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बाबा साहेब डॉ.भीमराव : यूं ही कोई अंबेडकर नहीं बन सकता

नीलम अहिरवार

नीलम अहिरवार

Apr 13, 2026
11:24 AM

कभी सोचा है…एक बैलगाड़ी से उतारा गया बच्चा…पूरे देश को कैसे खड़ा कर सकता है…?एक तरफ थे मोहनदास करमचंद गांधी…जिन्हें विदेश में रंगभेद का सामना करना पड़ा…और उस अपमान ने एक आंदोलन को जन्म दिया… लेकिन…उसी दौर में…इस देश की धूलभरी सड़कों पर…एक और बच्चा था…जिसे न सिर्फ रास्ते से…बल्कि इंसानियत से भी उतार दिया गया…सिर्फ इसलिए…क्योंकि उसका जन्म “नीची जाति” में हुआ था.कहानी यही खत्म नहीं होती बल्कि यहीं से शुरू होती है…वो बच्चा चुप रहा…लेकिन इतिहास नहीं…क्योंकि उस दिन बैलगाड़ी से उतारा गया बच्चा.आने वाले वक्त में…पूरा सिस्टम उलटने वाला था…जिसे समाज ने “अछूत” कहा……उसने ऐसा किताब लिखा…जिसे आज पूरा देश छूकर जीता है…वो बच्चा कोई और नहीं… बल्कि भारत के संविधान के निर्माता…भीमराव रामजी अंबेडकर थे…

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में हुआ था, वह अपने माता-पिता की 14वीं और अंतिम संतान थे। डॉ. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल थे। जो ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। बाबा साहेब के पिता संत कबीर के अनुयायी थे और वो बेहद सुविज्ञ भी थे। जब भीमराव छोटे थे तो उनके पिता महाराष्ट्र के सतारा आ गए, वहीं करीब 6 साल की उम्र में उनकी मां का निधन हो गया…सतारा आकर अछूत होने का दंश उन्होंने सिर्फ झेला नहीं… हर रोज जिया था

वो दर्द…जो छूने से रोकता था,

वो अपमान… जो इंसान होने पर सवाल उठाता था—

उसी को सहकर भीमराव अंबेडकर आगे बढ़े।

जब सतारा में पढ़ाई के दौरान उन्हें अन्य बच्चों से अलग बैठना पड़ता था। वो सोच में पढ़ गए…वो ये देखकर हैरान थे कि जब सवर्ण बच्चे पानी पीते थे, तो उन्हें पानी पीने की अनुमति नहीं थी। इधर भीमराव का पढ़ाई में बहुत दिल लगता था…लेकिन यहां भी उन्हें छुआछूत का सामना करना पड़ा…और उन्हें निची जाति के कारण संस्कृत पढ़ने से भी रोका गया...लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और सारे धर्म पढ़ डाले...संस्कृत भी पढ़ीसभी धर्मों का उन्होंने गहन अध्ययन किया और उनकी आलोचना भी की…वहीं पढ़ाई में उनकी रूचि देखकर भीमराव के शिक्षक कृष्णजी केशव अंबेडकर ने उन्हें अपना सरनेम यानी उपनाम दे दिया….जी हां शिक्षक कृष्णजी केशव अंबेडकर (ब्राह्मण) ने अपने उपनाम के साथ उनका नाम 'अंबेडकर' किया। मूल रूप से भीमराव का सरनेम 'सकपाल' था और रिकॉर्ड में 'अंबावाडेकर' दर्ज था, लेकिन शिक्षक ने स्नेहवश अपने सरनेम 'अंबेडकर' को उन्हें दिया। वो महार जाति से ताल्लुक रखते थे और मूल नाम 'भीमराव रामजी सकपाल' था।

सन 1907…जब पढ़ाई करना ही एक संघर्ष था…जब समाज की दीवारें हर कदम पर रोकती थीं…तब एक लड़के ने सिर्फ मैट्रिक पास नहीं किया…बल्कि इतिहास में अपनी पहली लकीर खींच दी।

