समय का सच : लोकतंत्र की सबसे बड़ी फसल : संवाद

-UMEESH GUPTA
जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहाँ लोकतंत्र केवल शासन नहीं रहता—वह जनविश्वास बन जाता है।"
"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।"
— ऋग्वेद
अर्थात्—साथ चलो, साथ बोलो और एक-दूसरे के मन को समझो।
यह केवल एक वैदिक मंत्र नहीं है। यह भारतीय सभ्यता का वह लोकतांत्रिक दर्शन है, जिसने हजारों वर्ष पहले ही यह समझ लिया था कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सैन्य क्षमता, उसकी संपत्ति या उसकी सत्ता नहीं, बल्कि उसके भीतर “जीवित संवाद” होता है।
आज, जब मध्यप्रदेश के मूंग आंदोलन का समाधान वार्ता से निकला है, तब यह घटना केवल एक राज्य की प्रशासनिक सफलता नहीं रह जाती। यह पूरे भारतीय लोकतंत्र के सामने एक ऐसा प्रश्न खड़ा करती है, जिसका उत्तर केवल सरकारों को नहीं, बल्कि समाज, राजनीति और हम सभी नागरिकों को मिलकर देना होगा।
क्या संवाद आज भी हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है?
मध्यप्रदेश के मूंग आंदोलन से निकला एक प्रश्न, जो पूरे भारतीय लोकतंत्र से उत्तर माँगता है।
भारत ने लोकतंत्र को केवल संविधान लागू होने के बाद नहीं सीखा। संवाद हमारी सभ्यता के संस्कारों में बहुत पहले से विद्यमान रहा है। वैदिक सभाओं से लेकर बौद्ध संघों तक, ग्राम पंचायतों से लेकर गणराज्यों तक, और स्वतंत्र भारत की संविधान सभा से लेकर आधुनिक संसद तक—भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का सबसे मजबूत आधार शक्ति नहीं, संवाद रहा है।
यही कारण है कि भारत का लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान की एक सतत परंपरा भी है। लेकिन आज, जब समाज बदल रहा है, अपेक्षाएँ बदल रही हैं और नागरिक अधिक जागरूक हो रहे हैं, तब एक प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है-
क्या हमारे लोकतंत्र में “संवाद” की संस्कृति उतनी ही मजबूत है, जितनी हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, उसकी सबसे बड़ी परीक्षा उस दिन होती है जब किसी नागरिक को यह महसूस होता है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही। पिछले कुछ दिनों में मध्यप्रदेश ने लोकतंत्र का एक ऐसा दृश्य देखा जिसने इस प्रश्न को फिर से जीवित कर दिया।
मूंग खरीदी को लेकर किसान अपनी मांगों के साथ आंदोलनरत थे। किसानों की अपनी चिंताएँ थीं, सरकार के सामने अपनी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियाँ थीं, परिस्थितियाँ ऐसी बन गईं कि मामला सड़क तक पहुँचा, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति का परिचायक बना।
सरकार और किसान प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे।
वार्ता हुई,
तर्क हुए,
मांगों पर विचार हुआ,
कुछ निर्णय लिए गए,
कुछ आश्वासन दिए गए,
और अंततः आंदोलन समाप्त हो गया।
यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, यह लोकतंत्र के उस मौलिक सिद्धांत की पुनर्पुष्टि थी, जिसमें किसी की पराजय आवश्यक नहीं होती; आवश्यक होता है विश्वास का पुनर्निर्माण। यहीं यह विचार जन्म लेता है कि खेतों में खड़ी मूंग की फसल जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह अदृश्य फसल है जो लोकतंत्र में उगती है-
“संवाद की फसल”
क्योंकि अनाज की फसल पेट भरती है, लेकिन संवाद की फसल समाज को टूटने से बचाती है। इतिहास इस सत्य का सबसे बड़ा साक्षी है।
महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा जनांदोलन खड़ा किया। उन्होंने सत्याग्रह किया, असहयोग किया, नमक कानून तोड़ा, जेल गए, लाखों लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। लेकिन संघर्ष के बीच भी उन्होंने संवाद का द्वार कभी बंद नहीं किया। गोलमेज सम्मेलन हो या वायसराय से मुलाकात,गांधी का विश्वास था कि स्थायी समाधान केवल शक्ति से नहीं, “संवाद” से निकलता है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा में लगभग तीन वर्षों तक तीखी बहसें हुईं। भाषा, नागरिक अधिकार, संघीय ढाँचा, न्यायपालिका और अनेक संवेदनशील विषयों पर मतभेद थे। यदि उन मतभेदों को टकराव में बदल दिया जाता, तो शायद दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संविधान कभी अस्तित्व में नहीं आता।
लेकिन वहाँ एक संस्कृति थी..
