बामुलाहिजा : सत्ता के गलियारों से: भुट्टा पार्टी, दतिया और बदलते सियासी समीकरण

- संदीप भम्मरकर
भुट्टा ठंडा, सियासत गरम
कभी-कभी एक राजनीतिक तूफान, भुट्टे का स्वाद भी फीका कर देता है। हर साल की तरह इस बार भी कैलाश विजयवर्गीय ने पूरे दिल से अपनी मशहूर भुट्टा पार्टी का न्योता दिया था। पर विधानसभा के भीतर मचे सियासी घमासान ने पूरी तस्वीर बदल दी। कांग्रेस विधायक धरने पर बैठे रहे। कैलाश खुद बुलाने पहुंचे, मगर नाराजगी नहीं पिघली। इसी हंगामे की वजह से मोहन यादव भी शामिल नहीं हो सके। अब गलियारों में चुटकी ली जा रही है, इस बार भुट्टे से ज्यादा सियासत भुन गई!
कांग्रेसी दिग्गज दतिया से गायब
चुनाव में मैदान ही नहीं, मौजूदगी भी मायने रखती है। दतिया चुनाव पर गौर करेंगे तो कांग्रेस की एक अलग ही तस्वीर ही नजर आएगी। दरअसल, यहां प्रचार करने वालों में प्रदेश कांग्रेस लीडरों की की एक पीढ़ी पूरी तरह नदारद नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस में सबसे शीर्ष पर नजर आने वाले कमलनाथ और दिग्विजय सिंह यहां गायब हैं। वैसे उपचुनाव घोषित होते ही जब जीतू पटवारी सबसे पहले पहुंचे थे, उस वक्त दिग्विजय सिंह भी जीतू पटवारी के साथ अचानक शामिल हुए थे। लेकिन अब वे नदारद हैं। कमलनाथ के साथ भी ऐसा ही है, भले ही इसे उनका स्वास्थ्यगत कारण बताया जा रहा हो। लेकिन जीतू पटवारी के अध्यक्ष बनने से पहले तक जो कांग्रेसी सियासत में नंबर वन के खिलाड़ी थे, वे फिलहाल दतिया से गायब।
हितानंद की मौजूदगी के मायने
सियासत में कुछ चेहरे कभी पूरी तरह पर्दे से बाहर नहीं जाते! दतिया में बीजेपी उम्मीदवार के ऐलान के बाद मचे बवाल ने संगठन की परीक्षा ले ली। हालात संभालने के लिए जिन चेहरों पर सबसे ज्यादा भरोसा दिखा, उनमें पूर्व संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा भी शामिल रहे। संघ में वापसी के बाद उनकी यह सक्रिय मौजूदगी राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रही है। सवाल सिर्फ दतिया का नहीं, उनकी भूमिका का भी है। अब कानाफूसी है, क्या हितानंद सिर्फ संकटमोचक बनकर आए थे… या एंट्री-एग्जिट का दरवाज़ा अब भी खुला है?
चढ़ावे पर नई बहस
मंदिर का चढ़ावा सिर्फ श्रद्धा है… या समाज की पूंजी भी? अयोध्या चढ़ावा विवाद के बाद अब सत्ता और संगठन के गलियारों में एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सवाल सिर्फ व्यवस्था का नहीं, चढ़ावे के उपयोग का भी उठने लगा है। कानाफूसी है कि मंदिरों की दैनिक व्यवस्थाओं से आगे बढ़कर क्या इस धन का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्नक्षेत्र, शोध और अन्य सामाजिक कार्यों में होना चाहिए? मंदिर समितियों, ट्रस्टों और उनकी जवाबदेही पर भी बहस तेज हो रही है। अब गलियारों में सवाल गूंज रहा है, आस्था का धन आखिर सबसे बड़ी सेवा कहां कर सकता है?
कांग्रेस बार-बार क्यों पिछड़ी
सियासत में सिर्फ हारना नहीं, नैरेटिव हारना सबसे महंगा पड़ता है। हालिया घटनाक्रम पर नजर डालें तो कांग्रेस लगातार बैकफुट पर दिखाई दे रही है। राज्यसभा चुनाव में मीनाक्षी नटराजन का मामला हो, राजेंद्र भारती प्रकरण या फिर यूसीसी पर विधानसभा की बहस, हर मोर्चे पर पार्टी प्रभावी राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में कमजोर नजर आई। विपक्ष होने के बावजूद आक्रामक जवाबी रणनीति और जनसंदेश दोनों फीके रहे। उधर मुख्यमंत्री मोहन यादव हर मुद्दे पर राजनीतिक बढ़त लेते दिखाई दिए। अब सत्ता के गलियारों में सवाल गूंज रहा है, कांग्रेस मुकाबला लड़ रही है… या सिर्फ अगली चाल का इंतजार कर रही है?
गृहमंत्री की कुर्सी... पनौती?
सियासत में दर्द भी कभी-कभी साझा हो जाता है। मध्य प्रदेश के दो पूर्व गृहमंत्रियों की हालिया बातचीत इन दिनों सत्ता के गलियारों में खूब सुनाई जा रही है। एक का टिकट कटने के बाद तबीयत ऐसी बिगड़ी कि अस्पताल पहुंचना पड़ा था, तो दूसरे ने टिकट न मिलने के बाद मंच पर आंसुओं से अपना दर्द बयां किया। मुलाकात हुई तो मुस्कुराहट के बीच एक ही जुमला निकला, जो तेरा हाल है… वो मेरा हाल है। अब इस संयोग ने गृहमंत्री की कुर्सी की पुरानी ‘मनहूसियत’ वाली चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। गलियारों में चुटकी ली जा रही है, कहीं यह कुर्सी वाकई नेताओं की किस्मत से खेल तो नहीं जाती?
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