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सवाल जो कोई नहीं पूछता : "खामोश साजिशें"

admin

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Jun 26, 2026
05:57 AM
"खामोश साजिशें"

- UMEESH GUPTA

"हर तरफ कतरें हैं, हर तरफ साजिशें,

धूप में भी यहाँ होती हैं बारिशें...

चेहरे पे मुखौटा लगा के घूमते हैं लोग,

अंदर अंधेरा है, बाहर दिखाते हैं रौशनी का जोग,

किसको कहें अपना, यहाँ हर कोई अनजान है,

इस शहर में वफादारी तो बस एक कत्ल का सामान है।"

एक तरफ राजा रघुवंशी, दूसरी तरफ केतन अग्रवाल। एक की शादी हो चुकी थी, दूसरे की शादी होने वाली थी। एक अपनी पत्नी के साथ पहाड़ों पर गया, दूसरा अपनी मंगेतर के साथ किले की ट्रैकिंग पर। दोनों के साथ वे लोग थे जिन पर उन्होंने सबसे अधिक भरोसा किया था। और दोनों कहानियों में एक तीसरे व्यक्ति-"एक प्रेमी"-की एंट्री हुई।

और अंत?

हम सभी जानते है ।

इंदौर का चर्चित सोनम रघुवंशी मामला अभी समाज की स्मृति से धुंधला भी नहीं हुआ था कि पुणे के लोहागढ़ किले से केतन अग्रवाल की गिरकर मौत। इस पूरे विमर्श ने एक सवाल ऐसा है जिसे शायद कोई नहीं पूछ रहा, कि _

"क्या अब प्यार के नाम पर किया गया भरोसा सबसे बड़ा जोखिम बन चुका है?" ये दो मामले तो चर्चा में है,शेष ऐसे ही प्रकरण अब आजकल बहुत आम हो गए है। तो,

"क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहां रिश्ते सुरक्षा नहीं, बल्कि संभावित खतरे का संकेत बनते जा रहे हैं?"

"हत्या करना आज के कुछ युवाओं के लिए इतना आसान निर्णय कैसे बनता जा रहा है?"

और यह प्रश्न केवल अपराध का नहीं है, बल्कि पूरे समाज, संस्कार, परिवार और मानव मनोविज्ञान का भी है।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, केतन और राजा की मौत को एक हादसा बताया गया था। मंगेतर ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना कहा था। लेकिन जब घटनाओं की परतें खुलती गई, तो यक्ष प्रश्न उठा - "क्या हर ‘हादसा’ वास्तव में हादसा होता है ?"

यह केवल घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक गहरी सामाजिक प्रवृत्ति की ओर संकेत हैं। आज का युवा वर्ग, जो तकनीक, स्वतंत्रता और विकल्पों के विस्तार के साथ बड़ा हुआ है, वह भावनात्मक स्थिरता और नैतिक जिम्मेदारी के मामले में कहीं पीछे तो नहीं छूट गया? क्या रिश्ते अब प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि अवसर और विकल्प का खेल बनते जा रहे हैं?

हर युग में प्रेम संबंध रहे हैं। विवाहेतर संबंध भी रहे हैं। असहमति, अलगाव और विश्वासघात भी नए नहीं हैं। लेकिन पहले अधिकांश लोग रिश्ते तोड़ते थे, घर छोड़ते थे, अदालत जाते थे या सामाजिक संघर्ष झेलते थे।तभी तो,फिल्म 'गुमराह' (1963) में साहिर लुधियानवी जी ने ऐसे ही संबंधों पर क्या खूब लिखा है और रफ़ी साहब ने जो गया है वो आज भी हम सब के लिए एक शिक्षा है, एक सबक है...जो हत्या करने को प्रेरित नहीं करती अपितु समझाइश देती हैं_

"चलो एक बार फिर से ..

अजनबी बन जाए हम दोनों...

"तारूफ रोग बन जाए तो उसको भूलना बेहतर,

ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा।

वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन,

उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।"

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हत्या जैसा जघन्य अपराध, जो कभी समाज में अंतिम और चरम हिंसा का प्रतीक माना जाता था, क्या अब कुछ लोगों के लिए एक ‘सुलझाने का विकल्प’ बनता जा रहा है? क्या दिल इतना कठोर हो गया है कि जीवन का मूल्य भावनाओं और इच्छाओं के आगे गौण हो गया है? या फिर यह स्वार्थ की वह अंधी दौड़ है, जिसमें इंसान अपने ही सबसे करीबी संबंधों को खत्म करने में भी नहीं हिचकता?

