मंगलवार, 13 अक्टूबर 202611:51:30 PM
Download App
Home/देश

विपक्ष के दोहरे मापदंड : केरलम की जीत 'ईमानदार', लेकिन चुनाव आयोग 'अवैध' ?

admin

admin

Oct 13, 2026
10:45 AM
केरलम की जीत 'ईमानदार', लेकिन चुनाव आयोग 'अवैध' ?

-मनोज वर्मा

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया और दिलचस्प नैरेटिव देखने को मिल रहा है। एक तरफ कांग्रेस और समूचा विपक्ष देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं, विशेषकर चुनाव आयोग पर "वोट चोरी" और निष्पक्ष न होने का गंभीर आरोप लगा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, हाल ही में केरलम (केरल) विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) ने शानदार जीत दर्ज की और सरकार बनाई।

अब सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की देखरेख में केरलम का चुनाव हुआ और जहाँ कांग्रेस की सरकार बनी, उसी विधानसभा ने एकजुट होकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर दिया। अब केरलम कांग्रेस का यही कदम कांग्रेस और उसके साथ समूचे विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त है। हालांकि वे तर्क दे सकते हैं कि वे इसी माध्यम से लोकतंत्र में अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त कर सकते हैं या विरोध जता सकते हैं, लेकिन सवाल तो फिर भी खड़े होते हैं।

तर्क की कसौटी पर विपक्ष के दोहरे मापदंड

यदि निष्पक्ष और तार्किक नजरिए से देखा जाए, तो विपक्ष का यह रुख दो सीधे और तीखे सवालों के घेरे में आता है: और ये भी साफ होता है कि इसके पीछे विपक्ष की मंशा आखिरकार है क्या। अब सवाल उठता है कि यदि चुनाव आयोग 'पक्षपाती' है, तो केरलम की जीत क्या है? क्या ये जीत अवैध है, अगर हां तो चुनाव आयोग वैध कैसे, और अगर आयोग वैध है तो जीत अवैध कैसे?

अगर कांग्रेस और विपक्षी दलों का यह दावा सही है कि चुनाव आयोग सरकारी मशीनरी के साथ मिलकर "वोट चोरी" कर रहा है और चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए हैं, तो फिर केरलम में कांग्रेस गठबंधन की सरकार कैसे बन गई? तमिलनाडु में टीवीके की सरकार कैसे बनी। खुद कांग्रेस डीएमके का दशकों पुराना साथ छोड़ इस गठबंधन का हिस्सा बना गई है। क्या इन दोनों राज्यों के चुनाव किसी किसी दूसरे देश के चुनाव आयोग ने कराए थे?

* अंतर्विरोध: यदि विपक्ष केरलम और तमिलनाडु की अपनी जीत को जनता का वास्तविक जनादेश मानता है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि चुनाव प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष थी। ऐसा ही उसे तेलंगाना, कनार्टक और हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में भी मानना होगा, या मानना चाहिए।

और यदि वह चुनाव प्रणाली को 'दूषित' मानता है, तो नैतिक रूप से उसे केरलम सहित तमाम राज्यों में मिली जीत और अपनी सरकार की वैधता पर भी सवाल उठाना चाहिए। लेकिन विपक्ष ऐसा कभी नहीं करेगा। वह अपनी जीत को "जनता की लहर" बताता है और अपनी हार को "संस्थाओं की चोरी"।

जीत की जमीन पर खड़े होकर संस्था पर हमला

केरलम विधानसभा में प्रस्ताव पास करने का मतलब यह निकलता है कि विपक्ष सत्ता का सुख तो उसी व्यवस्था से लेना चाहता है, लेकिन उसी व्यवस्था की साख को गिराने का कोई मौका भी नहीं छोड़ना चाहता। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के रहते हुए यदि विपक्ष चुनाव जीत सकता है, तो यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि चुनाव आयोग किसी एक दल के इशारे पर काम नहीं कर रहा है। ऐसे में अपनी सरकार बनने के तुरंत बाद विधानसभा से ऐसा प्रस्ताव पास कराना राजनीतिक अपरिपक्वता और केवल एक खास 'नैरेटिव' चमकाने की कोशिश दिखाई देती है।

कटघरे में राहुल और विपक्ष

विपक्ष की रणनीति यह बन चुकी है कि जिन राज्यों (जैसे केरलम, कर्नाटक, तेलंगाना या हिमाचल) में वे जीतते हैं, वहां ईवीएम और चुनाव आयोग बिल्कुल सही काम करते हैं। लेकिन जिन राज्यों या लोकसभा चुनाव में वे पिछड़ जाते हैं, वहां तुरंत "लोकतंत्र की हत्या" का रोना शुरू हो जाता है। राहुल गांधी संसद से लेकर सड़क तक हाथ में संविधान की प्रति लेकर घूमते हैं। लेकिन उनकी ही पार्टी की सरकार एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था (चुनाव आयोग) के अधिकार क्षेत्र और मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाला प्रस्ताव लाती है, वह भी यह जानते हुए कि राज्य विधानसभा के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार ही नहीं है।

विश्वसनीयता का संकट

लोकतंत्र में जनता सब देखती है। जब आप उसी व्यवस्था के तहत मिले मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं और अगले ही पल उसी व्यवस्था को 'अवैध' घोषित करने का प्रस्ताव लाते हैं, तो जनता के बीच आपकी राजनीतिक विश्वसनीयता (Credibility) समाप्त होने लगती है।

केरलम का यह प्रस्ताव चुनाव आयोग को कमजोर करे या न करे, लेकिन इसने कांग्रेस और वामपंथी दलों के उस नैरेटिव को जरूर खोखला कर दिया है जिसमें वे खुद को लोकतंत्र का इकलौता रक्षक बताते हैं। अगर खेल के नियम सिर्फ तभी तक अच्छे हैं जब तक आप जीत रहे हैं, तो समस्या नियमों में नहीं, बल्कि खिलाड़ी की खेल भावना में है। इसके साथ ही आपको ये भी समझना होगी, रील्स ये व्यूज रियल लाइफ में मिले जनाधार की जगह नहीं ले सकते। इसके लिए धरना-प्रदर्शन, रैली, जलूस-जलसा, जो करने पड़े करिए। लेकिन इतना ध्यान रखिये की इससे संवैधानिक संस्थाओं का रसूख और साख खतरे में नहीं पड़े।

और अंत में मई 1996 में संसद (लोकसभा) में विश्वास मत (Confidence Motion) पर बहस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के भाषण को ध्यान रखना होगा। जब उनकी 13 दिन की सरकार गिरने वाली थी, और उन्होंने इस्तीफा देने से पहले देश के लोकतंत्र और राष्ट्र की सर्वोच्चता पर यह अविस्मरणीय बात कही थी। अटलजी ने कहा था, "यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। पार्टियां आएंगी-जाएंगी, सरकारें बनेंगी-बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र रहना चाहिए।"

admin
Written By

admin

एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

आपको यह खबर कैसी लगी? शेयर करें

अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें