समय का सच : विघ्नहर्ता के देश में इतने विघ्न क्यों?

-UMEESH GUPTA
आज 'गणेश चतुर्थी है।'
घर-घर गणपति विराजेंगे, आरती होगी, मोदक चढ़ेंगे और करोड़ों लोग एक ही प्रार्थना करेंगे कि "हे गणपति, हमारे विघ्न दूर करो ।"
लेकिन इसी उत्सव के बीच एक प्रश्न हमारी व्यवस्था के सामने भी खड़ा होना चाहिए कि जिस देश में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है, उसी देश के आम नागरिक के जीवन में इतने विघ्न क्यों हैं?
यह प्रश्न आस्था पर नहीं, व्यवस्था पर है। गणेश का स्वरूप स्वयं जीवन-दर्शन है । बड़ा मस्तक दूरदृष्टि का, बड़े कान सुनने की क्षमता का, छोटी आंखें सूक्ष्म विवेक का और मूषक इस सत्य का प्रतीक कि समाज का सबसे छोटा व्यक्ति भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि इन चार प्रतीकों को शासन और प्रशासन के सामने रख दिया जाए, तो शायद सुशासन की पूरी परिभाषा इन्हीं में समा जाती है । दूरदर्शी निर्णय, संवेदनशील सुनवाई, वास्तविकता की गहरी समझ और अंतिम व्यक्ति के प्रति समान सम्मान।
यही कसौटी है, जिस पर आज हमारी व्यवस्था को परखा जाना चाहिए।
सुविधा नहीं, विश्वास चाहिए -
पिछले एक दशक में भारत ने प्रशासनिक सेवाओं के डिजिटलीकरण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। प्रमाणपत्र, शिकायत, भुगतान, पंजीयन और अनेक सरकारी सेवाएं अब ऑनलाइन उपलब्ध हैं। यह परिवर्तन आवश्यक भी था और स्वागतयोग्य भी। लेकिन तकनीक ने एक प्रश्न और खड़ा किया है कि क्या नागरिक का जीवन वास्तव में आसान हुआ या केवल प्रक्रिया का माध्यम बदल गया?
किसी शिकायत का ऑनलाइन दर्ज हो जाना समाधान नहीं है। किसी आवेदन को ट्रैक कर पाना न्याय नहीं है। नागरिक की दृष्टि से व्यवस्था की सफलता तब शुरू होती है जब उसे समयबद्ध, निष्पक्ष और सम्मानजनक परिणाम मिले।
आज भी अनेक लोग यह अनुभव करते हैं कि आवेदन जमा करने से लेकर अंतिम निर्णय तक सबसे कठिन यात्रा प्रक्रिया की नहीं, बल्कि प्रतीक्षा की होती है। हर लंबित फाइल केवल एक प्रशासनिक संख्या नहीं होती; उसके पीछे किसी विद्यार्थी का भविष्य, किसी किसान की आय, किसी उद्यमी का निवेश या किसी परिवार की उम्मीद जुड़ी होती है।
राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक का समय बचाना है, क्योंकि समय ही जीवन की सबसे लोकतांत्रिक संपत्ति है।
आंकड़ों से आगे का भारत-
विकास आवश्यक है और उसके लिए आंकड़े भी आवश्यक हैं। सड़क कितनी बनी, कितने घर बने, कितने लाभार्थी जुड़े, कितनी सेवाएं डिजिटल हुईं। ये सभी प्रगति के महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
लेकिन शासन का अंतिम मूल्यांकन आंकड़ों से नहीं, अनुभव से होता है। किसी योजना की सफलता का अर्थ केवल उसका बजट खर्च होना नहीं है; सफलता तब है जब पात्र व्यक्ति तक उसका लाभ बिना अपमान, बिना अनावश्यक दौड़-भाग और बिना सिफारिश पहुंचे।
किसी अस्पताल की क्षमता रिपोर्ट में पर्याप्त दिखाई दे सकती है, लेकिन मरीज के अनुभव में यदि लंबी प्रतीक्षा, अव्यवस्था और असहायता हो तो कागज और जमीन के बीच की दूरी स्पष्ट हो जाती है।
यही अंतर घोषणा और डिलीवरी का है।
भारत की अगली प्रशासनिक छलांग नई योजनाओं से अधिक बेहतर क्रियान्वयन में छिपी है। नागरिक अब केवल यह नहीं पूछता कि सरकार ने क्या घोषित किया; वह यह पूछता है कि उसे वास्तव में क्या मिला।
सबसे बड़ा विघ्न _ अनिश्चितता -
हम अक्सर विघ्न को भ्रष्टाचार, लालफीताशाही या दफ्तरों की कतार तक सीमित कर देते हैं। लेकिन आज के भारत में एक अदृश्य विघ्न तेजी से बढ़ा है, वह है "अनिश्चितता।'
•युवा मेहनत करता है, लेकिन उसे नहीं पता भर्ती कब पूरी होगी।
