प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीता है आदिवासी समाज : ब्रह्मकुमारी के कार्यक्रम में बोलीं महामहिम, वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को भी दोहराया

बैतूल। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मध्यप्रदेश के दौरे पर पहुंच चुकी है। वे अगले पांच दिनों तक मप्र में रहकर कई कार्यक्रमों में शिरकत करेंगी। दौरे पहले दिन यानि गुरुवार को राष्ट्रपति बैतूल में ब्रह्मकुमारी संस्था द्वारा आयोजित ‘आध्यात्मिक जागृति द्वारा आदिवासी समाज का सशक्तीकरण महासम्मेलन’में शामिल हुई। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महामहिम ने आदिवासी समाज के लिए बड़ी बात कही।
इस अवसर पर राज्यपाल मंगुभाई पटेल, केंद्रीय राज्य मंत्री दुर्गादास उइके, प्रभारी मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल, ब्रह्मकुमारी संस्थान के उड़ीसा प्रभारी नथमल भाई, भोपाल जोन की क्षेत्रीय निदेशक शैलजा दीदी और बैतूल प्रभारी मंजू दीदी भी मौजूद थीं। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा है कि आदिवासी समाज के युवाओं को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और डिजिटल सशक्तीकरण से जोड़ना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति विकास और संस्कृति के बीच संतुलन से आती है। आदिवासी समुदाय की जीवनशैली स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक मूल्यों और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित होती है।
पंचतत्वों के सम्मान और जीवन मूल्यों पर जोर
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज धरती, जल, वायु, आकाश, सूर्य और चंद्रमा जैसे पंचतत्वों का सम्मान करता है। यह समुदाय प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीता है और प्रेम, शांति तथा सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा देता है। उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय समाज ने अपनी लोक परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों और पारंपरिक ज्ञान को पीढ़ियों से संरक्षित रखा है, जो पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह जीवन शैली न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी महत्वपूर्ण आधार है।
2047 तक विकसित भारत का संकल्प
राष्ट्रपति मुर्मु ने महासम्मेलन के माध्यम से वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को दोहराया। उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य में आध्यात्म, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण समावेशी विकास की मजबूत नींव बनेंगे। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और उसे मुख्यधारा से जोड़कर अधिक सशक्त भागीदारी देना आवश्यक है।
प्राकृतिक खेती को बताया समय की जरूरत
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने प्राकृतिक खेती को वर्तमान समय की आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और विदेशी कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
उन्होंने कहा कि देश अब प्राकृतिक खेती की ओर लौट रहा है, जो न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारती है बल्कि शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी है। उन्होंने इसे आदिवासी समाज की प्रकृति-आधारित जीवनशैली से भी जोड़ते हुए इसकी महत्ता बताई।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
