सवाल जो कोई नहीं पूछता : नीम लगा शहद, ( 21 जून _ Fathers Day)

- UMEESH GUPTA
कल 21 जून है, कैलेंडर बता रहा है कि कल "फादर्स डे" है।
कल सोशल मीडिया पर तस्वीरें बदल जाएंगी। पिता के साथ पुरानी यादें साझा होंगी। धन्यवाद और सम्मान से भरे संदेश लिखे जाएंगे। कुछ घंटों के लिए पूरी दुनिया को याद आ जाएगा कि "पिता" भी हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लेकिन एक सवाल है, जो शायद कोई नहीं पूछता_
"की क्या पिता साल के 365 दिन में केवल एक दिन वो भी कुछ घंटों के लिए याद किया जाना चाहिए ?"
सभी बातों के पहले हमे समझना है कि "पिता" है कौन -
"पिता" परिवार का वह ध्रुव तारा, आधारशिला, और छायादार वृक्ष है, जो निःस्वार्थ पूरे परिवार के सपनों को सींचता है। सामान्य भाषा में पिता के विभिन्न रूपों को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है-
•त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति है "पिता", पिता उस कठोर चट्टान की तरह है जो परिवार की खातिर खुद धूप-छाँव सहता है, लेकिन अपने बच्चों को हमेशा आरामदायक छाँव देता है।
"मंगलेश डबराल" अपनी कविता में लिखते है_
"पिता कहते हैं ......
लेकिन मैंने जो नए कमरे जोड़े हैं
इस पुराने मकान में उन्हें तुम ले लो
मेरी अच्छाई ले लो उन बुराइयों से जूझने के लिए
जो तुम्हें रास्ते में मिलेंगी
मेरी नींद मत लो मेरे सपने लो !!"
•अनुशासन और संस्कार का प्रतीक है "पिता", पिता को परिवार के उस कठोर संरक्षक के रूप में देखा जाता है, जो बच्चों के भविष्य को सही आकार देने के लिए सख्त होकर अनुशासन का पाठ पढ़ाता है ।
"धूल-धूसरित कदमों से घर लौटते हैं पिता,
दिन भर की थकान चेहरे पर समेटे पिता।
गोधूलि की इस बेला में भी असीम धैर्य लिए,
परिवार की ख़ुशी का पर्याय होते हैं पिता।'
•भीतर से कोमल, बाहर से कठोर- बाहर से नारियल के समान कठोर, शब्दों और अनुशासन में नीम की तरह कड़वे, लेकिन भीतर से मोम की तरह कोमल और चंपा सा सुगंधित होता है "पिता", उनका निःशब्द प्यार शब्दों से कहीं अधिक गहरा होता है।
तभी तो "कवि कुमार विश्वास" कहते है कि _
"फ़िर पुराने नीम के नीचे खड़ा हूँ
फ़िर पिता की याद आई है मुझे..."
और "चंद्रकांत देवतले" कहते है_
"प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी ।"
•जीवन का संबल है "पिता" ,प्रेमचंद और जैनेंद्र जैसे साहित्यकारों के अनुसार, पिता परिवार का वह मुख्य स्तंभ है जिस पर घर की आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा टिकी होती है। अहा, जिम्मेदारी उठाने वाला पिता ।
"विजया सिंह" की पंक्तियों में -
"पिता की नर्म आँख काँच हो चुकी होती
लगता हम जिसे देख रहे हैं
वह, वह नहीं जिसे हम पहचानते हैं
कोई और है
और अभी लौट रहा है गुप्त अँधेरों से
पाँव में छाले और पीठ में दर्द लिए !"
हमे समझना है कि पिता के प्रति हमारी क्या जिम्मेदारी है चाहे वह पारिवारिक हो, सामाजिक या नैतिक, और यह भी समझना है कि आखिर कब अकेले हो जाते हैं?
क्या तब, जब उनके बाल सफेद हो जाते हैं?
क्या तब, जब उनकी कमर झुकने लगती है?
या तब, जब उनकी नौकरी समाप्त हो जाती है?
नहीं, ...पिता उस दिन अकेले होने लगते हैं, जब परिवार में उनकी मौजूदगी को स्वाभाविक मान लिया जाता है, लेकिन उनके मन की कोई खबर नहीं ली जाती।जब उनकी सलाह को "पुरानी सोच" कहकर अनसुना कर दिया जाता है।
जब उनकी जरूरतों से ज्यादा उनकी कमियों पर चर्चा होने लगती है। और जब उनके बच्चों के पास पूरी दुनिया के लिए समय होता है, लेकिन उनके लिए नहीं।
आज का समाज तेजी से बदल रहा है।संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है।रिश्तों की जगह सुविधाएं और संवाद की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है।ऐसे समय में सबसे अधिक उपेक्षित यदि कोई हुआ है, तो वह घर का वह व्यक्ति है जिसने पूरी जिंदगी अपने परिवार की खुशियों के लिए संघर्ष किया, वह है माता-पिता।
आज देश के अनेक वृद्धाश्रम उन कहानियों से भरे पड़े हैं, जहां बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक रूप से नहीं, भावनात्मक रूप से परित्यक्त हैं। वे भूखे नहीं हैं।उनके पास रहने की जगह भी है।लेकिन उनके पास वह नहीं है जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है -"अपनों का साथ"।
उनकी प्रतीक्षा किसी पैसे की नहीं होती।वे तो बस चाहते हैं कि बेटा या बेटी फोन करके पूछ ले कि"पिताजी, आप कैसे हैं?"