ये लड़का कोई और नहीं…भीमराव अंबेडकर थे।

उस दौर में मैट्रिक पास करना…सिर्फ एक डिग्री नहीं,पूरे समाज के लिए गर्व का क्षण था।और फिर आया वो पल…जिसने उनकी सोच को हमेशा के लिबदल दिया…एक सम्मान समारोह मेंउनके शिक्षक कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर ने भगवान बुद्ध के जीवन पर आधारित उन्हें एक किताब भेंट कवो सिर्फ एक किताब नहीं थी…वो एक नई दिशा थी।यहीं से… अंबेडकर का पहला परिचयबौद्ध धर्म से हुआ।और शायद…यहीं से शुरू हुई वो सोच,जो आगे चलकर एक क्रांति बनने वाली थी। लेकिन जिंदगी सिर्फ विचारों से नहीं चलती समाज की परंपराएं भी अपना असर दिखाती हैं।सिर्फ 17 साल की उम्र में… अंबेडकर की शादी रमाबाई से हो गई।एक तरफ ज्ञान की भूख… दूसरी तरफ जिम्मेदारियों का बोझ…यही था वो संघर्ष… जिसने एक साधारण लड़के को

असाधारण बना दिया। इधर सन 1906 में महाराष्ट्र में जातिवाद और दलित उत्थान को लेकर डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन ऑफ इंडिया (Depressed Classes Mission of India) की स्थापना हुई थी…इस मिशन की स्थापना महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे द्वारा की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य दलित वर्गों (अछूतों) के सामाजिक उत्थान और शिक्षा को बढ़ावा देना था। आगे की पढ़ाई के लिए अंबेडकर के पास पैसे नहीं थे…ऐसे में शिक्षक अर्जुन केलुस्कर ने अंबेडकर की मदद की… उन्होंने महाराज सयाजीराव गायकवाड़ ने अधूतों को पढ़ाने का वादा किया था…उन्होंने केलुस्कर से कहा कि अंबेडकर का इंतेहान लूंगा फिर उन्होंने 12वीं क्लास पढ़ने के लिए सयाजीराव ने कुछ सवाल पूछे जिनके जवाब उन्होंने सही दिए तो उन्हें सयाजीवराव ने स्कॉलरशिप दे दी… डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 1913-1917 के बीच कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यू यॉर्क) और 1916-1923 के बीच लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र, कानून और राजनीति विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की। बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय की आर्थिक मदद (छात्रवृत्ति) से उन्होंने विदेश में पढ़ाई की और अर्थशास्त्र में PhD व अन्य डिग्रियां हासिल कीं डॉ भीमराव अंबेडकर PhD तक की पढ़ाई करने वाले पहले दलित थे।

उन्होंने 1927 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से और 1932 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से PhD कंप्लीट की.इसी के साथ विदेश से डॉक्टरेट डिग्री हासिल करने वाले वो पहले भारतीय बने आपको जानकर हैरानी होगी कि डॉ. बाबाभीमराव अम्बेडकर कुल 64 विषयों में मास्टर थे..वो हिन्दी, पाली, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, पर्शियन और गुजराती जैसे 9 भाषाओँ के जानकार थे. इसके अलावा उन्होंने लगभग 21 साल तक विश्व के सभी धर्मों की तुलनात्मक रूप से पढ़ाई की थी. उनकी शिक्षा ने उन्हें एक वैश्विक विद्वान, अर्थशास्त्री, कानूनविद और समाज सुधारक के रूप में ढाला, जिसने उन्हें भारत के संविधान के निर्माण में मार्गदर्शन दिया…

