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sehat:वजन कंट्रोल से लेकर हड्डियों तक को मजबूत बनाता है मखाना वाला दूध, जानिए इसके फायदे
नई दिल्ली । आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बढ़ता वजन एक बड़ी चिंता बन चुका है। ऐसे में अगर कोई आसान उपाय मिल जाए, जो शरीर को नुकसान पहुंचाए बिना असर दिखाए, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है? भारतीय रसोई में मौजूद कुछ चीजें ऐसी हैं, जो वजन को कंट्रोल करने में मदद करती हैं। इनमें से एक है मखाना और दूध का कॉम्बिनेशन। मखाना (फॉक्स नट्स) को जब दूध के साथ मिलाकर लिया जाता है, तो यह एक सुपरफूड बन जाता है। विज्ञान के अनुसार, मखाना और दूध दोनों ही पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, और इनका साथ में सेवन शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है, खासकर वजन कंट्रोल करने में। दरअसल, मखाना में कैलोरी बहुत कम होती है, लेकिन इसमें प्रोटीन और फाइबर अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है और बार-बार भूख नहीं लगती।मखाना को दूध में उबालकर खाना फायदेमंद होता है, क्योंकि दूध में मौजूद प्रोटीन और कैल्शियम मखाने के फाइबर के साथ मिलकर शरीर के मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाते हैं। इससे शरीर का फैट तेजी से बर्न होता है और वजन धीरे-धीरे कम होने लगता है।विज्ञान के अनुसार, मखाना में एंटीऑक्सीडेंट्स भी पाए जाते हैं, जो शरीर में जमा हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। इसके अलावा, इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम और फास्फोरस जैसे मिनरल्स होते हैं, जो शरीर के संतुलन को बनाए रखते हैं। दूध में मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाता है, और जब यह मखाने के साथ लिया जाता है, तो इसका असर और भी बढ़ जाता है।मखाना वाला दूध सिर्फ वजन कंट्रोल नहीं करता, बल्कि यह दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद पोटैशियम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। इसके साथ ही यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में भी सहायक होता है।मखाना वाला दूध नींद की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए भी एक अच्छा विकल्प है। दूध में मौजूद ट्रिप्टोफैन नामक तत्व दिमाग को शांत करता है और अच्छी नींद लाने में मदद करता है। वहीं मखाना शरीर को रिलैक्स करता है, जिससे तनाव कम होता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है।इसके अलावा यह पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाता है। मखाने में मौजूद फाइबर कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है और पेट को साफ रखने में मदद करता है। वहीं दूध आंतों को पोषण देता है, जिससे पाचन प्रक्रिया बेहतर होती है। यह हड्डियों और दिमाग के विकास में सहायक होता है।

क्या है लेटेंट टीबी?: नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी, जानें लक्षण और बचाव
नई दिल्ली । टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो बैक्टीरिया माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरकुलोसिस के कारण होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। साथ ही दिमाग, हड्डी, किडनी और अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह हवा के जरिए फैलती है। अगर समय पर इलाज न किया जाए तो टीबी खतरनाक हो सकती है और जान भी ले सकती है। लेकिन टीबी की एक स्थिति ऐसी होती है, जिसमें टीबी के बैक्टीरिया शरीर में मौजूद होते हैं, लेकिन वे निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं।24 मार्च को हर साल विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद लेटेंट टीबी के बारे में जागरूक करता है। यह वह स्थिति है जिसमें टीबी के बैक्टीरिया शरीर में मौजूद होते हैं, लेकिन वे निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति में कोई लक्षण नहीं दिखते, न ही वह बीमार महसूस करता है और न ही वह दूसरों में संक्रमण फैलाता है।आयुर्वेद इंस्टीट्यूट के अनुसार, लेटेंट टीबी को सक्रिय टीबी रोग से अलग समझना जरूरी है। इसमें संक्रमित व्यक्ति टीबी का वाहक बना रहता है, लेकिन रोग नहीं फैलाता। हालांकि, अगर समय पर ध्यान न दिया जाए और इलाज न किया जाए, तो यह निष्क्रिय संक्रमण किसी भी समय सक्रिय टीबी में बदल सकता है, जो खांसी, बुखार, वजन घटना, रात में पसीना आना और थकान जैसे लक्षण पैदा करता है। लेटेंट टीबी आमतौर पर उन लोगों में पाई जाती है जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है, जैसे एचआईवी संक्रमित, डायबिटीज के मरीज, कैंसर रोगी, या जो लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं ले रहे हैं। छोटे बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका खतरा अधिक होता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में भर की बड़ी आबादी लेटेंट टीबी से संक्रमित है। भारत जैसे देश में यह संख्या और भी ज्यादा है। विशेषज्ञों का कहना है कि लेटेंट टीबी का पता लगाना और समय पर इलाज करना बहुत जरूरी है। आसान ब्लड टेस्ट या ट्यूबरकुलिन स्किन टेस्ट से इसका पता लगाया जा सकता है। अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो डॉक्टर आमतौर पर 3 से 9 महीने तक की दवा देते हैं, जिससे संक्रमण को सक्रिय होने से रोका जा सकता है।एक्सपर्ट के अनुसार, अगर परिवार में किसी को लंबी खांसी, बुखार या वजन घटने की शिकायत है, तो तुरंत जांच कराएं। लेटेंट टीबी को नजरअंदाज करने से बाद में सक्रिय टीबी हो सकती है, जो न सिर्फ व्यक्ति के लिए बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए खतरा बन सकती है।

नवरात्र विशेष :इम्युनिटी से बॉडी डिटॉक्स तक, व्रत में नींबू पानी है सेहत के लिए वरदान
नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र के इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ व्रत रखते हैं। व्रत के दौरान शरीर को ऊर्जा और पोषण की जरूरत होती है, लेकिन भारी भोजन से परहेज भी करना पड़ता है। ऐसे में नींबू पानी एक आसानी से बनाए जाने वाला, प्राकृतिक और सेहतमंद विकल्प है, जो व्रत में न केवल प्यास बुझाता है, बल्कि कई स्वास्थ्य लाभ भी देता है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय भी इस घरेलू नुस्खे को काफी फायदेमंद बताता है। सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में ताजा नींबू निचोड़कर पीना शरीर के लिए वरदान साबित होता है। नींबू में भरपूर विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट और साइट्रिक एसिड पाया जाता है, जो इम्यूनिटी को मजबूत करता है। व्रत के दिनों में शरीर कमजोर होने का खतरा रहता है, लेकिन नींबू पानी नियमित लेने से सर्दी-जुकाम, थकान और संक्रमण से बचाव होता है।व्रत में अक्सर पेट फूलना, गैस, अपच और कब्ज जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन गुनगुना नींबू पानी पाचन तंत्र को सक्रिय रखता है, एसिडिटी को कम करता है और आंतों को साफ करता है। इससे व्रत आसानी से पूरा होता है और शरीर हल्का महसूस होता है। साथ ही यह लिवर को डिटॉक्स करने में मदद करता है। व्रत के दौरान शरीर में जमा टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं, जिससे लिवर स्वस्थ रहता है और ऊर्जा बनी रहती है। नींबू पानी वजन नियंत्रण में भी सहायक है। व्रत में मीठे-तले भोजन से परहेज करने के बावजूद कई लोगों का वजन बढ़ जाता है।गुनगुना नींबू पानी मेटाबॉलिज्म बढ़ाता है, फैट बर्न करने में मदद करता है और भूख को नियंत्रित रखता है। व्रत के बाद भी इसे जारी रखने से वजन संतुलित रहता है। त्वचा के लिए भी यह रामबाण है। व्रत में पानी कम पीने से त्वचा रूखी हो सकती है। नींबू में मौजूद विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट मुंहासे, दाग-धब्बे कम करते हैं और चेहरा चमकदार बनाते हैं। नियमित सेवन से त्वचा जवां और स्वस्थ दिखती है।नींबू पानी बनाने का तरीका भी आसान है। इसके लिए एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़ें। स्वाद के लिए थोड़ा शहद मिला सकते हैं, लेकिन चीनी बिल्कुल न डालें। बहुत गर्म पानी न लें, सिर्फ गुनगुना ही इस्तेमाल करें। व्रत में फलाहार के साथ या दिन में 2-3 बार पी सकते हैं।

सेहत:गर्मियों में फाइबर का बेहतरीन स्रोत है कटहल, हृदय को देगा नई मजबूती
शीत ऋतु की विदाई और ग्रीष्मकाल के आगमन के साथ ही बाजारों में कटहल की उपलब्धता बढ़ जाती है। हालांकि, प्रत्येक क्षेत्र में इसे पकाने की विधियाँ भिन्न हो सकती हैं, किंतु स्वाद के मामले में इसका कोई सानी नहीं है। यद्यपि इसे काटना और बनाना थोड़ा मुश्किल कार्य हो सकता है, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि कटहल वास्तव में स्वास्थ्य का खजाना है। पोषक तत्वों की प्रचुरता के कारण इसे 'सब्जियों का सुपरफूड' भी कहा जा सकता है। विशेष रूप से, यह फाइबर का एक बेहतरीन और प्राकृतिक स्रोत है। आयुर्वेद में कटहल को भारी और चिकनाई वाली सब्जी माना गया है, जो शरीर के पोषण की जरूरतों को पूरा करता है। कटहल को अगर सही तरीके से पकाया जाए को यह शरीर में वात का संतुलन भी करता है लेकिन अगर पाचन अग्नि मंद है तो इसका सेवन कम से कम करें क्योंकि इसे पचाने में पेट को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। भारी और चिकनाई युक्त होने की वजह से इसके पाचन में लंबा समय लगता है।कटहल के सेवन के बहुत सारे लाभ होते हैं, और शुगर के मरीजों के लिए यह सब्जी एक बेहतर विकल्प है। इसका 'ग्लाइसेमिक इंडेक्स' कम होता है, जो रक्त में शर्करा की मात्रा को कम करता है। यह हृदय के लिए भी लाभकारी होती है और कोलेस्ट्रॉल को भी कम करने में मददगार है। इसमें पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है, जो हृदय से जुड़े रोगों के खतरे को कम करता है।कटहल में अधिक मात्रा में फाइबर भी होता है। अगर कब्ज या आंतों में गंदगी जमा रहती है, तो कटहल का सेवन आंतों को साफ करने में भी सहायक है। यह आंतों के लिए एक ब्रश की तरह काम करता है, जो गंदगी को जल्दी से जल्दी शरीर से बाहर निकालता है। पेट के साथ-साथ यह सब्जी सौंदर्य को बढ़ाने में भी लाभकारी है।इसमें मौजूद विटामिन ए और सी मिलकर स्किन और बालों को निखारने का काम करते हैं। इसके साथ ही कुछ लोगों को कटहल के सेवन में सावधानी बरतनी चाहिए। गैस या मंद पाचन वाले लोगों को इसका सेवन कम ही करना चाहिए। अगर शरीर में वात की अधिकता है, तो इसे कम मसालों के साथ बनाएं और सीमित मात्रा में ही खाएं।

