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समय का सच : DINK - ( Double Income, No Kids)

admin

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Jun 08, 2026
02:12 PM
DINK - ( Double Income, No Kids)

-UMEESH GUPTA

हम अपने माता-पिता की चार पुत्र एक पुत्री के रूप में पांच संताने है। आज पांचो की शादी हो गई,इस तरह से हम ( पति-पत्नी) 10 लोग हुए और उन 10 लोगों के बीच में कुल जमा 8 संताने हैं, उसमें भी तब,जब ऊपर के दो बड़े भाई बहनों की तीन-तीन संताने है। दो जन ( मुझे लेकर) _"हम दो, हमारा एक" और एक भाई तो "DINK - (Double Income, No Kids)" का प्रबल पक्षधर रहे है ।

तो, मुद्दा यह है कि- भारत तो पहले से ही जनसंख्या विस्फोट के कगार पर खड़ा है । लेकिन यदि हम पिछले दशक के कुछ आंकड़ों पर नजर डालें,तो पाते हैं की जो न्यूनतम फर्टिलिटी जो प्रति व्यक्ति 2.1 की औसत मानी गई है,हम उससे नीचे दिन प्रतिदिन आते जा रहे हैं । यह चिंता का विषय है-या खुशी का विषय है, हम जनसंख्या कंट्रोल कर रहे हैं- या कि हम किसी आपदा को आमंत्रित कर रहे हैं,

यह एक गंभीर विचारणीय प्रश्न है ?

ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 1.9 बच्चे प्रति महिला होने के क्या मायने हैं? जिस पर 6 जून को एलन मस्क ने भारत में जन्मदर पर चिंता जताई ?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े बताते हैं कि भारत की कुल प्रजनन दर (TFR - Total Fertility Rate) घटकर 1.9 रह गई है। (साधारण शब्दों में कहें तो औसतन एक महिला अब अपने जीवनकाल में दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है।) किसी भी समाज या देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए यह दर 2.1 होनी चाहिए, जिसे 'प्रतिस्थापन स्तर' (Replacement Level) कहा जाता है। जब दर 2.1 से नीचे चली जाती है, तो इसका सीधा मतलब यह है कि भविष्य में आबादी बढ़ने के बजाय घटने लगेगी।

यह आंकड़ा सुनते ही कई लोग कहेंगे—"अच्छी बात है, आबादी कम होगी, संसाधनों पर दबाव घटेगा।" लेकिन समाज और अर्थव्यवस्था के गहरे जानकार जानते हैं कि यह कहानी इतनी सीधी नहीं है।

विडंबना देखिए कि इस विषय पर सबसे अधिक चिंता दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक Elon Musk जताते हैं, जबकि भारत में न नेता चिंतित दिखते हैं, न नौकरशाही, न समाज सुधारक। यहां अभी भी बहस उसी पुराने डर पर अटकी है—"जनसंख्या विस्फोट"।

"जबकि सच यह है कि भारत पहली बार जनसंख्या विस्फोट नहीं, जनसंख्या सिकुड़ने की दिशा में बढ़ने के संकेत देख रहा है।"

"युवा बदल गए हैं, पर "व्यवस्था" नहीं बदली।"

आज का युवा अपने माता-पिता की पीढ़ी जैसा नहीं है।

वह शादी देर से कर रहा है।

कर भी रहा है तो बच्चे देर से चाहता है।

और बच्चा हो भी जाए तो दूसरा बच्चा उसकी आर्थिक गणित बिगाड़ देता है, इसलिए दूसरे बच्चे से दूरी बना ली है।

एक मध्यमवर्गीय परिवार जानता है कि बच्चे को जन्म देना आसान है, उसे योग्य नागरिक बनाना महंगा है-

"शिक्षा" निजी है।

"स्वास्थ्य" निजी है।

"कोचिंग" निजी है।

"सुरक्षा" निजी है।

यहां तक कि "रोजगार पाने की तैयारी भी निजी" है।

राज्य नागरिक से कहता है—"बच्चे पैदा करो", लेकिन बच्चे के पालन-पोषण का अधिकांश खर्च उसी नागरिक के कंधे पर छोड़ देता है।

युवाओं ने हिसाब लगाना सीख लिया है, इसीलिये तो कह रहा हूं कि - युवा बदल गए हैं, पर "व्यवस्था" नहीं बदली।

कभी भारत के गांव बड़े परिवारों के प्रतीक थे। आज वहां भी तस्वीर बदल रही है_

"खेती" छोटी हो रही है।

"जमीन" बंट रही है।

"रोजगार शहरों में खिसक गया है।"

आज का युवा परिवार की संख्या पर नहीं, गुणवत्ता पर ध्यान दे रहा है और यह बदलाव सामाजिक विकास का संकेत है ।

अचरज की बात यह नहीं है कि मस्क ने क्या कहा ? अचरज की बात यह है कि यह चिंता अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया या टेक्सास से आ रही है।

