नौकरी का संकट : “युवाओं का सब्र टूटा तो बदल सकता है सत्ता का खेल”

- डाॅ. गजेंद्र कुमार गुप्ता
युवाओं की नौकरी, भविष्य की चिंता और परीक्षाओं की तैयारी का गुस्सा और निराशा सत्ता बदल देती है। जब सालों-साल मेहनत करने के बाद भर्तियां लटकती हैं या सरकारी नौकरियां कम होती दिखती हैं, तो यह तनाव होना स्वाभाविक है।लेकिन इस चर्चा को सही दिशा में समझने के लिए आंकड़ों और आर्थिक सच्चाइयों को सही परिप्रेक्ष्य (Perspective) में देखना जरूरी है।
आंकड़ों का सही परिप्रेक्ष्य विकाशील देशों govt जॉब का 15 -20% के आंकड़े है, वह भी कुल आबादी (Total Population) का नहीं, बल्कि कुल कार्यबल (Total Workforce / Working Class) का होता है:कुल आबादी vs कार्यबल: भारत की आबादी लगभग 140 करोड़ है, लेकिन इसमें बच्चे, बुजुर्ग और वे लोग भी शामिल हैं जो काम नहीं करते। भारत का वास्तविक कार्यबल (Labour Force) लगभग 70 से 75 करोड़ का है।
विकसित देशों का मॉडल: OECD (विकसित देशों के संगठन) के अनुसार, उन देशों में कुल नौकरियों का लगभग 18% हिस्सा सार्वजनिक/सरकारी क्षेत्र में होता है (जैसे अमेरिका में 18%, ब्रिटेन में 20-23%)।
भारत का आंकड़ा: अगर कुल आबादी (140 करोड़) के हिसाब से देखें, तो भारत में सरकारी कर्मचारी (केंद्र + राज्य + रक्षा बल + पुलिस + PSUs + शिक्षक) कुल आबादी का लगभग 1.3% से 1.5% हैं। अमेरिका, जापान, जर्मनी या चीन—सबकी अर्थव्यवस्था का इंजन सरकारी और प्राइवेट सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर और एंटरप्रेन्योरशिप (उद्यमिता) रहा है।
असली समस्या कहाँ है? राजनीतिक बयानबाजी या किसी राज्य/समुदाय विशेष पर टिप्पणी करने के बजाय, बुनियादी कमियों को समझना ज़रूरी है :
रिक्त पदों की धीमी भर्ती: केंद्र और राज्यों में लाखों स्वीकृत पद (जैसे रेलवे, पुलिस, शिक्षण, स्वास्थ्य, न्यायपालिका) खाली पड़े हैं, जिन्हें समय पर न भरा जाना युवाओं के असंतोष की सबसे बड़ी वजह है।
पेपर लीक और कोर्ट केस: भर्ती परीक्षाओं में धांधली और अदालती मुकदमों के कारण वर्षों तक नियुक्तियां अटकी रहती हैं।
स्किल बनाम जॉब्स: जिस गति से हर साल लाखों डिग्री-धारक युवा निकल रहे हैं, उस गति से गुणवत्तापूर्ण नौकरियां (चाहे सरकारी हों या प्राइवेट) पैदा नहीं हो पा रही हैं।
निष्कर्ष: युवाओं की मांग कि खाली पड़े पदों को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से भरा जाए, पूरी तरह जायज है। साथ ही समस्या का स्थाई समाधान केवल सरकारी नौकरियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है जहाँ प्राइवेट सेक्टर, स्टार्टअप्स और मैन्युफैक्चरिंग में भी युवाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार मिल सके। मोदी सरकार इसमें पूरी तरह से विफल रही है। चुकी हम भविष्य देख सकते हैं, अतः इतना ही कह सकते हैं कि, अत्यंत ही गंभीर परिस्थिति के लिए तैयार रहो।
लेखक के अपने निजी विचार हैं।
admin
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