पेट से जुड़े रोगों के लिए खा रहे हैं अजवाइन:सेवन की यह गलती बिगाड़ सकती है पाचन
नई दिल्ली । गलत खान-पान और शारीरिक गतिविधि के कम होने के कारण आज के समय में पेट से जुड़े विकार सबसे ज्यादा परेशान करते हैं। भूख का कम लगना या खाने के बाद पेट फूलना जैसी परेशानियां होने लगती हैं। पहले तो इन परेशानियों को छोटा समझकर नजर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन यहीं छोटी-छोटी दिक्कतें सेहत को बुरी तरीके से प्रभावित करती हैं। कई लोग रोग पाचन से जुड़ी परेशानियों से बचने के लिए रोजाना अजवाइन खाते हैं, लेकिन यह नहीं जानते हैं कि कैसे और कितनी मात्रा में अजवाइन खाना लाभकारी होता है।अजवाइन में थाइमोल नाम का यौगिक पाया जाता है, जो पाचन से जुड़ी परेशानियों में राहत देता है और इसकी गर्म तासीर सर्दी और खांसी से भी बचाती हैं। हालांकि अजवाइन का सेवन करने से पहले उसके सेवन का तरीका भी जान लेना जरूरी है। कुछ लोग अजवाइन को कच्चा ही खा लेते हैं और किसी भी समय खाली पेट या फिर रात के समय इसका सेवन बेधड़क करते हैं लेकिन यह तरीका बिल्कुल गलत है।अजवाइन को खाने से पहले हल्का भून लेना चाहिए। अजवाइन को इतना भूनना चाहिए कि उसके रंग में किसी तरह का परिवर्तन न हो लेकिन उसमें से हल्की-हल्की सुगंध आने लगे। ऐसे में आधे से कम चम्मच का सेवन करना चाहिए और सेवन भी हमेशा गुनगुने पानी के साथ करना करना चाहिए। गुनगुने पानी के साथ सेवन से अजवाइन के गुण बढ़ जाते हैं और पाचन तेजी से ठीक होता है। इससे पेट की जठराग्नि तेज होती है और भूख भी समय पर लगती है।अब सवाल है कि किस समय अजवाइन का सेवन करना लाभकारी है। कुछ लोग सुबह के वक्त खाली पेट अजवाइन का पानी या सूखी अजवाइन का सेवन करते हैं, लेकिन यह तरीका बिल्कुल गलत है। अजवाइन को हमेशा भोजन के बाद ही लेना चाहिए। खाना खाने के बाद तकरीबन आधे घंटे बाद गुनगुने पानी से इसका सेवन किया जा सकता है। ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि अजवाइन का सेवन तब ही करें जब पाचन में परेशानी हो, बिना परेशानी के उसे अपने दिनचर्या का हिस्सा न बनाएं। गर्म तासीर होने की वजह से यह पेट में जलन कर सकती है। इसलिए जब गैस और पेट फूलने की परेशानी हो, तभी इसका सेवन करें।

मोटापा सिर्फ बढ़ता वजन नहीं: कई बीमारियों की बड़ी वजह, आसान उपाय संग ऐसे करें कंट्रोल
नई दिल्ली। मोटापा अब सिर्फ दिखावे की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह हृदय रोग, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर समेत कई गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण बन चुका है। ऐसे में बढ़ती वजन की समस्या से परेशान लोगों को हेल्थ एक्सपर्ट कुछ आसान उपाय की सलाह देते हैं, जो मोटापे की समस्या को खत्म करने में कारगर हैं। नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के अनुसार, यह समस्या अब बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी उम्र के लोगों में तेजी से फैल रही है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जंक फूड का अधिक सेवन, शारीरिक गतिविधि की कमी, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना और अनियमित जीवनशैली मोटापे की मुख्य वजह बन गई है। बच्चे मोबाइल-टीवी पर ज्यादा समय बिताते हैं, जिससे उनकी शारीरिक सक्रियता कम हो जाती है। वहीं, बड़ों में ऑफिस की नौकरी, तनाव और फास्ट फूड की आदत ने मोटापे को और बढ़ावा दिया है।ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापा सिर्फ वजन बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर में सूजन पैदा करता है, इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ाता है और धमनियों में फैट जमा होने से हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एनएचएम ने लोगों को मोटापे से बचने के लिए कुछ आसान लेकिन प्रभावी उपाय बताए हैं।वास्तव में मोटापा एक ऐसी समस्या है, जिसे दवाइयों से ज्यादा जीवनशैली में बदलाव से नियंत्रित किया जा सकता है। अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, जोड़ों के दर्द और यहां तक कि अन्य गंभीर रोगों का कारण भी बन सकता है।इसके लिए रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम या शारीरिक गतिविधि करें। तेज चलना, साइकिल चलाना, योग या खेलकूद इसमें शामिल हो सकता है। संतुलित और पौष्टिक आहार लें। घर का बना खाना, ताजी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और कम तेल-चीनी का इस्तेमाल करें। जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएं। स्क्रीन टाइम को सीमित करें। खासकर बच्चों को टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर पर दो घंटे से ज्यादा समय न बिताने दें। पर्याप्त नींद लें। रात को 7-8 घंटे की अच्छी नींद मोटापे को नियंत्रित रखने में बहुत मदद करती है। एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाएं। लिफ्ट की बजाय सीढ़ियां चढ़ें, छोटे-छोटे काम खुद करें और बैठे रहने की आदत छोड़ें।

स्ट्रोक के लक्षणों को न करें नजरअंदाज:'बचाव' फॉर्मूला से बनेगी बात
नई दिल्ली । स्ट्रोक या ब्रेन अटैक एक गंभीर और जानलेवा स्थिति है। यह तब होता है जब मस्तिष्क तक खून पहुंचने में रुकावट आ जाती है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। ऐसे में हर मिनट मायने रखता है, क्योंकि जितनी जल्दी इलाज मिले, उतनी बेहतर रिकवरी की संभावना होती है। नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) स्ट्रोक के लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह देता है, क्योंकि समय पर पहचान और त्वरित कार्रवाई से जान बचाई जा सकती है। ऐसे में एनएचएम आसान और कारगर बचाव फॉर्मूला के बारे में जानकारी देता है। स्ट्रोक के मुख्य लक्षणों को याद रखने का सबसे आसान तरीका है 'बचाव'।स्ट्रोक में देरी मतलब मस्तिष्क में स्थायी नुकसान है। इसके लिए तुरंत अस्पताल पहुंचने से क्लॉट-बस्टिंग दवाएं या अन्य इलाज दिए जा सकते हैं, जो रिकवरी में मदद करते हैं। स्ट्रोक से बचाव के लिए ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें, धूम्रपान-शराब छोड़ें, नियमित व्यायाम करें और संतुलित आहार लें। वहीं, 'बचाव' फॉर्मूला लक्षणों को आसानी से समझाता है-ब मतलब बाजू (बाहों में कमजोरी): व्यक्ति से दोनों बाहें ऊपर उठाने को कहें। अगर एक बाजू नीचे गिर जाए या कमजोर लगे, तो यह स्ट्रोक का संकेत है।च मतलब चेहरा (चेहरा असमान): मुस्कुराने को कहें। अगर चेहरे का एक हिस्सा लटक जाए या असमान दिखे, तो ध्यान दें।आ मतलब आवाज (बोलने में कठिनाई): व्यक्ति से कोई सरल वाक्य बोलने या दोहराने को कहें। अगर आवाज अस्पष्ट, तुतलाती हो या बोलना मुश्किल हो, तो यह बड़ा खतरा है। व मतलब वक्त (समय): ऊपर के कोई भी लक्षण दिखें तो तुरंत समय बर्बाद न करें। 108 पर कॉल करें, एम्बुलेंस बुलाएं और नजदीकी अस्पताल (जहां सीटी स्कैन उपलब्ध हो, जैसे जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज) पहुंचें।हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार, ये लक्षण अचानक दिखते हैं और ज्यादातर शरीर के एक तरफ प्रभावित होते हैं। अन्य संकेतों में अचानक संतुलन बिगड़ना, आंखों में धुंधलापन या गंभीर सिरदर्द शामिल हो सकता है। स्ट्रोक को 'साइलेंट किलर' भी कहा जाता है, क्योंकि कभी-कभी बिना चेतावनी के आ जाता है, लेकिन 'बचाव' फॉर्मूला से 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में जल्दी पहचान संभव है।

ऐसी है बॉलीवुड की होली: :‘शो मैन’ ने सिखाया रंगों से खेलना, यश चोपड़ा और बच्चन का ट्रेडिशनल रंग और ‘वक्त’ ने होली संस्कार
नीलम अहिरवार (इंटरटेनमेंट डेस्क)। कहते हैं रंगों में इतनी ताकत होती है कि वह दो दुश्मनों को भी करीब लेकर आ जाता है। फिल्मों और फेस्टिवल का नाता तो काफी पुराना है। दिलीप कुमार और राज कुमार की फिल्म 'सौदागर' हो या फिर प्रियंका चोपड़ा और अक्षय कुमार की फिल्म 'वक्त', इस रंग भरे फेस्टिवल की चमक आज भी फिल्मों में देखने को मिलती है क्योंकि बॉलीवुड इंडस्ट्री में होली का त्योहार पारंपरिक उत्साह, संगीत और जीवंत रंगों के साथ मनाया जाता है. रील और रीयल लाइफ दोनों में यह प्यार, दोस्ती और मस्ती का प्रतीक है। जहां सितारे एक-दूसरे पर गुलाल लगाकर जश्न मनाते हैं। फिल्मों में तो होली का ग्रैंड सेलिब्रेशन तो हमने देखा ही है, लेकिन इंडस्ट्री में भी राज कपूर से लेकर अमिताभ बच्चन और समेत कई सितारे ऐसे हैं, जो अपने घरों में होली का सेलिब्रेशन बहुत ही धूमधाम से करते थे. राज कपूर की ऐतिहासिक होली बॉलीवुड के शोमैन के नाम से पहजाने जाने वाले राज कपूर की होली पार्टी की रौनक अलग होती थी। उनके आर के स्टूडियो में ढोल-नगाड़ों के साथ होली सेलिब्रेशन शुरू होता था। खुद राज कपूर साहब मेहमानों को अटैंड किया करते थे। राज कपूर की होली पार्टी पूरे बॉलीवुड इंडस्ट्री के लिए होती थी, क्योंकि ये होली पार्टियां सिर्फ सितारों तक ही सीमित नहीं थीं। हर डिपार्टमेंट से टेक्निशियन, प्रोडक्शन स्टाफ और क्रू इसका हिस्सा होते थे। एक दौर था, जब राज कपूर के आर के स्टूडियो में पूरा बॉलीवुड जमा होता था। खूब रंग-गुलाल उड़ता था, एक बड़ी सी पानी की टंकी हुआ करती थी, जिसमें खूब सारा रंग भरा होता था। जो मेहमान आता था उसे रंग भरी टंकी में डूबो दिया जाता था। खाने-पीने और नाच गाने का लंबा दौर चलता था। फिल्मी दुनिया की होली की जब भी बात होती है तो सबसे पहला नाम राज कपूर का ही आता है। आरके स्टूडियो में होने वाली होली के बारे में 55वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया के दौरान अपने परदादा की इस होली पार्टी के बारे में एक्टर रणबीर कपूर ने भी बताया था। उन्होंने कहा था कि उस वक्त वो बहुत छोटे थे और काले पीले रंगों में रंगे लोगों को देख वो काफी घबरा जाते थे। रणबीर ने कहा था, “मैं बहुत छोटा था तो मेरे लिए ये बहुत डरावना माहौल होता था। हर कोई काले और कई रंगों से रंगा होता था, सबको ऐसे ट्रंक में फेंका जा रहा है।” आरके स्टूडियो में होली पार्टी का सिलसिला साल 1998 तक चलता रहा। लेकिन राज कपूर के निधन के बाद ये पार्टी बंद हो गई। कहते हैं कि करीब 32 साल से इस स्टूडियो में होली रौनक देखने को नहीं मिली। निर्माता यश चोपड़ा की यादगार होली इंडस्ट्री के निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा को होली बेहद पसंद थी। 'सिलसिला' और ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ सहित कई यादगार फिल्में देने वाले यश चोपड़ा को होली खेलना बेहद पसंद था। इसका अंदाजा आप उनकी फिल्मों से भी लगा सकते हैं। यश चोपड़ा अपने ग्रैंड स्टूडियो 'यशराज' में होली पार्टी का आयोजन करते थे। उनकी होली पार्टी में अमिताभ बच्चन से लेकर रूमी जाफरी सहित बॉलीवुड सितारे तो शामिल होते ही थे। बड़े-बड़े बिजनेसमैन भी इसका हिस्सा बनते थे। हालांकि यश चोपड़ा के निधन के बाद उनके परिवार ने भी होली का ग्रैंड सेलिब्रेशन बंद कर दिया। 80 के दशक में महानायक के घर पर होती थी होली पार्टी सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के घर होने वाली होली पार्टी की अलग रौनक होती थी। अपने आइकॉनिक होली गीतों पर अमिताभ डांस करते थे। सभी मेहमानों को खुद जाकर बिग बी अटेंड करते थे। जिन-जिन सेलेब्स ने उस दौर में अमिताभ बच्चन की होली पार्टी अटेंड की थी, आज भी वो लोग उस पार्टी को याद करते हैं। वक्त बदला सितारों के रंग भी बदले और होली के रंग धीरे धीरे चुनिंदा परिवारों तक सीमित रह गई। जावेद और शबाना की ‘दिलवालों की होली’ लेखक और संगीतकार जावेद अख्तर और उनकी पत्नी शबाना आजमी के घर की होली का इंतजार हर किसी को रहता है। वहीं जावेद अख्तर और शबाना आजमी हर साल पूरी मस्ती के साथ होली खेलते हैं। इस होली के वीडियो सामने आते रहते हैं। यहां कपल सफेद कपड़े पहनते हैं, सिर पर पगड़ियां बांधते हैं। यही नहीं, जहां दोनों रंग में सराबोर है, वहीं एक दूसरे के खूब रंग भी लगा रहे हैं। वहीं बॉलीवुड इंडस्ट्री के जाने माने सितारे इनकी होली पार्टी में शामिल होते हैं। एकता कपूर और टीवी स्टार्स की होली बॉलीवुड की फेमस निर्माता-निर्देशक और टीवी इंडस्ट्री की क्वीन एकता कपूर कीहोली पार्टी टेलीविजन और बॉलीवुड इंडस्ट्री में बहुत मशहूर हैं, जो अक्सर उनके मुंबई स्थित आवास पर आयोजित की जाती हैं। यहां टीवी इंडस्ट्री के जाने माने सितारे मौजूद रहते हैं। पार्टी में डांस डीजे के साथ रंग गुलाल का फुल ऑन इंतजाम रहता है। यहां सितारे एक दूसरे के गिले शिकवे भूलकर एक साथ एक मंच पर होली खेलते नजर आते हैं। टीवी के अधिकतर सितारे एकता कपूर की होली पार्टी में शिरकत करना नहीं भूलते हैं। उनकी होली पार्टी की फोटोज भी देखने लायक होती हैं। अंकिता लोखंडे और विक्की जैन की महंगी पार्टीटीवी एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे और उनके पति विक्की जैन शादी के बाद से ही ग्रैंड होली पार्टी का आयोजन करते आ रहे हैं। उनकी होली पार्टी में टीवी सितारों का भी खूब मेला लगता है। बीते साल अंकिता-विक्की की होली पार्टी में 'बिग बॉस 17' स्टार्स ने भी शिरकत की थी। इनकी होली पार्टी में पूरा वीडियो शूट भी होता है जिसे अंकिता अपने ब्लॉग पर भी शेयर करती हैं। होली पार्टी की शुरूआत पूजा से होती फिर अंकिता अपने पति विक्की जैन को रंग लगाती हैं और सितारों का मेला भी शुरू हो जाता है। यहां जमकर मस्ती धमाल मचाया जाता है। अंकिता लोखंडे मुंबई के एक बड़े होटल में शानदार होली पार्टी रखती हैं। रवि दुबे और सरगुन मेहता की रंगीली होलीटीवी इंडस्ट्री के एक्टर और प्रोड्यूसर जोड़ी रवि दुबे और सरगुन मेहता भी हर साल ग्रैंड होली पार्टी का आयोजन करते हैं। वे अपने साथ काम कर चुके सितारों के साथ तो जश्न मनाते ही हैं, साथ ही इंडस्ट्री में मौजूद खास दोस्तों को भी न्योता देना नहीं भूलते। बीते साल रवि-सरगुन ने मुंबई में दोस्तों के साथ होली मनाई थी। वहीं टीवी की फेमस एक्ट्रेस रूपाली गांगुली यूं तो 'अनुपमा' के सेट पर ही सभी कलाकारों के साथ होली मना लेती हैं। लेकिन एक्ट्रेस घर पर भी पार्टी करने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। रुपाली गांगुली की होली पार्टी में परिवार के साथ-साथ खास दोस्त भी शामिल होते हैं। अंबानी परिवार की होली और बॉलीवुड का नाताअब बात उस परिवार की जिसकी हर पार्टी में शामिल होना हर किसी का सपना होता है। यहां स्टाइल और फैशन के साथ ही संस्कारों का रंग भी देखने को मिलता है। मुकेश अंबानी और नीति अंबानी की होली पार्टी लग्जिरियस होती है। यहां बॉलीवुड, टीवी, बिजनेस और क्रिकेट जगत के लोग शामिल होते हैं। इनकी पार्टी की बात की निराली होती है। आखिर इस दुनिया की सबसे महंगी होली पार्टी माना जाता है। दुनिया भर में अंबानी की पार्टीज की चर्चा कई दिनों तक होती है। इनकी पार्टी में स्टार्स फैशनेबल दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ते। भई यही तो मौका होता वर्ल्ड लेवल पर अपने रंगत बिखेरने का। आखिर आम लोगों के साथ ही सितारों में भी इस फेस्टिवल को सेलिब्रेट करने की उत्सुकता देखने को मिलती है। यही वो टाइम भी होता है, जब बी टाउन के सितारे एक से बढ़कर एक लैविश ड्रेस पहन हाई प्रोफाइल पार्टी अटेंड करते हैं।

