सांसद हिमाद्री सिंह के वैवाहिक रिश्ते पर विराम : शादी के 9 साल पति नरेन्द्र सिंह मरावी से हुआ तलाक, आपसी सहमति पर कोर्ट ने लगाई मुहर

शहडोल। शहडोल लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हिमाद्री सिंह और नरेंद्र सिंह मरावी के बीच तलाक हो गया है। अनूपपुर जिले की राजेंद्रग्राम जिला अदालत ने हमाद्री सिंह और उनके पति नरेंद्र सिंह मरावी के विवाह विच्छेद को मंजूरी दे दी है। अदालत से मंजूरी मिलने के बाद अब वे पति-पत्नी नहीं रहे। करीब नौ साल पहले विवाह बंधन में बंधे इस दंपती के वैवाहिक रिश्ते का आपसी सहमति से अंत हो गया। दोनों का विवाह 23 नवंबर, 2017 को हिंदू रीति-रिवाज से राजेंद्रग्राम में हुआ था। शादी के बाद दोनों के बीच मतभेद पैदा हो गए, जिसके कारण वे पिछले लगभग पांच वर्षों से अलग रह रहे थे।
दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर कोई आरोप नहीं लगाया
शादी के बाद हिमाद्री सिंह और नरेंद्र सिंह मरावी राजेंद्रग्राम में साथ रहते थे। इस दौरान 20 जून, 2019 को उनकी बेटी का जन्म हुआ। बेटी के जन्म के बाद दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद शुरू हो गया। विवाद बढऩे पर दोनों का आपस में मिलना-जुलना बंद हो गया और वे 5 मई, 2021 से अलग रहने लगे।
विवाद बढ़ा तो अलग-अलग रहने लगे
न्यायालय में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, छोटी-छोटी बातों को लेकर दोनों के बीच विवाद होने लगे। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बनी कि दोनों का साथ रहना और मिलना-जुलना कम हो गया। आखिरकार 5 मई 2021 से दोनों अलग-अलग रहने लगे। करीब पांच साल तक अलग रहने के बाद दोनों ने वैवाहिक संबंध समाप्त करने का फैसला लिया।
साथ रहने की संभावना खत्म होने की बात
न्यायालय में हिमाद्री सिंह की ओर से बताया गया कि अब दोनों के बीच दाम्पत्य जीवन दोबारा शुरू होने की कोई संभावना नहीं है। दोनों ने स्वीकार किया कि उनके बीच वैवाहिक संबंध सामान्य रूप से चल पाना संभव नहीं है। तलाक की प्रक्रिया में एक-दूसरे पर किसी तरह का गंभीर या विशेष आरोप नहीं लगाया गया। दोनों ने अपनी इच्छा और आपसी सहमति से विवाह विच्छेद के लिए सहमति दी।
बेटी की जिम्मेदारी हिमाद्री के पास
अदालत के समक्ष यह भी स्पष्ट किया गया कि उनकी बेटी गिरिशा सिंह हिमाद्री सिंह के साथ रह रही है। बेटी की परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़े खर्चों की पूरी जिम्मेदारी हिमाद्री सिंह उठाएंगी। हिमाद्री ने अपने और बेटी के लिए नरेंद्र सिंह मरावी से किसी तरह का भरण-पोषण या गुजारा भत्ता मांगने से भी इनकार किया।
छह महीने तक सुलह की कोशिश, लेकिन बात नहीं बनी
न्यायालय ने तलाक की प्रक्रिया के दौरान दोनों को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने और फिर से साथ आने का अवसर दिया। इसके लिए छह महीने की अवधि दी गई। इस दौरान दोनों के बीच सुलह और पुनर्मिलाप की कोशिश भी हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका।
छह महीने की अवधि पूरी होने के बाद दोनों ने अदालत को बताया कि वे अब पति-पत्नी के रूप में साथ रहने में सक्षम नहीं हैं और अपनी इच्छा से वैवाहिक संबंध समाप्त करना चाहते हैं। इसके बाद न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों और दोनों की सहमति के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी।
admin
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
