नई पीढ़ी को चाहिए प्यार, संवाद और संस्कार : संघ प्रमुख ने परिवार और मातृत्व की भूमिका पर रखे अपने विचार, कहा- बदलते समय संवाद सबसे बड़ी जरूरत

अमेठी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने परिवार, मातृत्व और नई पीढ़ी के बदलते स्वभाव को लेकर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। युगानुकूल मातृत्व विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम का समापन में मोहन भागवत ने कहा कि समय के साथ बच्चों की सोच और अपेक्षाएं बदल चुकी हैं। आज के बच्चे हर बात को समझना चाहते हैं और बिना तर्क के किसी बात को स्वीकार नहीं करते। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। उन्हें बच्चों के साथ समय बिताने, स्नेह देने और लगातार संवाद बनाए रखने की आवश्यकता है।
बदलते समय में संवाद बना सबसे बड़ी जरूरत
मोहन भागवत ने अपने बचपन का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले माता-पिता की बातों को बिना किसी प्रश्न के स्वीकार कर लिया जाता था, क्योंकि उनके प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा होती थी। लेकिन आज की पीढ़ी हर विषय पर प्रश्न करती है और उसके पीछे का कारण जानना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव स्वाभाविक है और इसे समझते हुए अभिभावकों को बच्चों के साथ धैर्यपूर्वक बातचीत करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि परिवारों में संवाद की कमी रिश्तों को कमजोर कर रही है। यदि माता-पिता बच्चों की बात सुनेंगे और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर देंगे, तो परिवार अधिक मजबूत और विश्वासपूर्ण बनेंगे।
भारतीय संस्कृति पर विश्वास रखने की अपील
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लंबे औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय समाज के मन में यह धारणा बैठा दी गई कि उसकी परंपराएं पिछड़ी हुई हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। भारतीय संस्कृति अनुभव, जीवन मूल्यों और संतुलित जीवन पद्धति पर आधारित है, इसलिए इसे आत्मविश्वास के साथ अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों से बिना सोचे-समझे पश्चिमी जीवनशैली का अनुसरण करने के बजाय भारतीय जीवन मूल्यों को अपनाने का आग्रह किया।
मातृत्व को बताया सृष्टि का आधार
मोहन भागवत ने कहा कि मातृत्व केवल एक सामाजिक भूमिका नहीं, बल्कि सृष्टि के निर्माण, संरक्षण और निरंतरता का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि मातृत्व के बिना समाज और मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं है। दुनिया के कई देशों में परिवार, विवाह और मातृत्व जैसी संस्थाओं पर उठ रहे सवालों का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे अत्यधिक व्यक्तिवाद का परिणाम बताया। उनके अनुसार जिन समाजों ने केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च माना, वे अब उसके दुष्परिणामों पर पुनर्विचार कर रहे हैं।
विज्ञान की सीमाओं का भी किया उल्लेख
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने विज्ञान और परंपरा के संबंध पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा माना जाता था कि विज्ञान हर प्रश्न का उत्तर दे सकता है, लेकिन अब स्वयं वैज्ञानिक भी स्वीकार कर रहे हैं कि विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने कहा कि भारत की परंपराएं केवल मान्यताओं पर नहीं, बल्कि लंबे व्यावहारिक अनुभव और जीवन के गहरे ज्ञान पर आधारित हैं। इसलिए आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना भी उतना ही आवश्यक है।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