प्रेग्नेंसी में इन फलों का करें सेवन: मां के साथ शिशु के लिए भी फायदेमंद
नई दिल्ली । मां बनना जीवन का सबसे खूबसूरत और भावुक अहसास है। गर्भावस्था के इस खास सफर में मां और गर्भस्थ शिशु दोनों की सेहत का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। सही और संतुलित पोषण इस दौरान नींव की तरह काम करता है। ऐसे में सेब, अनार, संतरा और केला का नियमित सेवन मां को एनर्जी देता है। शिशु के विकास को बढ़ावा देता है और दोनों को सेहतमंद रखता है। नेशनल हेल्थ मिशन के अनुसार, सही आहार मां की ताकत और बच्चे की अच्छी शुरुआत का आधार बनता है। इस दौरान कुछ फलों को रोजाना डाइट में शामिल करने से मां और बच्चे दोनों को भरपूर फायदा मिलता है। ये फल विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं, जो प्राकृतिक रूप से सेहतमंद रहने में मदद करते हैं।सेब गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। इसमें फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो पाचन सुधारते हैं और कब्ज से राहत देते हैं। नियमित सेवन से बच्चे के विकास में भी मदद मिलती है।अनार हीमोग्लोबिन बढ़ाने का बेहतरीन स्रोत है। यह आयरन, फोलेट और विटामिन से भरपूर होता है, जिससे एनीमिया का खतरा कम होता है। अनार का सेवन मां को एनर्जी देता है, ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करता है और बच्चे की ग्रोथ को सपोर्ट करता है। यह मॉर्निंग सिकनेस और थकान में भी राहत देता है।संतरा विटामिन सी का सबसे अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। यह इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है, संक्रमण से बचाता है और आयरन को एब्जॉर्ब करने में मदद करता है। संतरे में फोलेट भी होता है, जो बच्चे के ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड के विकास के लिए जरूरी है। यह हाइड्रेशन बनाए रखता है और क्रेविंग्स को कंट्रोल करता है।केला गर्भावस्था में आने वाली थकान और कमजोरी को दूर करने में मददगार और एनर्जी देता है। इसमें पोटैशियम, विटामिन बी6 और फाइबर भरपूर होता है, जो मसल क्रैंप्स रोकता है, ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखता है और पाचन सुधारता है। केला आसानी से पच जाता है। इन सुपरफ्रूट्स को रोजाना थाली में शामिल करने से मां को जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं। डॉक्टर की सलाह से इन्हें संतुलित मात्रा में खाएं।

स्वर्ग से आए इस पौधे में सुगंध के साथ हैं अनगिनत गुण:नींद से लेकर पाचन शक्ति बढ़ाने में करेगा मदद
नई दिल्ली । माना जाता है कि स्वर्ग से तीन फूलों को धरती पर भेजा गया था, जिसमें अपराजिता, पारिजात और मधुकामिनी शामिल हैं। तीनों ही फूल बेहतरीन खुशबू के लिए जाने जाते हैं, और खुशबू के साथ-साथ इन फूलों में अनगिनत औषधीय गुण भी हैं, जो सांस से लेकर त्वचा संबंधी परेशानियों में राहत देते हैं। आज हम बात करेंगे मधुकामिनी की, जो गर्मियों में ढेर सारे फूल देता है और जिसका रखरखाव भी आसान है।मधुकामिनी अपने नाम की तरह ही खूबसूरत और सुगंध देने वाला पौधा है। इनडोर होने की वजह से इसे आसानी से घर के अंदर लगाया जा सकता है, लेकिन बहुत कम लोग ही इसके औषधीय गुणों के बारे में जानते हैं। मधुकामिनी के सिर्फ फूल ही नहीं बल्कि पत्ते और जड़ों का इस्तेमाल आयुर्वेद में होता आया है। इसके फूलों की मनमोहक सुगंध मानसिक तनाव को कम करने में मदद करती है और हार्मोन को संतुलित करती है।मधुकामिनी की जड़ का पाउडर आसानी से बाजार में मिल जाता है। इसकी जड़ों से बना पाउडर शरीर के लिए टॉनिक की तरह काम करता है। अगर पेट या पाचन से जुड़ी परेशानी है तो इसकी जड़ी से पाउडर का प्रयोग किया जा सकता है। माना जाता है कि जड़ का पाउडर मंद पाचन अग्नि को तेज कर देता है।अगर गले में दर्द या खिचखिच की परेशानी है या फिर मौसम बदलने के साथ ही सांस लेने में परेशानी होती है, तब मधुकामिनी के फूलों को उबालकर काढ़ा बनाकर पीने की सलाह दी जाती है। इससे गला साफ होता है और अंदरुनी सूजन भी कम होती है। काढ़े में इसके पत्तों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इसके साथ ही अगर दांतों में दर्द या सूजन की समस्या होने पर इसके पत्ते चबाने से आराम मिलेगा। इसके पत्तों में सूजन रोधी गुण होते हैं, जो दर्द में राहत देने में मदद करते हैं।मधुकामिनी का परफ्यूम ऑयल का प्रयोग थेरेपी के लिए किया जाता है। जिन लोगों को तनाव या मानसिक थकान की वजह से नींद आने में परेशानी का सामना करना पड़ता है, उनके लिए मधुकामिनी का परफ्यूम ऑयल एक बेहतरीन ऑप्शन है।

गर्मियों में सेहत के लिए गेम चेंजर है लौंग:कैसे करना है है उपयोग, जानें शानदार टिप्स
नई दिल्ली। लौंग एक ऐसा मसाला है, जिसके उपयोग से खाने का स्वाद दोगुना हो जाता है। लौंग का इस्तेमाल सर्दियों में ज्यादा किया जाता है क्योंकि इसकी तासीर गर्म होती है और ये सर्दी और खांसी में आराम भी देती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि गर्मियों में भी लौंग का उपयोग कई बीमारियों से बचा सकता है? बशर्ते इसका सही प्रयोग पता होना चाहिए। विज्ञान और आयुर्वेद दोनों मानते हैं कि छोटी सी लौंग गर्मियों में शरीर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है, लेकिन कैसे, यह हम आपको बताएंगे।आयुर्वेद में लौंग को देवपुष्प कहा गया है। हालांकि इसकी तासीर गर्म मानी जाती है, लेकिन इसमें कुछ ऐसे गुण हैं जो विशेष परिस्थितियों में शरीर को ठंडक और शांति प्रदान करते हैं। अगर सही तरीके से लौंग का सेवन किया जाए तो गर्मी और लू जैसी परेशानियों से राहत पाई जा सकती है। लौंग की तासीर भले ही गर्म है, लेकिन इसके प्रभाव शीतलता देने वाले होते हैं। यह कफ, पित्त और रक्त दोषों को शांत करती है और शरीर में गर्मी का तापमान भी सही बनाए रखती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि लौंग का उपयोग आंखों के लिए बेहद लाभकारी है।लौंग की तासीर गर्म है, लेकिन वो फिर भी शरीर में पित्त को संतुलित करती है। अगर गर्मियों में बार-बार प्यास लगती है या फिर डिहाइड्रेशन होता है, तब भी लौंग का सेवन राहत देता है। लौंग के सेवन से मुंह में लार का उत्पादन तेजी से होता है, जिससे गर्मियों में मुंह सूखने की परेशानी कम होती है।गर्मियों में अक्सर पानी की कमी से मुंह में दुर्गंध की समस्या रहती है। सर्दियों की तुलना में गर्मियों में मुंह और पेट के अंदर बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं। ऐसे में लौंग बैक्टीरिया को कम करके ओरल हाइजीन को बनाए रखता है। इससे दुर्गंध की समस्या भी कम होती है। गर्मियों में भारी खाना कम पच पाता है क्योंकि पाचन अग्नि कम तीव्र होती है। ऐसे में जठराग्नि को संतुलित करने के लिए लौंग का सेवन करना जरूरी है। लौंग पाचन अग्नि को तेज कर खाने को पचाने में मदद करती है और पेट से संबंधित परेशानियों से भी राहत देती है।लौंग में मौजूद श्यूजेनॉलश् नाम का यौगिक पाया जाता है, जो शरीर को हर मौसम में संतुलित करने में मदद करता है। आयुर्वेद में इसलिए लौंग को नेचुरल कूलर माना गया है। इसके लिए रात को भिगोकर लौंग का सेवन करें और मिश्री के साथ भी लौंग ले सकते हैं।

सेहत:हानिकारक आधी रात में भोजन करना, मोटापा-तनाव की बनता है वजह
नई दिल्ली । बहुत से लोगों को आधी रात में भोजन करने की आदत होती है, उन्हें उसी समय कुछ न कुछ खाने की तलब लगती है। यह आदत न केवल मोटापा बढ़ाती है, बल्कि नींद खराब करती है और पाचन तंत्र को भी नुकसान पहुंचाती है। इससे पेट भले ही भर जाता हो मगर सेहत को यह कई समस्या दे सकता है। नेशनल हेल्थ मिशन ने लोगों को आधी रात में कुछ भी खाने से परहेज करने की सलाह देता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, देर रात या सोने से ठीक पहले भोजन करना या स्नैकिंग करना सेहत के लिए बहुत हानिकारक है। हेल्थ मिशन के मुताबिक, रात में शरीर को आराम और रिकवरी की जरूरत होती है न कि अतिरिक्त कैलोरी की। जब हम सोने के समय के करीब भोजन करते हैं, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। खाना ठीक से पच नहीं पाता और कैलोरी के रूप में जमा हो जाता है, जिससे वजन तेजी से बढ़ता है। इससे मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।देर रात स्नैकिंग नींद को भी बुरी तरह प्रभावित करती है। भारी या मीठा भोजन खाने से एसिड रिफ्लक्स, अपच और नींद में खलल की समस्या हो सकती है। अच्छी नींद न आने से थकान, चिड़चिड़ापन, कमजोर इम्युनिटी और मानसिक तनाव बढ़ता है। लंबे समय तक यह आदत डिप्रेशन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को भी न्योता दे सकती है।ऐसे में मोटापा रोकने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए एक्सपर्ट कुछ सरल सुझाव देते हैं, जैसे रात का खाना सोने से कम से कम 2-3 घंटे पहले खा लें। रात 8-9 बजे के बाद कुछ भी न खाएं, खासकर चिप्स, बिस्किट, चॉकलेट, आइसक्रीम या तला-भुना। अगर बहुत भूख लगे तो एक गिलास दूध ले सकते हैं। दिन में संतुलित भोजन करें, ताकि रात में भूख कम लगे। नियमित व्यायाम और समय पर सोने की आदत डालें।वजन कंट्रोल के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना बहुत जरूरी है। छोटी-छोटी आदतों में बदलाव से मोटापे को आसानी से रोका जा सकता है। देर रात भोजन करने की आदत छोड़कर बेहतर पाचन, गहरी नींद और फिट शरीर पाया जा सकता है।

खतरे की घंटी है बढ़ते ट्राइग्लिसराइड का स्तर: जानें क्या है बचने के लिए जरूरी कदम
नई दिल्ली। शरीर को ऊर्जा देने के लिए वसा बहुत जरूरी है। वसा ही शरीर में ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर काम करने की क्षमता को बढ़ाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही वसा जब रक्त में बढ़ जाती है तो ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ जाता है और यह पूरे शरीर के लिए खतरे की घंटी है। ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ना, मधुमेह, मोटापा, जोड़ों का दर्द और दिल की बीमारियों की शुरुआत है।आमतौर पर लोग ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल को एक ही मानकर चलते हैं, लेकिन ये दोनों रक्त में पाए जाने वाले दो अलग फैट्स हैं। ट्राइग्लिसराइड शरीर की कोशिकाओं में जमा होता है और शरीर को ऊर्जा देने का काम करता है। रक्त में मौजूद ट्राइग्लिसराइड का सही स्तर गुड कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखता है, शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस को बैलेंस करता है, शरीर के अंदर की इन्फ्लेमेशन को कम करता है, और मेटाबॉलिज्म को मजबूत करने में मदद करता है, जबकि कोलेस्ट्रॉल कोशिकाओं के निर्माण, हार्मोन और विटामिन बनाने में मदद करता है।अब जानते हैं कि शरीर में क्यों बढ़ता है ट्राइग्लिसराइड। ट्राइग्लिसराइड के बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। सामान्यत: शरीर में ट्राइग्लिसराइड का स्तर 150 एमजी/डीएल होना चाहिए। अगर स्तर ज्यादा है तो सावधानी बरतनी जरूरी है। यह मुख्यत: जरूरत से ज्यादा कार्बोहाइड्रेट खाने, मोटापा अधिक होने, जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड का सेवन, शारीरिक गतिविधि की कमी और शराब और तंबाकू के सेवन से होता है। ये सभी कारण ट्राइग्लिसराइड के स्तर को बढ़ाने में मदद करते हैं।ट्राइग्लिसराइड पर डॉक्टर दवा से स्तर को नीचे लाने का काम करते हैं, लेकिन आयुर्वेद में मौजूद कुछ तरीकों से ट्राइग्लिसराइड को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले आहार में कार्बोहाइड्रेट कम करें। अगर आप शारीरिक मेहनत कम करते हैं तो कार्बोहाइड्रेट कम खाएं। कार्बोहाइड्रेट गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, रागी और मिलेट में भी पाया जाता है।दूसरा, आहार में हेल्दी फैट्स को शामिल करें। जैसे देसी घी, मक्खन, सरसों का तेल, और एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल को आहार में शामिल कर सकते हैं। इसके साथ ही कम से कम 1 घंटा शारीरिक व्यायाम भी जरूरी है। रोजाना वॉक से लेकर एक्सरसाइज जरूर करें। बार-बार खाने की आदत भी ट्राइग्लिसराइड के स्तर को बढ़ाने में मदद करती है। इसलिए इंटरमिटेंट फास्टिंग करें। रोजाना खुद को 14-16 घंटे भूखा रखें।

पाचन से लेकर थायरॉयड तक:सेहत को भला चंगा रखती है विपरीतकरणी मुद्रा
नई दिल्ली । योगासन भारत की प्राचीन परंपरा है जो शारीरिक के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाती है। विपरीतकरणी मुद्रा एक ऐसी ही प्रैक्टिस है, जो पाचन तंत्र को मजबूत करने से लेकर थायरॉयड तक को नियंत्रित रखती है। इसके अभ्यास से स्वास्थ्य को कई लाभ मिलते हैं। मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा इस मुद्रा के अभ्यास से मिलने वाले स्वास्थ्य लाभ को गिनाते हुए विस्तार से जानकारी देता है। विपरीतकरणी मुद्रा एक ऐसी योग मुद्रा है जिसमें पैर दीवार की तरफ ऊपर करके लेटा जाता है और शरीर को उल्टे स्थिति में रखा जाता है। यह मुद्रा प्राण ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाने में मदद करती है और गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से शरीर के विभिन्न अंगों को लाभ पहुंचाती है।एक्सपर्ट के अनुसार, इसके नियमित अभ्यास से शरीर को कई लाभ मिलते हैं। इस मुद्रा से सबसे पहले पाचन तंत्र में सुधार होता है। यह पेट के अंगों की मालिश करती है, जिससे भोजन अच्छी तरह पचता है और पाचन क्रिया मजबूत होती है। कब्ज की समस्या को दूर करने में भी यह बहुत प्रभावी है। लंबे समय तक बैठे रहने या अनियमित खान-पान से होने वाली कब्ज से राहत मिलती है, क्योंकि मुद्रा आंतों में रक्त संचार बढ़ाती है।मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी यह मुद्रा फायदेमंद है। अभ्यास से मानसिक सतर्कता बढ़ती है, दिमाग शांत रहता है और एकाग्रता में सुधार होता है। तनाव और चिंता कम होने से व्यक्ति ज्यादा चुस्त-दुरुस्त महसूस करता है। त्वचा और बालों के लिए भी यह खास है। विपरीतकरणी मुद्रा से त्वचा में निखार आता है, क्योंकि चेहरे और सिर में रक्त प्रवाह बढ़ने से पोषण बेहतर मिलता है। साथ ही बालों से संबंधित समस्याएं भी दूर होती हैं, बाल मजबूत और चमकदार बनते हैं।विपरीतकरणी मुद्रा का एक और बड़ा लाभ थायरॉयड नियंत्रण है। इससे गर्दन के क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ता है, जिससे थायरॉयड ग्रंथि बेहतर काम करती है। हाइपोथायरॉयडिज्म जैसी समस्याओं में यह कारगर साबित हो सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार, इसके रोजाना अभ्यास से शरीर और मन दोनों में संतुलन बना रहता है। हालांकि, शुरुआत में 5-10 मिनट से अभ्यास करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। गर्भवती महिलाओं, हाई ब्लड प्रेशर या गंभीर समस्या वाले मरीजों को डॉक्टर या योग विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही अभ्यास करना चाहिए।

न करें ये लापरवाही:प्रसव के बाद मां-बच्चे की सही देखभाल है जरूरी
नई दिल्ली । प्रसव के बाद का समय मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद नाज़ुक और महत्वपूर्ण होता है। डिलीवरी के बाद अक्सर ध्यान सिर्फ बच्चे पर चला जाता है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि अगर मां स्वस्थ रहेगी तभी शिशु की सही देखभाल संभव है। इस समय थोड़ी-सी लापरवाही आगे चलकर मां और बच्चे दोनों की सेहत पर भारी पड़ सकती है, इसलिए प्रसवोत्तर देखभाल को हल्के में नहीं लेना चाहिए। डिलीवरी के बाद मां का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान शरीर की ताकत, खून और पोषक तत्व काफी हद तक कम हो जाते हैं। ऐसे में मां को पूरा आराम, सुकून भरा माहौल और परिवार का सहयोग मिलना बहुत जरूरी है। अत्यधिक काम करना, नींद पूरी न होने देना या मानसिक तनाव देना मां की रिकवरी को धीमा कर देता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय मां को चिंता, डर और तनाव से दूर रखना चाहिए क्योंकि इसका सीधा असर दूध बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है।खान-पान की बात करें तो प्रसव के बाद हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन बहुत जरूरी होता है। हरी सब्जियां, दालें, दूध और दूध से बनी चीजें, थोड़ी मात्रा में घी, दलिया, खिचड़ी जैसे भोजन शरीर को ताकत देते हैं और पाचन भी ठीक रखते हैं। आयुर्वेद में मेथी, जीरा, सौंफ, अदरक और शतावरी को बहुत लाभकारी माना गया है। ये न सिर्फ शरीर की कमजोरी दूर करते हैं बल्कि मां के दूध की मात्रा बढ़ाने में भी मदद करते हैं। बहुत ठंडा, बासी या तला-भुना खाना इस समय नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।शारीरिक देखभाल भी उतनी ही जरूरी है। डिलीवरी के बाद हल्की मालिश, गुनगुने पानी से स्नान और धीरे-धीरे किए गए हल्के व्यायाम शरीर को फिर से संतुलन में लाने में मदद करते हैं। पेट और कमर की मांसपेशियां धीरे-धीरे मजबूत होती हैं और दर्द में भी राहत मिलती है। लेकिन किसी भी तरह की जल्दबाजी या तेज एक्सरसाइज से बचना चाहिए।अक्सर लोग इस समय मां की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं, जो गलत है। हार्मोनल बदलाव के कारण मां को उदासी, चिड़चिड़ापन या थकान महसूस हो सकती है। ऐसे में परिवार का प्यार, समझदारी और सहयोग बहुत मायने रखता है। अगर समय रहते सही देखभाल की जाए तो यह दौर मां और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षित और सुखद बन सकता है।अब बात करें बच्चे की, तो जन्म के तुरंत बाद मां का पहला दूध (कोलोस्ट्रम) बच्चे के लिए अमृत के समान होता है। इसे किसी भी बच्चे को पिलाना चाहिए। पहले छह महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध देना सबसे अच्छा माना जाता है। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और वह स्वस्थ रहता है। बच्चे की साफ-सफाई, गर्माहट और समय-समय पर स्तनपान का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है।

