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समय का सच : रावण हर साल जलता है, फिर भी व्यवस्था में जिंदा क्यों है?

admin

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Oct 19, 2026
08:43 AM
रावण हर साल जलता है, फिर भी व्यवस्था में जिंदा क्यों है?

-UMEESH GUPTA

"दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं, सत्ता, समाज और नागरिक विवेक के आत्ममंथन का अवसर भी है।"

आज महानवमी है और कल देशभर में दशहरा मनाया जाएगा। मैदानों में रावण के पुतले जलेंगे, आतिशबाजी होगी और असत्य पर सत्य की विजय का उद्घोष गूंजेगा। भारतीय संस्कृति का यह पर्व हमें मर्यादा, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। लेकिन हर वर्ष एक सवाल हमारे सामने खड़ा होता है - यदि रावण का अंत हर साल होता है, तो हमारे समाज और व्यवस्था में बुराइयां आज भी क्यों मौजूद हैं? क्या हमने दशहरे को केवल एक परंपरा बना दिया है, जबकि उसकी वास्तविक शिक्षा को अपने सार्वजनिक और निजी जीवन से दूर कर दिया है?

यह सवाल किसी धर्म या आस्था पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर है जो आदर्शों की बात तो करती है, लेकिन उन्हें व्यवहार में उतारने में अक्सर पीछे रह जाती है।

रावण केवल एक पुतला नहीं, एक प्रवृत्ति है

रामायण का रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और अपार सामर्थ्य का स्वामी था। फिर भी उसका पतन हुआ, क्योंकि ज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ मर्यादा और सामर्थ्य के साथ विनम्रता नहीं बची। यही उसकी कथा का सबसे प्रासंगिक संदेश है। किसी व्यक्ति या व्यवस्था का पतन केवल संसाधनों की कमी से नहीं होता, कई बार वह तब शुरू होता है, जब शक्ति स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगती है।

आज की व्यवस्था में रावण किसी एक चेहरे या पद का नाम नहीं है। वह उस अहंकार में दिखाई देता है, जो सवालों को अपमान समझता है। वह उस भ्रष्टाचार में दिखाई देता है, जो जनसेवा के संसाधनों को निजी लाभ का साधन बना देता है। वह उस अन्याय में दिखाई देता है, जिसमें प्रभावशाली व्यक्ति के लिए रास्ते आसान और सामान्य नागरिक के लिए न्याय की राह कठिन हो जाती है।

रावण के दस सिरों से अधिक खतरनाक वह अहंकार था, जिसने उसे अपनी सीमाएं पहचानने नहीं दीं। यही अहंकार आज भी व्यक्ति, सत्ता और संस्थाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

सत्ता का धर्म: अधिकार नहीं, जवाबदेही

लोकतंत्र में सत्ता किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से प्राप्त सार्वजनिक दायित्व है। चुनाव जीतना शासन करने का संवैधानिक अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार जवाबदेही से मुक्त नहीं करता।

सरकार की सफलता केवल घोषणाओं, योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार से नहीं मापी जा सकती। उसका मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि नागरिकों तक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान कितनी प्रभावशीलता से पहुंच रहे हैं।

जब किसी नागरिक को अपने जायज काम के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, जब भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाला व्यक्ति स्वयं असुरक्षित महसूस करे या किसी कमजोर व्यक्ति की आवाज प्रभावशाली लोगों के सामने दब जाए, तब व्यवस्था को आत्ममंथन करना चाहिए।

हालांकि, लोकतंत्र में जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। विपक्ष का दायित्व भी सिर्फ विरोध करना नहीं, बल्कि तथ्यपूर्ण आलोचना और वैकल्पिक नीतियों के माध्यम से जनता के मुद्दों को सामने लाना है। संसद से लेकर स्थानीय निकायों तक बहस का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को अपमानित करना नहीं, बल्कि जनसमस्याओं का समाधान तलाशना होना चाहिए।

सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, ताकत है।

लोकतंत्र की खूबसूरती केवल बहुमत की शक्ति में नहीं, बल्कि असहमति के लिए उपलब्ध स्थान में भी निहित है। किसी नीति की आलोचना करना, निर्णयों पर सवाल उठाना और शासन से जवाब मांगना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है।

सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, उसे आलोचना और विरोध के बीच अंतर समझना होगा। स्वस्थ आलोचना व्यवस्था को कमजोर नहीं करती, वह उसकी कमियों को सामने लाकर सुधार का अवसर देती है। इसी तरह विपक्ष को भी अपनी आलोचना तथ्यों और जनहित के आधार पर करनी चाहिए।

संस्थाओं की स्वतंत्रता, कानून का समान अनुपालन और संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान किसी एक सरकार की सुविधा के विषय नहीं हैं। ये लोकतंत्र की विश्वसनीयता के आधार हैं। शक्ति की वास्तविक परीक्षा इस बात में है कि उसका उपयोग कितना न्यायपूर्ण और जवाबदेह ढंग से किया जाता है।

