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समय का सच : "लोकतंत्र का असली इम्तिहान चुनाव नहीं, मतदाता का विश्वास है"

admin

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Oct 05, 2026
10:26 AM
"लोकतंत्र का असली इम्तिहान चुनाव नहीं, मतदाता का विश्वास है"

-UMEESH GUPTA

लोकतंत्र में चुनाव सबसे दृश्यमान प्रक्रिया है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत केवल मतदान के दिन दिखाई नहीं देती। वह उस अटूट विश्वास में झलकती है, जिसके कारण एक सामान्य नागरिक यह मानता है कि उसका वोट दर्ज है, उसकी आवाज सुनी जाएगी और चुनावी प्रक्रिया उसके साथ पूरी निष्पक्षता व समानता का व्यवहार करेगी।

यही कारण है कि लोकतंत्र का असली इम्तिहान केवल यह नहीं है कि चुनाव समय पर संपन्न हो गए या कितने प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। असली सवाल इससे कहीं अधिक व्यापक और मौलिक है कि क्या मतदाता को चुनावी व्यवस्था पर पूर्ण भरोसा है?

आज भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर चल रही बहस ने इसी मूल प्रश्न को पुनः केंद्र में ला खड़ा किया है। निर्वाचन आयोग का मत है कि मतदाता सूची को शुद्ध, अद्यतन और समावेशी बनाना अनिवार्य है, ताकि अपात्र या डुप्लीकेट नाम हटाए जा सकें और कोई भी पात्र नागरिक सूची से वंचित न रहे। आयोग ने इसे अपने संवैधानिक दायित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।

दूसरी तरफ, राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों की चिंता यह है कि पुनरीक्षण की इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम न छूट जाए। इसके लिए पर्याप्त पारदर्शिता, जमीनी स्तर पर BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) के माध्यम से पारदर्शी सत्यापन और सरल अपील व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। हाल ही में निर्वाचन आयोग द्वारा उन वास्तविक मतदाताओं की पहचान और पुनः पंजीकरण के लिए विशेष अभियान चलाने की घोषणा इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

यहीं से लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है_मतदाता सूची केवल आंकड़ों की एक प्रशासनिक सूची है या लोकतांत्रिक नागरिकता का प्रवेश-द्वार?

वोट सिर्फ एक बटन नहीं

हम अक्सर कहते हैं- “मेरा वोट, मेरा अधिकार।” लेकिन वोट केवल ईवीएम पर दबाया गया एक बटन नहीं है। वोट नागरिक और राज्य के बीच विश्वास का संवैधानिक संबंध है। जब कोई नागरिक मतदान केंद्र तक पहुंचता है, तो वह केवल किसी उम्मीदवार का चयन करने नहीं जाता; वह यह मानकर जाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके अधिकार और उसकी जन-आकांक्षा की रक्षा करेगी।

इसलिए मतदाता सूची में एक नाम का होना महज़ एक तकनीकी या प्रशासनिक प्रविष्टि नहीं है। उसके पीछे नागरिक की राजनीतिक भागीदारी का मौलिक अधिकार जुड़ा है।

संविधान का अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को आधार प्रदान करता है। निर्वाचन आयोग के मौजूदा आदेशों में भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि सभी पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल किया जाए और किसी भी पात्र नागरिक को बाहर न किया जाए। यही वह कसौटी है, जिस पर पूरी चुनावी प्रक्रिया की सफलता को परखा जाना चाहिए।

शुद्ध सूची जरूरी है, लेकिन भरोसा भी उतना ही अनिवार्य है, Migration, तीव्र शहरीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम, डुप्लीकेट प्रविष्टियों या स्थानांतरित मतदाताओं को सूची से हटाना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए अत्यंत आवश्यक है। किसी भी लोकतंत्र में मतदाता सूची जितनी सटीक होगी, चुनावी प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी होगी।