वर्ल्ड कैंसर डे :बचाव संभव, इन आदतों से तौबा, तो इन्हें करें दिनचर्या में शामिल
नई दिल्ली । कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही आदतें अपनाकर और कुछ बुरी आदतों से पूरी तरह दूर रहकर इस बीमारी से बचा जा सकता है। हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर में कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने, इस बीमारी के कारणों को समझने और बचाव के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए समर्पित है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय कैंसर से बचाव के लिए कुछ आसान और प्रभावी सुझाव देता है, जिन्हें रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल कर लिया जाए तो जोखिम काफी कम हो सकता है। ये छोटी-छोटी आदतें अपनाकर न केवल कैंसर से बचा जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य भी बेहतर कर सकते हैं।मंत्रालय के अनुसार, कैंसर से बचाव के लिए सबसे जरूरी कदम है, सबसे पहले तंबाकू और इसके सभी उत्पादों (सिगरेट, गुटखा, बीड़ी, पान मसाला, हुक्का आदि) से पूरी तरह दूर रहें। तंबाकू कैंसर के सबसे बड़े कारणों में से एक है, खासकर मुंह, फेफड़े, गले और पेट के कैंसर का। दूसरा, शरीर का वजन संतुलित रखें। मोटापा कई तरह के कैंसर (स्तन, आंत, किडनी, गर्भाशय आदि) का जोखिम बढ़ाता है। इसलिए संतुलित वजन बनाए रखना बहुत जरूरी है। तीसरी जरूरी चीज है, नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधियां। रोजाना कम से कम 30-45 मिनट पैदल चलना, योग, साइकिलिंग या कोई भी शारीरिक व्यायाम कैंसर के खतरे को कम करता है। वहीं, फल, सब्जियां और पौष्टिक आहार का सेवन बढ़ाएं। रंग-बिरंगे फल-सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, नट्स और कम प्रोसेस्ड फूड खाने से शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स बढ़ते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में मदद करते हैं। कैंसर के बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहें। डॉक्टर की सलाह से समय पर स्क्रीनिंग जैसे मैमोग्राफी, पेप स्मीयर, कोलोनोस्कोपी करवाएं। शुरुआती स्टेज में कैंसर पकड़ में आ सकता है, जिससे इलाज आसान और सफल होता है।

मोरिंगा ऑयल:प्रदूषण और धूप से खराब स्किन पर असरदार, दाग-धब्बों को भी करे दूर
मुंबई । बदलती लाइफस्टाइल, प्रदूषण, धूप, तनाव और गलत खानपान का असर सबसे पहले चेहरे पर दिखाई देता है। झुर्रियां, एज स्पॉट्स, दाग-धब्बे और रूखी त्वचा जैसी परेशानियां अब कम उम्र की भी समस्या बनने लगी हैं। ऐसे में प्राकृतिक उपाय बेहद कारगर हैं, जिनमें मोरिंगा तेल बेहतर विकल्प है। मोरिंगा को आयुर्वेद में शोभांजन कहा जाता है। इसके पत्ते, फल, छाल और खासतौर पर इसके बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। मोरिंगा के सूखे बीजों से निकाला गया तेल बेहद पोषक माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, यह तेल त्वचा के दोषों को संतुलित करता है और शरीर के अंदर और बाहर दोनों स्तरों पर काम करता है।इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च एंड एप्लीकेशंस में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, मोरिंगा तेल में ओलिक एसिड, विटामिन ए, सी और ई, फ्लेवोनॉयड्स और पॉलीफेनॉल जैसे तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये सभी तत्व मिलकर त्वचा को पोषण देते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-एजिंग, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो त्वचा को भीतर से स्वस्थ बनाते हैं।एज स्पॉट्स, चेहरे पर पड़ने वाले काले धब्बे, अक्सर फ्री रेडिकल्स, धूप और कोलेजन की कमी के कारण होते हैं। मोरिंगा तेल इस समस्या पर सीधे काम करता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं। वहीं, विटामिन सी त्वचा में कोलेजन के निर्माण को बढ़ावा देता है, जिससे त्वचा की इलास्टिसिटी बनी रहती है और धब्बे कम होते हैं। तेल से हल्के हाथों से मसाज करने से त्वचा की गहराई तक पहुंचकर डार्क स्पॉट्स को हल्का करने में मदद मिलती है।आयुर्वेद में एज स्पॉट्स को पित्त दोष के असंतुलन से भी जोड़ा जाता है। मोरिंगा तेल में ठंडक देने वाले गुण होते हैं, जो त्वचा की गर्मी को शांत करते हैं और पित्त को संतुलन में लाने में सहायक होते हैं। इससे पिगमेंटेशन से बचाव होता है। नहाने के बाद या रात को सोने से पहले चेहरे पर इसकी कुछ बूंदों से मसाज करने पर त्वचा लंबे समय तक नरम और मुलायम बनी रहती है।एज स्पॉट्स के अलावा, मोरिंगा तेल त्वचा की कई दूसरी समस्याओं में भी राहत देता है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीसेप्टिक गुण मुंहासों, जलन और एलर्जी में मददगार माने जाते हैं। यह त्वचा की प्राकृतिक नमी को बनाए रखता है, जिससे रूखापन और खिंचाव कम होता है। फटे होंठों, बेजान त्वचा और सन डैमेज में भी इसका इस्तेमाल लाभकारी माना जाता है।

शरीर को वज्र की तरह मजबूत बना देगी हीरा भस्म:कैंसर, गठिया और दिल से जुड़े रोगों में भी लाभकारी
नई दिल्ली । आयुर्वेद में दुर्लभ जड़ी-बूटियों की सहायता से रोगों का इलाज कई सालों से होता आया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जड़ी-बूटियों के अलावा, प्राकृतिक धातुओं से भी इलाज संभव है? आयुर्वेद में विभिन्न धातुओं द्वारा तैयार की गई भस्मों से भी लंबे समय से इलाज होता आया है। हीरा भस्म, हीरक भस्म या व्रज भस्म को भी आयुर्वेद में दवा की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो शरीर के सभी दोषों (वात, पित्त और कफ) के असंतुलन को दूर करती है और शरीर के किसी भी अंग से संबंधित पुरानी बीमारियों को दूर किया जा सकता है।आयुर्वेद में हीरा भस्म एक महत्वपूर्ण औषधि है, जिसके सेवन से आयु और जीवन की गुणवत्ता में सुधार आता है और कुछ गंभीर बीमारियों में भी हीरा भस्म का इस्तेमाल सदियों से होता आया है, जैसे कैंसर, ट्यूमर, तपेदिक, मधुमेह, मोटापा और पुरानी एनीमिया की बीमारी से छुटकारा पाने में हीरा भस्म मदद करती है। आयुर्वेद में इसे 'वज्र भस्म' के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह शुद्ध हीरे से तैयार की जाती है। इस भस्म को शुद्ध हीरे और कुछ दुर्लभ जड़ी-बूटियों के कई बार शोधन के बाद तैयार किया जाता है।हीरे में कार्बन होता है, और इसमें रस सिंदूर और शुद्ध गंधक की बराबर मात्रा मिलाकर अच्छी तरह पीस लिया जाता है। फिर इसे एक डिब्बा बंद डिब्बे में हवा की अनुपस्थिति में गर्म किया जाता है, और इस प्रक्रिया को 14 बार दोहराया जाता है। इसकी एक ग्राम की कीमत हीरे की असल कीमत के कैलकुलेशन से तैयार की जाती है।हीरे के समान कीमती ये भस्म कई रोगों में काम आती है। यह हृदय रोगों के लिए लाभकारी है। अगर दिल ठीक से रक्त का प्रवाह नहीं करता है या रक्त धमनियां कमजोर हैं, तो हीरा भस्म दिल को मजबूती देता है। इस भस्म का उपयोग अस्थमा, मधुमेह, मोटापा, बांझपन और सूजन संबंधी बीमारियों के इलाज में किया जाता है।इसके अलावा, अगर रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तब भी हीरा भस्म टॉनिक की तरह काम करता है और शरीर में स्फूर्ति लाने में सहायक है। हीरा भस्म का इस्तेमाल कैंसर, गठिया और अस्थि मज्जा से जुड़े रोगों को दूर करने में भी होता आया है। ये प्राकृतिक रूप से स्मृति शक्ति बढ़ाकर मस्तिष्क को तेज बनाती है, जिससे एकाग्रता बढ़ती है। पुरुषों से जुड़ी शारीरिक कमजोरी में भी हीरा भस्म लाभकारी है।

सेहत: देसी घी में छिपा है सौंदर्य का खजाना, झुर्रियों और रूखी त्वचा से मिलेगी राहत
नई दिल्ली। आयुर्वेद में शुद्ध घी को अमृत कहा जाता है क्योंकि ये सिर्फ मन के लिए ही लाभकारी नहीं होता है, बल्कि तन को भी अनगिनत फायदे देता है। आंतों की कब्ज दूर करने से लेकर घी हड्डियों को मजबूती देता है, लेकिन क्या आज जानते हैं कि देसी घी त्वचा के लिए कितना फायदेमंद है? घी त्वचा को अंदर से पोषण देता है, ड्राइनेस कम करता है और नेचुरल ग्लो लाने में मदद करता है। सही मात्रा में उपयोग करने से स्किन हेल्दी और एजिंग सपोर्टेड रहती है।आयुर्वेद में घी को शीतल, स्निग्ध और रसायन माना गया है। घी वात और कफ को संतुलित रखने में भी मदद करता है, जो त्वचा से जुड़े रोगों के पीछे की सबसे बड़ी वजह होती है। घी त्वचा को गहराई से पोषण देता है और गंदगी को खत्म कर चेहरे की मृत कोशिकाओं को हटाकर ग्लो लाने में भी मदद करता है। खास बात ये है कि घी में एजिंग को रोकने की क्षमता होती है। चेहरे पर आने वाली झुर्रियों को कम करने के लिए घी का सेवन करना लाभकारी रहेगा।देसी घी त्वचा को नरम बनाता है और सर्दियों में होने वाले रूखेपन से भी बचाता है, लेकिन घी के सेवन का तरीका और कुछ सावधानियां जाननी भी जरूरी हैं। पहले ये जानते हैं कि घी का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। घी को सीमित मात्रा में भोजन में शामिल कर सकते हैं। सुबह और दोपहर के भोजन में घी का उपयोग आहार में किया जा सकता है। इसके अलावा, रात के समय घी को चेहरे के रूखे हिस्से पर भी लगाया जा सकता है।अब जानते हैं कि घी का प्रयोग करते हुए किन सावधानियों को बरतने की जरूरत है। अगर पाचन कमजोर है, तो एक सीमित मात्रा में ही घी का इस्तेमाल करें। अगर ऑयली स्किन है, तब भी घी का इस्तेमाल कम से कम करें क्योंकि ये मुहांसों और एक्ने का कारण बन सकता है। दिल से जुड़े रोगी और मधुमेह से पीड़ित लोगों को भी घी के सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। दिल से जुड़े रोगियों को कम चिकनाई खाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि घी कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है, जो दिल के रोगी के लिए खतरा है।

