समय का सच : अमानवीय शिक्षानीति

-UMEESH GUPTA
भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री स्व श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के अमर रचना की ये कुछ पंक्तियां ..जो व्यक्तिगत पीड़ा के क्षणों में, जब पुराने सपने टूटते हुए दिख रहे थे, तब लिखे गए थे। पर ये पंक्तियां आज के इस आलेख के मद्देनजर कितनी सटीक बैठती है...
"टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी..
अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी.."
•महाराष्ट्र में रविवार दिनांक 28 जून को होने वाली शिक्षक पात्रता परीक्षा TET 2026 का पेपर लीक हो गया इसके चलते परीक्षा स्थगित करनी पड़ी 37 शहरों में 1728 केदो पर होने वाली परीक्षा में 6 लाख छात्र बैठने थे।
•इसी साल सीबीएसई की 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के मूल्यांकन को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ।
•सबसे बड़ा विवाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट को लेकर हुआ।
लेकिन सवाल सिर्फ़ नीट तक सीमित नहीं है,भारत में परीक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है। आख़िरकार इसका ज़िम्मेदार कौन है? डिजिटल व्यवस्था संभालने वाली प्राइवेट कंपनी, प्रशासनिक अधिकारी या फिर वो संस्थाएं जो पूरी व्यवस्था की निगरानी करती हैं? क्या छात्र उन संस्थाओं पर भरोसा कर सकते हैं?
रिया कुमारी थापा की मौत सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी परीक्षा-प्रधान व्यवस्था पर लगा एक कठोर प्रश्नचिह्न है। देहरादून की इस 23 वर्षीय NEET aspirant के बारे में रिपोर्टों में बताया गया है कि वह 12वीं में 96.7%/करीब 97% अंकों के साथ टॉपर थीं और री-NEET की अनिश्चितता व दबाव के बीच उन्होंने परीक्षा से ठीक पहले आत्महत्या कर ली।
2026 में परीक्षा रद्द होने के बाद रि-एग्ज़ाम तक के 37 दिनों में कम-से-कम 12 से 13 NEET aspirants की आत्महत्याओं की रिपोर्टें आईं, जो दबाव, अनिश्चितता और संस्थागत असंवेदनशीलता का भयावह संकेत हैं।
लेकिन व्यवस्था की भाषा में...
ये केवल "संख्याएँ" हैं।
जिस परीक्षा को "अभेद्य" कहा गया, उसका प्रश्नपत्र लीक हो गया।परीक्षा रद्द हुई।फिर दोबारा परीक्षा हुई।सवाल यह नहीं है कि परीक्षा दोबारा क्यों हुई।सवाल यह है कि व्यवस्था की गलती का पूरा दंड केवल बच्चों ने ही क्यों भुगता?
जब पेपर लीक हुआ, तब किसकी गलती थी?
क्या वह छात्र था, जिसने महीनों नहीं, वर्षों तक पढ़ाई की?
क्या वह माँ थी, जिसने अपने गहने बेचकर कोचिंग की फीस भरी?
क्या वह पिता था, जिसने ओवरटाइम करके बेटे का सपना जिंदा रखा?
नहीं, नहीं..गलती व्यवस्था की थी।
जब शिक्षा-तंत्र को अपनी गलती सुधारने के लिए दूसरा मौका दिया जा सकता है, तो बच्चों को क्यों नहीं? यदि कोई विद्यार्थी कुछ मिनट देर से पहुंचता है, गलत सेंटर भेज दिया जाता है, रास्ते में दुर्घटना हो जाती है, या Google Maps की गलती से लेट हो जाता है, तो क्या एक निर्णायक परीक्षा का पूरा भविष्य उसी एक त्रुटि पर खत्म कर देना न्याय है? यह प्रश्न सहानुभूति का नहीं, न्याय का है। माँ का टीचरों के पैर पकड़कर रोना, पिता का दो मिनट की देरी पर छात्रा को परीक्षा कक्ष में लेने की भीख माँगना,गलत सेंटर, यात्रा में दुर्घटना, तकनीकी भूल, या मामूली देरी_ ये सब ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिन पर छात्र का कोई नियंत्रण नहीं होता। फिर भी दंड उसी को मिलता है, क्योंकि व्यवस्था “नियम” को इंसान से बड़ा मानती है।
"यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षा नीति अमानवीय हो जाती है और प्रशासनिक औपचारिकता नैतिक असफलता में बदल जाती है।"