तथापि, दूसरी तरफ प्रशासनिक त्रुटि या जानकारी के अभाव में एक भी पात्र मतदाता का नाम कट जाना उतना ही गंभीर विषय है।

इसलिए व्यवस्था के सामने चुनौती दोहरी है_ "अपात्र को हटाना और पात्र को बचाना।"

निर्वाचन आयोग स्वयं अपनी प्रक्रिया में दावे और आपत्तियों, भौतिक सत्यापन और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों (BLA) की भागीदारी जैसी व्यवस्थाओं को पारदर्शिता का आधार बताता है। परंतु लोकतंत्र में केवल नियम-पुस्तिकाओं और जटिल प्रक्रियाओं का होना ही पर्याप्त नहीं है। उस प्रक्रिया का आम नागरिक के लिए सरल और बोधगम्य होना भी उतना ही आवश्यक है।

जिस मतदाता को यह ज्ञात ही नहीं कि उसका नाम क्यों कटा, उसे कौन-से दस्तावेज़ जमा करने हैं, आपत्ति दर्ज कराने की समय-सीमा क्या है और उसकी सुनवाई कहाँ होगी, उसके लिए संवैधानिक अधिकार कागजों पर मौजूद होकर भी व्यवहार में कमजोर पड़ सकता है।

"अतः असली लड़ाई राजनीतिक दलों की नहीं, संस्थागत विश्वास की है।"

मतदाता सूची का विवाद अक्सर सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक खींचतान में उलझकर रह जाता है आरोप-प्रत्यारोप के इस शोर में मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है।

इस विमर्श को दलगत राजनीति से ऊपर उठाने की नितांत आवश्यकता है।

आज यदि किसी एक दल को मतदाता सूची की शुद्धता पर संदेह है, तो कल यही संशय किसी अन्य दल के सामने भी खड़ा हो सकता है। संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी एक चुनाव, एक सरकार या एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होती।

"निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सत्ता पक्ष के लिए भी उतनी ही जरूरी है जितनी विपक्ष के लिए।"

क्योंकि आज जो व्यवस्था एक दल के लिए कार्यरत है, वही व्यवस्था कल दूसरे दल के सामने भी होगी। लोकतंत्र संस्थाओं की निरंतरता और शुचिता पर चलता है, राजनीतिक सुविधा पर नहीं।

"पारदर्शिता ही संदेह का स्थायी इलाज है"

डिजिटल युग में जागरूक नागरिक केवल परिणाम नहीं देखना चाहता, वह प्रक्रिया को भी स्पष्ट रूप से समझना चाहता है।

•कितने नए नाम जोड़े गए?

• कितने नाम हटाए गए और किस विधिक आधार पर?

• कितनी आपत्तियां प्राप्त हुईं और उनमें से कितनों का निवारण हुआ?

• कितने छूटे हुए पात्र मतदाताओं को पुनः जोड़ा गया?

इन प्रश्नों के उत्तर जितने सार्वजनिक और स्पष्ट होंगे, अविश्वास की गुंजाइश उतनी ही कम होगी।

यद्यपि निर्वाचन आयोग की 'Voter Helpline App' और डिजिटल पोर्टल के माध्यम से नाम खोजने, पंजीकरण कराने और सुधार करने की सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन लोकतांत्रिक पारदर्शिता का अगला चरण केवल डिजिटल सुविधा प्रदान करना नहीं, बल्कि डेटा का सरल एवं पारदर्शी प्रकटीकरण है।

सामान्य से सामान्य नागरिक को यह समझ में आना चाहिए कि उसके मताधिकार से संबंधित निर्णय किस नियम के तहत लिया गया और उसके पास सुधार का कौन-सा त्वरित मार्ग उपलब्ध है।

मतदाता को केवल चुनाव के समय याद क्यों किया जाए?