सेहत: सुबह के नाश्ते से रात के खाने तक, आपकी सेहत का भरोसेमंद साथी है दलिया
नई दिल्ली। सुबह की शुरुआत अगर हल्के, स्वादिष्ट और सेहतमंद नाश्ते से हो जाए तो पूरा दिन अच्छा निकलता है। ऐसे में दलिया एक ऐसा भोजन है, जो सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक आपकी सेहत का भरोसेमंद साथी बन सकता है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर जंक फूड या बाहर का तला-भुना खाना खा लेते हैं जो पेट और सेहत दोनों के लिए नुकसानदायक होता है, लेकिन अगर आप रोज के खाने में दलिया शामिल कर लें, तो यह शरीर को जरूरी पोषण देने के साथ-साथ आपको कई बीमारियों से भी बचाने में मदद करता है। दलिया पचने में हल्का होता है और पेट पर बोझ नहीं डालता, इसलिए इसे किसी भी समय खाया जा सकता है।दलिया में भरपूर मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं जो पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं। नियमित रूप से दलिया खाने से कब्ज, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में काफी राहत मिलती है। यही वजह है कि डॉक्टर और आयुर्वेद विशेषज्ञ भी इसे रोजाना खाने की सलाह देते हैं।अगर वजन कम करना चाहते हैं तो दलिया आपके लिए बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि यह कम कैलोरी वाला भोजन है और लंबे समय तक पेट भरा रखता है। इससे बार-बार भूख नहीं लगती और आप ओवरईटिंग से बचते हैं।दलिया दिल की सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और जरूरी पोषक तत्व कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं, जिससे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम होता है। डायबिटीज के मरीजों के लिए भी दलिया अच्छा विकल्प है, क्योंकि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने नहीं देता। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों के लिए दूध वाला दलिया ऊर्जा देने वाला आहार है, जबकि सब्जियों या दाल के साथ बना नमकीन दलिया लंच या डिनर के लिए परफेक्ट रहता है। रात के खाने में हल्का दलिया खाने से नींद भी अच्छी आती है और पेट साफ रहता है। बस ध्यान रखें कि इसमें ज्यादा तेल-मसाले न डालें।

सेहत :ब्रेन फॉग कहीं दिल की बीमारी का संकेत तो नहीं? जानें वैज्ञानिक कारण
नई दिल्ली । आज की तेजतर्रार जिंदगी में अक्सर लोग थकान, तनाव और भूलने की आदत को आम परेशानी मान लेते हैं। लेकिन, कभी‑कभी यह केवल मानसिक थकान नहीं होती, बल्कि यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। कई डॉक्टर मानते हैं कि बार‑बार ध्यान भटकना, नाम भूलना या दिमाग का भारी लगना सिर्फ दिमाग की कमजोरी नहीं, बल्कि दिल की बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। हार्ट डिजीज हमेशा सीने में दर्द या सांस फूलने के जरिए ही सामने नहीं आती। कई बार यह धीरे‑धीरे दिमाग के लक्षणों के जरिए सामने आती है। ब्रेन फॉग दिमाग की उस हालत को कहते हैं जब आपको चीजें याद नहीं रहतीं, सोचने में दिक्कत होती है, और आप खुद को थोड़ा सुस्त महसूस करते हैं। अक्सर लोग इसे उम्र बढ़ने या तनाव का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।दिमाग और दिल के बीच गहरा संबंध है। जब दिल सही से काम करता है, तो दिमाग भी सही ढंग से काम करता है और जब दिल कमजोर होता है, तो दिमाग भी थक जाता है। यही वजह है कि ब्रेन फॉग सिर्फ दिमाग की समस्या नहीं, बल्कि दिल की बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। इसे पहचानना, जांच कराना और समय पर इलाज शुरू करना बेहद जरूरी है।डॉक्टर बताते हैं कि यह केवल सतही कमजोरी नहीं होती, बल्कि कई मामलों में दिमाग तक पहुंचने वाले ब्लड सर्कुलेशन में कमी का कारण होती है। जब दिल ठीक से ब्लड पंप नहीं करता, तो दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे मेमोरी, फोकस, और सोचने‑समझने की क्षमता प्रभावित होती है।जनरल ऑफ सेरेब्रल ब्लड फ्लो एंड मेटाबॉलिज्म में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दिल की हल्की कमजोरी भी दिमाग तक ब्लड फ्लो घटा सकती है। इसका असर सीधे याददाश्त, ध्यान और सोचने-समझने की क्षमता पर पड़ता है। अगर आप अक्सर भूलते हैं, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते या सोचने में सुस्ती महसूस करते हैं, तो यह सिर्फ दिमाग की समस्या नहीं, बल्कि दिल की चेतावनी भी हो सकती है।ऐसे में अपने दिल की जांच कराएं। छोटे‑छोटे बदलाव जैसे ब्लड प्रेशर, हार्ट रेट या ब्लड फ्लो का निरीक्षण करना आपके लिए बड़े फायदे ला सकता है।

हिन्दू धर्म के लिए बेहद खास है माघ शुक्ल पक्ष की सप्तमी:सूर्य और देवी उपासकों को सभी कष्टों से मिलती है मुक्ति
नई दिल्ली। माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि धार्मिक दृष्टि से बेहद खास है। गुप्त नवरात्रि के सातवें दिन के साथ ही इस दिन सूर्य देव की आराधना को समर्पित भानु सप्तमी की विशेष तिथि भी पड़ रही है, जो सूर्य और देवी उपासकों के लिए बेहद खास है। 25 जनवरी को भानु सप्तमी का पर्व है। यह दिन सूर्य देव की विशेष आराधना का है, जब रविवार और शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का संयोग बनता है तो उसे भानु सप्तमी या रवि सप्तमी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव की पूजा-पाठ विशेष तौर पर फलित होती है और सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और करियर में उन्नति मिलती है। साथ ही शारीरिक-मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।रविवार को गुप्त नवरात्रि का सातवां दिन भी है। गुप्त नवरात्रि माघ मास में शुक्ल पक्ष में शुरू होती है, जिसमें देवी की गुप्त साधना की जाती है। यह नवरात्रि तंत्र-मंत्र साधकों के लिए विशेष महत्व रखती है। रविवार को भानु सप्तमी पड़ने से यह दिन और भी पुण्यकारी हो गया है।भानु सप्तमी पर सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है। स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देने, लाल चंदन, रोली, लाल फूल, गुड़, चावल और जल से पूजा करने का विधान है। इसके साथ ही साधक को ओम ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः, घृणि सूर्याय नमरू, सूर्य देवताभ्याम नमरू मंत्र का का कम से कम 108 बार जप करना चाहिए। पूजा के बाद अपनी क्षमता अनुसार दान जैसे गुड़, गेहूं, लाल वस्त्र या तांबे का दान करना शुभ माना जाता है।धार्मिक मान्यता है कि भानु सप्तमी पर सूर्य देव की भक्ति से जातक को नया ऊर्जा मिलती है। करियर में प्रगति होती है, रोगों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। गुप्त नवरात्रि के दिन देवी साधना के साथ सूर्य पूजा करने से दोहरी शक्ति मिलती है।दृक पंचांग के अनुसार, रविवार को शुक्ल सप्तमी तिथि रात 11 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। रेवती नक्षत्र दोपहर 1 बजकर 35 मिनट तक है, उसके बाद अश्विनी शुरू होगा। चंद्रमा मीन राशि में संचार करेंगे। वहीं, सूर्योदय 7 बजकर 13 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर 54 मिनट पर होगा।किसी भी शुभ या नए कार्य से पहले मुहूर्त का विचार महत्वपूर्ण है। रविवार को राहुकाल दोपहर 4 बजकर 34 मिनट से 5 बजकर 54 मिनट तक रहेगा, इस दौरान कोई शुभ कार्य न करें। अन्य अशुभ समय जैसे यमगंड दोपहर 12 बजकर 34 मिनट से 1 बजकर 54 मिनट तक और गुलिक काल दोपहर 3 बजकर 14 मिनट से 4 बजकर 34 मिनट तक है।पंचांग के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 26 मिनट से 6 बजकर 19 मिनट तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 12 मिनट से 12 बजकर 55 मिनट तक है।

कोई साधारण फल नहीं है सिंघाड़ा:बीपी और थायरॉइड की समस्या से निजात दिलाने में कारगर
नई दिल्ली । सर्दियों में सिंघाड़ा के सेवन का खासा महत्व है। लोग इसे कच्चा खाते हैं, उबालकर नमक-मिर्च के साथ चटखारे लेते हैं, भूनकर या फिर सिंघाड़े के आटे से हलवा, पूरी और पकौड़े बनाते हैं। स्वाद के साथ-साथ यह फल औषधीय गुणों से भी भरपूर है। सिंघाड़े में आयोडीन, पोटेशियम, मैंगनीज, फाइबर और विटामिन जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो थायरॉइड को सपोर्ट करते हैं, पानी की अधिकता कम करते हैं, ब्लड प्रेशर संतुलित रखते हैं और पेट को आराम देते हैं।सेलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट पूजा मखीजा ने सिंघाड़े (वाटर चेस्टनट) के एक खास और दिलचस्प स्वास्थ्य लाभ पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि सिंघाड़ा देखने में छोटी थायरॉइड ग्लैंड जैसा दिखता है और मजेदार बात यह है कि इसके पोषक तत्व भी थायरॉइड के कार्य को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं।सिंघाड़े में आयोडीन, पोटेशियम और मैंगनीज जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। आयोडीन थायरॉइड हार्मोन बनाने के लिए जरूरी होता है, जबकि मैंगनीज और पोटेशियम टी4 हार्मोन को सक्रिय टी3 हार्मोन में बदलने की प्रक्रिया में मदद करते हैं। यह परिवर्तन थायरॉइड फंक्शन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बेहद आवश्यक है। कई लोगों को थायरॉइड संबंधी समस्याएं होने पर यह जानकारी उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि सिंघाड़ा एक प्राकृतिक और आसानी से उपलब्ध फल है।इसके अलावा, सिंघाड़ा शरीर में अतिरिक्त पानी जमा होने को कम करने में भी कारगर होता है। यह खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो थायरॉइड की वजह से सूजन या भारीपन महसूस करते हैं। पोटेशियम की अच्छी मात्रा ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में सहायता करती है, जिससे हृदय स्वास्थ्य को भी फायदा पहुंचता है।सिंघाड़ा पेट के लिए भी आरामदायक होता है। यह हल्का होने के कारण पाचन तंत्र को सुधारता है और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है। सिंघाड़ा सर्दियों में आसानी से मिलने वाला एक साधारण फल है, लेकिन इसके स्वास्थ्य लाभ काफी हैं। इसे कच्चा खाया जा सकता है, उबालकर, भूनकर या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजनों में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी स्वास्थ्य समस्या के मामले में डॉक्टर से सलाह लेना उचित रहता है।

बसंत पंचमी:बुद्धि-विद्या की देवी माता सरस्वती की आराधना का दिन, मां को सबसे प्रिय हैं पीली वस्तुएं
नई दिल्ली। बसंत पंचमी हिंदू कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन ज्ञान, संगीत, कला और विद्या की देवी माता सरस्वती को समर्पित है। बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक होने के साथ ही यह श्री पंचमी या सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अज्ञानता, आलस्य और सुस्ती से मुक्ति पाने के लिए मां सरस्वती की उपासना करते हैं। कई जगह छोटे बच्चों का बसंत पंचमी के दिन ही पहला अक्षर लिखवाने या विद्या आरंभ की परंपरा है। वहीं, स्कूलों में सुबह सरस्वती पूजा का आयोजन होता है। दृक पंचांग के अनुसार, 22 जनवरी की देर रात 1 बजकर 46 मिनट पर पंचमी तिथि शुरू होगी और अगले दिन तक रहेगी। नक्षत्र पूर्व भाद्रपद दोपहर 2 बजकर 33 बजे तक है, उसके बाद उत्तर भाद्रपद शुरू होगा। चंद्रमा कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्योदय 7 बजकर 13 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर मिनट पर होगा। पूरे दिन पंचक रहेगा।वहीं, राहुकाल सुबह 11 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक है। इस दौरान कोई भी शुभ या नया कार्य न करें। अन्य अशुभ समय में यमगंड 3 बजकर 13 मिनट से 4 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक माना गया है। यह समय स्वयं सिद्ध मुहूर्त है, जिसमें पूजा करना अत्यंत फलदायी होता है।शुक्रवार को ब्रह्म मुहूर्त 5 बजकर 26 मिनट से 6 बजकर 20 मिनट तक, अभिजीत मुहूर्त 12 बजकर 12 मिनट से 12 बजकर 54 मिनट तक और विजय मुहूर्त 2 बजकर 20 मिनट से 3 बजकर 2 मिनट तक है।बसंत पंचमी पर माता सरस्वती की उपासना का विशेष विधान है। सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले रंग के) पहनें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। लकड़ी की चैकी पर पीला वस्त्र बिछाकर मां सरस्वती का ध्यान करें। सबसे पहले गणपति की पूजा पहले करें। मां को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर चंदन, रोली, कुमकुम, अक्षत और सिंदूर का तिलक लगाएं। पीले फूलों की माला, आम के पत्ते और शृंगार सामग्री अर्पित करें। पुस्तकें, कलम और वाद्य यंत्र उनके समक्ष रखें। पूजन के बाद ओम ऐं सरस्वत्यै नमः का कम से कम 108 बार जप करें। माता की आरती उतारें और भोग लगाएं।मां सरस्वती को पीले रंग की चीजें प्रिय हैं। भोग में केसर युक्त हलवा, मालपुआ, बूंदी के लड्डू, केसरिया चावल, दूध से बनी मिठाई, तिल के लड्डू, पके केले, नारियल और पीली मिठाई, मालपुआ चढ़ाएं। फल, पीले फूल और गुलाल उनके चरणों में जरूर लगाएं।

