प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग, नाबालिगों को हिरासत... : छात्र आंदोलन में पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एसआईटी गठन के भी संकेत

नई दिल्ली। छात्र आंदोलन के दौरान संसद मार्च में हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। यह याचिकाएं काकरोच जनता पार्टी की ओर दायर की गई थीं। जिसकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। सुनासुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग, कथित मानवाधिकार उल्लंघन और नाबालिगों की हिरासत जैसे गंभीर आरोपों पर चिंता जताते हुए कहा कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पीठ ने संकेत दिए कि मामले की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति या विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जा सकता है।
वहीं पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश, बिहार और नागपुर सहित कई स्थानों पर भी छात्र आंदोलनों के दौरान इसी तरह की घटनाएं सामने आई हैं। अदालत ने कहा कि अलग-अलग याचिकाओं में लगाए गए आरोपों में काफी समानता दिखाई देती है, इसलिए पूरे घटनाक्रम को व्यापक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
बल प्रयोग और हिरासत पर उठे गंभीर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल से एक 19 वर्षीय युवक की आंखों की रोशनी चली गई है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल, एक छात्रा के गंभीर रूप से घायल होकर आईसीयू में भर्ती होने, वकीलों और एक मीडियाकर्मी के साथ मारपीट तथा सिविल ड्रेस में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा कथित हिंसा के आरोप भी अदालत के सामने रखे गए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, हालांकि कई बार ऐसे प्रदर्शनों में कुछ असामाजिक तत्व भी शामिल हो जाते हैं, जिससे स्थिति बिगड़ जाती है।
बिहार और अन्य राज्यों की घटनाएं भी चर्चा में
सुनवाई के दौरान बिहार से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि वहां बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें कई नाबालिग भी शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ नाबालिगों को निर्धारित समय से काफी देर बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। अदालत ने इन आरोपों को भी गंभीरता से दर्ज किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक युवक को कथित रूप से उठाकर दूर छोड़ देने का मामला उठाया, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने जंतर-मंतर क्षेत्र में पत्थरों से भरे ट्रक के पहुंचने और वीडियो तथा सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का मुद्दा रखा। उन्होंने यह भी कहा कि चेहरा पहचानने वाली तकनीक से जुटाए गए आंकड़ों का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
स्वतंत्र जांच की जरूरत पर अदालत के संकेत
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने पुलिसकर्मियों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण नहीं होने पर भी सवाल उठाए और कहा कि सुरक्षा उपकरण आक्रामक साधनों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने विभिन्न राज्यों की घटनाओं का विस्तृत ब्यौरा अदालत के समक्ष रखा।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने संकेत दिया कि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए उच्च स्तरीय समिति या विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जाएगा, ताकि सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच हो सके और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