हमारे लोकतंत्र की एक विडंबना यह भी रही है कि चुनाव के दौरान मतदाता सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बन जाता है, परंतु चुनाव संपन्न होते ही वही नागरिक प्रशासनिक फाइलों और आवेदन संख्याओं में गुम हो जाता है। चुनाव आते ही उसके द्वार पर दस्तक होती है; विकास, रोजगार, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं।

"लेकिन नागरिक के अधिकारों का सम्मान केवल चुनाव प्रचार के दौरान ही क्यों हो? उसका सम्मान पूरे पांच वर्ष होना चाहिए।"

"मतदाता लोकतंत्र का ग्राहक नहीं है; वह इसका वास्तविक स्वामी है।"

इसलिए चुनाव के बाद भी उसकी आवाज, उसकी शिकायत और उसके सूचना के अधिकार को उतनी ही गंभीरता मिलनी चाहिए, जितनी मतदान के दिन उसके वोट को मिलती है। लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा दीवार भारत जैसे विशाल, विविध और गतिशील लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव आयोजित कराना एक असाधारण प्रशासनिक उपलब्धि है। करोड़ों मतदाता, लाखों मतदान केंद्र, विविध भाषाएं और भौगोलिक परिस्थितियां, इन सबके बीच मतदाता सूची को शत-प्रतिशत शुद्ध रखना अत्यंत जटिल कार्य है। इसीलिए समाधान का मार्ग आरोपों के बजाय संस्थागत सुधारों से होकर गुजरता है:

•जहाँ तकनीकी या प्रशासनिक गलती हो, उसे तुरंत स्वीकार कर सुधार की सहज व्यवस्था हो।

• जहाँ गलत तरीके से नाम हटे हों, वहाँ प्राथमिकता के आधार पर त्वरित पुनर्बहाली हो।

• प्रक्रिया से संबंधित सभी मुख्य आंकड़े और नियम सार्वजनिक डोमेन में स्पष्टता से उपलब्ध हों।

क्योंकि लोकतंत्र में संदेह को दबाने से नहीं, बल्कि संदेह का पारदर्शी समाधान करने से विश्वास पैदा होता है।

आखिर भरोसा किसका?

लोकतंत्र की अंतिम और सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित है। लेकिन जनता अपनी शक्ति का प्रभावी उपयोग तभी कर सकती है, जब उसे संपूर्ण चुनावी तंत्र पर अगाध विश्वास हो।

चुनाव जीतने वाला दल सरकार बना सकता है, विपक्ष अपनी सजग भूमिका निभा सकता है, निर्वाचन आयोग चुनाव संपन्न करा सकता है और न्यायपालिका विवादों का निपटारा कर सकती है, लेकिन इन सबसे ऊपर जो अदृश्य शक्ति पूरे तंत्र को जोड़े रखती है, वह है "जनविश्वास।"

जिस दिन मतदाता को यह लगने लगे कि सूची में उसका नाम रहेगा या नहीं, उसका वोट गिना जाएगा या नहीं, उसकी शिकायत पर कार्रवाई होगी या नहीं, और इन सब पर अनिश्चितता का कुहासा छा जाए, उसी दिन लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ हिलने लगता है।

इसलिए आज यक्ष प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि "अगला चुनाव कौन जीतेगा?"

असली सवाल यह होना चाहिए कि "क्या हम हर चुनाव के साथ मतदाता के विश्वास को और अधिक मजबूत कर पा रहे हैं?"

क्योंकि लोकतंत्र की सफलता का एकमात्र पैमाना केवल शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन नहीं है। उसका सबसे बड़ा प्रमाण वह सामान्य नागरिक है, जो मतदान केंद्र की ओर बढ़ते हुए यह दृढ़ विश्वास रखता है कि “मेरी आवाज छोटी हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में वह व्यर्थ नहीं है।”

और यही लोकतंत्र का असली इम्तिहान है_चुनाव नहीं, मतदाता का अटूट विश्वास।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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