स्वास्थ्य: हर बीमारी का इलाज आयुर्वेदिक औषधीय गोंद, जानें कब किसका करें सेवन
नई दिल्ली । औषधीय गोंद एक प्रकार का प्राकृतिक रेजिन है जो विभिन्न पेड़-पौधों से निकलता है, जिसे सदियों से आयुर्वेद और हर्बल दवाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह शरीर की कई समस्याओं में लाभकारी है और इसका सही इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होता है। अलग-अलग गोंद अलग-अलग बीमारियों में काम आते हैं और शरीर की कमजोरी, पाचन, हड्डियों की ताकत, त्वचा और इम्यूनिटी सुधारने में मदद करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं कतीरा गोंद की। यह गर्मी से होने वाली कमजोरी, पेशाब की जलन और कब्ज में बहुत फायदेमंद है और शरीर की गर्मी को ठंडा करता है। बबूल गोंद हड्डियों को मजबूत बनाता है, महिलाओं में प्रसव के बाद कमजोरी दूर करता है और कमर या जोड़ों के दर्द में राहत देता है। गोंदनी या करया गोंद कब्ज में लाभकारी है, मोटापा कम करने में मदद करता है और पाचन को बेहतर बनाता है।धावडा गोंद शरीर को मजबूती देने, घाव भरने व ऊर्जा प्रदान करने का काम करता है। मोरिंगा या सहजन गोंद हड्डियों की कमजोरी दूर करता है, इम्यूनिटी बढ़ाता है और शरीर की थकान दूर करता है। आम का गोंद पेट के रोग, दस्त और कमजोरी में सहायक है। नीम का गोंद त्वचा के रोग, खून साफ करने और फोड़े-फुंसी में लाभ देता है। पीपल का गोंद खांसी, दमा और गले की समस्याओं में मददगार है।बरगद का गोंद महिलाओं की सफेद पानी की समस्या, कमजोरी और रक्तस्राव रोकने में फायदेमंद है। बेल का गोंद दस्त, पेचिश और पेट की गर्मी को कम करता है और आंतों को मजबूत बनाता है। गुग्गुल गोंद जोड़ों के दर्द, गठिया और मोटापे में लाभकारी है और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता है। लोबान गोंद मानसिक शांति देता है, सिरदर्द और सूजन व दर्द में राहत देता है।राल गोंद घाव भरने, त्वचा रोग और सूजन में मदद करता है। शल्लकी गोंद आर्थराइटिस, जोड़ों की सूजन और मांसपेशियों के दर्द में काम आता है। हींग का गोंद गैस, अपच और पेट दर्द में लाभकारी है। अर्जुन का गोंद हृदय रोग, हाई बीपी और दिल की कमजोरी में सहायक है। अशोक का गोंद स्त्री रोग, अनियमित मासिक धर्म और अधिक रक्तस्राव में लाभ देता है।इसके अलावा, साल गोंद घाव, सूजन और त्वचा की समस्या में काम आता है। खैर का गोंद मुंह के छाले, दस्त और खून बहना रोकने में फायदेमंद है। इमली का गोंद पेट की गर्मी कम करता है, कब्ज में मदद करता है और पाचन सुधारता है। हर गोंद का अपना अलग फायदा है और इसे सही मात्रा में इस्तेमाल करने पर यह शरीर की कई छोटी-बड़ी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है। हालांकि इन औषधीय गोंदों को अपने आहार या इलाज में शामिल करने से पहले योग्य आयुर्वेदाचार्य की सलाह लेना जरूरी है।

सुबह के नाश्ते से बनती है पूरे दिन की एनर्जी:इन चीजों से दें शरीर को भरपूर ताकत
नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर सुबह के नाश्ते को छोड़ देते हैं, लेकिन आयुर्वेद और विज्ञान दोनों ही मानते हैं कि सुबह का नाश्ता हमारे पूरे दिन की सेहत तय करता है। रात की 8 से 10 घंटे की नींद के बाद हमारा शरीर लंबे फास्ट से बाहर आता है। इस दौरान शरीर की ऊर्जा लगभग खत्म हो चुकी होती है और दिमाग को भी सही तरीके से काम करने के लिए पोषण की जरूरत होती है। अगर इस समय सही और पौष्टिक नाश्ता न मिले, तो दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और बार-बार भूख लगने जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।आयुर्वेद के अनुसार, सुबह का समय शरीर में अग्नि यानी पाचन शक्ति को धीरे-धीरे जगाने का होता है। ऐसे में भारी या बहुत तला-भुना खाना नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि पोषक तत्वों से भरपूर और आसानी से पचने वाला नाश्ता शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है। विज्ञान कहता है कि सुबह उठने के एक से डेढ़ घंटे के भीतर संतुलित नाश्ता करने से ब्लड शुगर लेवल स्थिर रहता है और मेटाबॉलिज्म एक्टिव होता है। ऐसे में कुछ खास फूड्स हैं, जो कम मात्रा में भी शरीर को भरपूर ताकत दे सकते हैं।सुबह के नाश्ते में कद्दू के बीज और चिया सीड्स जैसे बीजों का सेवन शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। कद्दू के बीज में प्रोटीन, जिंक, मैग्नीशियम और आयरन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, ये बीज शरीर की कमजोरी दूर करने में मदद करते हैं और नसों को मजबूत बनाते हैं। विज्ञान के मुताबिक, कद्दू के बीज दिल की सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं और इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं। वहीं चिया सीड्स फाइबर और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं। ये पेट में जाकर पानी सोख लेते हैं, जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करता है और बार-बार भूख नहीं लगती। यही कारण है कि यह वजन कंट्रोल करने में भी मददगार माने जाते हैं। चिया सीड्स आंतों की सफाई करते हैं।अगर आप ठोस नाश्ता पसंद करते हैं, तो बेसन यानी चने के आटे से बना नाश्ता एक बेहतरीन विकल्प है। आयुर्वेद में चना बलवर्धक माना गया है, यानी यह शरीर को ताकत देने वाला होता है। बेसन में मौजूद प्रोटीन मांसपेशियों को ऊर्जा देता है, जबकि फाइबर पाचन को दुरुस्त रखता है। सुबह बेसन से बना चीला खाने से शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा मिलती है और भूख कंट्रोल में रहती है। विज्ञान के अनुसार, बेसन धीरे-धीरे पचता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल संतुलित रहता है और डायबिटीज का खतरा भी कम होता है। सब्जियों के साथ बनाया गया बेसन चीला शरीर को विटामिन और मिनरल्स भी देता है।वहीं ग्रीक योगर्ट सुबह के नाश्ते को और भी खास बना देता है। ग्रीक योगर्ट सामान्य दही की तुलना में ज्यादा गाढ़ा और प्रोटीन से भरपूर होता है। आयुर्वेद में दही को पाचन के लिए उपयोगी माना गया है, बशर्ते इसे सही समय और सही तरीके से खाया जाए। ग्रीक योगर्ट में मौजूद प्रोबायोटिक्स पेट के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है।

कैल्शियम से भरपूर है शंख भस्म:हड्डियों और जोड़ों को देती है नया जीवन
नई दिल्ली । आयुर्वेद में उपचार के लिए सदियों से दुर्लभ जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता आया है। जड़ी-बूटियों के गुण बड़े से बड़े रोग से मुक्ति दिलाने की शक्ति रखते हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि आयुर्वेद में भस्म के जरिए भी रोगों को दूर करने का काम पहले से होता आया है। हम बात कर रहे हैं शंख भस्म की, जिसे आयुर्वेद में चमत्कारी भस्म के नाम से जाना जाता है।शंख भस्म एक आयुर्वेदिक औषधि है जिसका उपयोग एसिड रिफ्लक्स जैसी समस्याओं के उपचार में किया जाता है। इसमें अम्लरोधी गुण होते हैं जो सीने में जलन और दर्द जैसे लक्षणों से राहत प्रदान करते हैं। रसशास्त्र में शंख को शुद्ध वर्ग के अंतर्गत एक खनिज के रूप में वर्णित किया गया है। शंख भस्म आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा दैनिक अभ्यास में उपयोग की जाने वाली महत्वपूर्ण भस्मों में से एक है।शंख भस्म का उपयोग पेट से जुड़े विकारों से लेकर हड्डियों और जोड़ों के विकारों को ठीक करने में किया जाता है, लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये है कि बिना चिकित्सक के शंख भस्म का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इसे सीधा खाया नहीं जाता है, बल्कि किसी न किसी चीज में मिक्स कर इसका सेवन किया जाता है। ये स्वाद में तीखी होती है और रोग के अनुसार इसके सेवन की मात्रा तय की जाती है।अगर पेट की पाचन अग्नि कमजोर हो गई है, पेट में दर्द रहता है, गैस बनने की वजह से उल्टी की परेशानी या सिर में दर्द होता है, तो शंख भस्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। शंख भस्म पाचन अग्नि को रीसेट करती है, जिससे खाना अच्छे से पचता है और पाचन की प्रक्रिया में सुधार आता है।शंख भस्म मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट होता है। यह हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने, ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने और दांतों की मजबूती को बनाए रखने में मदद करता है। अगर शरीर में कैल्शियम की कमी है, तब भी शंख भस्म का सेवन किया जा सकता है, लेकिन गर्भवती महिलाएं सेवन से पहले चिकित्सक की सलाह जरूर लें।शंख भस्म शरीर में वात और कफ दोषों को संतुलित करने का काम भी करती है। अगर ये दोनों ही दोष शरीर में असंतुलित हैं तो कई बीमारियों का जन्म होता है। इससे पेट से लेकर स्किन से जुड़ी परेशानियां होने लगती हैं। इसके अलावा, चेहरे के मुहांसों और दाग धब्बों से छुटकारा पाने के लिए भी शंख भस्म का लेपन और सेवन कर सकते हैं।

