शुक्रवार, 5 जून 202608:30:08 PM
Download App
Home/देश

“सवाल जो कोई नहीं पूछता” : 'क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या...

admin

admin

Jun 05, 2026
09:01 AM
'क़स्मे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या...

- UMEESH GUPTA

"काशी" _ जहाँ मृत्यु को अंत नहीं, एक यात्रा का आरंभ माना जाता है। जहाँ घाटों की सीढ़ियाँ सिर्फ जल तक नहीं, जीवन के गहरे अर्थों तक पहुँचाती हैं। जहाँ मृत्यु भी मोक्ष का द्वार मानी जाती है, वहीं एक जीवन का अंत ऐसे हुआ कि उसने हमारे समय की सबसे असहज सच्चाई को उजागर कर दिया। जब एक ऐसी खबर आती है कि 100 से अधिक पुस्तकों के लेखक, "पद्मश्री" सम्मानित "श्रीनाथ खंडेलवाल" अपने अंतिम दिनों में वृद्धाश्रम में रहे और कथित रूप से अपने ही परिजनों से उपेक्षा पाई, तो यह खबर केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है- अपितु यह पूरे समाज का नैतिक पतन बन जाती है।

एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसे देश ने "पद्मश्री" देकर सम्मानित किया। जिसने शब्दों के माध्यम से समाज को दिशा दी, सौ से अधिक पुस्तकों के जरिए विचारों की विरासत छोड़ी-उसका अंतिम समय कथित रूप से एकांत, उपेक्षा और सवालों के बीच बीता।यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, यह उस समाज का एक्स-रे है जिसमें हम जी रहे हैं।

यह कहानी किसी काल्पनिक फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि हमारे समकालीन समाज का वह कड़वा और नग्न सच है जो हमारी रीढ़ में सिहरन पैदा कर देता है। वर्ष 2023 में जब काशी के मूर्धन्य साहित्यकार 'श्रीनाथ खंडेलवाल" को राष्ट्रपति भवन में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से नवाजा जा रहा था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अक्षरों के इस सम्राट् का अंतिम सफर इतना एकाकी और हृदयविदारक होगा।

यह कहानी हमें असहज करती है, क्योंकि इसमें कोई काल्पनिक नाटकीयता नहीं है। यहाँ एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं, जिन्होंने शब्दों को जीवन दिया। कहा जाता है कि उन्होंने पुराणों का गहन अध्ययन और लेखन किया, समाज को विचार दिए, और सार्वजनिक सम्मान भी पाया।

लेकिन "जीवन के आख़िरी पड़ाव पर प्रश्न यह नहीं रहा कि उन्होंने क्या लिखा; प्रश्न यह रहा कि उनके साथ कौन खड़ा था?" पिता की 80 करोड़ की अकूत संपत्ति को तो बच्चों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और उस पर कब्जा जमा लिया, लेकिन उस पिता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया जिसने उन्हें इस काबिल बनाया था।जिस शख्सियत की किताबों को पढ़कर पीढ़ियां संवरती रहीं, उन्हें अपने जीवन के अंतिम दिन एक अनाथ आश्रम (वृद्धाश्रम) की चारदीवारी में काटने पड़े।

और "यहीं से असली पीड़ा शुरू होती है..."

क्या यह विडंबना नहीं कि जिस व्यक्ति को राष्ट्र ने सिर आँखों पर बैठाया,सम्मानपत्र दिया, वह अपने ही जीवन के अंतिम पड़ाव पर कथित रूप से अकेला पड़ गया?

यहाँ समस्या किसी एक परिवार की नहीं है-परिवार/ समाज में दिन प्रतिदिन बढ़ती उस सोच की है, जहाँ उपलब्धियाँ रिश्तों की जगह लेने लगी हैं।

हमने अपने बच्चों को सफलता का पाठ तो पढ़ाया, लेकिन संवेदनाओं की भाषा सिखाना भूल गए।हमने उन्हें यह बताया कि कैसे आगे बढ़ना है, लेकिन यह नहीं सिखाया कि पीछे मुड़कर देखना भी है।

कथित 80 करोड़ की संपत्ति, बेटा बड़ा व्यवसाई,बेटी सुप्रीम कोर्ट में वकील, ये सब सुनने में कितनी बड़ी उपलब्धि की कहानी लगते हैं। लेकिन यदि अंतिम समय में एक पिता को अपने ही परिवार का सहारा न मिले, पुत्र ,पुत्री अपरिचित और अति व्यस्त हो जाए,तो यह उपलब्धि नहीं, एक विडंबना है।

यदि संबंध सूख जाएँ, तो भावनाओं का क्या मोल?

काशी में यह घटना इसलिए और तीखी लगती है क्योंकि यह नगर केवल "आस्था" का नहीं, "संस्कार" का भी प्रतीक है। यहाँ मृत्यु को भी गरिमा दी जाती है। यहाँ अंतिम संस्कार केवल विधि नहीं, एक सामाजिक कर्तव्य माना जाता है। फिर भी "यदि किसी वरिष्ठ साहित्यकार को अंतिम विदाई में अकेलापन मिले, तो यह सिर्फ परिवार की विफलता नहीं, समाज की संवेदनहीनता का प्रमाण है।"

"काशी का नाम लेते ही श्रद्धा जागती है, पर क्या श्रद्धा केवल मंदिरों तक सीमित रह गई है?"

"क्या घरों की आस्तिकता अब केवल बाहरी आचरण में बची है, भीतर मनुष्य मर चुका है?"

