के अनुसार ब्लड ग्लूकोज को नॉर्मल लेवल पर लाने से, यानी प्रीडायबिटीज को प्रभावी ढंग से ठीक करने से, दिल की बीमारी से मौत या हार्ट फेलियर के लिए हॉस्पिटल में भर्ती होने का खतरा कम हो जाता है।जिन लोगों ने प्रीडायबिटीज से छुटकारा पा लिया था, उनमें कार्डियोवैस्कुलर मौत या हार्ट फेलियर के कारण हॉस्पिटल में भर्ती होने का खतरा 58 प्रतिशत कम था। यूके के किंग्स कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स ने कहा कि यह असर ग्लूकोज लेवल को नॉर्मल करने के दशकों बाद भी बना रहा, जो ब्लड ग्लूकोज को रेगुलेट करने पर एक स्थायी प्रभाव दिखाता है।यह खोज खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हालिया रिसर्च से पता चला है कि सिर्फ लाइफस्टाइल में बदलाव, जिसमें एक्सरसाइज, वजन कम करना और खाने-पीने में सुधार शामिल हैं, प्रीडायबिटीज वाले लोगों में कार्डियोवैस्कुलर जोखिम को कम नहीं करते हैं।किंग्स कॉलेज लंदन और यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ट्यूबिंजन में डायबिटीज के रीडर, लीड लेखक डॉ. एंड्रियास बिर्केनफेल्ड ने कहा, ष्यह स्टडी मॉडर्न प्रिवेंटिव मेडिसिन की सबसे बड़ी मान्यताओं में से एक को चुनौती देती है। सालों से, प्रीडायबिटीज वाले लोगों से कहा जाता रहा है कि वजन कम करने, ज्यादा एक्सरसाइज करने और हेल्दी खाना खाने से वे हार्ट अटैक और जल्दी मौत से बचेंगे। हालांकि ये लाइफस्टाइल में बदलाव निस्संदेह मूल्यवान हैं, लेकिन सबूत इस बात का समर्थन नहीं करते कि वे प्रीडायबिटीज वाले लोगों में हार्ट अटैक या मृत्यु दर को कम करते हैं।बिर्केनफेल्ड ने आगे कहा, इसके बजाय, हम दिखाते हैं कि प्रीडायबिटीज से छुटकारा पाने का संबंध जानलेवा कार्डियक घटनाओं, हार्ट फेलियर और सभी कारणों से होने वाली मृत्यु दर में स्पष्ट कमी से है। प्रीडायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जहां ब्लड ग्लूकोज का लेवल नॉर्मल से ज्यादा होता है लेकिन अभी इतना ज्यादा नहीं होता कि टाइप 2 डायबिटीज का पता चल सके।पिछली स्टडीज में दिखाया गया था कि लाइफस्टाइल में किए गए मिले-जुले बदलाव, जिसमें ज्यादा एक्सरसाइज और हेल्दी खाना शामिल है, कार्डियोवैस्कुलर बीमारी को कम नहीं करते हैं। यह बताता है कि डायबिटीज की शुरुआत में देरी करना ही कार्डियोवैस्कुलर सुरक्षा की गारंटी नहीं देता, जब तक कि महत्वपूर्ण मेटाबॉलिक बदलाव न हों।बिरकेनफेल्ड ने कहा, स्टडी के नतीजों का मतलब है कि प्रीडायबिटीज रिमिशन, ब्लड प्रेशर कम करने, कोलेस्ट्रॉल कम करने और स्मोकिंग छोड़ने के साथ, चैथे बड़े प्राइमरी प्रिवेंशन टूल के तौर पर अपनी जगह बना सकता है, जो सच में हार्ट अटैक और मौतों को रोकता है।

सेहत:तन-मन की थकान से कैफीन नहीं, ये हर्बल-टी दिलाएगी आराम, याददाश्त बढ़ाने में भी करेगी मदद
नई दिल्ली। तन और मन जब भी थक जाते हैं, तो लोग चाय या कॉफी का सहारा लेते हैं। आमतौर पर धारणा है कि चाय और कॉफी सुस्ती उतारने और मस्तिष्क को एकाग्रता के साथ काम करने की ताकत देती है, लेकिन इसका असमय और अतिसेवन पूरे शरीर के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। ऐसे में आयुर्वेद के पास एक ऐसा समाधान है, जो कैफीन के स्वाद से बेहतर और शरीर के लिए लाभकारी है।आयुर्वेद में थकान और तनाव को तंत्रिकाओं से जोड़ कर देखा गया है। जब तंत्रिकाएं थक जाती हैं, तब आँखें बंद होने लगती हैं, नींद आने लगती है, काम करने का मन नहीं करता, और पूरा शरीर ही अपना संतुलन खो बैठता है। सिर से लेकर पैर तक शरीर सिर्फ और सिर्फ आराम मांगता है। ऐसे में हर्बल टी बहुत लाभकारी होती है, जो शरीर को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती है और याददाश्त को बढ़ाने में मदद करती है।