लेकिन समाज की पूरी तस्वीर इतनी निराशाजनक भी नहीं है_ इसी समाज में कुछ ऐसी कहानियां भी हैं जो मानवता और पारिवारिक मूल्यों पर विश्वास बनाए रखती हैं। हाल ही में गाजियाबाद में एक ऐसी घटना सामने आई जो मैने TV 27 News के माध्यम से जाना, जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया।एक पिता गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी किडनी और लीवर दोनों प्रभावित हो चुके थे। डॉक्टरों ने बताया कि जीवन बचाने के लिए तुरंत प्रत्यारोपण आवश्यक है।उस कठिन समय में उनकी दो बेटियां उनके लिए ढाल बनकर खड़ी हो गईं।बड़ी बेटी ने अपनी एक किडनी दान कर दी और छोटी बेटी ने अपने लीवर का एक हिस्सा देकर अपने पिता को नया जीवन दिया।यह केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं थी।यह उस रिश्ते की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति थी, जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।जिस पिता ने कभी अपनी बेटियों को गोद में उठाकर चलना सिखाया था, आज वही बेटियां उनके जीवन का सहारा बन गईं।
यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है।यह पूरे समाज के लिए एक संदेश है कि "माता-पिता की सेवा का संबंध बेटा या बेटी होने से नहीं, बल्कि संस्कार और संवेदनशीलता से होता है।"दरअसल, पिता प्रेम का प्रदर्शन कम करते हैं।वे अपने त्याग का हिसाब नहीं रखते।बेटे-बेटियों के सपनों को पूरा करने के लिए अपने सपनों को छोटा कर लेते हैं, वे अपनी जरूरतें भूल जाते हैं।वे घर की दीवारों की तरह होते हैं,दिखाई कम देते हैं, लेकिन पूरा घर उन्हीं पर टिका होता है।
शायद यही कारण है कि हम उनके महत्व को तब समझते हैं, जब वे धीरे-धीरे हमारे जीवन के केंद्र से स्मृतियों का हिस्सा बनने लगते हैं।
"फादर्स डे"का वास्तविक अर्थ महंगे उपहार नहीं हैं।पिता को शायद किसी महंगी घड़ी, कपड़े या समारोह की उतनी जरूरत नहीं होती। यह दिन पिता के मूल्यों को समझते हुए भूल सुधार करने का है, पिता को कल से ज्यादा सम्मान देने का है, उनके त्याग, समर्पण, व्यथा को समझने का है, जवानी जो उन्होंने समझौते में काटी, उसे महसूस करने का है ,और लौटाने का है। उन्हें जरूरत है_
सम्मान की,
दो शब्दों की,
कुछ समय की,
और उस "भरोसे की" कि जिस परिवार के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया, उस परिवार में उनकी जगह आज भी सुरक्षित है।
आज जब हम फादर्स डे मना रहे हैं, तब शायद हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए- क्या हम अपने पिता को केवल याद कर रहे हैं, या वास्तव में उनके साथ हैं? क्योंकि एक तरफ कुछ पिता वृद्धाश्रमों की खिड़कियों से अपने बच्चों का इंतजार कर रहे हैं, कुछ घर में रहकर भी उपेक्षित और असहाय है, कुछ मौन है, कुछ दुनिया से छिपकर एकांत में रो लेते है ,तो दूसरी तरफ कुछ बेटियां अपने शरीर का हिस्सा देकर अपने पिता को जीवन लौटा रही हैं।
समाज की असली दिशा इन दोनों तस्वीरों के बीच कहीं तय हो रही है।
पिता बाहर से कितना भी कड़वा या सख्त हो अंदर से नीम की तरह औषधीय गुणों से भरा हुआ, गुलाब सा कोमल, सुगंधित और आम के घने वृक्ष सा छायादार और फलों से भरा हुआ, शहद सा मीठा होता है।
चलते चलते ..
"सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" जी की नीचे लिखी पंक्तियाँ एक पिता की हृदय विदारक और गहरी असहायता को व्यक्त करती है । युवावस्था में ही पुत्री की असमय मृत्यु से पिता टूट चुका है ,वह ग्लानि से भरा है कि अपनी बेटी के लिए जीवित रहते हुए जो सुख-वैभव या कर्तव्य पूरे नहीं कर सका, उसका प्रायश्चित वह अपने जीवन भर के सत्कर्मों (पुण्यों) को उसे समर्पित करके कर रहा है -
"मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दु:ख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!!"
......यह है "पिता",
पर सवाल जो कोई नहीं पूछता...
जब पिता बूढ़े हो जाएंगे, कमजोर हो जाएंगे और उन्हें हमारी जरूरत होगी, तब क्या हम उनके लिए उतने ही उपलब्ध होंगे, जितने वे हमारे बचपन में हमारे लिए थे? जैसी पवित्र, निःस्वार्थ भावना उनकी हमारे लिए थी।
क्योंकि पिता को सबसे ज्यादा जरूरत सम्मान की नहीं, बल्कि अपनापन महसूस करने की होती है और शायद फादर्स डे का सबसे बड़ा संदेश भी यही है कि _
"पिता वृद्ध हो सकते हैं, लेकिन उन्हें कभी अकेला,असुरक्षित,उपेक्षित नहीं होना चाहिए।"
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट"
एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,
admin
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