किताबों का ऐसा जुनून… कि भूख-प्यास भी छोटी पड़ जाए…

नींद सिर्फ 2 घंटे…और बाकी पूरा वक्त—ज्ञान के नाम…

ये कहानी है उस शख्स की… जिसने खुद को किताबों से गढ़ा…

डॉ. भीमराव अंबेडकर…

कहते हैं इंसान अपनी आदतों से बनता है…और अंबेडकर की सबसे बड़ी आदत थी—पढ़ना…अमेरिका, लंदन और Columbia University जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई करने वाले अंबेडकर…अपने समय के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों में गिने जाते थे…लेकिन उनकी असली पहचान सिर्फ डिग्रियां नहीं…बल्कि उनकी किताबों की दुनिया थी…कहा जाता है कि एक समय डॉ भीमराव अंबेडकर के पास 8,000 से ज्यादा किताबें थीं…और जीवन के अंत तक ये संख्या 50, 000 तक पहुंच गई…उनके करीबी शंकरानंद शास्त्री अपनी किताब में एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं… 20 दिसंबर 1944…रविवार का दिन…दोपहर का वक्त… जब वो अंबेडकर से मिलने उनके घर पहुंचे… तो अंबेडकर ने कहा—चलो जामा मस्जिद चलते हैं…जहां उस दौर में पुरानी किताबों का बड़ा बाजार लगता था…शास्त्री ने याद दिलाया—खाने का समय हो रहा है…-लेकिन अंबेडकर के लिए उस वक्त…खाना नहीं…किताबें ज्यादा जरूरी थीं…-वो वहां से करीब दो दर्जन से ज्यादा किताबें खरीद लाए… और दिलचस्प बात ये…कि वो अपनी किताबें किसी को उधार नहीं देते थे…उनका साफ कहना था— “पढ़ना है तो मेरी लाइब्रेरी में आकर पढ़ो…”वहीं उनके एक और अनुयाई नामदेव निमगड़े ने भी अपनी किताब In the Tiger’s Shadow में लिखा है—अंबेडकर पूरी रात पढ़ते थे…और मुश्किल से 2 घंटे सोते थे…खास बात ये है कि डॉक्टर अम्बेडकर को आधुनिक भारत के सबसे ओजस्वी लेखकों में गिना जाता है. डॉक्टर अम्बेडकर की किताबें वर्तमान में भारत में अबसे अधिक बिकने वाली किताबों में गिनी जातीं हैं..विश्व के लगभग हर देश में उनके प्रशंसक मौजूद हैं..अंबेडकर के एक अनुयाई ने अपनी किताब में जिक्र किया है कि मैंने एक बार उनसे पूछा था कि आप इतना पढ़ने के बाद रिलैक्स कैसे कर लेते हैं तो अंबेडकर ने जवाब दिया था कि मेरे लिए रिलैक्स करने का मतलब होता है (एक और किताब पढ़ना )

महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच संबंध जटिल, वैचारिक रूप से मतभेदपूर्ण, लेकिन अंततः राष्ट्र निर्माण के प्रति सम्मानजनक थे। जहाँ गांधी जी ने सामाजिक सुधार और अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए नैतिक और अहिंसक तरीके अपनाए, वहीं अंबेडकर ने संवैधानिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानून पर ज़ोर दिया। 1932 के पूना पैक्ट ने उनके बीच के कड़े मतभेदों को कम किया जी हां…

दो महानायक… एक लक्ष्य — आज़ादी और समानता…लेकिन रास्ते अलग-अलग…महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर…दो नाम… जिनकी सोच ने देश को गढ़ा… लेकिन आपसी मतभेद कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए…

सन 1931…लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के संवैधानिक सुधारों और भावी शासन व्यवस्था पर चर्चा के लिए आयोजित तीन सम्मेलनों की एक श्रृंखला थी। साइमन कमीशन की रिपोर्ट के बाद, ये सम्मेलन भारतीयों के साथ मिलकर भारत के लिए स्वायत्तता और संविधान की रूपरेखा तैयार करने हेतु आयोजित किए गए थे. सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर का आमना-सामना हुआ था, जहां अंडेबकर ने दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) की मांग की…और गांधीजी ने इस मांग का कड़ा विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज टूट जाएगा…कहते है कि सम्मेलन में बातचीत के दौरान गांधी ने कहा—“मैं अछूतों के बारे में उस समय से सोच रहा हूं, जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे…”

