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क्या 12 मिनट तक खड़े रहकर नापेंगे देशभक्ति : शशि थरूर ने वंदे मातरम को लेकर खड़े किए सवाल, कहा- सम्मान दिल से आता है कानून से नहीं

प्रफुल्ल तिवारी

प्रफुल्ल तिवारी

Aug 11, 2026
09:37 AM
शशि थरूर ने वंदे मातरम को लेकर खड़े किए सवाल, कहा- सम्मान दिल से आता है कानून से नहीं

नई दिल्ली। केन्द्र की मोदी सरकार ने ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित करा लिया है। सरकार ने इस संशोधन के जरिए वंदे मातरम को कानूनी सुरक्षा देने और इसे जन गण मन के बराबर दर्जा देने का प्रावधान किया है। सरकार के इस कदम पर सियासी बयानबाजी भी शुरू हो गई है। इसी क्रम में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने वंदे मातरम को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि क्या लोग 12 मिनट तक खड़े रहेंगे। सम्मान दिल से आता है, कानून से नहीं।

थरूर ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि राष्ट्रपति ने संसद में बिना चर्चा के पारित ‘वंदे मातरम संशोधन’ को मंजूरी दे दी है। उनके मुताबिक, संशोधन के बाद किसी भी सरकारी कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रगान के साथ पूरे राष्ट्रगीत का गायन अनिवार्य होगा।

नए नियम की व्यावहारिकता पर उठाए सवाल

कांग्रेस सांसद ने कहा कि वह ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ दोनों का बेहद सम्मान करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें राष्ट्रगीत के शुरुआती दो पद याद हैं और वे उन्हें गा सकते हैं, लेकिन बाकी पद पहले कभी अनिवार्य नहीं रहे हैं। यहीं से उन्होंने नए नियम की व्यावहारिकता पर सवाल उठाया।

12 मिनट तक खड़े रहने का सवाल

थरूर ने कहा कि राष्ट्रगान के दौरान लोगों से सम्मानपूर्वक खड़े रहने और करीब 52 सेकंड तक ध्यान केंद्रित रखने की अपेक्षा की जाती है। वहीं, उनके अनुसार पूरे ‘वंदे मातरम’ के गायन में करीब 3 मिनट 10 सेकंड लगते हैं। इसके अलावा तमिलनाडु में राज्य गीत को भी इन दोनों से पहले गाने का फैसला किया गया है, जिसमें लगभग दो मिनट लगते हैं।

थरूर ने सवाल उठाया कि यदि कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों समय ये सभी गीत गाए जाते हैं, तो लोगों को कुल मिलाकर करीब 12 अतिरिक्त मिनट तक सम्मानपूर्वक खड़े रहना पड़ेगा। उन्होंने पूछा कि क्या इतने लंबे समय तक लोगों को बिना हिले-डुले खड़े रहने की अपेक्षा करना व्यावहारिक है।

‘सम्मान कानून से नहीं थोपा जा सकता’

थरूर ने आशंका जताई कि ‘वंदे मातरम’ के प्रति सम्मान बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया यह कानून कहीं उलटा असर न डाल दे। उनका कहना है कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति वास्तविक सम्मान लोगों की भावना और स्वेच्छा से पैदा होता है, केवल कानूनी बाध्यता से नहीं।

प्रफुल्ल तिवारी
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प्रफुल्ल तिवारी

एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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