‘क्या मुल्क को तोड़ना है?’ : मुनीर पर बरसे मौलाना , फजलुर रहमान ने 1971 की हार याद दिलाकर दी बड़ी चेतावनी

नई दिल्ली। पाकिस्तान के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेता मौलाना फजलुर रहमान ने देश की सेना और उसके नेतृत्व को लेकर एक बार फिर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मौजूदा हालात की तुलना 1971 के उस दौर से की, जब पाकिस्तान को भारत के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था। उनके बयान में देश की आंतरिक स्थिति और भविष्य की भौगोलिक अखंडता को लेकर गंभीर चिंता दिखाई दी।
‘बड़े-बड़े दावे पहले भी सुने हैं’
फजलुर रहमान ने कहा कि वह सेना की ताकत और उसके नेतृत्व की क्षमता से इनकार नहीं करते, लेकिन इतिहास के सबक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने दिसंबर 1971 की घटनाओं को याद करते हुए कहा कि आत्मसमर्पण से ठीक एक दिन पहले तत्कालीन सैन्य शासक जनरल याहया खान ने देश को संबोधित किया था और सेना के मजबूती से लड़ने की बात कही थी। मौलाना के मुताबिक, अगले ही दिन परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं और पाकिस्तानी सेना को हथियार डालने पड़े। इसी संदर्भ में उन्होंने मौजूदा सैन्य नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे बड़े-बड़े दावे पाकिस्तान पहले भी सुन चुका है।
बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा तक चिंता
फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के कई संवेदनशील क्षेत्रों में बिगड़ती स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में जारी हिंसा और संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि वहां लगातार लोगों की जान जा रही है। उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के रावलाकोट में चल रहे लंबे विरोध प्रदर्शन का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि वहां लोग कई महीनों से सड़कों पर हैं, लेकिन उनकी मांगों को लेकर गंभीर बातचीत नहीं की जा रही।
‘क्या पाकिस्तान को तोड़ने की तैयारी है?’
मौलाना ने बेहद गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर देश को लगातार ऐसे हालात में धकेलने का उद्देश्य क्या है। उन्होंने चेताया कि यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक हिंसा और असंतोष बना रहता है तो अलगाववादी सोच को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने कहा कि लगातार खून-खराबा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह जाता, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक और भौगोलिक परिणाम भी हो सकते हैं। उन्होंने अफगानिस्तान में दशकों से चले आ रहे संघर्ष का उदाहरण देते हुए क्षेत्र की अस्थिरता पर चिंता जताई।
सेना और सरकार से मांगा जवाब
फजलुर रहमान ने कहा कि पाकिस्तान के नेतृत्व को जनता के सामने अपनी नीतियों और भविष्य की दिशा स्पष्ट करनी चाहिए। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान कई इलाकों में सुरक्षा संकट, राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय असंतोष से जूझ रहा है। 1971 की हार का संदर्भ देकर सेना के दावों पर सवाल उठाने और देश के संभावित भौगोलिक बदलाव की चेतावनी देने वाले इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
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