10 लाख तक के मामलों का फास्ट-ट्रैक पर निपटारा : सेबी का बड़ा फैसला, सेटलमेंट नियमों में किए अहम बदलाव

मुंबई। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने प्रतिभूति बाजार से जुड़े विवादों के निपटारे की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने के लिए नए संशोधित नियम जारी किए हैं। सेटलमेंट रेगुलेशन्स, 2026 के तहत नियामक ने 10 लाख रुपये तक की सेटलमेंट राशि वाले मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की है। नए प्रावधानों का उद्देश्य सेटलमेंट की रकम तय करने में पारदर्शिता बढ़ाना और मामलों के निपटारे को अधिक अनुमान योग्य बनाना है।
10 लाख रुपये तक के मामलों में तेज होगी प्रक्रिया
सेबी के नए नियमों के मुताबिक, 10 लाख रुपये या उससे कम की सेटलमेंट राशि वाले मामलों को सीधे आंतरिक समिति से पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के पास भेजा जाएगा। इससे निर्धारित पात्रता वाले मामलों में निपटारे की प्रक्रिया सरल हो सकती है।
नियामक ने फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट के दो प्रकार निर्धारित किए हैं। इनमें उल्लंघन की प्रकृति पर आधारित फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट और सेटलमेंट राशि की सीमा पर आधारित फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट शामिल हैं। हालांकि, केवल राशि कम होने से हर मामले को इस सुविधा का पात्र नहीं माना जाएगा। उल्लंघन की प्रकृति भी महत्वपूर्ण होगी।
सेटलमेंट राशि तय करने का नया फॉर्मूला
संशोधित नियमों में सेटलमेंट राशि की गणना के लिए नया फॉर्मूला पेश किया गया है। इसके तहत एक आधार राशि तय की जाएगी, जिसका संबंध प्रतिभूति कानूनों के तहत उल्लंघन के लिए निर्धारित न्यूनतम जुर्माने से होगा।
आधार राशि तय करते समय मामले में कार्यवाही के चरण, नियामकीय कार्रवाई, उल्लंघन की गंभीरता और अन्य संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाएगा। कानूनी खर्च को भी अलग से ध्यान में रखने का प्रावधान बताया गया है।
गलत मुनाफे और निवेशकों के नुकसान की होगी अलग गणना
नए नियमों की एक अहम विशेषता गलत तरीके से कमाए गए मुनाफे, बचाए गए नुकसान और निवेशकों को हुए नुकसान की अलग गणना है। इन रकमों को आधार राशि में शामिल नहीं किया जाएगा, बल्कि जहां लागू होगा, वहां अलग से वसूली की जाएगी। इस व्यवस्था का मकसद एक ही रकम की दोहरी गणना से बचना और सेटलमेंट प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाना है।
वित्तीय गड़बड़ियों वाले मामलों पर भी प्रावधान
नए नियमों में वित्तीय विवरणों को गलत तरीके से पेश करने और फंड के दुरुपयोग से जुड़े कुछ मामलों के सेटलमेंट का प्रावधान भी शामिल है। इसके लिए आवश्यक सुधारात्मक और नियामकीय कदम उठाना जरूरी होगा। इनमें संबंधित खुलासे करना और गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए फंड की वसूली जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, सेबी के इन बदलावों से पात्र मामलों में विवाद निपटाने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। साथ ही, सेटलमेंट राशि की गणना में स्पष्टता आने से बाजार से जुड़ी संस्थाओं को नियमों और संभावित वित्तीय देनदारी का बेहतर आकलन करने में मदद मिल सकती है।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
