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असम सरकार का बड़ा कदम : सीएम ने विधानसभा में पेश किया यूीसीसी बिल, बताया ‘समय की जरूरत, विपक्ष ने किया तीखा विरोध

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May 25, 2026
08:21 AM
सीएम ने विधानसभा में पेश किया यूीसीसी बिल, बताया ‘समय की जरूरत, विपक्ष ने किया तीखा विरोध

दिसपुर। सोमवार को असम विधानसभा का माहौल बेहद गरम रहा, जब हिमंता सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक 2026 सदन में पेश कर दिया। यह विधेयक मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ओर से संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने प्रस्तुत किया। जैसे ही विधेयक पेश किया गया, विपक्षी विधायकों ने जोरदार विरोध दर्ज कराया और इसे तुरंत पेश न करने की मांग की।

सरकार का दावा है कि यह कदम राज्य में कानूनी एकरूपता लाने और व्यक्तिगत कानूनों में समानता सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक पहल है, जबकि विपक्ष ने इसे सामाजिक विविधता और संवैधानिक भावना के खिलाफ बताया।

मुख्यमंत्री का बचावः ‘समानता और सुधार की दिशा में कदम’

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस विधेयक के पेश होने से यह खुली चर्चा संभव हुई है कि असम में यूसीसी क्यों आवश्यक है और यह कैसे राज्य के संस्थापक मूल्यों को आगे बढ़ाएगा। सरकार का तर्क है कि यह कानून सभी नागरिकों के लिए-धर्म की परवाह किए बिना, विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान नियम लागू करेगा।

सरकार का कहना है कि बहुविवाह, विवाह की कानूनी उम्र, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट और एकीकृत कानून की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

विपक्ष का विरोध और सदन में हंगामा

विधेयक पेश होते ही विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया और इसे जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताया। विपक्षी विधायकों ने आरोप लगाया कि यह विधेयक सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर सकता है और विभिन्न समुदायों की परंपराओं को नजरअंदाज करता है। इस दौरान विधानसभा में तीखी नोकझोंक और हंगामे की स्थिति भी बनी रही।

छूट और संवैधानिक संदर्भ

सरकार ने संकेत दिया है कि राज्य के आदिवासी समुदायों, चाहे वे पहाड़ी क्षेत्र में हों या मैदानी इलाकों में, उन्हें इस कानून के कुछ प्रावधानों से छूट दी जा सकती है। यह कदम क्षेत्रीय विविधता और जनजातीय परंपराओं को ध्यान में रखकर उठाया गया बताया जा रहा है।

संवैधानिक दृष्टि से अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, जबकि अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में नीति बनाने की सलाह देता है। इसी पृष्ठभूमि में असम सरकार इस विधेयक को बड़े सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

अगले दिन निर्णायक चर्चा संभव

सूत्रों के अनुसार, विधानसभा सत्र को एक दिन बढ़ाकर 27 मई तक कर दिया गया है और संभावना है कि मंगलवार को इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा होगी। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या असम इस विवादित लेकिन ऐतिहासिक माने जा रहे कानून को आगे बढ़ाने में सफल होगा या नहीं।

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