अधूरे इश्क ने उठवाई कलम, : निदा फ़ाज़ली के अल्फाज बने लाखों दिलों की आवाज

Entertainment Desk | कुछ लोग मोहब्बत में टूटकर बिखर जाते हैं, तो कुछ अपने दर्द को ऐसे अल्फाज दे जाते हैं कि पूरी दुनिया उसमें अपनी कहानी तलाशने लगती है। हिंदी और उर्दू साहित्य के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली भी ऐसी ही शख्सियत थे, जिनकी शायरी आज भी लाखों दिलों को छूती है।

दिल्ली में जन्म, ग्वालियर में बीता बचपन
निदा फ़ाज़ली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम मुक्तदा हसन था। बचपन ग्वालियर में बीता और उनके पिता भी शायरी करते थे। साहित्य से उनका जुड़ाव बचपन से ही हो गया था, लेकिन जिंदगी के अनुभवों ने उनकी कलम को खास गहराई दी।
अधूरी मोहब्बत ने दिया दर्द को समझने का नजरिया
कहा जाता है कि कॉलेज के दिनों में निदा फ़ाज़ली को एक लड़की से लगाव हो गया था। एक दिन उन्हें उसकी दुर्घटना में मौत की खबर मिली। इस घटना ने उन्हें गहरा सदमा पहुंचाया। उनकी जिंदगी से जुड़ा यह किस्सा अक्सर उनकी शायरी की प्रेरणाओं में गिना जाता है। हालांकि, उनके लेखन को आकार देने में जिंदगी के कई अनुभवों का योगदान रहा।
सूरदास के भजन ने छुआ दिल
एक दिन मंदिर के पास से गुजरते हुए निदा फ़ाज़ली ने सूरदास का भजन 'मधुबन तुम क्यौं रहत हरे?' सुना। इस भजन में व्यक्त विरह की पीड़ा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और गालिब जैसे रचनाकारों को पढ़ा। इनकी रचनाओं से प्रेरणा लेकर उन्होंने आम आदमी की भाषा में गहरे एहसासों को बयां करना शुरू किया।
माता-पिता पाकिस्तान गए, निदा ने भारत को चुना
देश के बंटवारे के दौरान उनके माता-पिता पाकिस्तान चले गए, लेकिन निदा फ़ाज़ली ने भारत में रहने का फैसला किया। साल 1964 में वह मुंबई पहुंचे और लेखन की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष किया। धीरे-धीरे उनकी रचनाएं लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगीं और उर्दू साहित्य में उनका नाम स्थापित हो गया।
बॉलीवुड में भी चला उनकी कलम का जादू
निदा फ़ाज़ली ने हिंदी सिनेमा को भी कई यादगार गीत दिए। फिल्म 'आहिस्ता-आहिस्ता' का गीत 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता' और फिल्म 'सरफरोश' का 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है' आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। उनकी खासियत थी कि वह जिंदगी की बड़ी से बड़ी सच्चाई को भी सरल शब्दों में कह जाते थे।
निदा फ़ाज़ली के अल्फाज आज भी हैं जिंदा
8 फरवरी 2016 को निदा फ़ाज़ली दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों को मोहब्बत, रिश्तों और जिंदगी को समझने का नजरिया देती है। उनकी कलम ने साबित किया कि सच्चे एहसासों से निकले शब्द कभी पुराने नहीं होते। शायर चला जाता है, मगर उसके अल्फाज पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं।
पलक गीते
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