समाज के भीतर पलता रावण

व्यवस्था की बुराइयों पर चर्चा करते समय समाज को भी अपने भीतर झांकना होगा। हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलते हैं, लेकिन कभी-कभी अपना काम जल्दी कराने के लिए अनुचित रास्ता तलाशते हैं। हम महिला सम्मान की बात करते हैं, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा और समानता को व्यवहार में सुनिश्चित करने में पीछे रह जाते हैं। हम समानता का समर्थन करते हैं, फिर भी जाति, वर्ग और आर्थिक हैसियत के आधार पर लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं।

यह विरोधाभास बताता है कि बुराइयां केवल शासन या संस्थाओं में नहीं, हमारे अपने आचरण में भी जगह बना सकती हैं।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को व्यापक मंच दिया है, लेकिन अफवाहों, अपुष्ट सूचनाओं और घृणा के प्रसार की चुनौती भी बढ़ाई है। किसी सूचना की पुष्टि किए बिना उसे साझा करना या मतभेद रखने वाले व्यक्ति को शत्रु समझ लेना सामाजिक विवेक को कमजोर करता है।

धार्मिक पर्वों की सार्थकता केवल आयोजन की भव्यता से नहीं, बल्कि उनसे मिलने वाली नैतिक प्रेरणा से भी तय होती है। यदि हमारी आस्था हमें अधिक संवेदनशील, संयमित और न्यायप्रिय नहीं बना पाती, तो हमें अपने आचरण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

मीडिया और संस्थाओं की अग्निपरीक्षा

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और जिम्मेदार मीडिया आवश्यक है। पत्रकारिता का काम केवल घटनाओं का प्रसारण या सत्ता के बयानों को दोहराना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सामने लाना भी है जिनके उत्तर जनता को मिलने चाहिए।

जब मीडिया तथ्यों की जांच करता है, सार्वजनिक नीतियों पर सवाल उठाता है और आम नागरिक की समस्याओं को विमर्श का हिस्सा बनाता है, तब वह लोकतंत्र को मजबूत करता है। इसके विपरीत, जब सनसनी तथ्य पर भारी पड़ने लगे और निष्पक्ष पड़ताल की जगह पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष ले लें, तब जनविश्वास प्रभावित होता है।

इसी प्रकार प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता उनके निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत कामकाज पर निर्भर करती है। किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा केवल उसके अधिकारों से नहीं, बल्कि उसके आचरण और नागरिकों के अनुभव से भी बनती है।

रामराज्य का आदर्श और आज की व्यवस्था

भारतीय जनमानस में रामराज्य न्याय, मर्यादा और लोककल्याण की कल्पना से जुड़ा है। इस आदर्श को सार्थक बनाने के लिए उसे भाषणों और प्रतीकों से आगे बढ़ाकर सार्वजनिक नीतियों तथा नागरिक जीवन में उतारना होगा।

जहां गरीब को न्याय पाने के लिए अपनी आर्थिक हैसियत से संघर्ष न करना पड़े, जहां महिलाओं की सुरक्षा केवल घोषणाओं तक सीमित न हो, जहां बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और सरकारी पद को विशेषाधिकार के बजाय सेवा का माध्यम माना जाए, वहीं लोककल्याणकारी शासन का आदर्श वास्तविक रूप लेने लगता है।

इसके लिए केवल इच्छाशक्ति के दावे पर्याप्त नहीं हैं। ईमानदार संस्थाएं, पारदर्शी प्रक्रियाएं, जवाबदेह नेतृत्व और जागरूक नागरिक आवश्यक हैं। अपनी कमियों को स्वीकार करना राष्ट्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उन्हें सुधारने की पहली शर्त है।

इस दशहरे एक संकल्प अपने भीतर भी लें

कल जब रावण का पुतला जले, तब उत्सव जरूर मनाइए। अपनी परंपरा, संस्कृति और आस्था का सम्मान कीजिए। लेकिन एक क्षण यह भी सोचिए कि हमारे भीतर और हमारे आसपास कौन-सी बुराइयां हैं, जिन्हें समाप्त करने का संकल्प हम लगातार टालते जा रहे हैं।

सत्ता अपने अहंकार पर नियंत्रण रखे, विपक्ष अपनी जिम्मेदारी समझे, संस्थाएं निष्पक्षता और जवाबदेही के मानकों पर खरी उतरें, मीडिया तथ्य और जनहित को प्राथमिकता दे तथा नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी निर्वहन करें, तभी विजयादशमी का संदेश वास्तविक सामाजिक अर्थ प्राप्त करेगा।

रावण का पुतला जलाने के लिए मैदान चाहिए, लेकिन उसकी प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए साहस, विवेक और चरित्र चाहिए। पहली घटना हर वर्ष होती है; दूसरी के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है।

दशहरा केवल उस रावण की पराजय का उत्सव नहीं होना चाहिए, जो रामायण में था। यह उस अहंकार, अन्याय और अनैतिकता के विरुद्ध भी संकल्प का दिन होना चाहिए, जो आज हमारे निर्णयों, व्यवहार और व्यवस्था में जगह बना लेते हैं।

राष्ट्र की वास्तविक विजय तब नहीं होती, जब मैदान में रावण का पुतला गिरता है; राष्ट्र की वास्तविक विजय तब होती है, जब न्याय के सामने अहंकार झुकता है, कर्तव्य के सामने स्वार्थ हारता है और संविधान के सामने सत्ता स्वयं को जवाबदेह मानती है।

यही दशहरे का संदेश है। यही समय का सच है।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं


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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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