“असहमति के बीच भी संवाद की संस्कृति”
इसीलिए संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं बना; वह सहमति, धैर्य और लोकतांत्रिक परिपक्वता का दस्तावेज़ बन सका। इतिहास केवल गौरवगान सुनाने के लिए नहीं होता। इतिहास इसलिए होता है कि वर्तमान अपनी गलतियों और सफलताओं को पहचान सके। यदि गांधी का सत्याग्रह, संविधान सभा का विमर्श और स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक यात्रा हमें कुछ सिखाती है, तो वह यही कि संवाद कभी कमजोरी नहीं होता, बल्कि परिपक्व लोकतंत्र का सबसे बड़ा आत्मविश्वास होता है।
यही कारण है कि आज जब हम अपने समय की ओर देखते हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक सरकार, किसी एक आंदोलन या किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का बन जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अनेक दृश्य देखे हैं_
· कहीं किसान अपनी फसलों और नीतियों को लेकर सड़कों पर उतरे।
· कहीं छात्र शिक्षा और प्रवेश परीक्षाओं को लेकर अपनी आवाज़ बुलंद करते दिखाई दिए।
· कहीं युवाओं ने भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और रोजगार के अवसरों को लेकर आंदोलन किए।
· कहीं स्थानीय समुदाय अपने अधिकारों और विकास से जुड़े प्रश्नों के साथ प्रशासन के सामने खड़े हुए।
इन सभी घटनाओं की परिस्थितियाँ अलग थीं। इनकी माँगें अलग थीं, इनकी पृष्ठभूमि भी अलग थी, लेकिन यदि इन सबके बीच कोई एक सूत्र समान था, तो वह था..
"हमें सुना जाए"
यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा आग्रह है।
लोकतंत्र में नागरिक केवल पाँच वर्ष में एक बार मतदान करने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह शासन का साझेदार होता है। उसकी भागीदारी चुनाव परिणामों से समाप्त नहीं होती; वहीं से शुरू होती है। इसीलिए जब कोई किसान अपनी उपज का मूल्य पूछता है, जब कोई छात्र अपनी परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाता है, जब कोई युवा रोजगार के अवसरों को लेकर आवाज़ उठाता है, तो वे केवल अपनी व्यक्तिगत समस्या नहीं रखते; वे लोकतंत्र से संवाद की अपेक्षा करते हैं। यहीं लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा होती है।
“क्या व्यवस्था नागरिक को सुनती है, या केवल प्रतिक्रिया देती है?”
जंतर-मंतर केवल एक स्थान नहीं, एक प्रतीक है
दिल्ली का जंतर-मंतर भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा सार्वजनिक स्थल बन चुका है जहाँ समय-समय पर देश के विभिन्न वर्ग अपनी बात लेकर पहुँचते रहे हैं। किसान, छात्र, कर्मचारी, सामाजिक संगठन, महिलाएँ, दिव्यांग, पूर्व सैनिक, अलग-अलग समय में अनेक समूह वहाँ अपनी आवाज़ दर्ज कराते रहे हैं। जंतर-मंतर की सबसे बड़ी पहचान किसी एक आंदोलन से नहीं, बल्कि इस तथ्य से है कि लोकतंत्र में नागरिक अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का अधिकार रखते हैं।
लेकिन हर बार जब कोई आंदोलन सड़क तक पहुँचता है, तब हमें केवल आंदोलन नहीं देखना चाहिए; हमें यह भी पूछना चाहिए..
