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समय का सच : 20 जुलाई के बाद भारत का सबसे बड़ा सवाल… सड़क पर कौन था, यह नहीं; व्यवस्था ने उन्हें वहाँ पहुँचने क्यों दिया?

admin

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Jul 27, 2026
11:52 AM
20 जुलाई के बाद भारत का सबसे बड़ा सवाल… सड़क पर कौन था, यह नहीं; व्यवस्था ने उन्हें वहाँ पहुँचने क्यों दिया?

-UMEESH GUPTA

जब किसी लोकतंत्र के सबसे मेधावी युवाओं को अपनी बात कहने के लिए सड़क चुननी पड़े, तो सबसे पहले सड़क नहीं, व्यवस्था की ओर देखना चाहिए।

20 जुलाई की घटना को कोई छात्र आंदोलन कहेगा, कोई प्रशासनिक कार्रवाई, कोई राजनीतिक संघर्ष और कोई लोकतांत्रिक प्रतिरोध। इन सभी दृष्टिकोणों का अपना स्थान है। लेकिन किसी भी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह होता है, जो तत्काल बहस से परे जाकर भविष्य के लिए प्रश्न छोड़ जाए।

20 जुलाई भी ऐसा ही एक दिन था। उस दिन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं था कि सड़क पर कौन था। सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि "आख़िर ऐसी परिस्थिति बनी ही क्यों कि हजारों युवाओं को अपनी बात सड़क पर रखनी पड़ी।"

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध असामान्य नहीं होता। असामान्य तब होता है, जब संवाद की जगह टकराव लेने लगे। यदि किसी समाज के मेधावी युवा यह महसूस करने लगें कि उनकी बात संस्थानों तक नहीं पहुँच रही, तो समस्या केवल एक परीक्षा, एक भर्ती या एक आदेश की नहीं रह जाती। तब प्रश्न पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का हो जाता है।

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। यह हमारी सबसे बड़ी जनसांख्यिकीय शक्ति है। लेकिन कोई भी शक्ति तभी तक शक्ति रहती है, जब तक उसके भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास जीवित रहता है।

युवा केवल नौकरी नहीं खोजता, वह न्याय भी खोजता है, वह अवसर भी खोजता है और सबसे बढ़कर - वह यह विश्वास खोजता है कि उसकी मेहनत का मूल्य किसी सिफारिश, संयोग या अव्यवस्था से कम नहीं आँका जाएगा।

इसलिए यह केवल रोजगार का प्रश्न नहीं है....यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं है....यह केवल प्रतियोगी परीक्षाओं का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न है " विश्वास" का, ....विश्वास कि संस्थाएँ निष्पक्ष हैं, विश्वास कि प्रक्रियाएँ पारदर्शी हैं और विश्वास कि संवाद के द्वार खुले हैं,विश्वास कि यदि कोई गलती होगी, तो उसे स्वीकार कर सुधारा जाएगा।

लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का दायित्व है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि नागरिकों, विशेषकर युवाओं, की बात सुनी जाए। सार्वजनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संवाद दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान इसी संतुलन से होती है।

20 जुलाई ने एक और सच्चाई स्पष्ट कर दी कि अब जनमत केवल संसद, सभाओं या समाचार चैनलों से नहीं बनता। हर नागरिक के हाथ में मौजूद मोबाइल फ़ोन लोकतांत्रिक संवाद का एक नया मंच बन चुका है। आज का युवा केवल मतदाता नहीं है। वह सूचना का स्रोत भी है। वह विश्लेषक भी है। वह प्रश्नकर्ता भी है और कई बार वही जनमत का निर्माता भी बन जाता है। इसलिए किसी भी व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल निर्णय लेना नहीं, बल्कि उन निर्णयों पर समाज का विश्वास बनाए रखना है।

विश्वास आदेश से नहीं आता, विश्वास पारदर्शिता से आता है, विश्वास संवेदनशीलता से आता है,विश्वास उत्तरदायित्व से आता है...."समय का सच यही है"…

किसी राष्ट्र का भविष्य तब संकट में नहीं आता, जब उसके युवा प्रश्न पूछते हैं। संकट तब शुरू होता है, जब व्यवस्था प्रश्नों को सुनना बंद कर देती है और अब कुछ प्रश्न… जिनके उत्तर शायद देश की हर संस्था को खोजने होंगे_

•क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को अवसर दे रही है या केवल प्रतिस्पर्धा का बोझ?

* क्या भर्ती और चयन प्रक्रियाएँ इतनी विश्वसनीय हैं कि परिश्रम करने वाला युवा निश्चिंत रह सके?

* क्या हमारी संस्थाओं ने संवाद की संस्कृति को पर्याप्त महत्व दिया है?

* क्या सरकारें केवल संकट आने के बाद सक्रिय होती हैं, या विश्वास निर्माण भी उनकी प्राथमिकता है?

* क्या असहमति को सुनने की क्षमता लोकतंत्र की ताकत मानी जाएगी या कमजोरी?

* और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या हम ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं, जहाँ युवाओं को अपनी बात रखने के लिए सड़क अंतिम विकल्प न लगे?

इतिहास घटनाओं को दर्ज करता है, समय उनके अर्थ को और 20 जुलाई का अर्थ शायद यही है _

"किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी ऊँची इमारतें, शक्तिशाली संस्थाएँ या लंबे भाषण नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि उसके युवाओं को यह भरोसा हो कि उनकी मेहनत, उनकी आवाज़ और उनका भविष्य तीनों सुरक्षित हाथों में हैं। जिस दिन यह विश्वास कमजोर पड़ने लगे, उसी दिन व्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हो जाती है और जिस व्यवस्था को अपने युवाओं का विश्वास बचाने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, उसे सबसे पहले अपने नागरिकों से नहीं, स्वयं से प्रश्न पूछने चाहिए..."यही समय का सच है।"

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं


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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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