सवाल जो कोई नहीं पूछता : चांद, करवाचौथ और बंद कमरों में रिश्तों का हिसाब!

- UMEESH GUPTA
करवाचौथ बीत गया। चांद निकल आया, छलनियों से चेहरे देखे गए, व्रत खुले, उपहारों का आदान-प्रदान हुआ और सोशल मीडिया पर प्रेम, समर्पण तथा वैवाहिक सुख की हजारों तस्वीरें अपलोड हो गईं। किसी ने पति की लंबी उम्र की कामना की, किसी ने पत्नी के लिए व्रत रखकर आधुनिकता का प्रमाण दिया। किसी ने महंगे उपहार दिए तो किसी ने अपने प्रेम को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने के लिए खूबसूरत रील बना डाली। कुछ घंटों के लिए ऐसा लगा मानो भारतीय समाज में प्रेम और वैवाहिक निष्ठा का स्वर्णिम युग लौट आया हो। लेकिन त्योहार की रौनक उतरते ही एक सवाल फिर खड़ा है कि
•क्या तस्वीरों में दिखाई देने वाला प्रेम वास्तविक जीवन में भी उतना ही मजबूत है?
•क्या एक दिन का उपवास पूरे साल की वफादारी की गारंटी बन सकता है? और
* क्या चांद को साक्षी बनाकर ली गई कसमें उन रिश्तों को भी बचा सकती हैं, जिनमें विश्वास कब का दम तोड़ चुका है?
सवाल करवाचौथ मनाने वालों से नहीं है। सवाल उस सामाजिक दोहरेपन से है, जिसमें परंपराओं का प्रदर्शन तो पूरी श्रद्धा से किया जाता है, लेकिन उनके मूल भाव को जीवन में उतारने की जिम्मेदारी अक्सर भुला दी जाती है।
परंपरा आस्था थी, हमने उसे प्रदर्शन बना दिया!
करवाचौथ भारतीय वैवाहिक संस्कृति का एक पुराना पर्व है। इसके पीछे जीवनसाथी के मंगल, प्रेम और दीर्घायु की कामना का भाव रहा है। किसी की आस्था, धार्मिक विश्वास या उपवास रखने के व्यक्तिगत निर्णय पर सवाल उठाने का कोई औचित्य नहीं।
लेकिन आज इस पर्व के साथ एक नया बाजार भी खड़ा हो गया है। डिजाइनर साड़ियां, महंगे आभूषण, विशेष मेकअप, होटल और रेस्तरां में आयोजन, महंगे उपहार और सोशल मीडिया की रोमांटिक तस्वीरें। किसने कितना खर्च किया, किसे कितना महंगा उपहार मिला और किसकी तस्वीर पर कितने लाइक्स आए, मानो वैवाहिक प्रेम का भी कोई वार्षिक टर्नओवर निर्धारित हो गया हो।
दिलचस्प यह है कि कई बार रिश्तों की वास्तविक स्थिति से ज्यादा उनकी सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली छवि की चिंता की जाती है।
जिस रिश्ते में बातचीत नहीं, वहां रोमांटिक कैप्शन हैं। जहां विश्वास नहीं, वहां एक-दूसरे के लिए सार्वजनिक घोषणाएं हैं। जहां भावनात्मक दूरी है, वहां चांद के साथ मुस्कराती तस्वीरें हैं।
"अब प्रेम महसूस करने से ज्यादा दिखाने की वस्तु बनता जा रहा है।"
रिश्ते बदल रहे हैं या रिश्तों के प्रति हमारी निष्ठा?
आधुनिक समाज में संबंधों की परिभाषाएं तेजी से बदली हैं। डेटिंग ऐप्स, सोशल मीडिया, ऑफिस के परिचय, दोस्ती और भावनात्मक नजदीकियों ने लोगों के लिए संबंध बनाने के अनेक रास्ते खोल दिए हैं। विवाह से पहले अनेक युवक-युवतियां एक से अधिक प्रेम संबंधों से गुजरते हैं। किसी के लिए यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, किसी के लिए जीवनसाथी की तलाश का अनुभव और किसी के लिए जीवन का सामान्य हिस्सा।
इसमें किसी व्यक्ति के अतीत को लेकर नैतिक अदालत लगाने की आवश्यकता नहीं। विवाह से पहले प्रेम संबंध होना किसी के चरित्र का अंतिम प्रमाणपत्र नहीं है।
लेकिन एक असहज सवाल यहां से शुरू होता है।
जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में अनेक संबंधों का अनुभव लेकर विवाह में प्रवेश करता है, तो क्या वह विवाह के बाद एकनिष्ठता की जिम्मेदारी को उसी सहजता से स्वीकार कर पाता है? क्या प्रेम को बार-बार बदलते विकल्पों की तरह देखने की आदत एक स्थायी प्रतिबद्धता में बदल सकती है?