“क्या संवाद की शुरुआत पहले हो सकती थी?”
यह प्रश्न सरकार से भी है। यह प्रश्न आंदोलनों का नेतृत्व करने वालों से भी है और यह प्रश्न समाज से भी है, क्योंकि लोकतंत्र में संवाद एकतरफा नहीं होता। संवाद के लिए दोनों पक्षों में सुनने का धैर्य और समझने का साहस होना चाहिए।
लोकतंत्र की परिपक्वता क्या है?
लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि विरोध हुआ या नहीं। विरोध तो लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि विरोध के बाद क्या हुआ।
क्या संवाद हुआ?
क्या समाधान खोजने का ईमानदार प्रयास हुआ?
क्या दोनों पक्ष अपनी-अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों को समझ सके?
यदि उत्तर "हाँ" है, तो लोकतंत्र मजबूत है।
यदि उत्तर "नहीं" है, तो केवल आंदोलन समाप्त होने से समस्या समाप्त नहीं होती।
दुनिया का इतिहास भी यही कहता है..
दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने सत्ताईस वर्ष जेल में बिताने के बाद प्रतिशोध का नहीं, संवाद का मार्ग चुना। यदि उन्होंने बदले की राजनीति चुनी होती, तो शायद दक्षिण अफ्रीका लंबे गृहसंघर्ष में फँस जाता।
उत्तरी आयरलैंड में दशकों तक चली हिंसा का अंत किसी सैन्य विजय से नहीं, बल्कि लंबी वार्ताओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति से हुआ।
भारत में भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था कि "मित्र बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं।" यह केवल विदेश नीति का वाक्य नहीं था; यह संवाद की राजनीति का दर्शन था।
इसी प्रकार, जीएसटी परिषद भारतीय संघीय लोकतंत्र का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें एक ही मेज़ पर बैठती हैं, बहस करती हैं, असहमत होती हैं और अंततः राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास करती हैं।
यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
टकराव नहीं—संवाद।
लोकतंत्र का सौंदर्य इस बात में नहीं है कि वहाँ विरोध नहीं होता। विरोध तो जीवंत समाज का प्रमाण है। जहाँ प्रश्न नहीं होते, वहाँ प्रगति भी नहीं होती। जहाँ असहमति नहीं होती, वहाँ विचार भी नहीं जन्म लेते। इसलिए किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती विरोध को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे संवाद में बदलना होती है।
आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तकनीक बदल रही है, समाज की आकांक्षाएँ भी बदल रही हैं। ऐसे समय में शासन और समाज के बीच संवाद पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। क्योंकि आज नागरिक केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं है, वह निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी भी चाहता है।
यहीं लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
क्या सरकारें केवल निर्णय सुनाएँगी या निर्णय से पहले समाज को सुनेंगी?
क्या आंदोलन केवल विरोध दर्ज कराएँगे या समाधान की दिशा में भी कदम बढ़ाएँगे?
क्या राजनीतिक दल केवल आरोप लगाएंगे या राष्ट्रीय हित में संवाद की संस्कृति को भी मजबूत करेंगे?
और क्या हम नागरिक, सोशल मीडिया की तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठकर धैर्यपूर्वक एक-दूसरे को सुनने की क्षमता विकसित करेंगे?
