जग्गी हत्याकांड : अमित जोगी को आजीवन कारावास, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज

रायपुर। साल 2003 के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम और निर्णायक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी करार दिया है। अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, साथ ही 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में छह महीने की अतिरिक्त सश्रम कारावास की सजा भी निर्धारित की गई है। यह फैसला 31 मई 2007 को रायपुर की विशेष अदालत (एट्रोसिटी) द्वारा दिए गए निर्णय को पूरी तरह उलट देता है। उस समय अदालत ने सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि अन्य 28 आरोपियों को दोषी ठहराया गया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए CBI ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट टिप्पणी की कि एक ही गवाह और साक्ष्यों के आधार पर कुछ आरोपियों को दोषी ठहराना, जबकि कथित मुख्य साजिशकर्ता को बरी कर देना न्यायिक दृष्टि से असंगत और त्रुटिपूर्ण है। अदालत ने इसे गंभीर कानूनी चूक मानते हुए निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोबारा शुरू हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट को भेजा था, जिसके बाद विस्तृत सुनवाई के उपरांत यह निर्णय सामने आया।
क्या था मामला?
4 जून 2003 को रायपुर में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रदेश कोषाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उस समय राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया था। मामले में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से दो—बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह—सरकारी गवाह बन गए थे। ट्रायल कोर्ट ने 28 आरोपियों को दोषी ठहराया, लेकिन अमित जोगी को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
रामावतार जग्गी एक प्रभावशाली नेता थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। शुक्ल के कांग्रेस छोड़कर NCP में शामिल होने के बाद जग्गी भी उनके साथ पार्टी में सक्रिय हुए और उन्हें छत्तीसगढ़ में कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक लंबे समय से लंबित मामले में न्यायिक निष्कर्ष तक पहुंचने का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायिक प्रक्रिया में भले ही देरी हो, लेकिन साक्ष्यों के आधार पर न्याय संभव है। फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में नई बहस और हलचल तेज हो गई है।
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