कम उम्र में सफेद बाल बन रहे हैं परेशानी? :सौंफ देगा बालों को नेचुरल हेयर कलर
नई दिल्ली । आज के समय में सफेद बाल केवल उम्र बढ़ने की निशानी नहीं रह गए हैं। बदलती जीवनशैली, अनियमित खानपान, बढ़ता तनाव, नींद की कमी और मोबाइल-लैपटॉप की लगातार स्क्रीन लाइट जैसे कई कारणों से कम उम्र में ही बाल सफेद होने लगे हैं। पहले जहां यह समस्या चालीस-पचास की उम्र के बाद दिखाई देती थी, वहीं अब स्कूल-कॉलेज जाने वाले युवाओं तक में बाल सफेद होना देखा जा रहा है। ऐसे में लोग तुरंत समाधान चाहते हैं। बार-बार हेयर कलर करना न तो सेहत के लिए अच्छा है और न ही हर किसी के पास इतना समय होता है।आयुर्वेद में बालों को शरीर की अंदरूनी सेहत का आईना माना गया है। आयुर्वेद मानता है कि जब शरीर में वात और पित्त का संतुलन बिगड़ता है, तो इसका असर सीधे बालों की जड़ों पर पड़ता है। वहीं विज्ञान भी यह मानता है कि मेलानिन नामक पिगमेंट की कमी से बाल सफेद होते हैं। मेलानिन ही वह तत्व है जो बालों को काला रंग देता है। जब तनाव, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, या पोषण की कमी होती है, तो मेलानिन बनना कम हो जाता है। ऐसे में कुछ प्राकृतिक चीजें मदद कर सकती हैं।सौंफ उन्हीं प्राकृतिक चीजों में से एक है। आमतौर पर सौंफ को हम पाचन के लिए जानते हैं, लेकिन आयुर्वेद में इसे त्रिदोष नाशक माना गया है। सौंफ में एंटीऑक्सीडेंट्स, फ्लेवोनॉयड्स, और कुछ ऐसे नेचुरल तत्व पाए जाते हैं जो फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं। विज्ञान के अनुसार, एंटीऑक्सीडेंट्स बालों की जड़ों को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाते हैं। यही डैमेज बालों के समय से पहले सफेद होने की एक बड़ी वजह बनता है।सौंफ में मौजूद नेचुरल पिगमेंट बालों पर हल्की डार्क कोटिंग बनाते हैं। यह तरीका बालों को अंदर से काला नहीं करता, लेकिन सफेद बालों को अस्थायी रूप से छुपाने में मदद करता है।इस देसी नुस्खे की प्रक्रिया भी बहुत सरल है। सबसे पहले सौंफ को साफ पानी में कुछ देर भिगोया जाता है ताकि उसकी अशुद्धियां निकल जाएं। इसके बाद उसे हल्की आंच पर भूनकर पूरी तरह जलाया जाता है। जब सौंफ जलकर काली राख बन जाती है, तो उसे ठंडा करके बहुत बारीक पीस लिया जाता है। यह पाउडर सफेद बालों पर लगाया जाता है। इसका असर एक दिन तक रहता है और अगली बार बाल धोने पर यह हट सकता है।अगर सफेद बालों की समस्या लगातार बढ़ रही है, तो आयुर्वेद और विज्ञान दोनों यही सलाह देते हैं कि खानपान सुधारें, तनाव न लें, और शरीर को अंदर से मजबूत बनाएं।

सर्दी, खांसी और जुकाम से चाहिए राहत?:घर में मौजूद यह विंटर कॉम्बो देगा आराम
नई दिल्ली । सर्दियों में जैसे-जैसे पारा गिरता है, लोग गले में खराश, छींक और सर्दी-जुकाम की शिकायत करने लगते हैं। ऐसे में लोग अक्सर सिरप और दवा की तरफ भागते हैं, लेकिन सच कहें तो रसोई में ही मौजूद एक आसान और असरदार नुस्खा इस परेशानी का हल है। यह है गुड़ और सोंठ। आयुर्वेद में इसे प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, गुड़ और सोंठ दोनों की तासीर गर्म होती है। इसका फायदा यह है कि यह शरीर में जमा कफ और ठंड को पिघलाने में मदद करता है। गुड़ श्वसन नली को साफ करता है और आयरन की प्रचुर मात्रा के कारण हीमोग्लोबिन बढ़ाता है, जिससे शरीर को ठंड से लड़ने की ताकत मिलती है।सोंठ में मौजूद जिंजरॉल एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरा है, जो फेफड़ों की सूजन कम करने और इंफेक्शन दूर करने में कारगर है। पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसे खांसी, जुकाम और शरीर में बढ़े कफ को दूर करने वाला बताया गया है।इसे इस्तेमाल करने के कई तरीके हैं। सूखी खांसी के लिए गुड़ और सोंठ की गोलियां बनाई जा सकती हैं। आधा कप कद्दूकस किया हुआ गुड़ लें, उसमें 2 चम्मच सोंठ पाउडर और एक चुटकी काली मिर्च मिलाकर थोड़ा घी डालें और गोलियां बना लें। दिन में 2-3 बार एक गोली चूसने से गले की खराश और खांसी में राहत मिलती है।जमे हुए कफ के लिए गुनगुना काढ़ा भी फायदेमंद है। एक गिलास पानी में गुड़ और सोंठ डालकर आधा उबालें और रात को सोने से पहले पिएं। यह छाती में जमा बलगम साफ करने में मदद करता है। वहीं, शरीर को गर्म रखने और ठंड से बचने के लिए सोंठ और गुड़ के लड्डू बनाने की पुरानी परंपरा है। इसे सुबह दूध के साथ खाने से जुकाम और जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।हालांकि, ध्यान रहे कि गुड़ और सोंठ की तासीर गर्म होती है। इसलिए सीमित मात्रा में ही सेवन करें। नाक से खून आने, बवासीर या पेट की अल्सर जैसी समस्या वाले लोग इसे कम लें। हमेशा गहरे रंग या जैविक गुड़ का ही चुनाव करें। साथ ही इसे गुनगुने पानी या घी के साथ लेना सबसे अच्छा रहता है।

बॉडी डिटॉक्स से मजबूत इम्युनिटी तक:सुबह खाली पेट गुनगुने नींबू पानी के जबरदस्त फायदे
नई दिल्ली। शरीर की साफ-सफाई सिर्फ बाहर से नहीं, बल्कि अंदरूनी तौर पर भी बहुत जरूरी है। इसके लिए महंगे उपायों की जरूरत नहीं। बस हर सुबह उठते ही खाली पेट एक गिलास गुनगुना पानी में ताजा नींबू निचोड़कर पी लें। यह आसान आदत अपनाने से पाचन बेहतर होता है, शरीर डिटॉक्स होता है और सेहत में कई गुना सुधार आता है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने भी इस सरल घरेलू नुस्खे को काफी फायदेमंद बताया है। यह आदत न केवल सेहत को बेहतर बनाती है, बल्कि रोजमर्रा की कई छोटी-मोटी परेशानियों से भी छुटकारा दिला सकती है।एक्सपर्ट के अनुसार, सुबह खाली पेट गर्म नींबू पानी पीने के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। नींबू में भरपूर मात्रा में विटामिन-सी होता है, जो शरीर की रक्षा प्रणाली को सक्रिय रखता है और सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियों से बचाव में मदद करता है। यह वजन घटाने में भी कारगर है। गुनगुना नींबू पानी पाचन तंत्र को तेज करता है, मेटाबॉलिज्म बढ़ाता है और शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को कम करने में सहायक होता है। जो लोग वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक आसान उपाय है।इसके नियमित सेवन से पेट फूलना, गैस और अपच जैसी समस्याएं भी दूर रहती हैं। यह लिवर के लिए बहुत अच्छा है। नींबू पानी लिवर को डिटॉक्स करने में मदद करता है। सुबह खाली पेट पीने से लिवर टॉक्सिन्स को आसानी से बाहर निकाल पाता है, जिससे यह स्वस्थ और मजबूत रहता है। यह त्वचा के लिए भी फायदेमंद है। नींबू में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन-सी त्वचा को साफ और चमकदार बनाते हैं। यह मुंहासों को कम करता है, दाग-धब्बों को हल्का करता है और त्वचा को जवां रखने में मदद करता है। नियमित पीने से चेहरा निखरता है और त्वचा स्वाभाविक रूप से स्वस्थ दिखती है।यह नुस्खा बनाना भी बहुत आसान है। एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़कर मिलाएं। स्वाद के लिए थोड़ा शहद भी डाल सकते हैं, लेकिन चीनी से बचें। ध्यान रखें कि बहुत गर्म पानी न लें, सिर्फ गुनगुना ही काफी है।

मकर संक्रांति पर षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग:हिन्दू धर्म के लिए माना गया है बेहद शुभ, तिल दान से मिलेगा विशेष पुण्य
नई दिल्ली। 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व बहुत खास रहने वाला है, क्योंकि इस दिन षटतिला एकादशी भी पड़ रही है। इन दोनों का संयोग हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। मकर संक्रांति पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। संक्रांति पर अन्न दान के साथ अन्य पुण्य कर्म किए जाते हैं और गुड़-तिल से बने खाद्य पदार्थों के सेवन और दान का भी विशेष महत्व है। साथ ही सूर्य देव को जल देने का भी विशेष पर्व है।इस बार मकर संक्रांति के साथ ही माघ मास की कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी भी पड़ रही है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होती है। षटतिला का अर्थ है छह प्रकार से तिल का उपयोग। तिल को पवित्र और शुभ फल देने वाला माना जाता है। इस एकादशी पर तिल से जुड़े कार्य करने से पापों का नाश होता है, गरीबी दूर होती है, मनोकामनाएं पूरी होती हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।उत्तरायण काल में किए गए दान, व्रत और भक्ति का कई गुना फल मिलता है। इसलिए इस संयोग में तिल दान का महत्व और भी बढ़ जाता है। षटतिला एकादशी पर तिल का छह तरह से उपयोग करने की परंपरा है। पहला तिल मिले हुए पानी से स्नान करना। शरीर पर तिल का लेप लगाना। हवन में तिल की आहुति देना। ब्राह्मण या जरूरतमंद लोगों को तिल दान करना। व्रत के नियमों के अनुसार तिल से बने व्यंजन खाना और तिल मिश्रित जल पीना या पितरों को तर्पण करना शामिल है। ये सभी कार्य करने से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।वहीं, दृक पंचांग के अनुसार, 14 जनवरी को एकादशी तिथि शाम 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी। बुधवार को राहुकाल दोपहर 12 बजकर 30 मिनट से 1 बजकर 49 मिनट तक रहेगा, इस दौरान कोई नया शुभ कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। अनुराधा नक्षत्र 15 जनवरी सुबह 3 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। चंद्रमा वृश्चिक राशि में संचार करेंगे। सूर्योदय 7 बजकर 15 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर 45 मिनट पर होगा।

जटामांसी:बालों का झड़ना रोकने और ग्रोथ बढ़ाने की आयुर्वेदिक औषधि, जानिए फायदे
नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तनाव, गलत खान-पान और केमिकल युक्त प्रोडक्ट्स के कारण बालों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं, ऐसे में जटामांसी एक प्राकृतिक समाधान के रूप में सामने आती है। यह बालों की जड़ों को पोषण देकर उन्हें मज़बूत बनाती है और हेयर फॉल को धीरे-धीरे कम करने में मदद करती है। जटामांसी आयुर्वेद की एक बेहद प्रभावशाली जड़ी-बूटी है। यह हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है और इसकी जड़ औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है। पुराने समय से ही जटामांसी का इस्तेमाल बालों के झड़ने, रूसी और कमजोर बालों की समस्याओं में किया जाता रहा है।जटामांसी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह स्कैल्प में रक्त संचार को बेहतर बनाती है। जब सिर की त्वचा में ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है तो बालों के रोमछिद्रों तक जरूरी पोषक तत्व आसानी से पहुंचते हैं, जिससे नए बाल उगने की प्रक्रिया तेज होती है। यही कारण है कि जटामांसी को हेयर ग्रोथ बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक औषधि माना जाता है। इसके अलावा, यह वात दोष को संतुलित करती है जो आयुर्वेद के अनुसार बालों के झड़ने का एक मुख्य कारण होता है। नियमित उपयोग से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और टूटना कम होता है।रूसी, खुजली और स्कैल्प की जलन से परेशान लोगों के लिए भी जटामांसी बहुत फायदेमंद है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-फंगल गुण स्कैल्प को शांत करते हैं और रूसी की समस्या को धीरे-धीरे खत्म करने में मदद करते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स बालों को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं, जिससे समय से पहले बालों का सफेद होना कम हो सकता है। यह बालों के तंतुओं को मजबूती देता है, दोमुंहे बालों की समस्या घटाता है और बालों में प्राकृतिक चमक लाता है।जटामांसी का उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है। इसके तेल को नारियल या तिल के तेल में मिलाकर हफ्ते में दो-तीन बार स्कैल्प पर मालिश करना बेहद लाभकारी होता है। वहीं जटामांसी पाउडर को दही या पानी में मिलाकर हेयर मास्क की तरह लगाया जा सकता है। हालांकि इसका अत्यधिक या गलत इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए बेहतर है कि इसका उपयोग सीमित मात्रा में और किसी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह से किया जाए।


