मंगलवार, 14 जुलाई 202612:42:49 AM
Download App
Home/देश

समय का सच : "आस्था की दानपेटी और नैतिकता का ऑडिट"

admin

admin

Jul 13, 2026
06:56 AM
"आस्था की दानपेटी और नैतिकता का ऑडिट"

-UMEESH GUPTA

"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।"

- निदा फ़ाज़ली

कभी-कभी एक शेर पूरी सभ्यता का आईना बन जाता है। निदा फ़ाज़ली की यह पंक्ति केवल शायरी नहीं, बल्कि धर्म की आत्मा का सार है। यह बताती है कि पूजा का सर्वोच्च स्वरूप मनुष्य के दुःख को कम करना है।

लेकिन एक प्रश्न हम सबको स्वयं से पूछना चाहिए_

क्या हमें याद है कि हमने आख़िरी बार किसी भूखे को भोजन कब कराया था?

किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में सहयोग कब किया था? किसी बीमार की दवा का खर्च उठाया था?

किसी मजदूर को उसकी मेहनत से अधिक सम्मान दिया था?

किसी प्यासे पशु-पक्षी के लिए पानी रखा था?

या बिना किसी स्वार्थ के अपने माता-पिता के चरण दबाए थे?

शायद इन प्रश्नों का उत्तर तुरंत याद न आए। लेकिन यह अवश्य याद होगा कि हमने मंदिर में आख़िरी बार चढ़ावा कब चढ़ाया था।

यहीं से धर्म और आस्था के बीच का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है।

भारत आस्था का देश है। यहाँ मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, वे संस्कृति, सेवा, शिक्षा और सामाजिक एकता के केंद्र भी रहे हैं। सदियों से धार्मिक संस्थाओं ने अन्नदान, शिक्षादान, चिकित्सा और लोककल्याण की परंपरा को आगे बढ़ाया है।

आज भी अनेक धार्मिक संस्थाएँ इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। देशभर के अनेक मंदिर, गुरुद्वारे और धार्मिक ट्रस्ट प्रतिदिन लाखों लोगों को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और राहत सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं। वहीं, अक्षय पात्र जैसी संस्था करोड़ों बच्चों तक मध्यान्ह भोजन पहुँचाने के लिए आधुनिक वित्तीय पारदर्शिता, स्वतंत्र ऑडिट और सार्वजनिक वार्षिक रिपोर्ट जैसी व्यवस्थाएँ अपनाती है।

यही भारत की वास्तविक धार्मिक परंपरा है_जहाँ दान, सेवा बनता है, और सेवा, साधना।

लेकिन इसी उजाले के बीच समय-समय पर ऐसे समाचार भी सामने आते हैं, जिनमें धार्मिक संस्थाओं में चढ़ावे की राशि के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं या जवाबदेही की कमी के आरोप लगते हैं। ऐसे प्रत्येक मामले का निष्पक्ष और कानूनी परीक्षण होना चाहिए, क्योंकि यह केवल धन का नहीं, बल्कि श्रद्धा का प्रश्न है।

"मंदिर की दानपेटी में जब कोई भक्त दस रुपये डालता है, तो वह केवल एक नोट नहीं डालता। वह अपनी आशा, अपनी पीड़ा, अपना विश्वास और अपने भगवान के प्रति समर्पण उस दानपेटी में रख देता है।"

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि दान कितना आया।

प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कहाँ हुआ।

यदि दान अस्पताल बना रहा है, विद्यालय चला रहा है, गरीब का उपचार करा रहा है, भूखे को भोजन करा रहा है, गौशाला, अनाथालय, छात्रावास या समाज सेवा में लग रहा है, तो वही दान प्रसाद बन जाता है।

लेकिन यदि वही धन किसी व्यक्ति की निजी सुविधा, प्रभाव या संपत्ति का साधन बन जाए, तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ विश्वासघात है।

धर्म कभी धन संग्रह का माध्यम नहीं रहा। भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ है - कर्तव्य, सेवा, संयम और लोककल्याण।

गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है_

"परहित सरिस धरम नहिं भाई,

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।"

यानी परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं।

इसलिए यह लेख किसी धर्म, किसी संप्रदाय, किसी पुजारी या किसी धार्मिक संस्था के विरुद्ध नहीं है। यह केवल उस मानसिकता के विरुद्ध है, जो भगवान के नाम पर प्राप्त विश्वास को निजी अधिकार समझ बैठती है।

आज आवश्यकता किसी नए धर्म की नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थाओं में अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की है।

यदि एक गैर-सरकारी संस्था अपनी ऑडिट रिपोर्ट, वार्षिक लेखा-जोखा और धन के उपयोग का विवरण सार्वजनिक कर सकती है, तो बड़े धार्मिक ट्रस्ट भी स्वेच्छा से ऐसा क्यों नहीं कर सकते? इससे श्रद्धा कम नहीं होगी, बल्कि और मजबूत होगी।

समय की माँग है कि धार्मिक संस्थाएँ स्वयं आगे बढ़कर कुछ सरल सिद्धांत अपनाएँ_

* प्रत्येक वर्ष स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट।

* आय-व्यय का सार्वजनिक विवरण।

* दान राशि के उपयोग की वार्षिक रिपोर्ट।

* डिजिटल भुगतान और डिजिटल रसीद की व्यवस्था।

* सेवा परियोजनाओं की नियमित सार्वजनिक जानकारी।

* प्रबंधन में उत्तरदायित्व और नैतिक आचार संहिता।

आख़िर भगवान को पारदर्शिता से भय कैसा?

विश्वास वहीं सबसे अधिक मजबूत होता है, जहाँ छिपाने के लिए कुछ नहीं होता।

भक्तों की भी जिम्मेदारी है कि उनकी आस्था जागरूक हो। प्रश्न पूछना अधर्म नहीं है। यदि प्रश्न ईमानदारी, पारदर्शिता और सेवा के लिए पूछा जाए, तो वही धर्म की रक्षा का माध्यम बन जाता है।

"हमें यह भी समझना होगा कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं हैं। वे उस वृद्ध माँ की आँखों में हैं, जो बेटे की प्रतीक्षा कर रही है; उस पिता की थकी मुस्कान में हैं, जिसने परिवार के लिए अपना जीवन खपा दिया; उस भूखे बच्चे में हैं, जिसे भोजन चाहिए; उस मजदूर में हैं, जिसे सम्मान चाहिए; उस पशु-पक्षी में हैं, जिसे पानी चाहिए।"

यदि हमारी पूजा इन तक नहीं पहुँचती, तो केवल चढ़ावा चढ़ा देने से धर्म पूर्ण नहीं हो जाता।

भगवान कभी अपने हिस्से का धन नहीं माँगते।

वे केवल मन की सच्चाई माँगते हैं।

वे सोने-चाँदी के आभूषणों से अधिक स्वच्छ चरित्र, निर्मल व्यवस्था और निष्कलंक सेवा को स्वीकार करते हैं।

इसलिए प्रश्न चंदे का नहीं है।

प्रश्न विश्वास का है।

"क्योंकि मंदिर की दानपेटी में केवल रुपये नहीं होते-उसमें किसी किसान का पसीना, किसी मजदूर की मेहनत, किसी माँ की मन्नत, किसी वृद्ध की अंतिम श्रद्धा और किसी बच्चे की मासूम आस्था भी सुरक्षित होती है।"

उसकी रक्षा केवल कानून नहीं कर सकता।

उसकी रक्षा चरित्र करता है।

समय का सच यही है_

जहाँ धर्म पर धन हावी होने लगे, वहाँ इमारतें तो बची रह सकती हैं, लेकिन आस्था धीरे-धीरे ढहने लगती है।

और जहाँ दान सेवा बन जाए, वहाँ भगवान स्वयं समाज के बीच उतर आते हैं।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं

admin
Written By

admin

एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

आपको यह खबर कैसी लगी? शेयर करें

अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें