सवाल जो कोई नहीं पूछता : डिग्री मिलना शिक्षा का अंत नहीं है, असली शिक्षा तब शुरू होती है, जब इंसान सवाल पूछना सीखता है

- UMEESH GUPTA
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती पर उनकी प्रेरणादायी शैक्षणिक एवं वैज्ञानिक विरासत को सादर समर्पित।
15 अक्टूबर भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और युवाओं के प्रेरणास्रोत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती है। यह दिन केवल एक महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि शिक्षा, ज्ञान और वैज्ञानिक सोच के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करने का भी अवसर है।
डॉ. कलाम का जीवन हमें सिखाता है कि जिज्ञासा, निरंतर सीखने की इच्छा और ज्ञान के प्रति समर्पण व्यक्ति को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं। उनकी विरासत से प्रेरित होकर एक सवाल उठता है कि "क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को केवल सही उत्तर देना सिखा रही है, या सही सवाल पूछने का साहस भी दे रही है?"
यह सवाल केवल शिक्षा व्यवस्था के सामने नहीं, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और पूरे समाज के सामने भी रखा जाना चाहिए _ तब जब सही उत्तर, सही सवाल से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए
हमारे समाज में किसी युवा के हाथ में डिग्री आते ही परिवार गर्व करता है, रिश्तेदार बधाई देते हैं और समाज उसकी शैक्षणिक उपलब्धि को सफलता का प्रमाण मान लेता है। लेकिन इसी उत्सव के बीच एक सवाल अक्सर अनसुना रह जाता है कि क्या डिग्री हासिल करने के साथ उस व्यक्ति ने स्वतंत्र रूप से सोचना भी सीख लिया है?
क्या वह किसी स्थापित मान्यता पर प्रश्न उठा सकता है? क्या वह किसी लोकप्रिय विचार से असहमत होने का साहस रखता है? क्या वह किसी सूचना को सच मानने से पहले उसके प्रमाण तलाशता है? और क्या उसमें नए तथ्य सामने आने पर अपनी राय बदलने की बौद्धिक ईमानदारी है?
उत्तर याद कर लेना ज्ञान का एक हिस्सा है; उत्तर की सत्यता को परखना बौद्धिक विकास का हिस्सा है।
हमारी शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी की योग्यता का आकलन अक्सर अंकों, परीक्षाओं और निर्धारित पाठ्यक्रम के आधार पर होता है। ये सभी आवश्यक हैं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इन्हें शिक्षा का अंतिम उद्देश्य मान लिया जाता है।कोई विद्यार्थी परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसे ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जहाँ उत्तर किताब में नहीं मिलते। वहाँ तर्क, विवेक, अनुभव और स्वतंत्र चिंतन की आवश्यकता होती है।
सवाल पूछना अवज्ञा नहीं, समझ की शुरुआत है
बचपन में बच्चे स्वाभाविक रूप से सवाल पूछते हैं- .....आसमान नीला क्यों है? कोई नियम ऐसा ही क्यों है? किसी बात को सही क्यों माना जाता है? लेकिन धीरे-धीरे कई बच्चे सीख जाते हैं कि कुछ सवाल पूछने से बचना बेहतर है । कभी उनकी जिज्ञासा को अनावश्यक बहस समझ लिया जाता है, कभी असहमति को अनुशासनहीनता और कभी स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाने को गलत व्यवहार मान लिया जाता है।
यहाँ एक अंतर समझना जरूरी है। हर प्रश्न सही नहीं होता और हर असहमति तर्कसंगत नहीं होती। लेकिन किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार कर लेना कि वह पुराना है, लोकप्रिय है या किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है, विवेकपूर्ण सोच नहीं है।
सवाल का उद्देश्य हर बात को गलत साबित करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि कोई बात सही क्यों है।
डॉ. कलाम का वैज्ञानिक जीवन जिज्ञासा और निरंतर सीखने के महत्व की याद दिलाता है। विज्ञान की प्रगति प्रश्नों, प्रयोगों, प्रमाणों और पुराने निष्कर्षों की समीक्षा से होती है। यही दृष्टिकोण शिक्षा में भी आवश्यक है।
उनकी विरासत को केवल प्रेरक कथनों तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। उनसे प्रेरणा लेने का अर्थ है कि हम बच्चों और युवाओं को स्वतंत्र रूप से सोचने, प्रयोग करने, गलतियों से सीखने और नए समाधान खोजने के अवसर दें।
एक विद्यार्थी जब पूछता है, “ऐसा क्यों है?”, तब वह केवल उत्तर नहीं खोज रहा होता; वह ज्ञान की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन रहा होता है।
डिग्री और विवेक के बीच का अंतर
डिग्री किसी व्यक्ति की शैक्षणिक उपलब्धि और अध्ययन का प्रमाण हो सकती है, लेकिन यह अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि वह हर परिस्थिति में विवेकपूर्ण निर्णय लेगा या गलत सूचना से बच पाएगा।
आज सूचना तक पहुँच आसान है। कुछ ही क्षणों में हम किसी विषय पर सैकड़ों दावे, वीडियो और टिप्पणियाँ देख सकते हैं। लेकिन सूचना की उपलब्धता और सत्य की पहचान दो अलग क्षमताएँ हैं।
क्या हम विद्यार्थियों को यह सिखा रहे हैं कि किसी दावे का स्रोत क्या है, प्रमाण कितना विश्वसनीय है और किसी सूचना को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि कैसे की जाए?
