सवाल जो कोई नहीं पूछता : घर की चटकती दीवार

- UMEESH GUPTA
एक पाँच साल का बच्चा।
जिस उम्र में वह खेलना, हंसना और सुरक्षा के सहारे जीना चाहता था, उसी उम्र में उसके शरीर और बाल मन-मस्तिष्क पर यौन हिंसा की भयानक छाप डाल दी गई। महाराष्ट्र के संभाजीनगर का सप्ताह भर पहले का यह मामला कभी भी एक “खबर” के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यह केवल एक पिता द्वारा अपने ही बच्चे पर किया गया यौन अपराध नहीं है,यह एक बच्चे के भरोसे की हत्या है।जीवन के सबसे बड़े भरोसे का-जो वह अपने पिता पर रखता था, अपने घर पर रखता था, अपने परिवार पर रखता था।
और फिर कुछ दिनों पहले "बहराइच ( उत्तर प्रदेश)" की घटना। _
जहाँ एक विवाहिता ने अपने ही पिता तुल्य ससुर की यौन दरिंदगी की शिकायत अपने पति से की और जवाब में उसे सुरक्षा नहीं मिली। उसे मिला "तीन तलाक" ।
शिकायत का इनाम अपमान बना।अत्याचार उजागर करने का परिणाम बेदखली बना। यह केवल एक महिला के साथ अन्याय नहीं है, यह उस पारिवारिक ढांचे की सड़न है, जहाँ सच बोलना भी खतरे की बात बन जाता है, और पीड़ा को “परिवार की इज्जत” के नाम पर दबा दिया जाता है।
ये दोनों घटनाएँ अलग नहीं हैं।
ये दो मामले नहीं, एक ही समाज के दो घाव हैं।
और ये घाव बहुत गहरे हैं।
पहली घटना_ जन्मदाता ने तोड़ा बच्चे का भरोसा_
संभाजीनगर के मामले में सबसे भयावह बात सिर्फ “अपराधी पिता” नहीं है। सबसे डरावनी बात यह है कि बच्चा लंबे समय तक सहमा रहा, डरा रहा, परेशान रहा, क्या असर हुआ होगा उसके बाल मन पर ? और हम जैसे अभिवावक अपनी व्यस्तता, लापरवाही के चलते अक्सर बच्चों के असामान्य व्यवहार के ऐसे संकेतों को पहचान ही नहीं पाते।बच्चा बोलता नहीं, लेकिन उसका व्यवहार तो बोलता है। उसकी खामोशी, उसका असामान्य डर, उसका अचानक बदल जाना-ये सब खतरे की घंटी ही तो है। पर हम इन्हें “बच्चे की नाजुक उम्र” कहकर टाल देते हैं।
यही वह मानसिकता है जो यौन अपराधों को बढ़ावा देती है।
हम बच्चों को या घर की महिलाओं को सिर्फ “बाहर वाले” से सावधान करना सिखाते हैं। लेकिन यह नहीं सिखाते कि खतरा घर के भीतर भी हो सकता है।
हम “गुड टच” और “बैड टच” का नाम लेते हैं, लेकिन रिश्तों के भीतर छिपी गंदगी पर बात नहीं करते। हम शोर मचाते हैं कि बच्चा सुरक्षित रहे,महिलाये सुरक्षित रहे, लेकिन घर के भीतर कौन क्या कर रहा है उस पर नजर नहीं रखते।
और जब बच्चे, बच्चियां और महिलाएं शिकार हो जाती है, तब हमें अहसास होता है कि अरे, "घर"भी क्या सबसे असुरक्षित जगह बन सकता है?
दूसरी घटना_ पिता तुल्य ससुर ने बहू को बेटी नहीं स्त्री का शरीर समझा _
बहराइच की घटना में महिला ने जब अपने पति को ससुर की करतूत बताई, तो उसे सहयोग नहीं मिला, उसे सज़ा मिली। ससुर ने कथित तौर पर अवैध तमंचा दिखाकर कई बार बहू से दुष्कर्म किया। "यह केवल बलात्कार नहीं था" यह वासना, शक्ति, डर और वर्चस्व का घिनौना खेल था और जब पीड़िता ने हिम्मत करके सच कहा, तो पति ने उसे फोन पर तीन तलाक दे दिया।
यह घटना बताती है कि अपराध सिर्फ शरीर पर चिन्ह नहीं छोड़ता अपितु मन,मस्तिष्क और आत्मा पर वह अपना अमिट छाप छोड़ जाता है।
"अपराध तब और गहरा हो जाता है जब परिवार का सदस्य ही अपराधी हो ।"
"अपराध तब और घिनौना हो जाता है जब पीड़ित को परिवार द्वारा चुप रहने के लिए मजबूर किया जाए।"
"अपराध तब व्यवस्था बन जाता है जब परिवार का पुरुष अपराधी के साथ ही खड़ा हो जाए।
पति द्वारा “पापा के साथ कोऑर्डिनेट करो”-ऐसा कहना केवल संवेदनहीनता नहीं, यह पुरुष प्रधान समाज की सबसे गंदी भाषा है।इसका अर्थ है कि तुम्हारी पीड़ा नहीं, मेरी व्यवस्था महत्वपूर्ण है।इसका अर्थ है,अपराध छिपाओ, परिवार बचाओ।"
और यही वह सोच है, जो सदियों से पीड़ितों को तोड़ती आई है।
सवाल यह है कि यौन चाहत इतनी कुरूप क्यों हो गई?