भारतीय संस्कृति ने हमेशा संबंधों को "अधिकार" नहीं,"दायित्व" माना है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का अनुबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों और सामाजिक विश्वास का बंधन माना गया है।लेकिन उपभोक्तावादी सोच के विस्तार ने कई लोगों को यह विश्वास दिला दिया है कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण केवल "मैं" हूं। और

जब "मैं" सबसे बड़ा हो जाता है, तब परिवार छोटा पड़ जाता है।

रिश्ते छोटे पड़ जाते हैं।

नैतिकता छोटी पड़ जाती है।

और अंततः इंसानियत भी छोटी पड़ जाती है।

स्वार्थ जब चरम पर पहुंचता है तो व्यक्ति सामने वाले को मनुष्य नहीं, बाधा के रूप में देखने लगता है और जहां मनुष्य, मनुष्य न रहकर बाधा बन जाए, वहां अपराध जन्म लेता है।

इन घटनाओं का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण कई स्तरों पर किया जाना चाहिए_

पहली परत है_ यह एक विश्वास का संकट है, रिश्तों में पारदर्शिता और संवाद की कमी, संदेह और छुपे हुए संबंधों को जन्म देती है।

दूसरी परत है_ भावनात्मक अपरिपक्वता। युवा पीढ़ी को निर्णय लेने की स्वतंत्रता तो मिली है, लेकिन उन निर्णयों के परिणामों को समझने की परिपक्वता विकसित नहीं हो पाई है।

तीसरी परत है_ समाज का बदलता नैतिक ढांचा, जहां व्यक्तिगत सुख और तात्कालिक इच्छाएं, सामूहिक जिम्मेदारियों और नैतिक मूल्यों पर भारी पड़ने लगी हैं।

मीडिया और समाज दोनों के लिए यह आत्ममंथन का समय है। क्या हम केवल सनसनीखेज खबरों तक सीमित रहेंगे, या इन घटनाओं के पीछे छिपे गहरे सामाजिक संकट को समझने और समझाने का प्रयास करेंगे? क्या परिवार, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संस्थाएं युवाओं को केवल सफलता और स्वतंत्रता सिखा रही हैं, या जिम्मेदारी और संवेदनशीलता भी?

सबसे बड़ा सवाल जो कोई नहीं पूछता, 'क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां रिश्ते विश्वास पर नहीं, बल्कि संदेह और स्वार्थ पर टिके होंगे?"अगर ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन की शुरुआत है। इन घटनाओं को केवल अपराध की खबर के रूप में नहीं, बल्कि चेतावनी के रूप में देखना होगा। क्योंकि जब भरोसा टूटता है, तो केवल एक जीवन नहीं जाता,समाज की आत्मा भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।

जब समाज में संवेदनशीलता घटती है तो अपराध केवल कानून का विषय नहीं रहता, वह मानसिकता का हिस्सा बनने लगता है।

राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल जैसे मामलों की जांच अदालतें और पुलिस करेंगी। दोषी कौन है, यह कानून तय करेगा।लेकिन समाज को एक दूसरा प्रश्न पूछना होगा-

आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि जिस व्यक्ति के साथ जीवन बिताने की कसमें खाई जाती हैं, उसी के जीवन को समाप्त करने की कथित योजनाएं बनने लगती हैं?

यह प्रश्न केवल दो मामलों का नहीं है।

यह हमारे समय का प्रश्न है।

यह परिवारों से प्रश्न है।

यह शिक्षा व्यवस्था से प्रश्न है।

यह सोशल मीडिया संस्कृति से प्रश्न है।

यह हमारी नैतिक चेतना से प्रश्न है।

और शायद यही वह सवाल है जो कोई नहीं पूछता-

क्या हम तकनीक में आधुनिक हो गए हैं, लेकिन संवेदनाओं में गरीब होते जा रहे हैं?यदि इसका उत्तर खोजने में समाज असफल रहा, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं केवल समाचार नहीं रहेंगी, बल्कि हमारे सामाजिक चरित्र का आईना बन जाएंगी और तब इतिहास यह सवाल पूँछेगा कि- हत्या करने वाले कितने थे, यह महत्वपूर्ण नहीं था,महत्वपूर्ण यह था कि समाज ने ऐसी मानसिकता पैदा होने ही क्यों दी?

राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल के मामले केवल अपराध कथाएँ नहीं हैं। ये हमारे समय के सामाजिक दस्तावेज हैं।

चलते चलते .....

ये घटनाएं हमसे पूछ रही हैं कि क्या आधुनिकता के साथ हमारी संवेदनाएँ भी विकसित हुई हैं, या हमने केवल सुविधाएँ बढ़ाईं और संस्कारों को पीछे छोड़ दिया?

यदि प्रेम में विश्वास, परिवार में संवाद, शिक्षा में नैतिकता और समाज में संवेदना कमजोर होती गई, तो आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं होगा। सबसे बड़ा संकट होगा-मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठ जाना।

और जिस दिन समाज से विश्वास समाप्त हो जाता है, उसी दिन सभ्यता का पतन शुरू हो जाता है।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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