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भस्म आरती में राजसी स्वरूप में सजे बाबा महाकाल : भांग-चंदन और भस्म से हुआ दिव्य शृंगार, जय श्री महाकाल के जयघोष से गूंजा मंदिर परिसर

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Sep 21, 2026
04:45 AM
भांग-चंदन और भस्म से हुआ दिव्य शृंगार, जय श्री महाकाल के जयघोष से गूंजा मंदिर परिसर

उज्जैन। श्री महाकालेश्वर मंदिर में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर सोमवार को बाबा महाकाल की भस्म आरती विधि-विधान और भक्तिभाव के साथ संपन्न हुई। भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का राजसी और रौद्र स्वरूप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा। भांग, चंदन और भस्म से किए गए दिव्य शृंगार में बाबा महाकाल के अलौकिक दर्शन ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

सोमवार तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के बीच बाबा महाकाल के मंदिर के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार और धार्मिक जयघोष गूंजने लगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु बीती रात से ही बाबा महाकाल की भस्म आरती के दर्शन के लिए कतार में खड़े थे।

पट खुलने के बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके पश्चात दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से तैयार पंचामृत से अभिषेक हुआ। पूजा-अर्चना के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के बाद बाबा महाकाल को मुकुट धारण कराया गया। इसके बाद झांझ-मंजीरों, ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के बीच भस्म आरती संपन्न हुई।

भांग, चंदन और भस्म से सजा दिव्य स्वरूप

भस्म आरती के अवसर पर बाबा महाकाल के ज्योतिर्लिंग का विशेष शृंगार किया गया। भांग, चंदन और भस्म से बाबा का आकर्षक स्वरूप सजाया गया। इस दौरान बड़ी और जीवंत आंखें, लाल-काली भौंहें तथा विशेष मूंछें बनाकर बाबा को राजसी और रौद्र स्वरूप प्रदान किया गया। दिव्य शृंगार के बाद बाबा महाकाल के दर्शन होते ही मंदिर परिसर ‘जय श्री महाकाल’ के उद्घोष से गूंज उठा।

महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा

परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के बाद बाबा महाकाल निराकार से साकार स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य होता है।

महाआरती के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए और सुख-समृद्धि की कामना की। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।

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