West Bengal Election 2026 : क्या डोलेगा दीदी का सिंहासन ? मतदान परसेंटेज बढ़ने के बाद चर्चा तेज़, SIR है वजह, आंगड़े भी दे रहे गवाही...

भोपाल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 152 सीटों पर 93 फीसदी मतदान रहा, जो पिछले चुनाव के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा है। ये सत्ता परिवर्तन का एक अंदेशा माना जा रहा है। ऐसा बंगाल का इतिहास कहता है कि जब भी बंगाल में वोट परसेंटेज बढ़ा है सत्ता परिवर्तन जरूर हुआ है।
बंगाल में वोटिंग परसेंटेज बढ़ने के कारण
1. SIR(Special Intensive Revision)
SIR के कारण लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम या तो हटा दिए गए हैं या उन्हें जांच के दायरे में रखा गया है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12% है।आंकड़े बताते हैं कि 2024 लोकसभा चुनाव में इन्हीं 152 सीटों पर वोटिंग करीब 80% और 2021 विधानसभा चुनाव में करीब 82.17% रही थी।
2. एंटी-इंकंबेंसी (Anti-Incumbency)
भारी मतदान अक्सर मौजूदा सरकार के खिलाफ असंतोष का प्रतीक होता है। इस बार टीएमसी (TMC) सरकार को दो मोर्चों पर कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जिसमें भ्रष्टाचार के आरोप, राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला और टीएमसी के शीर्ष नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने आम जनता के बीच एक नकारात्मक संदेश भेजा है। महिला उत्पीड़न का मुद्दा जिसने संदेशखाली जैसी घटनाओं ने महिला मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को झकझोर कर रख दिया है। महिलाओं की सुरक्षा और उनके सम्मान का मुद्दा इस बार वोटिंग मशीनों पर भारी पड़ता दिख रहा है।
3. मुस्लिम वोट बैंक में सेंध या ध्रुवीकरण?
बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता हमेशा से 'किंगमेकर' रहे हैं। हुमायूं कबीर और ओवैसी (AIMIM) की सक्रियता और मतदाता सूची से नाम कटने का मुद्दा टीएमसी के सामने चुनौती पेश कर रहे हैं, जिससे मुस्लिम मतों के बंटवारे (Split) की प्रबल संभावना दिख रही है, जो भाजपा के लिए समीकरण बदल सकता है।
सरल शब्दों में कहें तो, जब 'डिनोमिनेटर' (कुल मतदाताओं की संख्या) से फर्जी नाम हटकर वह 'शुद्ध' (Pure) हो जाता है, तो मतदान करने वाले वास्तविक लोगों का प्रतिशत खुद ही ऊपर चला जाता है। यही कारण है कि 152 सीटों पर 93% का आंकड़ा देखने को मिल रहा है।
बंगाल में सत्ता परिवर्तन का इतिहास
कांग्रेस का पतन और गठबंधन का उदय (1967)
आजादी के बाद लगभग दो दशकों तक बंगाल में कांग्रेस का वर्चस्व था। लेकिन 1960 के दशक के मध्य में अकाल, बेरोजगारी और खाद्य संकट ने जनता में रोष पैदा किया। 1962 में मतदान करीब 55% था, लेकिन 1967 में यह उछलकर 66% के पार चला गया। इस बढ़ते वोट प्रतिशत ने कांग्रेस को बहुमत से नीचे धकेल दिया और अजय मुखर्जी के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'संयुक्त मोर्चा' सरकार बनी। यह पहली बार था जब बंगाल ने दिखाया कि भारी मतदान का मतलब बदलाव होता है।
ज्योति बसु का उदय और 'लाल युग' की शुरुआत (1977)
बंगाल के चुनावी इतिहास में सबसे निर्णायक मोड़ 1977 में आया। यह वह दौर था जब बंगाल की जनता कांग्रेस के शासन और आपातकाल के अनुभवों से त्रस्त थी। ज्योति बसु इस बदलाव के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे। 1977 के चुनावों में जब लोगों ने भारी मतदान किया, तो वह केवल वोट नहीं था, बल्कि कांग्रेस के खिलाफ एक जन-आक्रोश था। बसु ने बिखरे हुए वामपंथ को एकजुट किया और 'वाम मोर्चा' (Left Front) का गठन किया। भारी मतदान के कारण ही वाम मोर्चे को ऐतिहासिक बहुमत मिला और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने।
उन्होंने सत्ता में आते ही 'लैंड रिफॉर्म्स' (भूमि सुधार) और 'पंचायत राज' को मजबूत किया। ज्योति बसु का शासन इतना मजबूत रहा कि उन्होंने लगातार 23 साल (1977-2000) तक मुख्यमंत्री रहकर देश में एक रिकॉर्ड बनाया। उनके समय में वोटिंग प्रतिशत हमेशा उच्च रहा क्योंकि उन्होंने अपने कैडर को पोलिंग बूथ तक लाना सिखाया था।
पश्चिम बंगाल का सत्ता परिवर्तन का सफर

2011 से 2024 तक के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें, तो पहले चरण की इन 152 सीटों पर बीजेपी का ग्राफ तेजी से ऊपर गया है. 2011 में बीजेपी एक भी सीट नहीं जीत सकी, 2016 में यह आंकड़ा सिर्फ 3 तक पहुंचा था हालांकि 2016 के विधानसभा चुनाव में मदादाताओं का रुझान कम रहा था बावजूद इसके ममता बनर्जी ने सत्ता ने वापसी की थी इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब भी वोटिंग परसेंटेज बढ़े है सत्ता परिवर्तन देखने को मिला है। साल 2019 लोकसभा चुनाव में इन सीटों पर बीजेपी ने 86 पर बढ़त बनाई। 2021 विधानसभा चुनाव में 59 सीटें जीतीं. इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में 64 सीटों पर आगे रही। पीएम मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत इस चरण में झोंक दी है। हालांकि, TMC के लिए भी यह इलाका किसी दुर्ग से कम नहीं है।
4 मई को होगा फैसला, कौन मारेगा बाजी ?
2026 चुनाव का फैसला 4 मई को आ जाएगा और सबकुछ साफ हो जाएगा। इस बार बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी की टीएमसी और बीजेपी के बीच है। इस बार चुनाव सिर्फ दो चरणों में कराए जा रहे हैं, जबकि 2021 में आठ और 2016 में छह चरणों में मतदान हुआ था। हालांकि चरणों की संख्या कम हुई है, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं और चुनाव आयोग ने सख्त नियमों के पालन के लिए कई नए कदम उठाए हैं। पहले चरण में 152 सीटों पर 93 फीसदी मतदान रहा और दुसरे चरण का मददान 29 अप्रैल को होना है।
अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार अप्रैल की धूप में तृणमूल का फूल जोड़ा मुरझाएगा या बंगाल की धरती पर कमल खिलेगा.बहरहाल अभी कोई भी यह दावे के साथ नहीं कह सकता है कि बंगाल की भूभि बगावत बनेगी या फिर लगातार चौथी बार दीदी को चुनेगी।
ये भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल एसआईआर : वोटिंग प्रतिशत ने खोली सच्चाई की परत, विपक्ष के दावों पर सुप्रीम टिप्पणी
ये भी पढ़ें: टीएमसी का दीपक बुझने वाला है : दमदम की रैली में पीएम मोदी का तीखा प्रहार, बदलाव का भी किया ऐलान
खुशी राज
छात्रों और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रिपोर्टिंग। उत्साही तेवर। तेज़-तर्रार। अहम विषयों पर केंद्रित। लक्ष्य है- समाज में जागरूकता और सकारात्मक बदलाव।