और यदि कोई व्यक्ति विवाह के बाद भी नए आकर्षण, नए भावनात्मक सहारे और नए संबंधों की तलाश में रहता है, तो क्या उसे केवल आधुनिक जीवनशैली कहकर उचित ठहराया जा सकता है?
इसका उत्तर संबंधों की संख्या में नहीं, व्यक्ति की मानसिकता में है।
अनेक संबंधों का अनुभव रखने वाला व्यक्ति भी एकनिष्ठ और जिम्मेदार जीवनसाथी हो सकता है। वहीं बिना किसी पूर्व संबंध के विवाह करने वाला व्यक्ति भी बेवफाई कर सकता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि व्यक्ति संबंधों को किस नजर से देखता है, "एक अस्थायी आकर्षण की तरह या एक जिम्मेदार साझेदारी की तरह।"
आखिर आकर्षण और प्रतिबद्धता एक ही चीज तो नहीं हैं!
आकर्षण सहज हो सकता है, प्रेम भावनात्मक हो सकता है, लेकिन प्रतिबद्धता एक सचेत चुनाव है। किसी के साथ रहना, उसकी भावनाओं का सम्मान करना, कठिन परिस्थितियों में संवाद बनाए रखना और अपने व्यवहार की जिम्मेदारी स्वीकार करना; यही रिश्ते की वास्तविक परीक्षा है।
समस्या तब पैदा होती है जब व्यक्ति विवाह से पहले स्वतंत्रता के नाम पर हर तरह के विकल्प खुले रखना चाहता है, लेकिन विवाह के बाद अपने जीवनसाथी से संपूर्ण निष्ठा की अपेक्षा करता है। अपने लिए अलग नियम और दूसरे के लिए अलग नियम, यह आधुनिकता नहीं, सुविधा के अनुसार बनाई गई नैतिकता है।
और यह सवाल पुरुषों से भी उतना ही है जितना महिलाओं से। जो पति अपनी पत्नी से पारदर्शिता की अपेक्षा करता है, क्या वह स्वयं पारदर्शी है? जो पत्नी अपने पति से एकनिष्ठता चाहती है, क्या वह भी उसी जिम्मेदारी को स्वीकार करती है? निष्ठा का कोई स्त्री या पुरुष संस्करण नहीं होता।
सात फेरे क्या स्वभाव बदलने की गारंटी हैं?
भारतीय विवाह में सात फेरों और सात वचनों का अपना धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। लेकिन क्या सात फेरे लेने के बाद व्यक्ति की पुरानी आदतें, सोच और व्यवहार अपने आप बदल जाते हैं? क्या विवाह कोई ऐसी व्यवस्था है, जिसमें प्रवेश करते ही व्यक्ति के भीतर जिम्मेदारी, ईमानदारी और भावनात्मक परिपक्वता का नया सॉफ्टवेयर इंस्टॉल हो जाता है?
किसी व्यक्ति का अतीत उसकी पूरी जिंदगी तय नहीं करता, लेकिन उसका वर्तमान व्यवहार अवश्य बताता है कि वह रिश्ते को कितनी गंभीरता से लेता है। यदि कोई व्यक्ति लगातार झूठ बोलता है, संबंधों में पारदर्शिता से बचता है, भावनात्मक जिम्मेदारी नहीं निभाता और हर कठिनाई में नए विकल्प तलाशता है, तो विवाह का सामाजिक या धार्मिक बंधन अपने आप उसका स्वभाव नहीं बदल देगा।
बदलाव के लिए आत्मबोध चाहिए, इच्छा चाहिए और सबसे बढ़कर अपने जीवनसाथी के प्रति ईमानदारी चाहिए। विवाह केवल दो लोगों का एक घर में रहना नहीं है। यह दो व्यक्तियों का एक-दूसरे के विश्वास, स्वतंत्रता और भावनात्मक सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वीकार करना है।
एक दिन का व्रत और 365 दिन की जवाबदेही!
करवाचौथ पर पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है। यह उसकी आस्था और प्रेम का विषय है। लेकिन क्या पति पत्नी के सम्मान, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता और भावनात्मक सुरक्षा के लिए उतना ही प्रतिबद्ध है?
क्या पत्नी के त्याग का उत्सव मनाने वाला पति उसके सपनों और आकांक्षाओं को भी उतना ही महत्व देता है? क्या वह उसके आत्मसम्मान की रक्षा करता है? क्या वह उसके कठिन दिनों में उसके साथ खड़ा होता है?
और क्या पत्नी भी पति की भावनात्मक जरूरतों, असुरक्षाओं और जिम्मेदारियों को समझती है? रिश्ते में समानता का अर्थ है कि दोनों की भावनाओं और जिम्मेदारियों को बराबर महत्व मिले। "एक दिन भूखे रहकर जीवनसाथी की लंबी उम्र की कामना करना व्यक्तिगत आस्था है, लेकिन 365 दिन उसके विश्वास की रक्षा करना वास्तविक प्रतिबद्धता है।"
एक दिन चांद के सामने जीवनसाथी का चेहरा देखना सुंदर परंपरा है, लेकिन हर दिन उसके मन को समझना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
सबसे बड़ा संकट विवाह का नहीं, विश्वास का है!
