बामुलाहिजा : दिल्ली की दस्तक, भोपाल की बेचैनी... सियासत में कई मोर्चे गर्म

- संदीप भम्मरकर
दिल्ली की दस्तक, भोपाल बेचैन
दिल्ली में हलचल बढ़ते ही भोपाल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। संसद सत्र से पहले मोदी कैबिनेट विस्तार की चर्चा ने एमपी की सियासत में नई बेचैनी भर दी है। जॉर्ज कुरियन के कार्यकाल समाप्त होने के बाद एक केंद्रीय मंत्री पद को लेकर अटकलें तेज हैं। गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा वीडी शर्मा और राज्यसभा सांसद तरुण चुघ के नामों की है। उधर, सबकी नजर इस बात पर भी है कि अगर दिल्ली में समीकरण बदले, तो भोपाल की सियासी बिसात भी नए सिरे से सज सकती है। चर्चा यही है, एक शपथ कई नेताओं की राजनीतिक दिशा बदल सकती है।
सीएस का मास्टर स्ट्रोक
कभी एक आदेश, हजारों उम्मीदों का दरवाजा खोल देता है। दस साल बाद एमपी के सरकारी दफ्तरों में रौनक आई है। दरअसल प्रमोशन के रास्ते खोल दिए गए हैं। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने खुद पहल करते हुए एक बड़ा आदेश जारी किया। जिसमें साफ किया गया कि प्रमोशन किए जा सकेंगे। अब तक मामला कोर्ट में होने की वजह से मामला अटका हुआ था। वजह प्रमोशन में आरक्षण था। रिजर्व और जनरल क्लास में विवाद की वजह से सरकार भी कोई फैसला नहीं ले पा रही थी। लेकिन मुख्य मंत्री मोहन यादव के सकारात्मक रुख के बाद मुख्य सचिव ने भी ताकत का एहसास कराया है। इसमें एडवोकेट जनरल की राय को शामिल करके सारी कानूनी पेंचीदगियां खत्म की गई है। ये आदेश अहम इसलिए है कि साढ़े चार लाख कर्मचारियों को सीधा फायदा मिलेगा। पदोन्नति के बाद खाली होने वाले पदों में 2 लाख नयी भर्ती का रास्ता भी खुल जाएगा।
राजा की चाल, जूनियर का दबदबा
सियासत में कभी-कभी शागिर्द भी उस्ताद पर भारी पड़ जाता है। जिस दिग्विजय सिंह से राजनीति की बारीकियां सीखने वाले जीतू पटवारी आज प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं, उसी दौर में दोनों के सुर अलग-अलग सुनाई दिए। वीर भारत न्यास के मुद्दे पर पहले दिग्विजय ने अलग राय रखी, फिर जल्द ही जीतू के साथ कदमताल करते नजर आए। इस दौरान राजा के यू टर्न बयान के साथ ही राजा की बॉडी लैंग्वेज का भी खूब विश्लेषण हुआ। दतिया दौरे में भी दोनों की साथ मौजूदगी ने नई चर्चाओं को हवा दे दी। आमतौर पर राजा सोच-समझकर ही बोलते हैं, उज्जैन में जीतू के बयान के खिलाफ दिया गया बयान को भी स्लिप ऑफ टंग नहीं समझा जा रहा है। कुछ न कुछ तो ज़रूर है। लेकिन दिग्विजय से यू टर्न वाले बयान के बाद अब गलियारों में सवाल गूंज रहा है, राजा चूक गए… या फिर जूनियर को आगे बढ़ाने के लिए खुद ही एक कदम पीछे हट गए?
दतिया की बिसात, मोहरों की चाल
शतरंज की बाजी में राजा नहीं, सही चाल मायने रखती है। दतिया में उपचुनाव की आहट के साथ सियासी बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है। बीजेपी में नरोत्तम मिश्रा के स्वाभाविक दावेदार माने जाने के बावजूद नए चेहरे की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। उधर, नरोत्तम अपने चुनावी मोहरे एक-एक कर सजा रहे हैं। कांग्रेस में राजेंद्र भारती परिवार पर मंथन जारी है, तो चंबल के दिग्गज पड़ोसी सीटों से भी समीकरण साधने में जुटे हैं। मौजूदा नज़ारा देखकर अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि दतिया में टिकट नहीं, पूरी शतरंज खेली जा रही है… और असली चाल अभी बाकी है।
क्या उलझ गईं प्रतिमा बागरी?
सियासत में कई बार असली परीक्षा चुनाव के बाद शुरू होती है। पहली बार विधायक बनते ही राज्यमंत्री का दर्जा पाने वाली प्रतिमा बागरी अब नए विवादों के घेरे में हैं। पहले भाई का नाम गांजा तस्करी मामले में चर्चा में आया, तो अब जाति विवाद ने सियासी हलकों में नई कानाफूसी शुरू कर दी है। चर्चा यह भी है कि बड़ा राजनीतिक भविष्य देख रही नेता के लिए यह मामला अहम मोड़ बन सकता है। दोनों पक्षों की दलीलें अब छानबीन समिति की टेबल तक पहुंच चुकी हैं। गलियारों में सवाल गूंज रहा है, यह विवाद थमेगा तो नहीं, आगे की राह मुश्किल ज़रूर है।
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