नीट प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि केवल सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी कर देने से संकट खत्म नहीं होता। परीक्षा-तंत्र को यह समझना होगा कि उसका पहला कर्तव्य बच्चों का भविष्य बचाना है, न कि उन्हें ऐसे ढांचे में धकेल देना जहाँ एक गलती पूरी ज़िंदगी की कीमत बन जाए। "जब तक नीति-निर्माता परिणामों के बजाय मनुष्यता को केंद्र में नहीं रखेंगे, तब तक हर रद्द परीक्षा, हर री-टेस्ट, और हर देरी किसी न किसी घर में शोक बनकर उतरती रहेगी।"
"शोध और सार्वजनिक रिपोर्टें लगातार यह बता रही हैं कि अत्यधिक शैक्षणिक दबाव, अनिश्चितता और संस्थागत असुरक्षा छात्र-मानसिक स्वास्थ्य पर गहरी चोट पहुंचाते हैं।
इसी कारण छात्र आत्महत्याओं को केवल निजी दुख कहकर टालना ईमानदारी नहीं होगी। जब एक ही परीक्षा की त्रुटि का असर हज़ारों परिवारों पर पड़े, जब री-टेस्ट की तारीख एक नए संकट में बदल जाए, और जब बच्चे यह महसूस करें कि उनकी मेहनत के बावजूद कोई भी व्यवस्था उन्हें सुरक्षित नहीं रखेगी, तब मामला शिक्षा का नहीं, कुल सामाजिक क्रूरता और अमानवीय शिक्षानीति का हो जाता है।"
ये किसी एक परिवार की कहानी नहीं, एक पूरी पीढ़ी की चीत्कार हैं। ऐसे क्षणों में परीक्षा-प्रबंधन की कठोरता व्यवस्था नहीं लगती, बेरहमी लगती है। सिस्टम अगर दया की एक छोटी-सी खिड़की भी नहीं खोल सकता, तो उसे न्याय का चेहरा बनने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
“जब व्यवस्था गलती करे, तब बच्चों से बलिदान क्यों मांगा जाए?”
तो जिम्मेदार कौन?
किस अधिकारी की सेवा समाप्त हुई?
किस संस्था की जवाबदेही तय हुई?
किसने सार्वजनिक रूप से कहा_ "यह हमारी असफलता थी।"
शिक्षा का उद्देश्य प्रतिभा को अवसर देना था। लेकिन आज कई बार ऐसा लगता है कि परीक्षा तंत्र बच्चों की योग्यता से अधिक उनकी मानसिक सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है।
परीक्षा,
फिर पेपर लीक,
फिर परीक्षा रद्द,
फिर पुनर्परीक्षा,
उत्तर कुंजी का इंतज़ार,
फिर परिणाम का इंतज़ार,
फिर काउंसलिंग,
फिर अनिश्चितता... अनिश्चितता ...अनिश्चितता..
क्या कोई पूछ रहा है कि इन महीनों में एक छात्र किस मानसिक स्थिति से गुजरता है?
अब समय केवल सुधार का नहीं, संरचनात्मक बदलाव का है,यदि देश वास्तव में अपने युवाओं को बचाना चाहता है, तो कुछ कठोर निर्णय लेने होंगे।परीक्षा संचालन में विफलता पर व्यक्तिगत और संस्थागत जवाबदेही तय हो।असाधारण परिस्थितियों में सत्यापन-आधारित "दूसरा अवसर" (special sitting) की नीति बने।प्रत्येक राष्ट्रीय परीक्षा के साथ अनिवार्य मानसिक स्वास्थ्य सहायता और हेल्पलाइन जोड़ी जाए।परीक्षा सुरक्षा में हुई चूक की स्वतंत्र समीक्षा सार्वजनिक की जाए।
"बच्चों को केवल अभ्यर्थी नहीं, नागरिक और इंसान मानकर नीतियाँ बनाई जाएँ।"
समय का सच यह है कि इस देश में व्यवस्था अपनी गलती पर दूसरी परीक्षा दे सकती है, लेकिन एक बच्चा यदि दो मिनट देर हो जाए, तो उसका पूरा भविष्य छीन लिया जाता है, और लोकतंत्र में इससे बड़ा अन्याय क्या होगा,कि जिस व्यवस्था ने प्रश्नपत्र नहीं बचाया, वही व्यवस्था बच्चों से पूर्णता की अपेक्षा करती रही।
यदि छात्र की गलती पर तत्काल दंड है, तो व्यवस्था की गलती पर तत्काल उत्तरदायित्व क्यों नहीं?
आज का युवा असहाय, असहज, मजबूर है व्यवस्था की बजबजाती गंध के आगे ...वो लड़ता है, गिरता है, मानसिक व्यथित होता है, रोता है, फिर उठता है,फिर लड़ता है...और कहता है...
"टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी,
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।
हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ।"
और यही "समय का सच" है।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
