..तो सीधे एससी का दरवाजा क्यों खटखटाया : दिल्ली हाईकोर्ट की सौरव दास-आशुतोष रांका को दो टूक, जानें क्या है पूरा मामला

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोई में बुधवार को सीजेपी एक्टिविस्ट सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिक चिम्नी और दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा पेश हुए हैं।
सुनवाई के दौरान ने कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई की मांग पर सहमित तो जताई, लेकिन न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की विशेष पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए सवालों पर सुनवाई करते हुए सवाल दागा की जब कानून में राहत पाने के दूसरे रास्ते उपलब्ध हैं, तो सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा क्यों खटखटाया गया। अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई निर्धारित थी, तो उससे पहले उच्च न्यायालय आने की इतनी जल्दी क्यों थी।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 11 अक्तूबर को शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया था। जंतर मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई किए जाने के बाद वे वहां गए और कथित तौर पर बैरिकेड तोड़ा। अदालत ने पूछा कि बॉन्ड तोड़ने के बाद एसईएम अदालत में नियत प्रक्रिया का पालन करने के बजाय सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आने की जरूरत क्या है। अदालत ने सुझाव दिया कि दोपहर दो बजे एसईएम अदालत की कार्यवाही का इंतजार किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर बाद में रिवीजन याचिका दायर की जा सकती है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर मकसद सत्ता परिवर्तन है, तो इसे चुनावों के जरिए ही हासिल किया जाना चाहिए।
हिरासत बढ़ाने के आदेश पर उठाए सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिक चिमनी ने 14 और 19 अक्टूबर को पारित आदेशों को रद्द करने की मांग की। उनका कहना था कि शांति भंग होने की आशंका के आधार पर हिरासत बढ़ाने का निर्णय मनमाना था और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 135 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई के लिए तत्काल आधार होना आवश्यक है। उनके अनुसार, विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को इस तरह हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं था।
इस पर अदालत ने कहा कि उसकी भूमिका मुख्य रूप से यह जांचने की है कि निर्णय लेते समय उचित प्रक्रिया अपनाई गई या नहीं। तथ्यों और साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करना अपीलीय अदालत का काम है।
जमानतदारों को चार बार खारिज करने का मुद्दा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने दावा किया कि उनके जमानतदारों को चार बार खारिज किया गया। उन्होंने आशंका जताई कि यदि याचिका वापस लेकर निचली अदालत में राहत मांगी गई और वहां फिर जमानतदार अस्वीकार कर दिए गए, तो उन्हें दोबारा उच्च न्यायालय आना पड़ेगा। इससे याचिकाकर्ताओं की हिरासत भी बढ़ सकती है।
अदालत ने कहा कि जमानतदारों को खारिज करने का प्रश्न अलग है। यदि इस निर्णय को चुनौती देने के लिए अपील का विकल्प उपलब्ध है, तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा? अदालत ने यह भी पूछा कि जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध उपाय अपनाने के बजाय सीधे संवैधानिक अधिकारों के तहत याचिका क्यों दायर की गई।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया पर जोर
सुनवाई के दौरान अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि मामले में उपलब्ध कानूनी उपायों पर भी विचार करना जरूरी है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने सरकार की ओर से पक्ष रखा और कहा कि याचिकाकर्ताओं को नए जमानतदार प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था।
अदालत ने यह भी सवाल किया कि बांड की शर्तों के कथित उल्लंघन के बाद संबंधित कानूनी सुरक्षा किस सीमा तक लागू होगी। सुनवाई में मुख्य मुद्दे हिरासत बढ़ाने के आदेश की वैधता, जमानतदारों की अस्वीकृति और उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों के इस्तेमाल को लेकर रहे।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
