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सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणीः : क्या ‘क्रीमी लेयर’ के बाद भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए? कहा- संतुलन बनाए रखना जरूरी

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May 22, 2026
10:15 AM
क्या ‘क्रीमी लेयर’ के बाद भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए? कहा- संतुलन बनाए रखना जरूरी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आरक्षण व्यवस्था और सामाजिक गतिशीलता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कड़े सवाल उठाए। मामला पिछड़े वर्गों में ‘क्रीमी लेयर’ को आरक्षण का लाभ दिए जाने की सीमा से जुड़ा था। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताते हुए पूछा कि जब किसी परिवार ने शिक्षा और आर्थिक स्थिति के आधार पर ऊंचा सामाजिक स्तर हासिल कर लिया है, तो उनकी अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी परिवार में दोनों माता-पिता भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में कार्यरत हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति के बाद अगली पीढ़ी को भी आरक्षण का लाभ मिलना सामाजिक न्याय की मूल भावना पर पुनर्विचार की मांग करता है।

याचिकाकर्ता का पक्ष: सामाजिक स्थिति आर्थिक आय से अलग

याचिकाकर्ता के वकील शशांक रतनू ने तर्क दिया कि आरक्षण केवल आय के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ग्रुप-ए और कई मामलों में ग्रुप-बी स्तर के कर्मचारियों को भी क्रीमी लेयर के दायरे में रखा जाता है, जबकि वास्तविक सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता।

ईडब्ल्यूएस और क्रीमी लेयर के बीच अंतर पर बहस

अदालत में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और क्रीमी लेयर की अवधारणा के बीच अंतर को लेकर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने कहा कि ईडब्ल्यूएस पूरी तरह आर्थिक आधार पर तय होता है, जबकि क्रीमी लेयर में सामाजिक और शैक्षणिक उन्नति भी शामिल होती है। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि दोनों को समान मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों की प्रकृति अलग है।

कोर्ट की टिप्पणीः संतुलन बनाए रखना जरूरी

पीठ ने कहा कि आरक्षण नीति में संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी परिवार के माता-पिता उच्च सरकारी पदों पर पहुंच चुके हों और पर्याप्त आर्थिक व सामाजिक प्रगति कर चुके हों, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सामाजिक गतिशीलता हो चुकी है। ऐसे में यह गंभीर विचार का विषय है कि अगली पीढ़ी को आरक्षण के दायरे में रखना कितना उचित है। मामले में कोर्ट ने नोटिस जारी कर आगे की सुनवाई की बात कही है।

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