इमरजेंसी सेवा या जर्जर सिस्टम? : हाईवे पर टूटी उम्मीदों की तस्वीर, गनीमत थी की एंबुलेंस में नहीं था मरीज

शहडोल। शहडोल जिले के एनएच-43 पर उस वक्त अफरा-तफरी मच गई जब मरीजों की जान बचाने वाली 108 एंबुलेंस खुद ही बीच सड़क पर “बीमार” पड़ गई। बुढ़ार क्षेत्र के रुंगटा तिराहे के पास चलती एंबुलेंस से अचानक धुआं निकलने लगा और कुछ ही पलों में वाहन ने काम करना बंद कर दिया। हाईवे पर यह दृश्य केवल एक तकनीकी खराबी नहीं था, बल्कि पूरी इमरजेंसी व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन गया।
गनीमत यह रही कि उस समय एंबुलेंस में कोई मरीज नहीं था, वरना स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी। सड़क पर धुआं फैलने से कुछ देर के लिए यातायात भी प्रभावित हुआ और राहगीरों में दहशत का माहौल बन गया।
अचानक खराबी या सिस्टम की लापरवाही?
चालक के अनुसार एंबुलेंस अनूपपुर से शहडोल की ओर जा रही थी, तभी अचानक इंजन से तेज धुआं निकलने लगा। स्थिति को भांपते हुए वाहन को तुरंत सड़क किनारे रोका गया। बाद में इसे ठीक करने के लिए मैकेनिक को बुलाया गया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आपातकालीन सेवाओं में इस्तेमाल होने वाले वाहन इस स्थिति तक कैसे पहुंच रहे हैं? क्या नियमित मेंटेनेंस सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है?
अगर मरीज होता तो कौन जिम्मेदार होता?
इस घटना ने एक गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। यदि एंबुलेंस में मरीज होता, तो क्या उसे समय पर अस्पताल पहुंचाया जा पाता? क्या यह सिस्टम उसकी जान बचा पाता या रास्ते में ही हार मान लेता?
मेंटेनेंस पर उठे गंभीर सवाल
स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि 108 एंबुलेंस जैसी जीवनरक्षक सेवाओं में नियमित जांच और रखरखाव बेहद जरूरी है। लापरवाही की स्थिति में ऐसी घटनाएं केवल असुविधा नहीं बल्कि जानलेवा साबित हो सकती हैं। यह मामला सिर्फ एक खराब वाहन का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की कमजोर कड़ी का प्रतीक है जिस पर लोगों की जान टिकी होती है।
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