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एसआईआर पर सुप्रीम फैसला : ईसी को मिली बड़ी राहत, शीर्ष अदालत ने निष्पक्ष चुनाव के लिए एसआईआर को बताया जरूरी

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May 27, 2026
06:10 AM
ईसी को मिली बड़ी राहत, शीर्ष अदालत ने निष्पक्ष चुनाव के लिए एसआईआर को बताया जरूरी

नई दिल्ली। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनोती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से चुनाव आयोग को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि एसआईआर में कोई खामी नहीं है। सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है और यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूची का शुद्ध होना बेहद जरूरी है।

पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया है और एसआईआर के दौरान नियमों के खिलाफ जाकर किसी मतदाता का नाम नहीं हटाया गया। अदालत ने माना कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सही मतदाता सूची आवश्यक है और इसी उद्देश्य से यह अभियान चलाया जा रहा है।

याचिकाओं में उठाए गए थे अधिकारों के सवाल

एसआईआर के खिलाफ दायर याचिकाओं में कहा गया था कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के दायरे से बाहर है। याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग की उस शर्त को चुनौती दी थी, जिसके तहत जिन लोगों का नाम 2002 या कुछ राज्यों में 2003 की मतदाता सूची में नहीं था, उन्हें पुराने मतदाता से पारिवारिक संबंध साबित करना जरूरी किया गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे गरीब, प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले लोगों के मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि उनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते। उन्होंने दावा किया कि यह प्रक्रिया लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिए थे अंतरिम निर्देश

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के निर्देश दिए थे। शुरुआत में आयोग ने सत्यापन के लिए 11 दस्तावेज तय किए थे, लेकिन बाद में अदालत ने आधार कार्ड को भी मान्य दस्तावेजों में शामिल करने का निर्देश दिया था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

कई राज्यों में चल रहा है अभियान

एसआईआर के खिलाफ अधिकांश याचिकाएं पिछले वर्ष जून में दाखिल हुई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में यह अभियान शुरू किया था। बाद में इसे पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु समेत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। चुनाव आयोग ने अदालत में कहा था कि फर्जी और अयोग्य मतदाताओं को हटाने तथा मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने के लिए यह अभियान बेहद जरूरी है।

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