बबलू, छोटू, कालू, गोबरी या शैतान जैसे नाम निरर्थक : राजस्थान में स्कूल शिक्षा विभाग बदलवा रहा बच्चों के नाम

जयपुर। नाम में क्या रखा है? शेक्सपियर का यह मशहूर जुमला आज राजस्थान के गलियारों में नई बहस छेड़ चुका है। एक तरफ वो वीरधरा है जिसने शैतान सिंह जैसे परमवीर पैदा किए तो दूसरी तरफ सरकार का सार्थक नाम अभियान है जो कहता है कि शैतान या टिंकू जैसे नाम बच्चों के आत्मविश्वास को कम कर देते हैं। राजस्थान का शिक्षा विभाग अब स्कूलों में बच्चों के नाम सुधारने की लिस्ट बांट रहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या शिक्षा विभाग का काम नाम बदलना है या स्कूलों की बदहाल शिक्षा को दुरुस्त करना?
राजस्थान शिक्षा विभाग का मानना है कि बबलू, छोटू, कालू, गोबरी या शैतान्य जैसे नाम निरर्थक और नकारात्मक हैं, जिनसे बच्चों का मजाक उड़ता है। इसके बदले विभाग ने 3000 से ज्यादा श्सार्थक्य नामों की एक सूची जारी की है, जिसमें श्आरव, अथर्व और आराध्या्य जैसे नाम सुझाए गए हैं। सरकार का तर्क है कि इससे बच्चों में गौरव की अनुभूति होगी। यहां शहरों के नाम की बात नहीं हो रही। बच्चों के नाम क्या होने चाहिए ये बात सरकार कर है। राजस्थान का शिक्षा विभाग कह रहा है कि शेरू, शैतान, कालू, टिंकू, छोटू, बबलू, कचूम्बर, धापा, गोबरी, बावरी जैसे नाम बच्चों के नहीं होने चाहिए।
ऐसे नामों से बच्चों को झेलनी पड़ती है शर्मिंदगी
ऐसे नामों की वजह से बच्चे स्कूल में मजाक का शिकार हो जाते हैं और उन्हें शर्मिंदगी होती है। बड़ा होने पर उनमें आत्मविश्वास की कमी हो सकती है। कहा गया कि नाम सार्थक होना चाहिए ताकि बच्चा गर्व महसूस करे। वो तो ठीक है, लेकिन पब्लिक तो पहले ये देख रही है कि शिक्षा विभाग ये सब भी करता है क्या? सरकार कह रही है जबरदस्ती नहीं करेंगे, सि$र्फ नाम बदलने के लिए नए नाम सुझाएंगे। सरकार नाम सुझा रही है, वहीं सार्थक नामों की सरकार ने सूची बनाई है। लड़कों के 1409 नाम और लड़कियों के 1541 नामों की सूची बनाई है। इनमें कोई नाम चुन लो। आरव रख लो, अथर्व रख लो, अखंड रख लो, बालमुकुंद रख लो, बद्रीनाथ रख लो, आराध्या रख लो, अन्नपूर्णा रख लो, वैष्णवी रख लो।
टिंकू नाम रखने से आत्मविश्वास कम होगा
कह रहे हैं ये सम्मानजनक नाम है, तो क्या सरकारी स्कूलों में पढने वालों का आत्मविश्वास इसलिए कम होता है क्योंकि उनके माता-पिता ने उनका नाम टिंकू रख दिया। बबलू रख दिया? पढ़ाई अच्छी हो जाएगी सरकारी स्कूलों में तो आत्मविश्वास अपने आप नहीं बढ़ जाएगा। जब बच्चा $काबिल बन जाएगा और दुनिया में कुछ कर के दिखाएगा किसी क्षेत्र में तो उसका आत्मविश्वास नहीं बढ़ जाएगा।
शिक्षक माता-पिता से बात कर देंगे सुझाव
अगर संस्कार की ही बात है तो वो मां-बाप ही तय करते हैं ना। उनका बच्चा है वो नाम देते हैं और बच्चे को पसंद नहीं अपना नाम तो बड़ा हो कर ख़ुद बदल लेता है। कई लोग अपने नाम हाईस्कूल के सर्टिफकेट का फॉर्म भरने के टाइम बदल भी लेते हैं, क्योंकि फिर जि़ंदगीभर के लिए वो उनका नाम हो जाता है कागजों में। अगर बबलू का नाम आप अथर्व रखवा भी दोगे कागज पर तो बुलाएंगे तो उसको बबलू ही।
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