सवाल जो कोई नहीं पूछता... : हर चेहरा व्यस्त, हर मन उदास... आखिर क्यों?

- उमेश गुप्ता
कभी आपने ध्यान दिया है कि आजकल हर कोई एक अंतहीन दौड़ में है?
चाय बेचने वाला जल्दी में है, दफ्तर का अफसर भी, स्कूल का छात्र भी और यहाँ तक कि वह बुजुर्ग भी जो अपनी व्यावसायिक "ड्यूटी" से रिटायर हो चुके हैं। हर किसी की जुबान पर एक ही रटा-रटाया जुमला है—
"व्यस्त हूं , या समय नहीं है।”
लेकिन कभी रुककर सोचिए कि हम इतना समय "बचाकर" आखिर कर क्या रहे हैं? और उससे भी बड़ा सवाल-क्या इस भागदौड़ ने हमें सचमुच खुश किया है, या हम सिर्फ “व्यस्त दिखने” की एक बीमारी में जी रहे हैं? सुबह आँख खुलते ही पहला स्पर्श मोबाइल का होता है और रात को सोने से पहले आखिरी नजर भी उसी नीली रोशनी पर पड़ती है। दिनभर हम अनगिनत नोटिफिकेशन, कॉल्स, टारगेट्स, ईएमआई (किस्तों) और भविष्य की चिंताओं के चक्रव्यूह में दौड़ते रहते हैं।
तकनीक ने हमसे 'जुड़ने' का वादा किया था, लेकिन इस जुड़ाव ने इंसान को अंदर से और ज्यादा अकेला, थका हुआ और विचारशून्य बना दिया है। एक दौर था जब साधन सीमित थे, लेकिन रिश्ते गहरे थे। लोग छतों पर बैठकर घंटों बतियाते थे, पड़ोसी बिना किसी अपॉइंटमेंट के घर चले आते थे, गलियों में बच्चों की हंसी गूंजती थी और घर के बुजुर्ग उस पूरे कुनबे का केंद्र होते थे।

आज तस्वीर पूरी तरह उलट चुकी है
निश्चित ही सुविधाएं बढ़ी हैं, घर बड़े हुए हैं, इंटरनेट की रफ्तार तेज हुई है, लेकिन दिलों के दायरे छोटे हो गए हैं। अब परिवार एक ही ड्राइंग रूम में बैठता तो है, लेकिन हर व्यक्ति अपनी-अपनी स्क्रीन के पिंजरे में कैद होता है। बेटा रील्स (Reels) स्क्रॉल कर रहा है, पिता समाचारों में खोए हैं, मां ऑनलाइन वीडियो देख रही हैं और दादा-दादी एक गहरी चुप्पी ओढ़े कोने में बैठे हैं। हमारी जीवंत बातचीत की जगह अब 'लाइक' और 'इमोजी' ने ले ली है। यह सिर्फ लाइफस्टाइल का बदलाव नहीं है-यह हमारी सोच और हमारे रिश्तों की बुनियादी संरचना का बिखरना है।
आज हमने सफलता की परिभाषा ही बदल दी है। अब सफल वही माना जाता है, जो सबसे ज्यादा “व्यस्त” और "तनाव में" दिखता है। अगर कोई कह दे कि उसके पास फुर्सत है, तो समाज उसे नाकाम, आलसी या कम काबिल समझने लगता है। हर व्यक्ति अपने थके हुए, झुर्रियों से भरे चेहरे को एक 'मेडल' की तरह लेकर घूम रहा है।

लेकिन क्या सचमुच यही जीवन है?
हम बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनना तो सिखा रहे हैं, लेकिन यह सिखाना भूल गए कि अकेलेपन से कैसे लड़ना है, तनाव को कैसे संभालना है और मन को शांत कैसे रखना है। नतीजा? सुख-सुविधाओं के इस सुनहरे दौर में भी अवसाद (Depression) और नींद की गोलियों और नशे का बाजार सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है।
यह बदलाव अब महानगरों तक सीमित नहीं है, छोटे शहरों और कस्बों में यह बीमारी और गहरी हो चुकी है। जहां कभी कम साधनों में संतोष और सामूहिकता की मिठास थी, वहां अब 'तुलना', 'प्रतिस्पर्धा' और 'दिखावे की होड़' ने पैर पसार लिए हैं। लोग सामान तो ज्यादा खरीद रहे हैं, लेकिन सुकून गंवा रहे हैं।
असल समस्या समय की कमी नहीं है। समस्या यह है कि हमने ठहरना, सांस लेना और खुद से बात करना बंद कर दिया है। हम जीवन जीने से ज्यादा, जीवन को दूसरों के सामने 'साबित' करने में लगे हैं।
दूसरों को दिखाने के लिए महंगे ब्रांड्स, परफेक्ट फोटोज, फॉलोअर्स और एक नकली सोशल स्टेटस बनाने की इस होड़ में हम खुद को समझने का सीधा रास्ता ही भूल गए हैं। इसका समाधान जटिल नहीं, बस ठहरने की जरूरत है। इस उदासी और खालीपन से बाहर निकलने के लिए किसी बड़े यूटोपिया की जरूरत नहीं है, बस कुछ छोटे और ईमानदार कदम काफी हैं_
#डिजिटल डिटॉक्स_दिन का कम से कम एक घंटा बिना किसी गैजेट के बिताएं।
#बिना वजह की बातचीत_ घर के बुजुर्गों या बच्चों के पास बैठें, बिना किसी काम या एजेंडे के, सिर्फ उनकी सुनने के लिए।
# खुद से दो सवाल_ आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछें— “आज मैं वाकई कब मुस्कुराया था?” और “मैं सच में जी रहा हूँ या सिर्फ एक मशीन की तरह चल रहा हूँ?”
ये छोटे कदम हमें रोबोट बनने से बचाएंगे और दोबारा इंसान बनाएंगे।
चलते-चलते...
अगली बार जब कोई आपसे बात करना चाहे, तो तुरंत यह ढाल आगे मत कीजिएगा कि “समय नहीं है”।
एक पल रुकिएगा और सोचिएगा— क्या सच में समय नहीं है, या हम उस कीमती समय को उन चीजों में फूंक रहे हैं जो हमें कभी मानसिक शांति नहीं दे सकतीं?
क्योंकि यही वह सवाल है... जो कोई नहीं पूछता।
लेखक: TV27 NEWS के कंसल्टिंग एडिटर और वाइस प्रेसिडेंट हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