इस पर अंबेडकर का जवाब तीखा और सीधा था… उन्होंने कहा—अगर आप सच में अछूतों के हितैषी होते…तो कांग्रेस में खादी पहनने से पहले…अस्पृश्यता खत्म करना अनिवार्य बनाते…अंबेडकर ने सवाल उठाया—क्या कभी उन लोगों पर कार्रवाई हुई…जो मंदिरों में दलितों के प्रवेश का विरोध करते थे?यही वो वैचारिक टकराव था…जहां गांधी सामाजिक सुधार को धीरे-धीरे बदलाव से जोड़ते थे…वहीं अंबेडकर तत्काल और ठोस अधिकारों की मांग करते थे…इस मतभेद के कारण सम्मेलन बिना किसी ठोस फैसले के समाप्त हो गया। आगे चलकर इसी मुद्दे पर गांधीजी ने 1932 में यरवदा जेल में आमरण अनशन किया, जिसके बाद पूना पैक्ट (1932) के तहत दलितों के लिए सीटें आरक्षित की गईं .जहां तक बात वीर सावरकर से मुलाकात की है—विनायक दामोदर सावरकर और अंबेडकर के बीच विचारों में कुछ समानताएं जरूर थीं, खासकर सामाजिक सुधार को लेकर…लेकिन अंबेडकर की विचारधारा पूरी तरह स्वतंत्र और अलग थी—वो किसी एक नेता से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों के आधार पर चलते थे…

हालांकि गांधी और अंबेडकर—

मतभेदों के बावजूद…

दोनों ने मिलकर उस भारत की नींव रखी…

जहां समानता, अधिकार और लोकतंत्र सबसे ऊपर है

वहीं… हम आपको ये भी बता दें कि साल 1935 में डॉ. भीमराव अंबेडकर की पहली पत्नी रमाबाई अंबेडकर का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था…

इस घटना ने अंबेडकर को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया…लेकिन… जिंदगी यहीं नहीं रुकी…लगातार बिगड़ती सेहत…मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर बीमारियों के बीच…उन्हें एक ऐसे साथी की जरूरत महसूस हुई… जो सिर्फ जीवनसाथी ही नहीं… बल्कि उनकी देखभाल भी कर सके…और फिर… 15 अप्रैल 1948 को उन्होंने दूसरी शादी की…उनकी दूसरी पत्नी थीं सविता अंबेडकर… जो एक ब्राह्मण परिवार से थीं…और पेशे से डॉक्टर भी…डॉ. सविता ने न सिर्फ उनका इलाज किया… बल्कि उनके जीवन के आखिरी वर्षों में… एक समर्पित साथी की तरह उनका साथ निभाया…

हालांकि… इस शादी का विरोध भी हुआ…क्योंकि उस दौर में एक दलित नेता का ब्राह्मण महिला से विवाह… समाज के लिए आसान बात नहीं थी…लेकिन अंबेडकर ने खुद अपनी किताब में लिखा… कि अगर वो सिर्फ एक नर्स रखते…तो समाज में गलतफहमियां पैदा हो सकती थीं… इसलिए…उन्होंने शादी का फैसला लिया…हां तक कि उन्होंने यह भी स्वीकार किया…कि सविता की देखभाल की वजह से ही.वो 8 से 10 साल ज्यादा जीवित रह सके…हालांकि इस दूसरी शादी से उन्हें कोई संतान नहीं हुई…जबकि पहली पत्नी रमाबाई से उनके पांच बच्चे हुए थे…लेकिन दुर्भाग्य से…उनमें से सिर्फ एक ही जीवित बच पाया…

29 अगस्त 1947… वो तारीख जब आज़ाद भारत के भविष्य की नींव रखी जा रही थी… और इस सबसे बड़ी जिम्मेदारी के लिए चुना गया एक ऐसा नाम… जिसने जिंदगी भर भेदभाव झेला… लेकिन कभी हार नहीं मानी…वो नाम था — डॉ. भीमराव अंबेडकर।संविधान सभा ने उन्हें Drafting Committee का चेयरमैन बनाया… यानी भारत के संविधान का मुख्य वास्तुकार।

लेकिन सवाल ये है — आखिर अंबेडकर ही क्यों?

