हिमालय में आया ‘बर्फीला सैलाब’ : मलबे ने नदी को बनाया तबाही का रास्ता, चंद मिनटों में उजड़ गया नेपाल

नई दिल्ली। नेपाल के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में बुधवार को आई भीषण आपदा ने पूरे क्षेत्र को दहला दिया। काठमांडू से करीब 45 किलोमीटर उत्तर में स्थित 7,234 मीटर ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत से शुरू हुई इस घटना ने कुछ ही मिनटों में बर्फ, चट्टान, पानी और मलबे की विशाल लहर को जन्म दे दिया। गुरुवार सुबह तक आधिकारिक तौर पर 175 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी, मृतकों की संख्या और बढ़ने की आशंका है।
17 हजार फीट से टूटा ग्लेशियर, नीचे मची तबाही
सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के विश्लेषण के मुताबिक, आपदा की शुरुआत करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई से ग्लेशियर के एक विशाल हिस्से के टूटने से हुई। करीब 2 हजार फीट चौड़ा बर्फ का यह हिस्सा लगभग 4 हजार फीट नीचे घाटी में आ गिरा। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि इससे 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा कंपन पैदा होने का अनुमान है।
बर्फ और चट्टानों का यह मलबा नीचे पहुंचते ही पानी, मिट्टी और पत्थरों के साथ करीब 100 फीट ऊंची लहर में बदल गया। यह भयावह लहर त्रिशुली नदी में जा मिली और रास्ते में आने वाली बस्तियों तथा बुनियादी ढांचे को रौंदती चली गई।
भूकंप ने ढहाया ग्लेशियर या हिमस्खलन से आया कंपन?
इसी दौरान सुबह 8ः37 बजे चीन सीमा के पास 4.4 तीव्रता का भूकंप भी दर्ज किया गया। वैज्ञानिक अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि भूकंप ने पहले से कमजोर ढलान को गिराया या विशाल हिमस्खलन के कारण ही भूकंपीय कंपन पैदा हुआ। ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियरों का पीछे हटना और कमजोर होती मोरेन भी इस क्षेत्र की अस्थिरता बढ़ा रहे हैं।
नदी बनी तबाही का रास्ता
मलबे ने चीन सीमा से जुड़ी ल्हेन्दे खोला नदी का प्रवाह रोक दिया। इससे अस्थायी झील बनी और उसके टूटने के बाद कीचड़ तथा बड़े पत्थरों की तेज धारा त्रिशुली नदी की ओर दौड़ पड़ी। कुछ ही समय में यह मलबा रसुवा चेकपॉइंट और आसपास के इलाकों तक पहुंच गया।
छह जलविद्युत परियोजनाएं तबाह
आपदा में भोटे कोसी और त्रिशुली नदी क्षेत्र की कम से कम छह प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं, बिजली सबस्टेशन और ट्रांसमिशन लाइनें नष्ट या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई हैं। नुवाकोट में 25 मेगावाट का सौर ऊर्जा संयंत्र भी कीचड़ में दब गया। करीब एक दर्जन पुल बह गए और कई प्रमुख सड़क मार्ग कट गए। अरबों डॉलर के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है।
2015 की त्रासदी की याद फिर ताजा
लांगटांग लिरुंग इससे पहले भी विनाश का गवाह बन चुका है। अप्रैल 2015 के 7.8 तीव्रता वाले भूकंप के बाद हिमस्खलन ने लांगटांग गांव को अपनी चपेट में ले लिया था। उस हादसे में कम से कम 300 लोगों की जान गई थी।
विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। चमोली, मेलामची, सिक्किम, थामे और भोटे कोसी के बाद यह आपदा एक और गंभीर चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय अस्थिरता मिलकर हिमालयी क्षेत्रों में बड़े संकट पैदा कर सकते हैं। नेपाल के सामने अब राहत-बचाव के साथ मजबूत चेतावनी प्रणाली, सीमा-पार सहयोग और जलवायु अनुकूलन में निवेश बढ़ाने की बड़ी चुनौती है।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