तो क्या आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि रिश्ते बाज़ार की भाषा में समझे जाने लगे हैं?

"बुज़ुर्ग अब प्रेम का विषय नहीं रहे, वे व्यवस्था, संपत्ति और सुविधा के बीच एक बोझ की तरह देखे जाने लगे हैं।"

जब तक वे कमाते हैं, सलाह देते हैं, या सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं, तब तक वे आवश्यक हैं। लेकिन जैसे ही वे निर्भर होते हैं, वे धीरे-धीरे हाशिए पर चले जाते हैं।यह समस्या सिर्फ अमीर या शिक्षित परिवारों की नहीं है। यह उस मानसिकता की है जहाँ कर्तव्य से ज़्यादा अवसर और संवेदना से ज़्यादा स्वार्थ निर्णायक बनने लगा है। यह वही दौर है जहाँ बच्चों को सफलता की भाषा तो सिखाई जा रही है, लेकिन माता-पिता की आँखों में उठती चुप्पी पढ़ना नहीं सिखाया जा रहा।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए कानून हैं, व्यवस्थाएँ हैं, शिकायत के रास्ते हैं। लेकिन कानून से दायित्व तय हो सकता है, " ममता' नहीं। "कानून यह सुनिश्चित कर सकता है कि कोई संतान कागज़ी तौर पर ज़िम्मेदार रहे, पर वह यह नहीं सिखा सकता कि बूढ़े माता-पिता की हथेली थामना भी एक "संस्कृति" है।"

"यही कारण है कि इस तरह की घटनाएँ केवल कानूनी प्रश्न नहीं बनतीं। ये नैतिक, सामाजिक और सभ्यतागत प्रश्न बन जाती हैं।" सबसे कड़वा सवाल यह है कि हम अपने समाज को कहाँ ले आए हैं? क्या अब एक बुज़ुर्ग की असली विरासत उसकी किताबें, उसके विचार, उसका सम्मान नहीं, बल्कि उसके पीछे बची संपत्ति है?

क्या हम उस मोड़ पर पहुँच चुके हैं जहाँ अंतिम संस्कार भी भावनाओं से नहीं, सुविधा से तय होते हैं?

यदि हाँ, तो यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं-हम सबकी सामूहिक हार है।

हम ऐसी घटनाओं को “व्यक्तिगत मामला” कहकर किनारे कर देते हैं।

लेकिन क्या यह सच में व्यक्तिगत है?

सबसे खतरनाक है हमारी सामूहिक चुप्पी ।।

जब एक बुजुर्ग, वह भी सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित,अपने अंतिम समय में कथित रूप से उपेक्षा का शिकार होता है-तो यह केवल एक घर की कहानी नहीं रहती, यह सामाजिक विफलता बन जाती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि आर्थिक प्रगति ने हमें सुविधाएं दी हैं, पर इस चमक की दौड़ में उसके दुगने अनुपात में संवेदनाएं तिल तिल मरती गई है।हम बेहतर जीवन जी रहे हैं, "लेकिन क्या बेहतर रिश्ते भी जी पा रहे हैं?" आज नहीं तो कल, हर व्यक्ति उसी मोड़ पर खड़ा होगा जहाँ उसे अपने लोगों की जरूरत होगी, न कि अपने बैंक बैलेंस की, तब क्या हमारे पास भी वही सन्नाटा होगा?

काशी की यह कहानी हमें झकझोरती है-कि अगर अब भी हमने अपने घरों में संवेदनाओं को नहीं बचाया,"तो आने वाले समय में सम्मान तो मिलेंगे,लेकिन कंधे नहीं।"

और शायद, यही हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी होगी।

चलते चलते...

" श्रीनाथ खंडेलवाल" की कहानी को केवल एक सनसनीखेज घटना की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इसे उस समाज के आईने की तरह पढ़ा जाना चाहिए, जो बाहर से सभ्य दिखता है, लेकिन भीतर से संवेदनाओं का कंकाल बनता जा रहा है।"

समृद्धि अगर संबंधों को निगल जाए,

सम्मान अगर अकेलेपन को न रोक पाए,

और संतान अगर अंतिम क्षणों में भी परायापन दे जाए,

तो फिर क्या हमें विकास, सभ्यता और 21वीं सदी का यही अर्थ समझना चाहिए?

"काशी ने एक बार फिर हमें बताया है कि मृत्यु के बाद की यात्रा से पहले जीवन में मनुष्यता बची रहनी चाहिए।

वरना धर्म, धन और प्रतिष्ठा-तीनों होते हुए भी मनुष्य अकेला ही रह जाता है ।

"श्रीनाथ खंडेलवाल जी" का चले जाना सिर्फ एक शरीर का अंत नहीं है, बल्कि यह हमारी "मरती हुई संवेदनाओं" का साक्षात् प्रमाण है। यह लेख उन तमाम बच्चों के मुंह पर एक तमाचा है जो माता-पिता की वसीयत तो संभाल लेते हैं, लेकिन उनकी वत्सलता और उनके बूढ़े शरीर को बोझ समझने लगते हैं।

तो, क्या किसी प्रतिष्ठित नागरिक का इस तरह अनाथालय में रहना सिर्फ एक पारिवारिक विवाद है, या यह हमारे पूरे तंत्र और सामाजिक ताने-बाने की सामूहिक विफलता है?

- और यही "वो सवाल है जो कोई नहीं पूंछता"।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट"
एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,

admin
Written By

admin

एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

आपको यह खबर कैसी लगी? शेयर करें

अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें