सवाल जो कोई नहीं पूछता : गुरु पूर्णिमा विशेष : हमारा गुरु कौन है?

- UMEESH GUPTA
29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा थी,
सुबह से सोशल मीडिया श्रद्धा में डूबा हुआ था। किसी ने गुरु के चरणों की तस्वीर लगाई थी, किसी ने संस्कृत का श्लोक, किसी ने कबीर का दोहा, किसी ने लिखा "गुरु ही जीवन का प्रकाश हैं।" सब कुछ बहुत सुंदर लगता है ना...लेकिन तभी मोबाइल फिर बजता है, संदेश आता है कि _"अत्यंत आवश्यक सूचना... इसे तुरंत 21 लोगों तक पहुँचाइए, मीडिया आपको यह सच कभी नहीं बताएगा...
और आश्चर्य देखिए...जो व्यक्ति पाँच मिनट पहले गुरु के चरणों में नतमस्तक था, वही बिना पढ़े, बिना जाँचे, बिना सोचे उस संदेश को आगे बढ़ा देता है। ऐसा लगता है जैसे श्रद्धा अभी समाप्त नहीं हुई...बस गुरु बदल गया।
कभी भारत में गुरु चुनना कठिन था। वर्षों की तपस्या, सेवा, अध्ययन और पात्रता के बाद शिष्य को गुरु मिलता था। आज गुरु चुनना बहुत आसान है, जिसके सबसे अधिक फ़ॉलोअर्स हों...जिसकी आवाज़ सबसे ऊँची हो...जिसका वीडियो सबसे अधिक वायरल हो...वही आज के सोशल मीडिया का "गुरु" है और "ज्ञान" का स्थान अब "रीच" ने ले लिया है। हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि जानकारी बहुत है, विडंबना यह है कि _"अब जानकारी और ज्ञान को एक ही समझ लिया गया है।"
मोबाइल में सूचना का महासागर है, लेकिन विवेक का कुआँ लगातार सूख रहा है। आज हर मोबाइल में एक विश्वविद्यालय चलता है । यहाँ प्रवेश परीक्षा नहीं होती,डिग्री नहीं मिलती,कोई उत्तरदायित्व नहीं होता,फिर भी करोड़ों विद्यार्थी रोज़ उपस्थित रहते हैं।
सुबह छह बजे पहला गुरु स्वास्थ्य विशेषज्ञ बनकर आता है।
आठ बजे वही इतिहास सुधार देता है।
दोपहर तक अर्थव्यवस्था समझा देता है।
शाम को विदेश नीति तय कर देता है।
और रात तक धर्म, दर्शन, विज्ञान और संविधान,चारों पर अंतिम निर्णय सुना देता है। और सच तो यह है कि इतनी सर्वज्ञता देखकर वेदव्यास भी शायद चकित रह जाएँ।
पहले शिष्य गुरु से पूछता था कि "मैं कैसे जानूँ कि सत्य क्या है?"अब शिष्य मोबाइल से पूछता है कि "मेरी राय के समर्थन में कोई वीडियो है?" यह परिवर्तन छोटा नहीं है, यहीं से सभ्यताएँ बदलती हैं।
पहले गुरु कहते थे "संदेह करो, फिर समझो।"अब एल्गोरिदम कहता है "रुको मत... अगला वीडियो देखो।"
पहले ज्ञान धैर्य माँगता था, अब भ्रम केवल इंटरनेट स्पीड माँगता है। व्यंग्य सोशल मीडिया पर नहीं है। सोशल मीडिया तो एक माध्यम है, व्यंग्य हम पर है क्योंकि मोबाइल ने हमारा विवेक नहीं छीना... हमने उसे स्वेच्छा से नोटिफिकेशन के हवाले कर दिया।
अब जो बात हमारी सोच से मेल खाती है, वही सत्य है। जो असुविधाजनक लगे, वह षड्यंत्र है। जो भावनाएँ भड़का दे, वह राष्ट्रहित है।और जो सोचने पर मजबूर करे...उसे पढ़ने का समय किसी के पास नहीं।
कबीर ने कहा था,
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
यदि कबीर आज होते तो शायद मुस्कराकर केवल इतना पूछते कि "तुम्हारा गुरु तुम्हें सोचने की स्वतंत्रता देता है... या केवल आगे भेजने ( स्क्रॉल करने ) की आदत?"
एकलव्य ने गुरु की प्रतिमा बनाई थी। आज हमने मोबाइल की स्क्रीन बना ली है, अंतर केवल इतना है कि उसने अपना अंगूठा गुरु-दक्षिणा में दिया था और हम अपना अंगूठा हर दिन स्क्रीन पर चलाकर यह मान लेते हैं कि हमने ज्ञान अर्जित कर लिया।
सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि झूठ फैल रहा है। झूठ तो हर युग में था। संकट यह है कि "आज झूठ भी ज्ञान का वेश पहनकर आता है।" उसके पास आँकड़े होते हैं, वीडियो होते हैं, संगीत होता है,भावनाएँ होती हैं और सबसे बड़ी बात...
उसे सत्य साबित करने के लिए लाखों लोग मिल जाते हैं।
इस गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु को प्रणाम कीजिए। अपने शिक्षकों को धन्यवाद दीजिए, लेकिन एक प्रणाम अपने विवेक को भी कीजिए क्योंकि वही एक गुरु है जो भीड़ देखकर अपना निर्णय नहीं बदलता, जो वायरल देखकर सत्य तय नहीं करता और जिसे किसी "फ़ॉरवर्डेड मैनी टाइम्स" संदेश की आवश्यकता नहीं पड़ती।
चलते चलते...
शायद आने वाले वर्षों में हमारे बच्चे हमसे यह नहीं पूछेंगे "आपके गुरु कौन थे?" वे शायद यह पूछेंगे कि "जब सच और वायरल संदेश आमने-सामने खड़े थे... तब आपने किस पर विश्वास किया था?" उस दिन हमारे पास उत्तर क्या होगा?
क्योंकि इतिहास यह याद नहीं रखता कि किसी संदेश को कितने लोगों ने साझा किया था, इतिहास केवल यह याद रखता है कि "सत्य के साथ खड़ा कौन था।"
और शायद...
यही वह सवाल है, जो कोई नहीं पूछता।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
