समय का सच : आंदोलन सत्ता बदलते हैं... या समाज?

-UMEESH GUPTA
किसी भी आंदोलन की असली जीत सत्ता परिवर्तन नहीं, समाज परिवर्तन होती है।"
"हर आंदोलन का मूल्यांकन उसके नारों से नहीं, उसके छोड़े हुए समाज से होता है।"
"हर आंदोलन की शुरुआत सड़क पर होती है, लेकिन उसका फैसला सड़क पर नहीं होता।उसका अंतिम निर्णय इतिहास की अदालत में होता है।"
लोकतंत्र में आंदोलनों का होना असामान्य नहीं है। बल्कि कई बार आंदोलन इस बात का प्रमाण होते हैं कि समाज ने अभी उम्मीद छोड़ना स्वीकार नहीं किया है। जब संवाद के रास्ते संकरे पड़ने लगते हैं, जब नागरिक को लगता है कि उसकी आवाज़ व्यवस्था तक नहीं पहुँच रही, तब सड़कें बोलना शुरू कर देती हैं।
आंदोलन केवल नारों की भीड़ नहीं होते। वे समाज की बेचैनी, उसकी आशा और उसके विश्वास की सार्वजनिक अभिव्यक्ति होते हैं। लेकिन हर आंदोलन अपने साथ एक ऐसा प्रश्न भी लेकर चलता है, जिसका उत्तर उसी दिन नहीं मिलता।
उसका उत्तर... समय देता है।
यही कारण है कि किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके मंच, उसकी भीड़ या उसके नारों से नहीं किया जा सकता। इतिहास हमेशा थोड़ा ठहरकर निर्णय देता है। भारत आंदोलनों की धरती रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर संपूर्ण क्रांति तक... भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन से लेकर किसानों, छात्रों और पर्यावरण से जुड़े आंदोलनों तक... हर पीढ़ी ने अपने संघर्ष देखे हैं।
मुद्दे बदले,
चेहरे बदले,
नारे बदले,
लेकिन एक प्रश्न कभी नहीं बदला-
क्या आंदोलन वास्तव में समाज को बदलते हैं, या केवल सत्ता के चेहरे?
महात्मा गांधी का दांडी मार्च केवल नमक का प्रश्न नहीं था। वह भारतीय आत्मसम्मान और नैतिक प्रतिरोध का प्रतीक था।
जयप्रकाश नारायण की "संपूर्ण क्रांति" केवल सरकार बदलने का अभियान नहीं थी। वह लोकतंत्र की नैतिक आत्मा को जगाने का प्रयास थी।
2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन लोकपाल की माँग लेकर शुरू हुआ। समय के साथ लोकपाल कानून बना, लेकिन उसी आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक नए नेतृत्व और नई राजनीतिक धारा के उदय का मार्ग भी प्रशस्त किया।
इन आंदोलनों के उद्देश्य अलग थे, परिस्थितियाँ अलग थीं और परिणाम भी अलग रहे। फिर भी एक बात समान थी_ कि इनका प्रभाव उनके घोषित उद्देश्यों से कहीं अधिक व्यापक था।
'यही इतिहास हमें सबसे महत्वपूर्ण सीख देता है।'
'किसी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसने कानून बनवाया या सरकार बदल दी। उसकी सबसे बड़ी सफलता यह होती है कि उसने नागरिक की चेतना, राजनीति की संस्कृति और समाज की नैतिकता को कितना प्रभावित किया। क्योंकि सरकार बदलना लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है...लेकिन...समाज बदलना एक पीढ़ी की साधना है।'
कुछ आंदोलन कानून बदलते हैं,
कुछ सरकारें बदलते हैं,
कुछ नए नेता पैदा करते हैं,
लेकिन "बहुत कम आंदोलन ऐसे होते हैं जो मनुष्य के भीतर प्रश्न जगाते हैं और वही आंदोलन इतिहास की दिशा बदलते हैं।"
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हर आंदोलन का आँख मूँदकर समर्थन किया जाए या हर आंदोलन पर संदेह किया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि हम हर आंदोलन से केवल तीन प्रश्न पूछें_
•क्या उसने संवाद को मजबूत किया?
•क्या उसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक उत्तरदायी बनाया?
•क्या उसने नागरिक चेतना को ऊँचा उठाया?
यदि उत्तर "हाँ'" है, तो वह आंदोलन अपने समय से आगे निकल चुका है। यदि उत्तर "नहीं" है, तो वह केवल एक राजनीतिक घटना बनकर रह जाएगा।
"सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र की प्रक्रिया है,
समाज परिवर्तन सभ्यता की उपलब्धि है,
सरकारें चुनाव से बदलती हैं,
सत्ताएँ गठबंधनों से बदलती हैं,
लेकिन...
समाज केवल चेतना से बदलता है।"
और यदि कोई आंदोलन समाज की चेतना को नहीं जगा पाया...तो इतिहास उसे "एक घटना" के रूप में याद रखेगा,
"परिवर्तन"के रूप में नहीं।
क्योंकि...
"इतिहास यह नहीं गिनता कि किसी आंदोलन में कितनी भीड़ थी। इतिहास यह भी नहीं लिखता कि मंच पर कौन खड़ा था। इतिहास केवल यह दर्ज करता है कि उस आंदोलन के बाद समाज कितना बदला।"
"समाज अपने आप नहीं बदलता। जब मनुष्य बदलता है, तभी समाज बदलता है..जब समाज बदलता है...तो राष्ट्र बदलता है,....जब राष्ट्र बदलता है...तो इतिहास बदलता है।
और जब इतिहास बदलता है...तब वह केवल घटनाएँ नहीं लिखता,...वह सभ्यताओं की दिशा लिखता है।"
यही... "समय का सच" है।
"समय कभी जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं देता।इसलिए इतिहास की सबसे विश्वसनीय अदालत "समय"ही है।"
और "समय का सच" है ।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
