बामुलाहिजा : हार का हिसाब, जीत का श्रेय और सत्ता की सरगोशियां

- संदीप भम्मरकर
हर नेता का अपना दतिया!
एक हार ने बीजेपी के भीतर कई सवाल जगा दिए हैं। दतिया के नतीजे के बाद पार्टी में सबसे ज्यादा चर्चा जमीनी नेटवर्क की हो रही है। कानाफूसी है कि कई वरिष्ठ नेताओं ने अपने-अपने इलाकों में ऐसा संगठन खड़ा कर लिया है, जो पार्टी से पहले नेता के प्रति वफादार माना जाता है। दतिया में नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराज़गी को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। अब पार्टी के भीतर सवाल उठ रहा है कि अगर यही हाल दूसरे क्षेत्रों में भी है, तो आगे ऐसे कई 'दतिया' सामने आ सकते हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है- संगठन का नेटवर्क बड़ा है… या नेताओं का अपना नेटवर्क?
जीत का सेहरा जीतू के सिर!
हार की धूल झाड़ने के बाद जीत का झंडा सबसे ऊंचा दिखाई देता है। दतिया उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद सबसे ज्यादा चर्चा पीसीसी चीफ जीतू पटवारी के खाते में गए राजनीतिक श्रेय की हो रही है। पार्टी ने इस चुनाव में पुराने दिग्गजों की छाया से बाहर निकलकर मुकाबला लड़ा और जीत का दावा भी नए नेतृत्व के नाम दर्ज हो गया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की भूमिका पर चर्चा सीमित रही, जबकि सोशल मीडिया पर जीतू समर्थकों ने सीधा निशाना मुख्यमंत्री पर साध रखा है। गलियारों में चर्चा है, राज्यसभा की हार का दर्द… दतिया की जीत ने काफी हद तक धो दिया है।
सीएस दफ्तर में फर्राटा
सचिवालय में इन दिनों रफ्तार पकड़ रही हैं। नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल के कार्यभार संभालते ही मंत्रालय के कामकाज का मिजाज बदलता नजर आ रहा है। सीएस कार्यालय पहुंचने वाली फाइलें बिना इंतज़ार तेजी से निपट रही हैं और पेंडेंसी लगातार घट रही है। इतना ही नहीं, नए साहब की सहज उपलब्धता भी अफसरशाही में चर्चा का विषय बनी हुई है। वरिष्ठ हों या कनिष्ठ, मुलाकात आसान है। मंत्रालय के गलियारों में चर्चाएं हैं कि मुखिया की टेबल तेज चलती है, तो पूरा सचिवालय अपनी चाल बदल लेता है।
फील्ड अफसरों का मंत्रालय बुलावा
जब मंत्रालय खुद मैदान में उतर जाए, तो समझना मुश्किल नहीं कि शिकायतों का मीटर लाल हो चुका है। अरे भाई जिलों के फील्ड अफसरों के सीधे भोपाल ने बुलावा भेजा था। मंत्रालय में परिवहन विभाग के इस नए अंदाज़ की खूब चर्चा हो रही है। दरअसल, शिकायतें बढ़ीं तो शासन ने ग्वालियर मुख्यालय की सीढ़ियां छोड़ सीधे फील्ड अफसरों को भोपाल बुला लिया। मंत्रालय में वन-टू-वन क्लास लगी और साफ संदेश दिया गया, दफ्तर में बैठिए, सड़क पर व्यवस्था दिखाइए। अफसरों ने भी बिना फिल्टर अपनी बात रख दी। गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि जब रिपोर्ट फाइल की बजाए सीधे फील्ड अफसरों से ली जाएगी तो बीच वाले क्या चाय पीते ही रह जाएंगे?
संघ की बैठक, बढ़ी धड़कनें
जब संघ खामोशी से बैठता है, तब सियासत सबसे ज्यादा शोर मचाती है। सोमवार को आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों की हुई एक अहम बैठक ने सत्ता के गलियारों में नई कानाफूसी छेड़ दी है। दिलचस्प संयोग यह रहा कि बैठक उसी समय हुई, जब दतिया उपचुनाव के नतीजे सामने आ रहे थे। चर्चा है कि बैठक में मध्य प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक हालात पर विस्तार से मंथन हुआ। आमतौर पर इतने वरिष्ठ पदाधिकारियों का इस तरह एक साथ जुटना कम ही देखने को मिलता है। अब गलियारों में बस एक ही सवाल गूंज रहा है, बैठक में क्या तय हुआ… और उसकी गूंज सबसे पहले कहां सुनाई देगी?
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