आज ऐसे अनेक रिश्ते दिखाई देते हैं जिनमें पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अलग-अलग दुनिया में जीते हैं। मोबाइल पर सैकड़ों संपर्क हैं, पुराने रिश्तों की यादें हैं, नए परिचय हैं, लेकिन अपने जीवनसाथी से खुलकर बात करने का समय नहीं। कहीं भावनात्मक बेवफाई है, कहीं छिपे हुए संबंध, कहीं केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए निभाया जा रहा विवाह और कहीं संवाद के अभाव में धीरे-धीरे समाप्त होता अपनापन।
हालांकि यह मान लेना भी गलत होगा कि आधुनिक पीढ़ी के सभी रिश्ते खोखले हैं और पिछली पीढ़ी के सभी विवाह आदर्श थे। पहले भी विवाहों में बेवफाई, हिंसा, उपेक्षा और मजबूरियां थीं। फर्क यह है कि आज व्यक्ति के पास अपनी बात रखने और अपने जीवन के फैसले लेने के अधिक अवसर हैं।
इसलिए समस्या आधुनिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति है।
हम विवाह से पहले आर्थिक स्थिति की जांच करते हैं, परिवार की प्रतिष्ठा देखते हैं, व्यवसाय और संपत्ति का आकलन करते हैं। लेकिन क्या हम भावनात्मक परिपक्वता, ईमानदारी, क्रोध पर नियंत्रण और प्रतिबद्धता की क्षमता को भी उतनी गंभीरता से परखते हैं? हम जीवनसाथी चुनते समय भविष्य की सुविधाओं का हिसाब तो लगाते हैं, लेकिन भविष्य में विश्वास टूटने की संभावनाओं पर बातचीत करने से बचते हैं।
शायद इसीलिए विवाह की तैयारियां महीनों चलती हैं, लेकिन विवाह निभाने की तैयारी लगभग शून्य होती है।
अब करवाचौथ के साथ एक और व्रत जरूरी है!
करवाचौथ मनाइए, परंपरा निभाइए, चांद देखिए, उपहार दीजिए और प्रेम का उत्सव मनाइए। लेकिन उसके साथ एक ऐसा संकल्प भी लीजिए, जिसकी कोई तस्वीर सोशल मीडिया पर अपलोड नहीं की जा सकती। झूठ नहीं बोलने का संकल्प। अपने जीवनसाथी को भावनात्मक रूप से अकेला नहीं छोड़ने का संकल्प। विवाह के बाहर किसी संबंध को छिपाकर अपने साथी के विश्वास के साथ खिलवाड़ नहीं करने का संकल्प। असहमति होने पर अपमान नहीं, संवाद करने का संकल्प।
क्योंकि विवाह में एकनिष्ठता किसी की स्वतंत्रता छीनने का नाम नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्रता के साथ किसी एक रिश्ते के प्रति ईमानदार रहने का चुनाव है।
अंततः सवाल करवाचौथ का नहीं, हमारे चरित्र और हमारी प्राथमिकताओं का है।
चांद हर साल निकलेगा। छलनी हर साल उठेगी। व्रत हर साल रखे जाएंगे। प्रेम के संदेश भी हर साल लिखे जाएंगे। लेकिन क्या हम अपने रिश्तों में वह ईमानदारी ला पाएंगे, जिसकी कसमें हर करवाचौथ पर खाते हैं?
और अंत में कुछ सवाल, जिनका जवाब शायद चांद के पास भी नहीं है_
* "क्या हम जीवनसाथी से प्रेम करते हैं या केवल उसके साथ बने रहने की सामाजिक सुविधा से?"
•"क्या हम एक-दूसरे के प्रति वफादार हैं या केवल बेवफाई पकड़े जाने से डरते हैं?"
•"क्या हम विवाह निभा रहे हैं या समाज के सामने अपनी वैवाहिक छवि बचा रहे हैं?"
और सबसे बड़ा सवाल_जब जीवनसाथी की आंखों में देखने के बजाय हम किसी दूसरे की आंखों में अपना सुकून तलाशने लगें, तब करवाचौथ का व्रत किस रिश्ते के लिए रखा जा रहा होता है?
क्योंकि चांद के सामने वफादारी का प्रदर्शन करना आसान है, लेकिन बंद कमरों में अपने चरित्र और प्रतिबद्धता को ईमानदार बनाए रखना मुश्किल।
चांद तो हर महीने लौट आता है, लेकिन टूटे हुए विश्वास को लौटने में कभी-कभी पूरी जिंदगी लग जाती है। और याद रखिए, रिश्तों की उम्र व्रत से नहीं, विश्वास से बढ़ती है।
और यही वह सवाल है जो कोई नहीं पूंछता।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