हर्बल टी बनाने के लिए जटामांसी, ब्राह्मी और कैमोमाइल चाहिए। ये तीनों ही चीजें आसानी से बाजार में मिल जाती हैं। जटामांसी और ब्राह्मी जड़ी-बूटी हैं और कैमोमाइल एक औषधीय फूल है। इन तीनों को मिलकर पानी में उबाल लें और काढ़ा बना लें। इस मिश्रण को छानकर गुनगुना होने पर पीएं। ये शरीर को चुस्त और दुरुस्त रखने में मदद करेगा। ये तीनों मिलकर थकान को कम करती हैं और तंत्रिकाओं को आराम देती हैं, जिससे अच्छी नींद आती है।जटामांसी हृदय और चेतना को स्थिर करती है और मन को संतुलित रखती है। यह घबराहट और बेचैनी को कम करने में राहत देती है। इसमें मौजूद न्यूरो-रिलैक्सेंट यौगिक तंत्रिका तंत्र को शांत करते हैं और धीरे-धीरे शरीर को थकावट का अहसास कम होता है। वहीं ब्राह्मी मस्तिष्क में स्पष्टता और एकाग्रता लाती है। इसके साथ ही शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन कॉर्टिसोल और एड्रेनालाईन को संतुलित रखते हैं। ये दोनों हार्मोन ही शरीर में बेचैनी और तनाव को बढ़ाते हैं।इसके अलावा, कैमोमाइल में ऐसे गुण होते हैं जो नींद में सहायक होते हैं। ये मस्तिष्क को शांत करने के अलावा, गहरी नींद लाने में सहायक हैं। ये जानना भी जरूरी है कि हर्बल चाय का सेवन किस समय करना सही होता है। इसके लिए रात को सोने से पहले, या लगातार स्ट्रेस की स्थिति में इसको लेना अच्छा होता है। काम के समय एकाग्रता बढ़ाने के लिए भी टी का सेवन कर सकते हैं। इसकी लत चाय की तरह नहीं पड़ती है और ये पूरी तरह सुरक्षित हैं।

रात का हेल्थ बूस्टर है दूध:जानें सर्दी में कैसे करता है स्वास्थ्य की पूरी देखभाल
नई दिल्ली। घर के बड़े बुजुर्गों ने हमेशा कहा कि रात के समय दूध पीकर सोना चाहिए, लेकिन सिर्फ रात में दूध का सेवन क्यों करना चाहिए? आयुर्वेद में रात के समय दूध का सेवन करना लाभकारी बताया गया है। रात के समय दूध का सेवन नींद सुधारने में मदद करता है और शरीर की मरम्मत में लगने वाली ऊर्जा को भी बढ़ाता है। इसलिए रात को लिया गया दूध अमृत के समान है। दूध में ट्रिप्टोफैन, कैल्शियम, विटामिन्स, प्रोटीन और अच्छे फैट होते हैं और शरीर को नई ऊर्जा से भर देते हैं। अच्छी नींद लाने में सहायक हैं। शरीर को संतुलित करते हैं। शरीर का ओज बढ़ाते हैं और दिल और दिमाग को गहराई से शांत करते हैं। शीत ऋतु में रोजाना अगर रात के समय दूध का सेवन किया जाए तो शरीर को बहुत सारे लाभ होंगे।शीत ऋतु में वात बढ़ने की वजह से नींद में परेशानी होती है। इसके लिए दूध में हल्दी या जायफल को मिलाकर लें। इससे शरीर में मेलाटोनिन और सेरोटोनिन बढ़ने लगता है और मन और मस्तिष्क का तनाव कम होता है। गहरी नींद आती है और सुबह दोगुनी ऊर्जा के साथ शरीर काम करता है।दूध का सेवन हड्डियों और जोड़ों को मजबूत बनाता है। दूध में कैल्शियम, प्रोटीन, और कम मात्रा में विटामिन डी भी होता है, जो मांसपेशियों और हड्डियों को नई ऊर्जा देता है। कंधे और कमर दर्द में भी राहत मिलती है। इसके लिए दूध में चुटकीभर अजवाइन मिलाकर लेने से आराम मिलेगा।दूध स्किन पर ग्लो लाने का काम भी करता है। दूध के सेवन से चेहरे पर ओज तेज होता है। इसके लिए दूध में केसर मिलाकर लें। इससे कोलेजन बढ़ता है, रूखापन कम होता है और स्किन मुलायम बनती है। अगर शरीर में थकान और कमजोरी बनी रहती है तो रात के समय दूध में इलायची और मिश्री मिलाकर लें। इससे शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर एक्टिव रहता है। इलायची और मिश्री के सेवन से पेट भी साफ रहता है और पाचन अग्नि तेज होती है।इसके अलावा अगर ब्लड शुगर की परेशानी रहती है तो इसके लिए बिना हल्दी वाला दूध का सेवन करें। दूध में किसी तरह का मीठा न डालें। इससे शरीर में शर्करा की मात्रा नियंत्रित रहेगी और इंसुलिन नहीं बढ़ेगा।


