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‘आत्मनिर्भरता सिर्फ हथियार बनाने तक सीमित नहीं’ : थल सेनाध्यक्ष की दो टूक- लंबे युद्ध के लिए खुद को लगातार मजबूत करना होगा

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Sep 27, 2026
08:06 AM
थल सेनाध्यक्ष की दो टूक- लंबे युद्ध के लिए खुद को लगातार मजबूत करना होगा

नई दिल्ली। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का मतलब केवल देश में हथियार और सैन्य उपकरण तैयार करना नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में सैन्य क्षमता को बनाए रखने और जरूरत के मुताबिक उसे लगातार बदलने की क्षमता हासिल करना है। थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने रविवार को यह बात कही। उन्होंने कहा कि बदलते युद्धक्षेत्र में तकनीक, रणनीति और संघर्ष की अवधि तेजी से बदल रही है, इसलिए आत्मनिर्भरता की सोच को भी उसी गति से विकसित करना होगा।

अब युद्ध की तस्वीर बदल चुकी है

‘बदलते युद्ध के दौर में आत्मनिर्भरता’ विषय पर बोलते हुए जनरल सेठ ने कहा कि पिछली सदी के युद्धों की तरह आज के संघर्षों का स्पष्ट अंत दिखाई नहीं देता। उन्होंने 1971 में ढाका में हुए आत्मसमर्पण का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय युद्ध के समाप्त होने का एक स्पष्ट क्षण सामने आया था। इसके विपरीत आज संघर्ष लंबे समय तक चल सकते हैं और उनके बीच अचानक भीषण लड़ाई देखने को मिल सकती है।

उनके मुताबिक तकनीक लड़ाई की तीव्रता और अवधि को प्रभावित कर सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि इससे पूरा युद्ध भी जल्दी समाप्त हो जाए।

तकनीक बदलने की रफ्तार बनी बड़ी चुनौती

सेनाध्यक्ष ने कहा कि किसी सैन्य क्षमता को तैयार करने, विकसित करने, जांचने और सेना में शामिल करने में कई साल लग जाते हैं, जबकि तकनीक बेहद तेजी से बदलती है। इसलिए चुनौती केवल स्वदेशी तकनीक और हथियार विकसित करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि सेना तक पहुंचने के समय वह तकनीक आधुनिक और उपयोगी बनी रहे।

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना की जरूरतें देश की भौगोलिक विविधता के कारण भी अलग हैं। समुद्र तल से लेकर अत्यधिक ऊंचाई और भीषण गर्मी से लेकर बेहद कम तापमान वाले इलाकों तक सेना को काम करना पड़ता है।

सस्ता ड्रोन, महंगे हथियार के लिए खतरा

जनरल सेठ ने बदलती तकनीक का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ सौ डॉलर की कीमत वाला ड्रोन लाखों डॉलर के सैन्य मंच के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे में कम लागत वाली, स्मार्ट और बड़ी संख्या में उपलब्ध तकनीक का महत्व बढ़ गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि पुरानी सैन्य प्रणालियों को तुरंत अनुपयोगी मान लेना सही नहीं होगा। आधुनिक सेंसर और अग्नि नियंत्रण प्रणालियों के साथ पुरानी एयर डिफेंस तोपें भी ड्रोन और उनके समूहों के खिलाफ प्रभावी साबित हो सकती हैं।

लंबी मारक क्षमता के साथ जमीन पर सैनिक जरूरी

थल सेनाध्यक्ष ने कहा कि भारतीय सेना को लंबी दूरी तक मार करने वाली क्षमता के साथ मजबूत जमीनी क्षमता की भी जरूरत है। लंबी दूरी के हथियार युद्धक्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन जमीन पर कब्जा करने और उसे नियंत्रित रखने का काम अंततः सैनिक ही करता है।

उन्होंने कहा कि सूचना, साइबर और अंतरिक्ष जैसे नए युद्धक्षेत्रों का महत्व बढ़ रहा है, लेकिन जमीन पर नियंत्रण ही सफलता का प्रत्यक्ष संकेतक है। इसलिए हर सैन्य क्षमता का अंतिम केंद्र सैनिक होना चाहिए।

80 से ज्यादा देशों तक पहुंचे भारतीय रक्षा उत्पाद

जनरल सेठ ने आत्मनिर्भरता की दिशा में हुई प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुंच चुके हैं। 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का स्वदेशीकरण किया जा चुका है और रक्षा उत्पादन में करीब 16 हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग भाग ले रहे हैं।

उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता देश को लड़ने की स्वतंत्रता देती है, क्षमता लड़ने की सामर्थ्य देती है और सैनिक लड़ने की इच्छाशक्ति देता है। ये तीनों मिलकर देश को जीतने की क्षमता प्रदान करते हैं।

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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