•किसान उत्पादन करता है, लेकिन उचित मूल्य कब मिलेगा यह निश्चित नहीं।
•छोटा उद्योग शुरू होता है, लेकिन स्वीकृतियों की समयसीमा अस्पष्ट रहती है।
•न्याय मांगने वाला व्यक्ति जानता है कि प्रक्रिया शुरू हो गई है, लेकिन अंत कब आएगा, इसका अनुमान कठिन है।
अनिश्चितता केवल आर्थिक समस्या नहीं होती; वह सामाजिक विश्वास को भी कमजोर करती है। जिस समाज में नागरिक को अपने अधिकार के परिणाम का भरोसा न हो, वहां संस्थाओं के प्रति सम्मान धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।
लोकतंत्र की असली ताकत कानून में नहीं, कानून के समय पर लागू होने में है।
पहुंच नहीं, समान अवसर-
हमारा लोकतंत्र बराबरी का वादा करता है। इसलिए किसी भी व्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षा यह नहीं कि वह शक्तिशाली के लिए कितनी सक्षम है, बल्कि यह कि वह सामान्य नागरिक के लिए कितनी निष्पक्ष है।
यदि किसी व्यक्ति का काम नियम से अधिक परिचय पर निर्भर हो जाए, यदि सिफारिश अधिकार से अधिक प्रभावी दिखाई देने लगे, यदि पहुंच प्रक्रिया पर भारी पड़ने लगे, तो समस्या किसी एक विभाग की नहीं रहती; वह संस्थागत संस्कृति का प्रश्न बन जाती है।
यहीं हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर दोष केवल सत्ता का नहीं है। नियम तोड़कर अपना काम पहले करा लेना यदि सामाजिक चतुराई माना जाएगा, तो नियम आधारित व्यवस्था कभी मजबूत नहीं हो सकती। रिश्ता, दबाव और व्यक्तिगत प्रभाव यदि अधिकार का विकल्प बन जाएंगे, तो सबसे अधिक नुकसान उसी नागरिक को होगा जिसके पास केवल कानून है, कोई पहुंच नहीं।
इसलिए सुशासन दोतरफा अनुबंध है_ जवाबदेह शासन और सजग नागरिक।
गणेश चतुर्थी का सबसे बड़ा संदेश-
हर वर्ष हम गणपति से बुद्धि की कामना करते हैं। शायद आज देश को बुद्धि से अधिक उसके उपयोग की आवश्यकता है। दूरदर्शिता केवल चुनावी चक्र तक सीमित न रहे। सुनवाई केवल औपचारिक जनसुनवाई न बने। निर्णय केवल फाइलों की गति से नहीं, नागरिक जीवन की जरूरतों से तय हों और विकास की अंतिम इकाई कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि वह व्यक्ति बने जिसके लिए संविधान ने समान अवसर और समान गरिमा का वादा किया है।
गणेश जी की पूजा कुछ दिनों का उत्सव है, लेकिन उनके संदेश का अर्थ पूरे वर्ष की जिम्मेदारी है।
यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, प्रशासन की भी है; केवल प्रशासन की नहीं, नागरिक समाज की भी है; और केवल नागरिक समाज की नहीं, हर उस व्यक्ति की है जो व्यवस्था से सुविधा तो चाहता है, लेकिन नियमों का सम्मान करने में पीछे हट जाता है।
आज आवश्यकता भगवान से नए चमत्कार की नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा बनाए गए अनावश्यक विघ्नों को समाप्त करने के संकल्प की है।
जब किसी नागरिक को अपने अधिकार के लिए कृपा नहीं, प्रक्रिया पर भरोसा होगा; जब सरकारी कार्यालय में प्रवेश करते समय उसके मन में भय नहीं, विश्वास होगा; जब अंतिम व्यक्ति को भी यह अनुभूति होगी कि व्यवस्था उसे सुनती है, तभी हम वास्तव में विघ्नहर्ता के संदेश को समाज में उतार पाएंगे।
इस गणेश चतुर्थी पर दीप केवल मंदिरों में नहीं, संस्थाओं की कार्यसंस्कृति में भी जलना चाहिए।
क्योंकि अंततः प्रश्न यही है_
विघ्नहर्ता के देश में विघ्न हमारी नियति हैं या हमारी बनाई हुई व्यवस्था की कमियां?
यदि उत्तर ईमानदारी से खोज लिया गया, तो शायद यही गणपति की सबसे सच्ची आराधना होगी और यही आज का सबसे महत्वपूर्ण समय का सच।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
