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समय का सच : एक "अकेला" इस शहर में...

admin

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Jun 22, 2026
05:46 PM
एक "अकेला" इस शहर में...

-UMEESH GUPTA

"हर तरफ़ लोग ही लोग हैं... फिर भी आदमी इतना अकेला क्यों है?""आदमी" अकेला हो सकता है पर "शहर" नहीं,शहर तो 24 बीसों घंटे जागता रहता है....सुबह सड़क पर निकलते ही लोगों की भीड़ दिखाई देती है। बस स्टैंड भरे हुए हैं, ट्रेनें खचाखच भरी हैं, बाजारों में रौनक है, दफ्तरों में कर्मचारियों की कतार है, मोबाइल फोन में सैकड़ों नंबर हैं, सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हैं। लेकिन इसी भीड़ के बीच एक सच धीरे-धीरे सिर उठा रहा है-

"एक अकेला इस शहर में .."...

दिन खाली खाली बर्तन है,

और रात है जैसे अंधा कुआँ...

इन सूनी अंधेरी आँखों में,

आँसू की जगह आता है धुआँ..

जीने की वजह तो कोई नहीं,

मरने का बहाना ढूँढता है.....

गुलजार साहब अपनी इस कालजयी रचना में (जो एक यादगार फिल्म "घरौंदा" 1977 में बनी) में स्पष्ट कहते है अकेला व्यक्ति हर अजनबी चेहरे में किसी जाने-पहचाने (अपने) इंसान को ढूंढता है, जो मिलता नहीं। यह अकेलापन सिर्फ़ शहर का नहीं, भीड़ का नहीं, किसी बुजुर्ग का नहीं है जिसे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया गया हो। यह अकेलापन उस नवजवान युवक का भी है जो देर रात तक मोबाइल स्क्रॉल करता रहता है, पार्टी करता है, नया जीवन जीता है.....यह उस महिला का भी है जो पूरे परिवार की देखभाल करती है लेकिन अपनी बात कहने के लिए कोई कंधा नहीं पाती। यह उस बच्चे का भी है जिसके पास महंगे स्कूल है, खिलौने हैं, गैजेट्स है, संसाधन है लेकिन कोई साथी नहीं।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

अब "घर" "मकान" बन गए है,एक समय था जब घरों में लोग रहते थे।दादा-दादी की कहानियां थीं, चाचा-ताऊ की डांट थी, मां की ममता थी और पिता का अनुशासन था। परिवार सिर्फ़ साथ रहने का नाम नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक सुरक्षा कवच था। आज घर पहले से बड़े हो गए हैं, लेकिन परिवार छोटे हो गए हैं। कमरों की संख्या बढ़ी है, लेकिन बातचीत के अवसर कम हो गए हैं। हर सदस्य अपने कमरे में, अपनी स्क्रीन, अपनी समस्या और समाधान में और अपनी तथाकथित दुनिया में ही व्यस्त है। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी लोग एक-दूसरे से दूर और अपरिचित होते जा रहे हैं।

चिट्ठी ना कोई संदेश.....

चिट्ठी आई है,आई है... चिट्ठी आई है...चिट्ठी पाने की भावनात्मक खुशी और गरमाहट का ज़माना लद गया।चिट्ठी आने में यूं तो कई दिन लगते थे लेकिन उसके शब्द दिल तक पहुंचते थे।आज वीडियो कॉल एक सेकंड में हो जाती है, लेकिन वो आनंद,अपनापन मानो खो सा गया है। दिलों के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।हमने संवाद को संदेशों में बदल दिया है। "कैसे हो?" अब एक औपचारिक संदेश बन गया है। जवाब भी तय है-"ठीक हूं।"सोशल मीडिया पर मुस्कुराती तस्वीरें दिखाई देती हैं, लेकिन उन मुस्कानों के पीछे का दर्द, मुस्कुराहट के पीछे का अकेलापन, द्वंद्व और बौनापन दिखाई नहीं देता।

आज की दुनिया ने सफलता को जीवन का अंतिम लक्ष्य बना दिया है। अच्छी नौकरी, बड़ा घर, महंगी कार, बैंक बैलेंस, इन सबको सफलता का पैमाना मान लिया गया है।इस दौड़ में आदमी ने बहुत कुछ पाया है, लेकिन बहुत कुछ खोया भी है।

