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Supreme Court : वैवाहिक झगड़ों में झूठे आपराधिक मामलों पर सख्त टिप्पणी, वकीलों को भी जिम्मेदारी निभाने की नसीहत

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May 30, 2026
07:47 AM
वैवाहिक झगड़ों में झूठे आपराधिक मामलों पर सख्त टिप्पणी, वकीलों को भी जिम्मेदारी निभाने की नसीहत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बढ़ते झूठे और दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इतना ही नहीं अदालत ने दो टूक शब्दों में यह भी कहा कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अदालतों और वकीलों दोनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है ताकि व्यक्तिगत रंजिश को कानून के दुरुपयोग का माध्यम न बनाया जाए।

बच्चों को विवादों में खींचे जाने पर नाराजगी

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें पति और उसके परिवार के खिलाफ 10 से अधिक आपराधिक और दीवानी मामले दर्ज किए गए थे। अदालत ने विशेष रूप से यह कहा कि वैवाहिक विवादों में बच्चों को भी अनावश्यक रूप से घसीटा जा रहा है और कई बार उन्हें एक पक्ष के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति है।

लंबा वैवाहिक विवाद

यह मामला 2008 में हुई शादी से जुड़ा है, जिसमें दंपति के दो बच्चे हैं। वर्ष 2011 में पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी, जबकि बच्चे पति और उसके परिवार के साथ रहने लगे। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच कई आपराधिक और दीवानी मुकदमे दर्ज हुए, जिनमें 498।, घरेलू हिंसा, हत्या के प्रयास और तलाक से जुड़े मामले शामिल थे।

2024 में दायर एक शिकायत में पति पर अपनी नाबालिग बेटी से दुष्कर्म और उसके चाचा पर यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों पर भी उत्पीड़न और धमकी देने के आरोप लगाए गए।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं और वे किसी ठोस मेडिकल या विश्वसनीय साक्ष्य से समर्थित नहीं हैं। अदालत ने यह भी पाया कि शिकायत और पीड़िता के बयान लगभग एक जैसे थे, जिससे यह संकेत मिलता है कि मामला प्रतिशोध की भावना से दर्ज किया गया प्रतीत होता है।

पीठ ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को अत्यंत सतर्क रहना चाहिए, विशेषकर जब आरोप दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े हों। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले से चल रहे वैवाहिक विवादों में तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर या तोड़-मरोड़कर पेश करने की संभावना अधिक रहती है।

वकीलों और न्याय प्रणाली की जिम्मेदारी

अदालत ने वकीलों की भूमिका पर भी जोर दिया और कहा कि उनकी सामाजिक जिम्मेदारी है कि वे अपने मुवक्किलों को ऐसे तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मुकदमे दर्ज करने से रोकें। पीठ ने कहा कि अधिवक्ताओं को हर वैवाहिक विवाद को मानवीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए और पक्षों के बीच समझौते को बढ़ावा देना चाहिए।

अदालत ने किया स्पष्ट

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल इस विशेष मामले के तथ्यों तक सीमित हैं और इन्हें वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों को कमजोर करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने की आवश्यकता पर बल दिया।

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