यह सवाल अब खुलकर, तीखे रूप से पूछना होगा।
यौन इच्छा अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन जब इच्छा में रिश्ते हो, बच्चे, बच्चियां हो, जब भावना की जगह वासना ले ले, जब करुणा खत्म हो जाए, मर्यादा खत्म हो जाए, और दूसरे इंसान को जो सघन रिश्ते है, बच्चे है, बहू है, बहन है -केवल " स्त्री की देह" समझ ली जाए -तब वही इच्छा कुरूप, हिंसक और अपराधी बन जाती है।
आज कई स्तरों पर यह गिरावट दिख रही है_
- सेक्स को "पत्नी के साथ संबंध"नहीं, स्त्री देह का"उपभोग" बना दिया गया है।
- शरीर को "इंसान" से अलग कर दिया गया है।
- "पुरुषत्व"को नियंत्रण, स्वछंदता और वर्चस्व से जोड़ दिया गया है।
- यौन शिक्षा के नाम पर या तो "चुप्पी"है, या "विकृत जानकारी" परोसना, और
- डिजिटल अश्लीलता ने "संवेदना"से पहले "उत्तेजना" को प्रमुख कर दिया है।
यही कारण है कि कई घरों में संबंध टूट रहे हैं, सीमाएँ मिट रही हैं, और अपराध “स्वाभाविक” लगने लगा है। जब आदमी किसी और को व्यक्ति की तरह नहीं, "वस्तु" की तरह देखने लगे, तब अपराध की शुरुआत हो जाती है।
परिवार की इकाई कैसे टूट रही है?
परिवार अब कई जगह सुरक्षा की जगह नहीं रहा। वह नियंत्रण का केंद्र बन गया है। वह संवाद की जगह "डर"की भाषा बोलने लगा है। वह भरोसे की जगह "शक, दबाव और चुप्पी" का ढाँचा बन गया है।
- बच्चा घर में डर रहा है।
- बहू ससुराल में अपमान झेल रही है।
- पति संरक्षण के बजाय अपराधियों के साथ खड़ा है।
- और समाज बाहर से संस्कारों की बातें कर रहा है।
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यह टूटन अचानक नहीं आई। यह तब आई जब रिश्तों में "करुणा" कम हुई, और "वासना" की आंधी दौड़ बढ़ी।
जब पिता “रक्षक” नहीं रहा,
जब पति “सहारा” नहीं रहा,
जब परिवार “घर” नहीं रहा, “
तब हमें समझना है कि समाज किस ओर जा रहा है?
हम एक खतरनाक दिशा में बढ़ रहे हैं...
ऐसी दिशा में, जहाँ_
- पीड़ित की चीख सुनाई नहीं देती,
- अपराधी रिश्ते की ओट में छिप जाता है,
- शर्म अपराधी की नहीं, पीड़ित की होती है,
- और “घर” सबसे असुरक्षित जगह बनता जा रहा है।
यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है।यह "सामाजिक चेतना"का पतन है। परिवार तब नहीं बचता जब सच दबाया जाए। परिवार तब बचता है जब सच बोला जाए। समाज तब नहीं सुधरता जब अपराध छिपाया जाए।
समाज तब सुधरता है जब अपराध को नाम लेकर बेनकाब किया जाए।
आज के इस माहौल में ये वो सवाल है जो कोई नहीं पूछता_
•हम बच्चों को सुरक्षित क्यों नहीं बना पाए?
•हम बहू की पीड़ा को घर की इज्जत से ऊपर क्यों नहीं रख पाए?
•हम पिता, पति और ससुर जैसे रिश्तों को जवाबदेह क्यों नहीं बना पाए?
•हम यौन शिक्षा, सहमति और सीमा की बात अपने घरों में क्यों नहीं करते?
और सबसे बड़ा सवाल_
"क्या हमारा समाज रिश्तों का नहीं, केवल "रिश्तों में यौन अपराध" का समाज बनता जा रहा है?
यही वह सवाल है, जो कोई नहीं पूछता।
लेकिन यही वह सवाल है, जिसका जवाब दिए बिना कोई परिवार, कोई समाज और कोई सभ्यता सुरक्षित नहीं रह सकती।अगर हम आज भी चूप रहेंगे, तो कल बच्चा और बहू दोनों ही घर में नहीं बच पाएंगे।
और जब घर समाप्त हो जाए, तब समाज की मर्यादा भी समाप्त होनी तय है।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट"
एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