पहला कारण — असाधारण विद्वता अंबेडकर सिर्फ पढ़े-लिखे नहीं थे… वो अपने दौर के सबसे बड़े विद्वानों में से एक थे…उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन समेत दुनिया के कई देशों के संविधानों का गहराई से अध्ययन किया था…उन्हें पता था कि भारत जैसे विविधता भरे देश के लिए कैसा संविधान चाहिए।

दूसरा कारण — कानून के महारथी कानून पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि संविधान सभा में उठने वाले सबसे कठिन सवालों का जवाब वो तर्क और तथ्यों के साथ देते थे.इसलिए उन्हें सबसे सक्षम नेता माना गया।

तीसरा कारण — सामाजिक न्याय की सोच अंबेडकर का सपना था — एक ऐसा भारत जहां हर व्यक्ति को बराबरी का अधिकार मिले…

जहां न कोई ऊंच-नीच हो… न कोई भेदभाव… इसी सोच ने संविधान में “समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व” जैसे मूल्यों को मजबूत किया।

चौथा कारण — हाशिए के लोगों की आवाजअंबेडकर सिर्फ एक नेता नहीं थे… वो उन करोड़ों लोगों की आवाज थे… जो सदियों से दबाए गए…इसलिए उनका संविधान हर वर्ग को साथ लेकर चलता है।और सबसे दिलचस्प बात…शुरुआत में उन्हें संविधान सभा में जगह तक नहीं मिली…लेकिन जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना…

और उन्हें वापस लाकर Drafting Committee का अध्यक्ष बनाया। कहना गलत नहीं होगा कि

“जिस इंसान को समाज ने हाशिए पर रखा…

उसी इंसान ने ऐसा संविधान लिखा… जिसने हर भारतीय को बराबरी का हक दिया…

इसलिए डॉ. अंबेडकर सिर्फ संविधान के निर्माता नहीं… बल्कि भारत के लोकतंत्र की आत्मा हैं…”

डॉ.भीमराव अंबेडकर दुनिया की एक ऐसी शख्सियत रहे हैं जिन्हें देश में नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में सम्मानित किया जा चुका है.. क्या आप जानते हैं…

एक ऐसा भारतीय…जिसकी प्रतिमाएं सिर्फ भारत में नहीं…बल्कि अमेरिका, लंदन, फ्रांस, जापान तक लगी हैं…आखिर कौन हैं वो…जिन्हें पूरी दुनिया सलाम करती है…?

वो नाम है…डॉ. भीमराव अंबेडकर…एक ऐसा व्यक्तित्व…जिन्होंने सिर्फ संविधान नहीं लिखा…बल्कि पूरी दुनिया कोसमानता और अधिकारों का असली मतलब समझाया…

ग्लोबल इंफेक्ट : सबसे पहले बात अमेरिका की…संयुक्त राज्य अमेरिका के मैरीलैंड में उनकी दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित है…जिसे “Statue of Equality” कहा जाता है…यही नहीं…Columbia Universityऔर Brandeis University जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भीउनका सम्मान किया गया है…अब चलते हैं लंदन… यूनाइटेड किंगडम में Ambedkar House आज भी उनकी यादों को संजोए हुए है…और London School of Economics…जहां उन्होंने पढ़ाई की…वहीं आज उनकी विरासत को सम्मान मिलता है…फ्रांस की राजधानी पेरिस मेंUNESCO मुख्यालय में उनकी प्रतिमा स्थापित है ये बताने के लिए काफी है…कि अंबेडकर सिर्फ भारत के नहीं…पूरी दुनिया के नेता हैं…कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम… और कई देशों में भी उनकी मौजूदगी देखी जा सकती है… बाबासाहेब का जीवन संघर्षों और उपलब्धियों की अनोखी मिसाल है. उनके जीवन से जुड़ीं तमाम कहानियां लोगों के लिए प्रेरणा हैं. 6 दिसंबर 1956 का दिन देश के लिए गहरे शोक का दिन बन गया जब बाबासाहेब ने अंतिम सांस ली. बीमारी से जूझते हुए भी उन्होंने अंतिम क्षणों तक बौद्ध धर्म सामाजिक सुधार और लेखन से खुद को जोड़े रखा..बाबासाहेब के अंतिम संस्कार में लाखों लोग शामिल हुए. उनका पार्थिव शरीर बौद्ध परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. उनका महापरिनिर्वाण सिर्फ एक महान आत्मा की विदाई नहीं थी बल्कि वह एक आंदोलन एक विचार और लाखों लोगों की प्रेरणा बन गए. आज भी उनका जीवन संघर्ष और विचार समाज को दिशा दिखा रहे हैं

नीलम अहिरवार
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नीलम अहिरवार

17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।

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