शिक्षित होना केवल जानकारी रखना नहीं, बल्कि जानकारी के साथ जिम्मेदारी से व्यवहार करना भी है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ केवल विज्ञान की किताबें पढ़ना नहीं, बल्कि प्रमाणों का सम्मान करना, तर्क के आधार पर निष्कर्ष निकालना और नए तथ्यों के सामने अपनी समझ विकसित करने के लिए तैयार रहना भी है।
क्या हम जिज्ञासु विद्यार्थी चाहते हैं या केवल सफल अभ्यर्थी?
हम बच्चों से अक्सर पूछते हैं_कितने अंक आए? कौन-सी रैंक मिली? किस कॉलेज में प्रवेश हुआ? नौकरी कब मिलेगी?
ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और व्यावसायिक सफलता जीवन के वास्तविक पक्ष हैं। लेकिन यदि बातचीत केवल इन्हीं तक सीमित हो जाए, तो शिक्षा के व्यापक उद्देश्य पीछे छूट जाते हैं।
हमें यह भी पूछना चाहिए कि तुमने ऐसा क्या सीखा जिसने तुम्हारी सोच बदली? किस प्रश्न का उत्तर तुम्हें अभी तक नहीं मिला? किस विचार से तुम असहमत हो और क्यों? क्या नए प्रमाण मिलने पर तुमने कभी अपनी पुरानी राय बदली है?
शिक्षकों की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण है। एक अच्छा शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करता, बल्कि ऐसा वातावरण बनाता है जहाँ विद्यार्थी बिना अपमान के प्रश्न पूछ सके, अपनी जिज्ञासा व्यक्त कर सके और तर्क के आधार पर अपनी समझ विकसित कर सके।
इसी तरह अभिभावकों को भी बच्चों के सवालों को केवल चुनौती नहीं, सीखने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
सवाल जो हमें स्वयं से पूछने चाहिए
क्या हम अपने बच्चों को केवल प्रतियोगिता में आगे निकलना सिखा रहे हैं, या दूसरों के विचारों को समझना भी?
क्या हम उनसे केवल आज्ञापालन की अपेक्षा करते हैं, या उचित तर्क के साथ असहमति व्यक्त करने का अवसर भी देते हैं?
क्या हम अपनी मान्यताओं के समर्थन में प्रमाण खोजते हैं, या केवल उन्हीं सूचनाओं को स्वीकार करते हैं जो हमारी सोच से मेल खाती हैं?
और क्या हम स्वयं कुछ नया सीखने के लिए तैयार हैं, या डिग्री और अनुभव के बाद यह मान लेते हैं कि अब सीखने के लिए बहुत कुछ शेष नहीं है?
इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक परीक्षा, नीति या संस्थान से नहीं मिलेगा। इसके लिए शिक्षा के प्रति हमारे दृष्टिकोण में बदलाव आवश्यक है।
डॉ. कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि
शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को रोजगार के योग्य बनाना नहीं, बल्कि उसे ज्ञानवान, विवेकशील, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना भी है। ऐसा व्यक्ति जो किसी बात को आँख बंद करके स्वीकार न करे, लेकिन बिना प्रमाण उसे खारिज भी न करे। जो असहमति से भयभीत न हो, लेकिन दूसरों की गरिमा का सम्मान करना जानता हो।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को उनकी जयंती पर याद करने का सार्थक तरीका केवल उनके योगदान का स्मरण करना नहीं, बल्कि जिज्ञासा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और निरंतर सीखने की भावना को अपने जीवन तथा शिक्षा व्यवस्था में स्थान देना भी है।
डिग्री एक पड़ाव है। सीखना एक निरंतर प्रक्रिया है। और सवाल पूछना उस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार है। क्योंकि शिक्षा की वास्तविक सफलता केवल इस बात में नहीं है कि विद्यार्थी कितना जानता है, बल्कि इसमें भी है कि वह अज्ञात को जानने के लिए कितने सार्थक सवाल पूछ सकता है।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की प्रेरणादायी शैक्षणिक एवं वैज्ञानिक विरासत को सादर समर्पित।
सवाल जो कोई नहीं पूछता_क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल होने की शिक्षा दे रहे हैं, या स्वतंत्र रूप से सोचने और सवाल पूछने के लिए भी तैयार कर रहे हैं?
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
