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सवाल जो कोई नहीं पूछता… : किराए का साथी… किराए की संवेदना…

admin

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Jul 10, 2026
02:10 AM
किराए का साथी… किराए की संवेदना…

- UMEESH GUPTA

"तन्हा दिल, तन्हा सफ़र…" शायद इसी भाव को सहलाने के लिए अब भारत में भी "किराए का पार्टनर" उपलब्ध होने का दावा किया जा रहा है। घंटे के हिसाब से भुगतान कीजिए और कोई आपके साथ कॉफी पीने, फिल्म देखने, किसी समारोह में जाने या कुछ देर बातें करने आ जाएगा।

समाचार छोटा है, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा है।

हाल के दिनों में एक वायरल दावा सामने आया है कि KoPartner.in नाम की वेबसाइट के माध्यम से घंटे के हिसाब से "रेंटल पार्टनर" बुक किए जा सकते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह सेवा शॉपिंग, मूवी, घूमने या सामाजिक आयोजनों में साथ देने के लिए "प्रोफेशनल साथी" उपलब्ध कराने का दावा करती है।

लेकिन इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वेबसाइट नहीं है।

सवाल यह नहीं है कि ऐसी वेबसाइट क्यों बनी। सवाल यह है कि वह खालीपन किसने पैदा किया, जिसे अब बाज़ार भरने निकला है?

समाज में हर नई व्यवस्था किसी न किसी कमी को भरने के लिए जन्म लेती है। हमारे यहाँ परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं था, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा की सबसे मजबूत दीवार था। पड़ोस अपनापन देता था, रिश्तेदार सहारा बनते थे और मित्र जीवन की कठिन राहों को आसान कर देते थे।

आज तस्वीर बदल रही है। तेज़ शहरीकरण, नौकरी का दबाव, प्रतिस्पर्धा, मोबाइल-आधारित जीवनशैली और लगातार घटता सामाजिक संवाद लोगों को भीतर से अलग-थलग कर रहा है। भीड़ पहले से कहीं अधिक है, लेकिन बातचीत पहले से कहीं कम। हजारों डिजिटल संपर्क हैं, लेकिन मन की बात सुनने वाला शायद ही कोई हो।

क्या हम तकनीक से जुड़ते-जुड़ते, इंसानों से कटते जा रहे हैं?

यही अकेलापन ऐसे प्रयोगों को जन्म देता है, जहाँ भावनात्मक ज़रूरतों को भी बाज़ार के माध्यम से पूरा करने की कोशिश की जाती है।

यह प्रवृत्ति जितनी आधुनिक दिखती है, उतनी ही गंभीर भी है। क्योंकि जब इंसानी संबंधों को अनुबंध और भुगतान के आधार पर परिभाषित किया जाने लगे, तब संवेदना, भरोसा और आत्मीयता पीछे छूटने लगती है। रिश्तों का सबसे बड़ा मूल्य उनकी निःस्वार्थता में होता है। दोस्त, जीवनसाथी, भाई-बहन या परिवार इसलिए विशेष हैं क्योंकि वहाँ उपयोगिता नहीं, अपनापन होता है। किराए का साथ कुछ समय की उपस्थिति दे सकता है, लेकिन जीवनभर का भरोसा नहीं।

पर,यह भी सच है कि महानगरों में लाखों लोग परिवार से दूर रहते हैं। काम का दबाव, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव कई लोगों को अस्थायी साथ तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए इस विषय को केवल नैतिकता के चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा। हमें उस पीड़ा को भी समझना होगा जिसने ऐसे बाज़ार को जन्म दिया है।

लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े होते हैं।

- क्या ऐसी सेवाओं में पर्याप्त पारदर्शिता है?

- क्या उपयोग की सीमाएँ स्पष्ट हैं?

- क्या व्यक्तिगत सुरक्षा और गोपनीयता पूरी तरह सुनिश्चित है?

- क्या कहीं भावनात्मक शोषण या मानसिक निर्भरता का जोखिम तो नहीं?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजे बिना ऐसी किसी भी व्यवस्था को केवल आधुनिकता या मनोरंजन का नया रूप मान लेना जल्दबाज़ी होगी।

क्या अकेलापन अब एक नया उद्योग बनता जा रहा है?

असल में, यह खबर "किराए के साथी" से अधिक "किराए की संवेदना" के दौर में प्रवेश करते समाज का संकेत देती है। जब घरों में संवाद कम हो जाए, परिवारों में समय कम पड़ जाए और रिश्तों में धैर्य घटने लगे, तब बाज़ार खाली जगह भरने की कोशिश करता है।

लेकिन बाज़ार रिश्ते नहीं बना सकता।

वह सुविधा दे सकता है, अपनापन नहीं।

वह विकल्प दे सकता है, भरोसा नहीं।

भारतीय सभ्यता ने "वसुधैव कुटुम्बकम्" का विचार दिया था। हमारे यहाँ अतिथि देवता था, पड़ोसी परिवार का विस्तार था और रिश्ते जीवनभर निभाए जाते थे। यदि उसी देश में साथ निभाने के लिए ऐप डाउनलोड करना पड़े, तो हमें तकनीक पर नहीं, अपनी सामाजिक संरचना पर प्रश्न करना चाहिए।

समय आ गया है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल होना नहीं, बल्कि रिश्ते निभाना भी सिखाएँ। उन्हें यह भी बताएँ कि जीवन का सबसे बड़ा निवेश बैंक खाते में नहीं, विश्वास के खाते में होता है।क्या सुविधा की सबसे बड़ी कीमत कहीं हमारी संवेदना तो नहीं बनती जा रही? क्योंकि सभ्यता की पहचान उसकी तकनीक से नहीं, उसके रिश्तों से होती है। आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन यदि उसके साथ आत्मीयता, संवाद और अपनापन कम होते जाएँ, तो वह विकास अधूरा रह जाता है।

और अंत में… सवाल जो कोई नहीं पूछता-

यदि कल हमारी अगली पीढ़ी यह पूछे,

"दादा जी, क्या आपके ज़माने में दोस्ती भी पैसे देकर की जाती थी?"

तो हमारे पास क्या उत्तर होगा?

और शायद निदा फ़ाज़ली ने ऐसे ही समय के लिए लिखा था_

«"एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक,

जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा…"

शायद आज का सबसे बड़ा सामाजिक संकट अकेलापन नहीं, बल्कि अपनापन खो देने का भय है।

_ अगले पखवाड़े के शुक्रवार को फिर मिलेंगे… एक नए सवाल के साथ, जो कोई नहीं पूंछता।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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