इन प्रश्नों के उत्तर ही भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को निर्धारित करेंगे, क्योंकि लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से संचालित नहीं होता। संविधान दिशा देता है, लेकिन उसे जीवंत नागरिकों का विश्वास बनाता है। यह विश्वास तभी बनता है, जब सत्ता सुनने का धैर्य रखे और समाज संवाद करने का संस्कार। इसीलिए किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होती कि उसने कितने कानून बनाए।
“सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि उसने कितने मन जोड़े”
इतिहास गवाह है…साम्राज्य तलवार से बने होंगे, लेकिन राष्ट्र विश्वास से बनते हैं। विश्वास आदेश से नहीं आता, विश्वास संवाद से आता है और संवाद तब जन्म लेता है जब दोनों पक्ष यह स्वीकार करते हैं कि सत्य पर किसी एक का एकाधिकार नहीं है। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष होना चाहिए, लेकिन मनों का विभाजन नहीं। आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि देश में आंदोलन समाप्त हो जाएँ, आवश्यकता इस बात की है कि आंदोलन अंतिम विकल्प बनें, पहला नहीं। व्यवस्था इतनी संवेदनशील हो कि नागरिक की आवाज़ सड़क पर आने से पहले ही सुन ली जाए। और यदि कभी सड़क तक बात पहुँचे भी, तो समाधान का मार्ग टकराव नहीं, वार्ता की मेज़ बने।
शायद यही भारत की प्राचीन परंपरा भी रही है।
ऋग्वेद ने कहा—"संगच्छध्वं संवदध्वं।"
बुद्ध ने संवाद को ज्ञान का मार्ग बनाया।
सम्राट अशोक ने युद्ध के बाद संवाद को शासन का आधार बनाया।
महात्मा गांधी ने संघर्ष के साथ संवाद को जोड़ा।
संविधान सभा ने मतभेदों को बहस में बदला और बहस को संविधान में।
यानी भारत की सभ्यता हमें बार-बार एक ही बात सिखाती रही….
“संवाद हार नहीं है,
संवाद समझौता नहीं है,
संवाद लोकतंत्र का सर्वोच्च साहस है।“
समय का सच
जब कोई किसान अपनी फसल की चिंता लेकर खड़ा होता है...
जब कोई छात्र अपने भविष्य को लेकर प्रश्न पूछता है...
जब कोई युवा रोजगार की उम्मीद लेकर व्यवस्था का दरवाज़ा खटखटाता है...
जब कोई नागरिक न्याय की अपेक्षा करता है...
तब लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उत्तर देना नहीं होती।
“सबसे पहली जिम्मेदारी होती है—उसे सुनना”
क्योंकि जिसे सुना जाता है, वह व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखता है और जिसे बार-बार अनसुना किया जाता है, वह अंततः व्यवस्था से दूर होने लगता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार चुनाव हारना नहीं है।
“लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार है-जनविश्वास खो देना”
और उसकी सबसे बड़ी जीत चुनाव जीतना नहीं है। उसकी सबसे बड़ी जीत वह क्षण है, जब मतभेद के बाद भी दो पक्ष एक-दूसरे के सामने बैठकर कह सकें..
"आइए... बात करते हैं"
क्योंकि युद्ध मैदान में जीते जाते हैं...
मुकदमे अदालतों में जीते जाते हैं...
चुनाव मतपेटियों में जीते जाते हैं...
“लेकिन विश्वास...
विश्वास केवल “संवाद” से जीता जाता है।“
खेतों में उगने वाली हर फसल एक मौसम के बाद कट जाती है। लेकिन लोकतंत्र की एक फसल ऐसी है जिसे हर पीढ़ी को फिर से बोना पड़ता है...हर सरकार को उसे सींचना पड़ता है...हर नागरिक को उसकी रक्षा करनी पड़ती है...उस फसल का नाम है..
“संवाद”
और शायद इसलिए...
इस देश ने युद्ध भी देखे हैं, विभाजन भी देखा है, आंदोलन भी देखे हैं और असहमतियों के लंबे दौर भी, लेकिन हर बार भारत इसलिए आगे बढ़ा, क्योंकि अंततः उसने संवाद का रास्ता चुना।
यही भारत की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पूँजी है।
इसे बचाए रखना ही हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, क्योंकि खेतों में उगने वाली हर फसल एक मौसम के बाद कट जाती है…लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी फसल “संवाद” हर पीढ़ी को फिर से बोनी पड़ती है।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