हमारे देश के भीतर,चाहे वे नीति निर्माता (Bureaucrats) हों, राजनेता हों या समाज की रग-रग का हिसाब रखने का दावा करने वाले समाजसेवी-इस मोर्चे पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है। नीति-निर्माताओं ने इसे समझने की गंभीर कोशिश नहीं की । शायद हमारे नीति निर्माताओं की टेबल पर फाइलें इतनी ऊंची हैं कि उन्हें खिड़की के बाहर बदलते समाज का यह सबसे बड़ा सच दिखाई ही नहीं दे रहा।उनकी राजनीति 'आज और अभी' पर चलती है जिसमें_

• वोट बैंक का गणित: जो बच्चा आज पैदा होगा, वह 18 साल बाद वोटर बनेगा। 18 साल बाद कौन सी पार्टी रहेगी, कौन सा नेता रहेगा, इसका बीमा कौन करे? नेताओं को तो वो भीड़ चाहिए जो पांच साल बाद उनके चुनावी वादों पर ताली बजा सके।

• फ्रीबीज बनाम भविष्य: मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और मुफ्त राशन बांटकर चुनाव जीतने की इस अंधी दौड़ में यह सोचने की फुर्सत किसे है कि आज से 25-30 साल बाद जब टैक्स भरने वाले युवा कम और पेंशन पर निर्भर बुजुर्गों की फौज ज्यादा होगी, तब यह 'फ्री' का टेंट कौन संभालेगा?

दुनिया के सबसे अमीर,तकनीकी दिग्गज एलन मस्क ने चेतावनी दी कि यदि यही रुख रहा, तो हर देश की तरह भारत भी एक जनसांख्यिकीय संकट (Demographic Crisis) की ओर बढ़ जाएगा। एलन मस्क बार-बार कहते हैं कि दुनिया के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में से एक "जनसंख्या का गिरना" है।उनकी चिंता केवल बच्चों की संख्या नहीं है।उनकी चिंता यह है कि जब जन्म कम होंगे तो भविष्य में_

काम करने वाले लोग कम होंगे,

करदाता कम होंगे,

वृद्धजन अधिक होंगे,

पेंशन और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा,

ऐसे में आर्थिक विकास धीमा पड़ सकता है।

यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया इस चुनौती को पहले से झेल रहे हैं।आज वहां सरकारें लोगों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर रही हैं। अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन समाज की बदली हुई मानसिकता वापस नहीं लौट रही।

सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि भारत में जन्मदर 1.9 क्यों हुई?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत की नीति-व्यवस्था इस बदलाव को समझ भी रही है?

संसद में इस पर गंभीर बहस नहीं होती।

चुनावी घोषणापत्रों में इसका जिक्र नहीं मिलता।

ब्यूरोक्रेसी अभी भी फाइलों में "जनसंख्या नियंत्रण" की भाषा खोज लेती है, लेकिन "जनसंख्या संतुलन" की भाषा विकसित नहीं कर पाई।

वस्तुतः भारत को अब दोहरी समझ की जरूरत है-एक, जनसंख्या विस्फोट वाले पुराने डर से मुक्त होना; और दो, घटती प्रजनन दर के नए सच को स्वीकार करना। इसके लिए केवल नारे नहीं, बल्कि किफायती आवास, बच्चों की देखभाल, सार्वजनिक स्वास्थ्य, मातृत्व सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्कूलिंग और कामकाजी माता-पिता के लिए सहायक व्यवस्था चाहिए।

समाज अगर माता-पिता बनने को मुश्किल बना देगा, तो जन्मदर का गिरना कोई नैतिक विफलता नहीं, बल्कि सामूहिक व्यवस्था की हार होगी। और अगर हम इसे समझने में देर करेंगे, तो 'आने वाला दशक बच्चों की कमी का नहीं, जिम्मेदारी की कमी का दशक कहलाएगा।"

युवा बच्चे इसलिए कम नहीं कर रहे कि उन्हें परिवार से प्रेम नहीं।वे कम बच्चे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भविष्य पर भरोसा कम है।

उन्हें लगता है-

क्या नौकरी मिलेगी?

क्या घर खरीद पाएंगे?

क्या शिक्षा का खर्च उठा पाएंगे?

क्या स्वास्थ्य सेवा सुलभ होगी?

"जब भविष्य असुरक्षित लगता है, तब परिवार छोटे हो जाते हैं।जन्मदर आंकड़ों से नहीं, उम्मीदों से तय होती है।"

अंतिम बात,

भारत अभी भी उस दौर में है जहां 1.9 की प्रजनन दर से घबराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी उतनी ही बड़ी भूल होगी।

क्योंकि,

समाज चुपचाप बदल रहा है।

युवा अपने फैसले ले चुके हैं।

परिवार का अर्थ बदल रहा है।

और हमेशा की तरह "व्यवस्था" सबसे पीछे चल रही है।

संख्या घटने या बढ़ने से पहले "उम्मीद घटती" है।

और किसी भी राष्ट्र के लिए यही सबसे गंभीर जनसांख्यिकीय चेतावनी होती है।

युवाओं की सोच अब 'वंश बढ़ाने' के पारंपरिक दबाव से मुक्त होकर 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' (Quality of Life) यानी जीवन की गुणवत्ता पर केंद्रित हो रही है।

विडंबना यह है कि भारत के नीति-निर्माता अभी भी जनसंख्या को गिन रहे हैं, जबकि युवा अपने भविष्य का हिसाब लगा रहे हैं और यही " समय का सच है।"

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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