समय का सच : स्थानीय भ्रष्टाचार में रमता हमारा जीवन

- UMEESH GUPTA
भ्रष्टाचार अब हमें चौंकाता नहीं।
यही उसकी सबसे खतरनाक सफलता है।
कभी यह शब्द गुस्सा पैदा करता था, आज एक हल्की मुस्कान के साथ लोग कह देते हैं—
“बिना पैसे दिए यहाँ काम कहाँ होता है?”
यानी हमने भ्रष्टाचार को समस्या नहीं, व्यवस्था मान लिया है।
बड़े घोटालों की खबरें टीवी पर चलती हैं, बहसें होती हैं, बयान आते हैं।लेकिन असली भ्रष्टाचार वह नहीं जो राजधानी की फाइलों में छिपा है।
असली भ्रष्टाचार वह है जो रोज़ छोटे शहरों, तहसीलों, पंचायतों और सरकारी दफ्तरों की टेबलों पर बैठा रहता है।
भोपाल जैसे बड़े शहरों में विकास की तस्वीरें चमकती हैं, योजनाओं के बोर्ड लगते हैं, और आंकड़ों में प्रगति दिखाई जाती है। लेकिन जब आम आदमी किसी सरकारी दफ्तर की चौखट पर खड़ा होता है, तो उसे असली व्यवस्था का सामना होता है—जहाँ हर फाइल की अपनी एक “कीमत” तय होती है, भले ही वह कहीं लिखी न हो।
यह भ्रष्टाचार किसी बड़े घोटाले की तरह शोर नहीं करता।
यह चुपचाप काम करता है—
किसी बुजुर्ग की पेंशन रोक देता है,
किसान की फाइल दबा देता है,
छात्रवृत्ति अटका देता है,
और फिर धीरे से कहता है—
“काम हो जाएगा… थोड़ा खर्चा लगेगा।”
सबसे खतरनाक बात यह है कि यह अब एक संगठित तंत्र बन चुका है। छोटे कर्मचारी से लेकर उच्च स्तर तक एक ऐसी चुप्पी कायम रहती है, जहाँ गलत को देखा भी जाता है और अनदेखा भी किया जाता है। कागजों में विकास पूरा होता है, जमीन पर अधूरा रहता है—और इस “कागजी प्रगति” का लाभ आम जनता तक नहीं पहुँचता।

लेकिन सवाल केवल व्यवस्था पर उठाना पर्याप्त नहीं है।
एक सवाल हमें खुद से भी पूछना होगा—
क्या भ्रष्टाचार सिर्फ दफ्तरों में है, या हमारे भीतर भी बस चुका है?
जब हम बिना लाइन लगे काम करवाने के लिए पहचान ढूंढते हैं,
जब नियमों को तोड़ने में सुविधा देखते हैं,
जब “चलता है” कहकर गलत को नजरअंदाज करते हैं—
तब हम भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, जिसकी शिकायत करते हैं।
धीरे-धीरे यह भ्रष्टाचार केवल प्रक्रिया नहीं, मानसिकता बन जाता है।
बच्चा देखता है कि काम “सेटिंग” से होता है,
युवा सीखता है कि योग्यता से ज्यादा पहुँच मायने रखती है,
और समाज यह मान लेता है कि ईमानदारी एक आदर्श है, व्यवहारिक नहीं।
सबसे दुखद स्थिति तब आती है जब ईमानदार व्यक्ति असहज महसूस करने लगता है।
रिश्वत न देने वाला “मूर्ख” कहलाता है,
और नियमों का पालन करने वाला “असमझदार”।
छोटे शहरों और कस्बों में यह स्थिति और गहरी है, क्योंकि वहाँ विकल्प कम हैं और डर ज्यादा। लोग लड़ना चाहते हैं, लेकिन डरते हैं कि कहीं उनका काम और न अटक जाए। यही डर भ्रष्टाचार की असली ताकत बन जाता है।
सच यह है कि भ्रष्टाचार केवल पैसों का खेल नहीं है।
यह समाज का नैतिक साहस धीरे-धीरे खत्म करता है।
यह मेहनत करने वालों का भरोसा तोड़ता है,
गरीब का आत्मसम्मान छीनता है,
और युवाओं को यह सिखाता है कि व्यवस्था बदलने से आसान है उसमें ढल जाना।
किसी भी समाज की असली पूँजी उसकी इमारतें या सड़कें नहीं होतीं,
बल्कि लोगों का आपसी भरोसा होता है।
और जब यह भरोसा टूटने लगता है,
तो विकास केवल दिखाई देता है—महसूस नहीं होता।
इसलिए अब सबसे जरूरी सवाल यह नहीं कि भ्रष्टाचार कहाँ है।
सबसे जरूरी सवाल यह है—
क्या हमने उसके साथ जीना सीख लिया है?
और अगर जवाब “हाँ” है,
तो समस्या व्यवस्था में नहीं,
हमारी स्वीकार्यता में है।
यही है… " समय का सच" ।
लेखक: TV27 NEWS के कंसल्टिंग एडिटर और वाइस प्रेसिडेंट हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