...उसने "समय" खो दिया,

"रिश्ते" खो दिए,

"अपनापन" खो दिया,

"भावनाएं" खो दी,

और "खुद" को भी खो दिया।

शहरों में लाखों लोग रोज़ कमाने निकलते हैं, लेकिन शाम को लौटते समय उनके पास साझा करने के लिए कोई नहीं होता, कुछ होता भी है तो वह होता है "द्वंद्व", होड़,नशा,मस्ती और तथाकथित खोखली हंसी ,आधारहीन आजादी और कागज़ के फूल।

सबसे गहरा अकेलापन शायद बुजुर्गों के हिस्से आया है, जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, आज वही हाथ सहारे की तलाश में हैं। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी खपा दी, वही कई बार अपने अंतिम वर्षों में उपेक्षा का सामना करते हैं।हर बुजुर्ग वृद्धाश्रम में नहीं रहता लेकिन कई अपने घरों में रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेले हैं। उनकी सबसे बड़ी जरूरत दवा नहीं, "संवाद" है। लेकिन आज किसी के पास समय नहीं है।

हम अक्सर सोचते हैं कि बच्चे खुश हैं। लेकिन क्या सचमुच?उनके पास मोबाइल है, इंटरनेट है, वीडियो गेम हैं।

लेकिन क्या उनके पास बचपन है?

क्या उनके पास मोहल्ले के दोस्त हैं?

क्या उनके पास दादी की कहानी है,उसके स्नेह की थाप है?

क्या उनके पास वह खुला आंगन है जिसमें सपने पनपते थे?

क्या उनके पास फलों से लदे पेढ हैं, खेत है, खलिहान है ?

बच्चे सुविधाओं से घिरे हैं, लेकिन भावनाओं से वंचित होते जा रहे हैं।

सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हम लोगों से घिरे हुए हैं।सच्चाई यह है कि भीड़ और साथ में फर्क होता है।भीड़ आपको देख सकती है, आप भीड़ को देख सकते है,भीड़ आपकी मौजूदगी महसूस कर सकती है।लेकिन साथ में कोई नहीं है, आज समाज में भीड़ बहुत है, लेकिन साथ कम होता जा रहा है।

आखिर समाधान क्या है?

शायद समाधान बहुत बड़ा नहीं है।अपने माता-पिता के पास दस मिनट बैठना।अपने बच्चों की बात सुनना।किसी मित्र को बिना मतलब फोन करना।भोजन के समय मोबाइल दूर रखना।रिश्तों को समय देना।और सबसे महत्वपूर्ण-किसी को यह एहसास कराना कि वह अकेला नहीं है।क्योंकि इंसान को जीने के लिए सिर्फ़ रोटी, कपड़ा और मकान नहीं चाहि_ उसे किसी का साथ भी चाहिए।

शहर पहले से बड़े हो गए हैं, आबादी पहले से ज्यादा हो गई है, संपर्कों की सूची पहले से लंबी हो गई है।लेकिन आदमी का मन पहले से ज्यादा खाली हो गया है।

"समय का सच" यह है कि "आज इंसान भीड़ में खो नहीं रहा, बल्कि भीड़ के बीच अकेला पड़ता जा रहा है।"

निदा फ़ाज़ली साहब ने दशकों पहले, क्या खूब लिखा था-

हर तरफ़, हर जगह, बे-शुमार आदमी,

फ़िर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी।

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ,

अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी।

हर तरफ़ भागते-दौड़ते रास्ते,

हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी।

रोज़ जीता हुआ, रोज़ मरता हुआ,

हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी।

और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है,

"जब हर तरफ़ लोग ही लोग हैं, तो फिर आदमी अपने दुख और अपनी खामोशी के साथ इतना अकेला क्यों है?"

भीड़ तन्हाइयों का मेला है, आदमी आदमी अकेला है।"

गुलज़ार साहब कहते है_

इन उम्र से लम्बी सड़कों को,

मन्ज़िल पे पहुँचते देखा नहीं....

बस दौड़ती फिरती रहती हैं,

हम ने तो ठहरते देखा नहीं....

इस अजनबी से शेहर में,

जाना पहचाना ढूँढता है...

"एक अकेला इस शहर में"...............

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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